Class 10 Hindi Chapter 7: नेताजी का चश्मा
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स्वयं प्रकाश और बदलते चश्मे का रहस्य
एक छोटे कस्बे के चौराहे पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की संगमरमर की मूर्ति है, जिसकी आँखों पर पत्थर का चश्मा नहीं बना। हालदार साहब हर बार उस पर नया असली चश्मा देखते हैं और जान पाते हैं कि यह एक ग़रीब, लँगड़े फेरीवाले कैप्टन की देशभक्ति है।
What you will be able to do
- स्वयं प्रकाश के जीवन, रचनाओं और कहानी-लेखन की विशेषताओं के बारे में बता सकेंगे।
- कस्बे, नगरपालिका और नेताजी की मूर्ति लगने की परिस्थिति को अपने शब्दों में समझा सकेंगे।
- मूर्ति पर बार-बार बदलते चश्मे का रहस्य और कैप्टन चश्मेवाले की भूमिका स्पष्ट कर सकेंगे।
- हालदार साहब और पानवाले के स्वभाव की तुलना करते हुए उनका चरित्र-चित्रण कर सकेंगे।
- कहानी में हल्के व्यंग्य, बोलचाल की भाषा और अंग्रेज़ी-स्थानीय शब्दों के प्रयोग को पहचान सकेंगे।
Key points
स्वयं प्रकाश का जन्म सन् 1947 में मध्यप्रदेश के इंदौर में हुआ; राजस्थान में उन्होंने बचपन भी बिताया और नौकरी के ज़्यादातर साल भी।
मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़कर वे एक औद्योगिक संस्थान में नौकरी करते रहे और वसुधा पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे; सन् 2019 में उनका निधन हुआ।
उनकी कहानियाँ मध्यवर्ग के जीवन को दिखाती हैं और जाति, धर्म, लिंग तथा वर्ग के आधार पर होने वाले भेदभाव का विरोध करती हैं।
कहानी एक छोटे कस्बे की है, जहाँ नगरपालिका ने मुख्य चौराहे पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की संगमरमर की मूर्ति लगवाई।
मूर्ति स्कूल के ड्राइंग मास्टर मोतीलाल ने बनाई थी; वह सुंदर थी, पर उसकी आँखों पर पत्थर का चश्मा नहीं था।
मूर्ति पर एक असली चश्मा पहनाया गया था, जो हालदार साहब को हर बार आने पर बदला हुआ मिलता था।
पानवाले ने बताया कि यह काम कैप्टन चश्मेवाला करता है, जो ग्राहक की माँग पर मूर्ति का फ्रेम बेचकर दूसरा लगा देता है।
हालदार साहब कैप्टन को कोई पुराना फ़ौजी समझते हैं, पर वह एक बूढ़ा, कमज़ोर, लँगड़ा फेरीवाला निकलता है।
पानवाला कैप्टन का मज़ाक उड़ाता है, पर हालदार साहब उसकी देशभक्ति के आगे सिर झुकाते हैं।
Full explanation
स्वयं प्रकाश: किस्सागो कथाकार
स्वयं प्रकाश का जन्म सन् 1947 में मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में हुआ। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और फिर एक औद्योगिक संस्थान में नौकरी की। राजस्थान में उनका बचपन बीता और नौकरी के ज़्यादातर साल भी वहीं में बीता। वे वसुधा नाम की साहित्यिक पत्रिका के संपादन से भी जुड़े रहे। सन् 2019 में उनका निधन हुआ।
हिंदी कहानी में स्वयं प्रकाश का नाम सन् 1970 के बाद वाले दौर में उभरा। उनके तेरह कहानी-संग्रह छपे। इनमें संधान, आदमी जात का आदमी, सूरज कब निकलेगा और आएँगे अच्छे दिन भी ख़ास माने जाते हैं। उन्होंने बीच में विनय और ईंधन जैसे उपन्यास भी लिखे। उन्हें पहल सम्मान, बनमाली पुरस्कार और राजस्थान साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला।
स्वयं प्रकाश मध्यवर्ग के जीवन को बहुत बारीकी से चित्रित करते हैं। उनकी कहानियों में ग़रीब और कमज़ोर वर्ग के शोषण के ख़िलाफ़ चेतना है। साथ ही वे जाति, धर्म और स्त्री-पुरुष के भेदभाव का भी विरोध करते हैं। उनकी सबसे बड़ी ख़ूबी है उनकी किस्सागोई, यानी कहानी सुनाने का ऐसा रोचक ढंग, जिसमें पाठक को लगे कि कोई सामने बैठकर क़िस्सा सुना रहा है।
देश और देशभक्ति का सच्चा अर्थ
यह कहानी देशभक्ति के बारे में एक बड़ा सवाल उठाती है। देश केवल नक़्शे पर बनी सीमाओं से घिरा ज़मीन का टुकड़ा नहीं है। देश बनता है अपने लोगों से, नदियों, पहाड़ों, पेड़ों और पशु-पक्षियों से। इन सबसे प्रेम करना और इनकी भलाई के लिए कुछ करना ही असली देशभक्ति है।
