Class 10 Hindi Chapter 9: लखनवी अंदाज़
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यशपाल और डिब्बे में बैठे नवाब साहब
लेखक एकांत की चाह में सेकंड क्लास के डिब्बे में चढ़ता है, जहाँ एक नवाब साहब पहले से बैठे हैं। दोनों संकोच में चुप रहते हैं। फिर नवाब साहब खीरा खाने का न्योता देते हैं और बड़े करीने से उसकी तैयारी करते हैं।
What you will be able to do
- यशपाल के जीवन, क्रांतिकारी जुड़ाव और प्रमुख रचनाओं का परिचय दे सकेंगे।
- बता सकेंगे कि लखनवी अंदाज़ किस उद्देश्य से लिखा गया व्यंग्य है।
- डिब्बे में लेखक और नवाब साहब के आपसी संकोच और अनुमानों का विश्लेषण कर सकेंगे।
- नवाब साहब द्वारा खीरा खाने की तैयारी की पूरी प्रक्रिया क्रम से लिख सकेंगे।
- लेखक के बार-बार इनकार को आत्मसम्मान के भाव से जोड़कर समझा सकेंगे।
Key points
यशपाल का जन्म सन् 1903 में पंजाब की फ़ीरोज़पुर छावनी में हुआ; शुरुआती पढ़ाई काँगड़ा में हुई।
लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़ते हुए वे भगत सिंह और सुखदेव के संपर्क में आए और क्रांतिकारी धारा से जुड़कर जेल गए।
सन् 1976 में उनका देहांत हुआ; वे आम आदमी की चिंताओं को उठाने वाले यथार्थवादी लेखक थे।
झूठा सच देश-विभाजन के दर्द पर लिखा उनका प्रसिद्ध उपन्यास है; दिव्या और अमिता भी उनके उपन्यास हैं।
लखनवी अंदाज़ यह दिखाने के लिए लिखा गया कि बिना कथ्य के कहानी नहीं बनती, पर यह स्वतंत्र व्यंग्य के रूप में भी पढ़ा जाता है।
लेखक भीड़ से बचने, कहानी पर सोचने और बाहर के दृश्य देखने के लिए सेकंड क्लास का टिकट लेता है।
डिब्बे में लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सज्जन पालथी मारे बैठे थे, और सामने तौलिए पर दो ताज़े खीरे रखे थे।
लेखक के आने से नवाब साहब असहज दिखे; लेखक ने भी स्वाभिमान के कारण उनसे नज़रें फेर लीं।
नवाब साहब ने खीरे धोए, पोंछे, सिर काटकर झाग निकाला, छीलकर फाँकें सजाईं और उन पर नमक-मिर्च छिड़का।
Full explanation
यशपाल: क्रांतिकारी से कथाकार तक
यशपाल हिंदी के उन लेखकों में हैं, जिनका जीवन ख़ुद किसी उपन्यास जैसा रहा। उनका जन्म सन् 1903 में पंजाब की फ़ीरोज़पुर छावनी में हुआ। शुरुआती पढ़ाई काँगड़ा में हुई, और फिर उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से बी.ए. किया। इसी कॉलेज में उनकी जान-पहचान भगत सिंह और सुखदेव जैसे युवा क्रांतिकारियों से हुई। आज़ादी की लड़ाई की क्रांतिकारी धारा से जुड़ने के कारण उन्हें जेल की सज़ा भी काटनी पड़ी। सन् 1976 में उनका देहांत हुआ।
क्रांति का यह अनुभव उनके लेखन में भी दिखता है। यशपाल की रचनाओं के केंद्र में आम आदमी है, उसकी परेशानियाँ, उसके सपने और उसका संघर्ष। वे यथार्थवादी शैली के लेखक हैं, यानी जीवन को बिना रंग-रोगन के, जैसा है वैसा दिखाते हैं। समाज की ऊँच-नीच, राजनीति का पाखंड और पुरानी रूढ़ियाँ, इन सब पर उनकी कलम खुलकर चलती है। उनकी भाषा बहुत स्वाभाविक और जीवंत है, मानो पात्र हमारे सामने बात कर रहे हों।
उनकी कहानियों के कई संग्रह छपे, जिनमें फूलो का कुर्ता, पिंजरे की उड़ान, ज्ञानदान, वा दुलिया और तर्क का तूफ़ान प्रमुख हैं। उपन्यासों में झूठा सच सबसे प्रसिद्ध है। यह भारत के बँटवारे की त्रासदी का एक मार्मिक दस्तावेज़ माना जाता है। इसके अलावा दिव्या, मेरी तेरी उसकी बात, पार्टी कामरेड, दादा कामरेड और अमिता भी उनके चर्चित उपन्यास हैं।
यह व्यंग्य क्यों लिखा गया?
लखनवी अंदाज़ के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। उस समय हिंदी साहित्य में नयी कहानी नाम का एक आंदोलन चल रहा था। कुछ लेखकों का दावा था कि कहानी के लिए ठोस घटना, पात्र या विचार ज़रूरी नहीं, लेखक चाहे तो किसी भी चीज़ से कहानी गढ़ सकता है। यशपाल इस सोच से सहमत नहीं थे। उन्होंने यह रचना यह साबित करने के लिए लिखी कि बिना कथ्य, यानी बिना कहने लायक़ बात के, कहानी नहीं बन सकती।
पर यह रचना केवल एक साहित्यिक बहस का जवाब भर नहीं है। इसे एक स्वतंत्र व्यंग्य के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। इसमें लेखक उस ढलते हुए सामंती वर्ग पर चोट करता है, जो असलियत से आँखें मूँदकर एक बनावटी, दिखावटी जीवन जीने का आदी हो गया था। ऐसा वर्ग अपनी शान दिखाने के लिए कुछ भी कर सकता है, भले ही उससे उसका अपना नुक़सान हो। लेखक मानता है कि ऐसी परजीवी संस्कृति, जो बिना मेहनत के दूसरों के सहारे पलती है, आज भी हमारे आसपास देखी जा सकती है।
इस तरह इस छोटी-सी रचना में एक साथ दो निशाने हैं। एक तरफ़ नवाबी नज़ाकत और झूठी शान है, तो दूसरी तरफ़ ऐसी कहानियाँ, जिनमें कहने को कुछ होता ही नहीं।
सेकंड क्लास का टिकट और एकांत की चाह
रचना एक छोटी रेलयात्रा से शुरू होती है। एक मुफ़स्सिल, यानी बड़े शहर के आसपास के इलाक़ों में चलने वाली पैसेंजर ट्रेन छूटने को तैयार है। लेखक को ज़्यादा दूर नहीं जाना था। सेकंड क्लास का किराया ज़्यादा था, फिर भी उसने वही टिकट लिया। उसका इरादा था कि भीड़-भाड़ से दूर बैठकर वह अपनी नयी कहानी के बारे में सोचेगा और खिड़की से बाहर के प्राकृतिक नज़ारे भी देखेगा।
गाड़ी सरकने लगी थी, इसलिए लेखक लपककर एक छोटे डिब्बे में चढ़ गया, यह सोचकर कि वह ख़ाली होगा। पर डिब्बा ख़ाली नहीं था। एक बर्थ पर लखनऊ के नवाबी ख़ानदान से दिखने वाले एक सफ़ेदपोश, यानी भले और इज़्ज़तदार दिखने वाले सज्जन आराम से पालथी मारकर बैठे थे। उनके सामने एक तौलिए पर दो ताज़े, चिकने खीरे रखे थे।
लेखक के अचानक डिब्बे में कूद आने से नवाब साहब की आँखों में नाराज़गी झलकी, मानो उनके अकेलेपन में किसी ने ख़लल डाल दिया हो। उन्होंने बातचीत में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। लेखक भी स्वाभिमानी था। वह सामने की बर्थ पर बैठ गया और उसने भी नवाब साहब की ओर से नज़रें फेर लीं।
लेखक के अनुमान: नवाब साहब क्यों असहज हैं?
लेखक को ख़ाली बैठकर कल्पना के घोड़े दौड़ाने की पुरानी आदत थी। अब वह सोचने लगा कि नवाब साहब इतने असहज क्यों हैं। पहले उसे लगा कि शायद वे भी किसी कहानी की सूझ में डूबे हों। फिर उसने सोचा कि शायद उन्हें इस बात की झेंप है कि कोई उन्हें खीरे जैसी मामूली चीज़ का शौक़ करते देख रहा है।
फिर लेखक ने एक और अनुमान लगाया। शायद नवाब साहब ने यह सोचकर सेकंड क्लास का टिकट लिया कि डिब्बे में कोई नहीं होगा, और पैसे भी कुछ बचेंगे। अब उन्हें यह अच्छा नहीं लग रहा कि शहर का कोई भला आदमी उन्हें फ़र्स्ट क्लास के बजाय मँझले दर्जे में सफ़र करता देख ले। शायद अकेले सफ़र का समय काटने के लिए ही उन्होंने खीरे ख़रीदे थे, और अब किसी के सामने उन्हें खाने में शर्म आ रही थी।
ये सारे अनुमान दिखाते हैं कि नवाबी शान की सबसे बड़ी चिंता यह है कि लोग क्या कहेंगे। असली ज़रूरत, जैसे भूख या किफ़ायत, उसके लिए छोटी बात है, और दिखावा बड़ी। लेखक कनखियों से, यानी तिरछी नज़र से, नवाब साहब पर नज़र रखे हुए था।
न्योता और इनकार
कुछ देर नवाब साहब खिड़की से बाहर देखते रहे, जैसे किसी फ़ैसले पर पहुँचने की कोशिश कर रहे हों। फिर अचानक उन्होंने लेखक की ओर मुड़कर बड़े अदब से आदाब किया और पूछा कि क्या वे खीरा पसंद करेंगे। यह बदलाव लेखक को अच्छा नहीं लगा। उसे लगा कि नवाब साहब अपनी शराफ़त का भ्रम बनाए रखने के लिए उसे भी मामूली लोगों जैसी हरकत में शामिल करना चाहते हैं, ताकि अकेले खीरा खाते हुए वे छोटे न दिखें।
लेखक ने भी उसी तहज़ीब में जवाब दिया। उसने शुक्रिया कहा और किबला, यानी आदरणीय कहकर नवाब साहब से ही शौक़ फ़रमाने का आग्रह किया। यह विनम्र इनकार था, पर इसके पीछे लेखक का अपना स्वाभिमान था। दोनों ओर शिष्टता के शब्द हैं, पर भीतर दोनों अपनी-अपनी इज़्ज़त बचाने में लगे हैं। यही इस प्रसंग का मज़ेदार व्यंग्य है।
खीरे की शाही तैयारी
अब नवाब साहब ने फिर एक बार खिड़की के बाहर देखा, और फिर पक्के इरादे के साथ काम में जुट गए। उन्होंने खीरों के नीचे रखा तौलिया झाड़कर अपने सामने बिछाया। सीट के नीचे से लोटा निकाला और खिड़की से बाहर हाथ निकालकर दोनों खीरे धोए। फिर तौलिए से उन्हें पोंछा।
इसके बाद जेब से चाकू निकला। उन्होंने दोनों खीरों के सिरे काटे और कटे हिस्से को रगड़कर उसका झाग निकाला, ताकि कड़वाहट न रहे। फिर बहुत सावधानी, यानी एहतियात से खीरे छीले और उनकी फाँकें करीने से तौलिए पर सजाते गए। लखनऊ स्टेशन के खीरे वाले जानते थे कि खीरा कैसे खाया जाता है, इसलिए वे ग्राहक को जीरा-मिला नमक और पिसी लाल मिर्च की पुड़िया भी देते थे। नवाब साहब ने बड़े सलीक़े से हर फाँक पर नमक और मिर्च बुरक दिया, यानी छिड़क दिया।
इस पूरे काम के दौरान उनके चेहरे का हर भाव और जबड़ों का हिलना बता रहा था कि खीरे के स्वाद की कल्पना से उनके मुँह में पानी भर आया है। लेखक मन ही मन सोच रहा था कि मियाँ रईस बनते हैं, पर किसी की नज़र न होने के भरोसे पर अपनी असलियत पर उतर आए हैं।
दूसरा न्योता और लेखक का स्वाभिमान
तैयारी पूरी होने पर नवाब साहब ने फिर लेखक को खीरा खाने का न्योता दिया, और गर्व से बताया कि यह लखनऊ का मशहूर बालम खीरा है। अब लेखक के लिए परीक्षा कठिन थी। नमक-मिर्च से चमकती रसीली, यानी पनियाती फाँकें देखकर उसके मुँह में भी पानी आ रहा था। पर वह पहले मना कर चुका था, इसलिए अब हाँ कहना उसे अपनी इज़्ज़त के ख़िलाफ़ लगा।
उसने फिर से विनम्रता से मना किया और बहाना बनाया कि इस समय भूख नहीं है और उसका मेदा, यानी पेट भी कुछ कमज़ोर है। यहाँ लेखक भी पूरी तरह सच्चा नहीं है। वह भी अपनी बात पर टिके रहने के दिखावे में अपनी इच्छा दबा रहा है। इस तरह व्यंग्य केवल नवाब साहब पर नहीं, उस आम आदत पर भी है, जिसमें हम इज़्ज़त के डर से अपने मन की बात नहीं कह पाते।
Concepts and terms
हँसी-हँसी में किसी कमी या पाखंड पर चोट करना। यहाँ नवाबी दिखावे और कथ्यहीन कहानी, दोनों पर चोट है।
जीवन को उसके असली, बिना सजावट वाले रूप में दिखाने की शैली। यशपाल इसी शैली के लेखक हैं।
ज़मींदारों और नवाबों का वह वर्ग, जो बिना मेहनत के ऐशो-आराम और शान-शौकत का आदी था।
अपनी असलियत छिपाकर दूसरों के सामने बड़ा बनने की कोशिश। नवाब साहब का व्यवहार इसका उदाहरण है।
अपनी इज़्ज़त का ख़याल। लेखक इसी के कारण खीरा खाने से बार-बार मना करता है।
सावधान
भ्रम और सच
करके देखो
Title:
शिष्टाचार की बोली
Safety:
बड़ों से बात करते समय उनके समय और सुविधा का ध्यान रखिए।
What You Notice:
आप पाएँगे कि हर भाषा में शिष्टता के अपने सुंदर शब्द हैं, पर उनका असली मूल्य तभी है, जब मन भी उतना ही साफ़ हो।
Did you know
पुराने समय में रेलगाड़ियों में फ़र्स्ट, सेकंड, इंटर और थर्ड, चार दर्जे होते थे। सेकंड क्लास बीच का, यानी मँझला दर्जा माना जाता था।
लखनऊ अवध के नवाबों की राजधानी रहा है। वहाँ की तहज़ीब, यानी बोलचाल और व्यवहार की नफ़ासत, आज भी मुहावरे की तरह याद की जाती है।
किबला शब्द अरबी से आया है। उर्दू की तहज़ीब में बड़े और आदरणीय व्यक्ति को संबोधित करने के लिए इसका इस्तेमाल होता था।
Memory tricks
खीरे की तैयारी के छह क़दम: धो-पों-का-झा-छी-स — धोना, पोंछना, सिर काटना, झाग निकालना, छीलना, सजाना।
Practice MCQs with answers (25)
- A लाहौर का पुराना शहर
- B फ़ीरोज़पुर छावनी
- C काँगड़ा
- D लखनऊ
Show answer
Why:
पंजाब।
- A गांधीजी और नेहरू
- B प्रेमचंद और प्रसाद
- C टैगोर और बोस
- D भगत सिंह और सुखदेव
Show answer
Why:
क्रांतिकारी धारा।
- A वे केवल परियों और राजाओं की कल्पना लिखते थे
- B वे कविता लिखते थे
- C वे जीवन को असली रूप में दिखाते हैं
- D वे इतिहास पढ़ाते थे
Show answer
Why:
आम आदमी।
- A देश का बँटवारा
- B पहला विश्वयुद्ध
- C अकाल
- D चुनाव
Show answer
Why:
त्रासदी।
- A नवाबों का खाना सबसे स्वादिष्ट और सेहतमंद होता है
- B रेल का सफ़र महँगा है
- C खीरा हानिकारक है
- D कथ्य के बिना कहानी नहीं बनती
Show answer
Why:
नयी कहानी की बहस।
- A मेहनत करने वाला किसान और मज़दूर वर्ग
- B पतनशील सामंती वर्ग
- C विद्यार्थी
- D सैनिक
Show answer
Why:
नवाबी शान।
- A बिना मेहनत दूसरों के सहारे जीना
- B खेतों में कड़ी मेहनत करके अपना घर चलाना
- C पेड़-पौधे लगाना
- D विदेश में रहना
Show answer
Why:
दिखावटी जीवन।
- A उसे बहुत लंबी दूरी तक सफ़र करना था
- B बाक़ी टिकट ख़त्म थे
- C एकांत में सोचने के लिए
- D मुफ़्त पास था
Show answer
Why:
नयी कहानी।
- A पुराने दोस्त को देखने की ख़ुशी
- B डर
- C नींद
- D एकांत टूटने का असंतोष
Show answer
Why:
संगति नहीं चाहिए।
- A गहरा डर और घबराहट
- B आत्मसम्मान
- C थकान
- D शर्म
Show answer
Why:
बराबरी।
- A उनकी शान को
- B उनकी सेहत और पाचन को
- C उनके पैसों को
- D उनकी नींद को
Show answer
Why:
किफ़ायत छिपाना।
- A खीरा बहुत महँगा और दुर्लभ फल था
- B खीरा सड़ा हुआ था
- C खीरा उन्हें मामूली चीज़ लगता था
- D उन्हें खीरा पसंद नहीं था
Show answer
Why:
अपदार्थ वस्तु।
- A शराफ़त का भ्रम बचाने की चाल
- B सच्ची और खुले दिल की मेहमाननवाज़ी
- C मज़ाक
- D ग़ुस्सा
Show answer
Why:
लथेड़ लेना।
- A खुला और कठोर अपमान
- B विनम्र इनकार
- C स्वीकृति
- D प्रश्न
Show answer
Why:
तहज़ीब।
- A खीरे को और भी ज़्यादा कड़वा बनाना
- B रंग बदलना
- C कड़वाहट कम करना
- D उसे सुखाना
Show answer
Why:
पुराना तरीक़ा।
- A प्लेटफ़ॉर्म के नल पर
- B बाल्टी में
- C नहीं धोए
- D खिड़की से बाहर
Show answer
Why:
लोटे से।
- A नमक-मिर्च की पुड़िया
- B चीनी और शहद की छोटी शीशी
- C नींबू
- D चटनी
Show answer
Why:
जीरा-मिला नमक।
- A दाँतों में तेज़ दर्द और तकलीफ़
- B ग़ुस्सा
- C स्वाद की कल्पना से मुँह में पानी
- D ठंड
Show answer
Why:
स्फुरण।
- A नवाब साहब सचमुच बहुत ही अमीर और उदार हैं
- B लेखक को जलन है
- C नवाब साहब बीमार हैं
- D शान केवल दिखावा है
Show answer
Why:
असलियत।
- A उसे सचमुच खीरे से गंभीर एलर्जी थी
- B पहले के इनकार पर टिके रहना
- C खीरा कम था
- D वह सो रहा था
Show answer
Why:
आत्मसम्मान।
- A दिमाग़
- B आँख
- C आमाशय
- D हाथ
Show answer
Why:
पेट।
- A सूखी
- B रसीली
- C जली
- D कड़वी
Show answer
Why:
नमक-मिर्च के बाद।
- A इज़्ज़त का दिखावा
- B एक-दूसरे के प्रति गहरी और सच्ची दोस्ती
- C भूख की कमी
- D बहुत बातें करना
Show answer
Why:
दोनों पर व्यंग्य।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- B अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- C अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
- D दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
Show answer
Why:
मुँह में पानी था।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C केवल I और III
- D I, II और III तीनों
Show answer
Why:
डिब्बा निर्जन नहीं था।
Important short questions (7)
लाहौर के नेशनल कॉलेज में यशपाल का परिचय भगत सिंह और सुखदेव से हुआ। वे आज़ादी की क्रांतिकारी धारा से जुड़ गए और जेल भी गए। यही अनुभव उनके लेखन में आम आदमी और अन्याय के विरोध के रूप में दिखता है।
पहला उद्देश्य यह दिखाना है कि बिना घटना, पात्र और विचार के कहानी नहीं बन सकती। दूसरा उद्देश्य उस सामंती वर्ग पर व्यंग्य करना है, जो असलियत से दूर रहकर दिखावे की ज़िंदगी जीता है।
नवाब साहब पालथी मारकर आराम से बैठे थे और सामने तौलिए पर दो खीरे रखे थे। लेखक के आने पर उनकी आँखों में नाराज़गी दिखी और उन्होंने बात करने में कोई रुचि नहीं ली।
लेखक ने सोचा कि शायद वे कहानी की सूझ में हैं। या फिर खीरा खाते देखे जाने से झेंप रहे हैं। उसे यह भी लगा कि उन्होंने बचत के लिए सेकंड क्लास लिया है। अब किसी भले आदमी के सामने उन्हें शर्म आ रही है।
उन्होंने तौलिया झाड़कर बिछाया, सीट के नीचे से लोटा निकाला और खिड़की से बाहर खीरे धोए। फिर तौलिए से पोंछकर जेब से चाकू निकाला।
लेखक को लगा कि नवाब साहब अपनी शराफ़त का भ्रम बचाने के लिए उसे भी खीरा खाने में शामिल करना चाहते हैं। ऐसा करके वे अकेले छोटे दिखने से बच जाते।
रसीली, चमकती फाँकें देखकर लेखक के मुँह में भी पानी आ रहा था। पर पहले इनकार कर चुकने के कारण उसने अपनी इच्छा दबा ली और फिर से मना कर दिया।
Long answer questions (3)
यशपाल हिंदी के प्रमुख यथार्थवादी कथाकार हैं। वे क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े रहे, और यही संघर्ष उनकी रचनाओं में आम आदमी की पीड़ा बनकर उभरता है। झूठा सच, दिव्या और अमिता उनके उपन्यास हैं। फूलो का कुर्ता और पिंजरे की उड़ान उनके कहानी-संग्रह हैं। लखनवी अंदाज़ में उनकी कई विशेषताएँ दिखती हैं। पहली है बारीक निरीक्षण। खीरा धोने से लेकर नमक बुरकने तक, हर क़दम का सजीव चित्र है। दूसरी है व्यंग्य। वे सीधे आलोचना नहीं करते, बल्कि नवाब साहब के व्यवहार से ही दिखावे को उजागर करते हैं। तीसरी विशेषता भाषा है। किबला, आदाब, तहज़ीब जैसे उर्दू शब्द लखनवी माहौल को जीवंत बनाते हैं। चौथी विशेषता ईमानदारी है। लेखक अपनी कमज़ोरी भी नहीं छिपाता, जैसे मुँह में पानी आने पर भी इनकार करना।
लेखक एकांत की उम्मीद में डिब्बे में चढ़ा, पर वहाँ नवाब साहब पहले से बैठे थे। उनके चेहरे पर एकांत टूटने की नाराज़गी थी, और उन्होंने बात करने की कोई इच्छा नहीं दिखाई। लेखक भी स्वाभिमानी था, इसलिए उसने भी नज़रें फेर लीं। लेखक अनुमान लगाता रहा कि नवाब साहब किस बात से असहज हैं। शायद उन्हें खीरे जैसी मामूली चीज़ खाते देखे जाने की शर्म थी। या फिर बचत के लिए लिया गया मँझला दर्जा उनकी शान के ख़िलाफ़ था। यह प्रसंग बताता है कि झूठी शान लोगों के बीच दीवार खड़ी कर देती है। दोनों व्यक्ति पढ़े-लिखे और सभ्य हैं, फिर भी सहज होकर बात नहीं कर पाते। हर किसी को यही चिंता है कि सामने वाला उसे छोटा न समझ ले।
मेरे विचार से आज भी यह आदत बहुत आम है। बहुत से लोग अपनी हैसियत से बड़ा दिखने के लिए ऐसे काम करते हैं, जिनकी उन्हें ज़रूरत नहीं होती। उदाहरण के लिए, कई परिवार शादी में दिखावे के लिए क़र्ज़ लेकर ख़र्च करते हैं। कुछ लोग महँगे फ़ोन या कपड़े सिर्फ़ इसलिए ख़रीदते हैं कि दोस्त उन्हें कम न समझें। सोशल मीडिया पर भी लोग अपनी ज़िंदगी को असल से ज़्यादा चमकदार दिखाते हैं। इसका नुक़सान ख़ुद हमें होता है। हम पैसा, समय और मन की शांति खो देते हैं। लखनवी अंदाज़ हमें सिखाता है कि नवाब साहब की तरह भूखे रहकर शान दिखाना समझदारी नहीं। सच्ची इज़्ज़त सादगी और ईमानदारी से मिलती है।
Flashcards (17)
Play this topic
- शब्द और अर्थ
- नवाब साहब या लेखक?
- सही या भ्रम
- खीरे की तैयारी का क्रम
- झटपट उत्तर
सूँघकर फेंकी फाँकें और नयी कहानी पर व्यंग्य
नवाब साहब हर फाँक को सूँघकर खिड़की से बाहर फेंक देते हैं, फिर ऐसे डकार लेते हैं मानो पेट भर गया हो। लेखक समझ जाता है कि जैसे कल्पना से पेट नहीं भरता, वैसे ही बिना घटना और पात्र के कहानी नहीं बनती।
What you will be able to do
- नवाब साहब द्वारा फाँकें सूँघकर फेंकने के प्रसंग को क्रम से लिख सकेंगे।
- इस व्यवहार के पीछे छिपे दिखावे, झूठी शान और सनक का विश्लेषण कर सकेंगे।
- समझा सकेंगे कि डकार वाला प्रसंग नयी कहानी के दावे पर किस तरह चोट करता है।
- सनक के नकारात्मक और सकारात्मक रूपों में अंतर उदाहरण देकर बता सकेंगे।
- पाठ के वाक्यों में सकर्मक और अकर्मक क्रिया की पहचान कर सकेंगे।
Key points
नवाब साहब ने हर फाँक को होंठों तक ले जाकर सूँघा, स्वाद की कल्पना में आँखें मूँदीं और उसे खिड़की से बाहर छोड़ दिया।
सारी फाँकें फेंकने के बाद उन्होंने तौलिए से हाथ-होंठ पोंछे और गर्व से लेखक को देखा, मानो यही रईसों का ढंग हो।
लेखक ने व्यंग्य में इस तरीक़े को ख़ानदानी तहज़ीब, नफ़ासत और नज़ाकत कहा और इसे सूक्ष्म या एब्स्ट्रैक्ट तरीक़ा बताया।
लेखक का सवाल था कि क्या केवल महक और ज़ायक़े की कल्पना से भूख मिट सकती है?
नवाब साहब ने डकार लेकर कहा कि खीरा स्वादिष्ट तो है, पर सकील, यानी देर से पचने वाला होता है।
इसी पर लेखक की आँखें खुलीं: अगर कल्पना से डकार आ सकती है, तो क्या बिना घटना और पात्र के कहानी बन सकती है?
यह व्यंग्य नयी कहानी के उन लेखकों पर है, जो कथ्य को ज़रूरी नहीं मानते थे।
नवाब साहब का व्यवहार सनक है; पर सनक का सकारात्मक रूप भी होता है, जैसे किसी अच्छे काम की धुन।
पाठ की भाषा में उर्दू के तहज़ीब, नफ़ासत, नज़ाकत, लज़ीज़, सकील जैसे शब्द लखनवी माहौल को जीवंत बनाते हैं।
Full explanation
सूँघो और फेंको: नवाबी रसास्वादन
लेखक के दूसरी बार मना करने के बाद नवाब साहब ने एक लंबी साँस ली। उन्होंने बड़ी ललचाई आँखों से नमक-मिर्च में चमकती फाँकों को देखा, फिर खिड़की के बाहर नज़र डाली। अब असली नाटक शुरू हुआ।
उन्होंने एक फाँक उठाई और होंठों तक ले गए। उसे सूँघा, और स्वाद के आनंद में उनकी पलकें बंद हो गईं। मुँह में जो पानी भर आया था, वह गले से नीचे उतर गया। और फिर, खाने के बजाय, उन्होंने वह फाँक खिड़की से बाहर गिरा दी। यही काम उन्होंने एक-एक करके हर फाँक के साथ किया। नाक के पास लाना, स्वाद की कल्पना में डूबना, और बाहर फेंक देना।
जब आख़िरी फाँक भी बाहर जा चुकी, तो उन्होंने तौलिए से अपने हाथ और होंठ पोंछे। फिर गर्व भरी गुलाबी आँखों से लेखक की ओर देखा। उनकी नज़र जैसे कह रही थी कि देखो, ख़ानदानी रईस ऐसे खाते हैं! इसके बाद वे खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से इतने थक गए कि बर्थ पर लेट गए।
ज़रा सोचिए, कितनी मेहनत से खीरे धोए, छीले, सजाए और मसाला लगाया गया, और अंत में एक भी फाँक पेट तक नहीं पहुँची। यह दृश्य हँसाता भी है और सोचने पर मजबूर भी करता है।
तहज़ीब, नफ़ासत और नज़ाकत: व्यंग्य की धार
यह सब देखकर लेखक को सम्मान में सिर झुकाना पड़ा, यानी तसलीम में सिर ख़म करना पड़ा। उसने मन में कहा कि यही है ख़ानदानी तहज़ीब, नफ़ासत और नज़ाकत! यहाँ लेखक सचमुच तारीफ़ नहीं कर रहा। यह व्यंग्य है। वह जिन शब्दों से नवाबी शिष्टता, सफ़ाई और कोमलता की बात करता है, वही शब्द इस बेतुके व्यवहार पर लगाकर उसकी हँसी उड़ाता है।
लेखक आगे सोचता है कि खीरे के इस इस्तेमाल को केवल महक और ज़ायक़े की कल्पना से तृप्त होने का एक सूक्ष्म, बढ़िया या एब्स्ट्रैक्ट तरीक़ा कहा जा सकता है। एब्स्ट्रैक्ट का अर्थ है अमूर्त, यानी जिसका कोई भौतिक अस्तित्व न हो। पर फिर लेखक एक सीधा और ज़मीनी सवाल पूछता है कि क्या ऐसे तरीक़े से पेट भी भर सकता है?
यही सवाल पूरी रचना की कुंजी है। कल्पना सुंदर हो सकती है, पर भूख कल्पना से नहीं मिटती। इसी तरह शान और दिखावा अच्छा लग सकता है, पर उससे जीवन की असली ज़रूरतें पूरी नहीं होतीं।
डकार और ज्ञान-चक्षु
तभी नवाब साहब की ओर से एक ऊँची डकार की आवाज़ आई, मानो उनका पेट पूरी तरह भर गया हो। फिर उन्होंने लेखक की ओर देखकर कहा कि खीरा स्वादिष्ट यानी लज़ीज़ तो होता है, पर सकील होता है, यानी आसानी से पचता नहीं, और बेचारे पेट पर बोझ डाल देता है।
यह डकार असली नहीं, दिखावटी है। नवाब साहब ने खीरा खाया ही नहीं, तो पेट कैसे भरता? पर वे यह दिखाना चाहते हैं कि वे कोई साधारण आदमी नहीं, जो भूख से खीरा खा ले। उनके लिए खीरा खाना छोटी बात है, इसलिए वे उसे पेट के लिए भारी बताकर अपनी इज़्ज़त बचाते हैं।
इसी पल लेखक कहता है कि उसके ज्ञान-चक्षु खुल गए, यानी उसे एक नई समझ मिली। उसने पहचाना कि यही तो नयी कहानी के लेखक हैं! अगर महक और ज़ायक़े की कल्पना भर से डकार आ सकती है, तो लेखक की इच्छा भर से, बिना विचार, घटना और पात्रों के, नयी कहानी क्यों नहीं बन सकती? यह वाक्य गहरे व्यंग्य से भरा है। लेखक कहना चाहता है कि जैसे नवाब साहब की डकार झूठी है, वैसे ही कथ्यहीन कहानी भी खोखली है।
कथ्य के बिना कहानी: लेखक का पक्ष
यशपाल का मानना था कि कहानी के लिए कुछ ठोस होना ज़रूरी है। कहानी में कोई घटना हो, कुछ पात्र हों, और कोई विचार या संदेश हो। यही कथ्य है। अगर ये सब न हों, तो कहानी ऐसी ही होगी जैसे बिना खाए डकार लेना।
मज़े की बात यह है कि ख़ुद लखनवी अंदाज़ में भी ये तीनों चीज़ें मौजूद हैं। इसमें एक घटना है, यानी रेल का सफ़र और खीरे का प्रसंग। इसमें पात्र हैं, यानी लेखक और नवाब साहब। और इसमें विचार भी है, यानी दिखावे और कथ्यहीन लेखन पर व्यंग्य। इस तरह यह रचना अपने ही उदाहरण से साबित कर देती है कि कहानी के लिए कथ्य ज़रूरी है। इस विचार से सहमत होना आसान है, क्योंकि जो रचना पाठक को कुछ न दे, वह याद भी नहीं रहती।
हालाँकि कुछ लोग कह सकते हैं कि आज की कई कहानियों में घटना बहुत छोटी होती है और मन के भाव बड़े। पर ऐसी कहानियों में भी कोई न कोई अनुभव या विचार होता ही है। पूरी तरह शून्य से कहानी नहीं बनती।
नवाब साहब का स्वभाव और सनक
नवाब साहब के व्यवहार से उनके कई गुण-दोष सामने आते हैं। वे दिखावा-पसंद हैं, क्योंकि भूख होते हुए भी उन्होंने खीरा नहीं खाया। वे झूठी शान में जीते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि खीरा खाते दिखना उनकी हैसियत के ख़िलाफ़ है। वे नफ़ासत-पसंद भी हैं, क्योंकि हर काम बड़े सलीक़े से करते हैं। और वे थोड़े सनकी भी हैं, क्योंकि उनका यह तरीक़ा किसी तर्क पर नहीं टिकता।
सनक का अर्थ है किसी बात की ऐसी धुन, जिसके पीछे समझदारी कम और ज़िद ज़्यादा हो। नवाबों की कई सनकें इतिहास में मशहूर हैं। किसी नवाब को पतंगबाज़ी का ऐसा शौक़ था कि वे उस पर पैसा पानी की तरह बहाते थे। कुछ मुर्ग़ों या बटेरों की लड़ाई पर दाँव लगाते थे। प्रेमचंद की कहानी शतरंज के खिलाड़ी में दो नवाब शतरंज में ऐसे डूबे रहते हैं कि राज्य पर ख़तरा आने पर भी उनका ध्यान नहीं हटता।
पर सनक हमेशा बुरी नहीं होती। अगर किसी व्यक्ति को अच्छे काम की धुन हो, तो वही सनक समाज के लिए वरदान बन जाती है। कोई पर्यावरण बचाने की धुन में हज़ारों पेड़ लगा देता है। कोई बच्चों को पढ़ाने की धुन में अपनी पूरी कमाई लगा देता है। कोई वैज्ञानिक सालों तक एक ही प्रयोग में लगा रहता है और दुनिया को नई खोज दे देता है। ऐसी सकारात्मक सनक लगन और समर्पण का दूसरा नाम है।
भाषा और शैली
लखनवी अंदाज़ की भाषा इसकी सबसे बड़ी ताक़त है। यशपाल ने लखनऊ के माहौल को जीवंत बनाने के लिए उर्दू के बहुत से शब्द इस्तेमाल किए हैं, जैसे आदाब अर्ज़, किबला, तहज़ीब, नफ़ासत, नज़ाकत, लज़ीज़, सकील और तसलीम। ये शब्द पढ़ते ही नवाबी दरबार की बोली कानों में गूँजने लगती है।
शैली की दूसरी विशेषता है बारीक चित्रण। लेखक नवाब साहब के हर छोटे काम को ऐसे लिखता है, मानो कैमरा उनकी हर हरकत रिकॉर्ड कर रहा हो। तीसरी विशेषता है व्यंग्य, जो कभी ऊँचे शब्दों की तारीफ़ के पीछे छिपा होता है, तो कभी एक सीधे सवाल में।
पाठ में क्रियाओं का प्रयोग भी सीखने लायक़ है। नवाब साहब ने तौलिया बिछाया, इस वाक्य में बिछाया सकर्मक क्रिया है, क्योंकि क्या बिछाया का उत्तर तौलिया है। दूसरी ओर, नवाब साहब थककर लेट गए, इसमें लेट गए अकर्मक क्रिया है, क्योंकि यहाँ कोई कर्म नहीं है। इसी तरह जेब से चाकू निकाला में निकाला सकर्मक है, और पालथी मारे बैठे थे में बैठे थे अकर्मक।
Concepts and terms
अपनी असली इच्छा या हालत छिपाकर दूसरों के सामने ऊँचा बनने का प्रयास। नवाब साहब ने भूख छिपाकर शान दिखाई।
किसी बात की ऐसी धुन, जो तर्क से परे हो। यह नकारात्मक भी हो सकती है और सकारात्मक भी।
रचना में कहने लायक़ असली बात, यानी घटना, पात्र और विचार। लेखक के अनुसार कहानी इसके बिना नहीं बनती।
जिस क्रिया का असर किसी कर्म पर पड़े, जैसे नवाब साहब ने खीरा काटा।
जिस क्रिया को कर्म की ज़रूरत न हो, जैसे नवाब साहब लेट गए।
सावधान
भ्रम और सच
मिलाकर देखो
Scenario:
मोहल्ले की एक शादी में तनुज ने देखा कि मेहमानों की प्लेटें खाने से भरी हैं, पर लोग थोड़ा-थोड़ा चखकर बाक़ी छोड़ रहे हैं।
एक रिश्तेदार ने कहा, ज़्यादा खाते दिखना अच्छा नहीं लगता, लोग सोचेंगे घर पर खाना नहीं मिलता। रात के अंत में खाने के कई बड़े डिब्बे कूड़े में जा रहे थे।
तनुज को लखनवी अंदाज़ के नवाब साहब याद आए। उसने आयोजकों से बात की और बचा हुआ साफ़ खाना पास की बस्ती के रैन-बसेरे तक पहुँचवाया।
Activity:
एक हफ़्ते तक अपने घर में रोज़ बचने या फेंके जाने वाले खाने का हिसाब रखिए। फिर तीन ऐसे उपाय लिखिए, जिनसे यह बर्बादी कम हो सके।
Analysis:
दिखावे की आदत केवल नवाबों तक सीमित नहीं है। जब हम लोगों की राय के डर से अन्न बर्बाद करते हैं, तो वही नवाबी सनक दोहराते हैं; समझदारी सादगी और बचत में है।
Did you know
नयी कहानी आंदोलन हिंदी में लगभग सन् 1950 के बाद उभरा। इसके लेखकों ने कहानी में शहर, अकेलेपन और मन की उलझनों को नई तरह से लिखा।
प्रेमचंद की कहानी शतरंज के खिलाड़ी भी ढलते नवाबी वर्ग पर है, जिस पर सत्यजित राय ने इसी नाम से फ़िल्म बनाई।
किसी भोजन का पचना या न पचना केवल भोजन पर नहीं, उसकी मात्रा, खाने के समय, शरीर की प्रकृति और मौसम पर भी निर्भर करता है।
Memory tricks
व्यंग्य की दोहरी चोट: न-क — न से नवाबी दिखावा, क से कथ्यहीन कहानी।
सकर्मक की पहचान: क्या या किसे? — क्रिया से पहले क्या या किसे पूछिए; उत्तर मिले तो सकर्मक, न मिले तो अकर्मक।
Practice MCQs with answers (25)
- A उसे सूँघा
- B उसे चखा
- C लेखक को दे दी
- D जेब में रख ली
Show answer
Why:
रसास्वादन।
- A तेज़ मिर्च के कारण आँखों में जलन से
- B नींद से
- C स्वाद की कल्पना के आनंद से
- D धूप से
Show answer
Why:
कल्पना का सुख।
- A सीट के नीचे रखी टोकरी में
- B लेखक की ओर
- C डिब्बे के फ़र्श पर
- D खिड़की से बाहर
Show answer
Why:
एक-एक करके।
- A अपनी किसी बड़ी ग़लती पर गहरी शर्मिंदगी
- B रईसी तरीक़े का प्रदर्शन
- C लेखक से माफ़ी
- D भूख की शिकायत
Show answer
Why:
ख़ानदानी तरीक़ा।
- A पूरी रात जागकर लंबी यात्रा करने से
- B बीमारी से
- C भारी भोजन से
- D खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से
Show answer
Why:
मेहनत का मज़ाक।
- A व्यंग्य
- B सच्ची और गहरी प्रशंसा
- C डर
- D करुणा
Show answer
Why:
उलटी तारीफ़।
- A खीरा बहुत बड़ा, मोटा और भारी था
- B खीरा विदेशी था
- C स्वाद केवल कल्पना में था
- D खीरा कड़वा था
Show answer
Why:
अमूर्त।
- A नवाब साहब के खाने की सच्चे मन से चिंता
- B दिखावे का खोखलापन उजागर करना
- C खीरे की बड़ाई
- D अपनी भूख बताना
Show answer
Why:
ज़मीनी सवाल।
- A उन्होंने कुछ खाया ही नहीं
- B उन्होंने डिब्बे में बहुत ज़्यादा खा लिया था
- C डकार बहुत धीमी थी
- D लेखक सो गया था
Show answer
Why:
दिखावटी।
- A लेखक को डॉक्टरी की गहरी जानकारी देना
- B खीरा बेचना
- C नया खीरा मँगाना
- D न खाने को सही ठहराना
Show answer
Why:
शान बचाना।
- A आँखों का कोई बड़ा ऑपरेशन होना
- B नींद से जागना
- C नई समझ मिलना
- D चश्मा लगाना
Show answer
Why:
पहचान।
- A रेलवे की ख़राब व्यवस्था और गंदगी
- B कथ्यहीन नयी कहानी
- C खीरे की खेती
- D लखनऊ के बाज़ार
Show answer
Why:
बिना घटना, पात्र।
- A घटना, पात्र और विचार
- B केवल लेखक की इच्छा और सुंदर शब्द
- C केवल लंबाई
- D केवल चित्र
Show answer
Why:
कथ्य।
- A इसमें कोई भी घटना या पात्र नहीं है
- B इसमें घटना, पात्र और विचार हैं
- C यह कविता है
- D यह बहुत लंबी है
Show answer
Why:
अपना उदाहरण।
- A बहुत सीधा-सादा और ईमानदार
- B कंजूस
- C दिखावा-पसंद
- D मेहनती
Show answer
Why:
भूख छिपाई।
- A बिना वजह पैसे बर्बाद करने की ज़िद
- B झूठी शान
- C आलस
- D अच्छे काम की लगन
Show answer
Why:
समर्पण।
- A मेहनतकश किसान और मज़दूर वर्ग
- B विद्यार्थी
- C पतनशील सामंती वर्ग
- D सैनिक
Show answer
Why:
प्रेमचंद।
- A अकर्मक
- B सकर्मक
- C प्रेरणार्थक
- D संयुक्त अकर्मक
Show answer
Why:
क्या धोए?
- A सकर्मक
- B द्विकर्मक
- C प्रेरणार्थक सकर्मक
- D अकर्मक
Show answer
Why:
कर्म नहीं।
- A स्वादिष्ट
- B कड़वा
- C सड़ा
- D फीका
Show answer
Why:
खीरा।
- A जल्दी पचने वाला हल्का
- B मीठा
- C ठंडा
- D देर से पचने वाला
Show answer
Why:
मेदे पर बोझ।
- A पुराने ज़माने के राजाओं और सेनापतियों से
- B रेलवे अफ़सरों से
- C नयी कहानी के लेखकों से
- D खीरे वालों से
Show answer
Why:
ज्ञान-चक्षु।
- A पाठ बहुत ही कठिन और उबाऊ हो जाता है
- B लखनवी माहौल जीवंत होता है
- C कहानी छोटी होती है
- D पात्र बदल जाते हैं
Show answer
Why:
तहज़ीब की बोली।
- A अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- C दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
ताज़ा था; दिखावे में फेंका।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C I, II और III तीनों
- D केवल I और III
Show answer
Why:
लेखक ने नहीं माँगी।
Important short questions (7)
उन्होंने हर फाँक को होंठों तक ले जाकर सूँघा और स्वाद की कल्पना में आँखें मूँद लीं। फिर उसे खाए बिना खिड़की से बाहर फेंक दिया। अंत में तौलिए से हाथ-होंठ पोंछे।
लेखक यह बात व्यंग्य में कहता है। तहज़ीब और नफ़ासत जैसे ऊँचे शब्द एक बेतुके काम पर लगाकर वह नवाबी दिखावे की हँसी उड़ाता है।
खीरा खाए बिना डकार लेना उनका दिखावा था। इसी डकार से लेखक को सूझा कि जैसे कल्पना से पेट भरने का नाटक होता है, वैसे ही बिना कथ्य के कहानी गढ़ने का भी।
वे यह जताना चाहते थे कि उन्होंने खीरा इसलिए नहीं खाया, क्योंकि वह भारी होता है। असल में वे किसी के सामने मामूली चीज़ खाकर अपनी शान घटाना नहीं चाहते थे।
यह सोच मुझे ठीक लगती है। जिस कहानी में न कोई घटना हो, न पात्र, न विचार, वह पाठक को कुछ नहीं दे पाती। कम से कम कोई अनुभव या भाव तो कहानी में होना ही चाहिए।
किसी व्यक्ति को पेड़ लगाने की ऐसी धुन हो कि वह हर रविवार कहीं न कहीं पौधे रोपे, तो यह अच्छी सनक है। इससे पर्यावरण और समाज, दोनों का भला होता है।
निकाला सकर्मक क्रिया है, क्योंकि क्या निकाला का उत्तर चाकू है। लेट गए अकर्मक क्रिया है, क्योंकि इसमें कोई कर्म नहीं है।
Long answer questions (3)
नवाब साहब ने खीरे को धोया, छीला, सजाया और उस पर नमक-मिर्च लगाया। पर लेखक के सामने वे उसे खा नहीं सके। उन्हें लगता था कि खीरे जैसी साधारण चीज़ खाते देखे जाना उनकी नवाबी शान के ख़िलाफ़ है। लेखक दो बार मना कर चुका था, इसलिए अब अकेले खाना और भी अटपटा लगता। अपनी इज़्ज़त बचाने का उन्हें एक ही रास्ता सूझा। उन्होंने फाँकें सूँघकर फेंक दीं, ताकि लगे कि रईस ऐसे ही स्वाद लेते हैं। इससे उनके कई स्वभाव-गुण सामने आते हैं। वे दिखावा-पसंद हैं और झूठी शान में जीते हैं। वे नफ़ासत-पसंद भी हैं, क्योंकि हर काम सलीक़े से करते हैं। उनमें सनक भी है, क्योंकि भूख होते हुए भी वे खाना फेंक देते हैं। यह व्यवहार ढलते सामंती वर्ग की खोखली मानसिकता को दिखाता है।
मेरे विचार से घटना, पात्र और विचार के बिना सच्ची कहानी नहीं बन सकती। कहानी का अर्थ ही है किसी के साथ कुछ होना और उससे कोई बात निकलना। लखनवी अंदाज़ में यशपाल ने यही बात बड़े मज़ेदार ढंग से कही है। नवाब साहब ने खीरा खाया नहीं, फिर भी पेट भरने की डकार ली। लेखक पूछता है कि क्या कल्पना से पेट भरता है? इसी तरह क्या लेखक की इच्छा भर से कहानी बन जाती है? ख़ुद यह रचना अपने तर्क का प्रमाण है। इसमें रेल-यात्रा की घटना है, लेखक और नवाब साहब जैसे पात्र हैं, और दिखावे पर व्यंग्य का विचार है। हाँ, कहानी में घटना छोटी हो सकती है और भाव बड़े। पर पूरी तरह ख़ाली कहानी नवाब साहब की डकार जैसी ही खोखली होगी।
सनक का अर्थ है किसी बात की ऐसी धुन, जो तर्क से परे हो। नवाबों की कई सनकें मशहूर रही हैं। कुछ नवाब पतंगबाज़ी पर पैसा पानी की तरह बहाते थे। कुछ बटेरों या मुर्ग़ों की लड़ाई पर दाँव लगाते थे। प्रेमचंद की कहानी शतरंज के खिलाड़ी में दो नवाब खेल में इतने डूबे रहते हैं कि राज्य पर संकट आने पर भी उन्हें होश नहीं आता। लखनवी अंदाज़ में खीरा सूँघकर फेंकना भी ऐसी ही सनक है। पर सनक का अच्छा रूप भी होता है। जब किसी को अच्छे काम की धुन लग जाए, तो वह लगन बन जाती है। कोई पेड़ लगाने में, तो कोई ग़रीब बच्चों को पढ़ाने में जीवन लगा देता है। वैज्ञानिक भी सालों एक ही खोज की धुन में रहते हैं। ऐसी सनक समाज के लिए वरदान है।
Flashcards (17)
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- शब्द और अर्थ
- सकर्मक या अकर्मक?
- सही या भ्रम
- रचना के अंत का क्रम
- झटपट उत्तर
Class 10 Hindi Chapter 9 — frequently asked questions
लाहौर के नेशनल कॉलेज में यशपाल का परिचय भगत सिंह और सुखदेव से हुआ। वे आज़ादी की क्रांतिकारी धारा से जुड़ गए और जेल भी गए। यही अनुभव उनके लेखन में आम आदमी और अन्याय के विरोध के रूप में दिखता है।
पहला उद्देश्य यह दिखाना है कि बिना घटना, पात्र और विचार के कहानी नहीं बन सकती। दूसरा उद्देश्य उस सामंती वर्ग पर व्यंग्य करना है, जो असलियत से दूर रहकर दिखावे की ज़िंदगी जीता है।
नवाब साहब पालथी मारकर आराम से बैठे थे और सामने तौलिए पर दो खीरे रखे थे। लेखक के आने पर उनकी आँखों में नाराज़गी दिखी और उन्होंने बात करने में कोई रुचि नहीं ली।
उन्होंने हर फाँक को होंठों तक ले जाकर सूँघा और स्वाद की कल्पना में आँखें मूँद लीं। फिर उसे खाए बिना खिड़की से बाहर फेंक दिया। अंत में तौलिए से हाथ-होंठ पोंछे।
लेखक यह बात व्यंग्य में कहता है। तहज़ीब और नफ़ासत जैसे ऊँचे शब्द एक बेतुके काम पर लगाकर वह नवाबी दिखावे की हँसी उड़ाता है।
खीरा खाए बिना डकार लेना उनका दिखावा था। इसी डकार से लेखक को सूझा कि जैसे कल्पना से पेट भरने का नाटक होता है, वैसे ही बिना कथ्य के कहानी गढ़ने का भी।
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