हम अक्सर सोचते हैं कि देशभक्त वही है, जो सीमा पर लड़ता है या जिसका नाम इतिहास की किताबों में है। पर नेताजी का चश्मा बताती है कि देश बनाने में करोड़ों साधारण लोगों का भी हाथ है। हर नागरिक अपने-अपने ढंग से देश के लिए कुछ न कुछ करता है। और यह कहानी यह भी दिखाती है कि इस काम में बच्चे भी पीछे नहीं हैं।
कहानी का नायक कोई बड़ा नेता या सेनानी नहीं, बल्कि सड़क पर चश्मे बेचने वाला एक बूढ़ा, ग़रीब और लँगड़ा आदमी है। उसकी देशभक्ति छोटी-सी लगती है, पर उसका मन बहुत बड़ा है। यही कहानी का केंद्रीय भाव है।
कस्बा और उसकी नगरपालिका
कहानी एक छोटे-से कस्बे की है। हालदार साहब किसी कंपनी में काम करते थे और हर पंद्रह दिन पर काम से इस कस्बे से गुज़रते थे। लेखक हल्के मज़ाक के अंदाज़ में बताता है कि कस्बा इतना छोटा था कि वहाँ पक्के मकान गिनती के थे और बाज़ार के नाम पर एक ही बाज़ार था। लड़कों और लड़कियों का एक-एक स्कूल, एक छोटा सीमेंट कारख़ाना, दो खुले सिनेमाघर और एक नगरपालिका भी थी।
लेखक नगरपालिका के बारे में भी व्यंग्य करता है। वह कहता है कि नगरपालिका भी कोई न कोई काम छेड़े ही रहती थी। कभी किसी सड़क पर पक्का काम हुआ, कभी कबूतरों के बैठने की छतरी बनी, और कभी कवि-सम्मेलन ही रख दिया गया। इस ढंग से लेखक बताता है कि ऐसे छोटे प्रशासन अक्सर बिना किसी योजना के, जो मन आया, वह काम कर देते हैं।
इसी नगरपालिका के किसी उत्साही अधिकारी ने कस्बे के मुख्य चौराहे पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की एक मूर्ति लगवा दी। लेखक साफ़ कहता है कि यह कहानी उसी मूर्ति के बारे में है, बल्कि उसके एक छोटे-से हिस्से के बारे में। यह छोटा हिस्सा है नेताजी का चश्मा।
मास्टर मोतीलाल की मूर्ति
लेखक अनुमान लगाता है कि मूर्ति बनवाने में शायद काफ़ी उलझन हुई होगी। देश के अच्छे मूर्तिकारों की जानकारी नहीं रही होगी, और अच्छी मूर्ति का ख़र्च बजट से बहुत ज़्यादा रहा होगा। चिट्ठी-पत्री में समय बीतता गया होगा। फिर जब बोर्ड का कार्यकाल ख़त्म होने वाला होगा, तब जल्दी में किसी स्थानीय कलाकार को काम दे दिया गया होगा।
लेखक मान लेता है कि यह काम कस्बे के एकमात्र हाई स्कूल में चित्रकला पढ़ाने वाले अकेले अध्यापक को मिला, जिनका नाम वह मोतीलाल रख देता है। मास्टर जी ने भरोसा दिलाया था कि वे महीने भर में मूर्ति तैयार कर देंगे। लेखक का यह अनुमान लगाने वाला ढंग ही किस्सागोई है। वह कहानी को ऐसे सुनाता है, जैसे पाठक के साथ बैठकर मिलकर सोच रहा हो।
मूर्ति संगमरमर की थी, लगभग दो फुट ऊँची, जिसमें सिर की टोपी से लेकर कोट के ऊपरी बटनों तक का भाग बना था। फ़ौजी वर्दी में नेताजी सुंदर, थोड़े भोले और कम उम्र के लग रहे थे। मूर्ति देखते ही उनके प्रसिद्ध नारे याद आ जाते थे। पर एक कमी साफ़ खटकती थी। नेताजी की आँखों पर पत्थर का चश्मा नहीं था। उसकी जगह एक असली, काले मोटे फ्रेम वाला चश्मा मूर्ति को पहनाया गया था।
हालदार साहब का कौतुक
हालदार साहब जब पहली बार चौराहे पर पान खाने रुके, तो उनकी नज़र इस चश्मे पर पड़ी। उन्हें यह बात बड़ी अनोखी और मज़ेदार लगी कि मूर्ति पत्थर की है, पर चश्मा सचमुच का। उनके चेहरे पर कौतुक, यानी हैरानी और मज़े से भरी मुसकान आ गई। जीप आगे निकल गई, पर वे देर तक इसी के बारे में सोचते रहे।
अंत में उन्होंने सोचा कि कस्बे के लोगों की यह कोशिश सराहनीय है। मूर्ति का रंग-रूप या आकार उतना ज़रूरी नहीं, जितनी उसके पीछे की भावना। उन्हें यह भी दुख हुआ कि आजकल देशभक्ति को भी लोग मज़ाक की चीज़ समझने लगे हैं। इससे हालदार साहब का स्वभाव साफ़ होता है: वे संवेदनशील हैं और देशभक्ति को गंभीरता से लेते हैं।
दूसरी बार गुज़रने पर उन्होंने देखा कि चश्मा बदल गया है। पहले मोटे फ्रेम का चौकोर चश्मा था, अब तार के फ्रेम का गोल चश्मा था। अगली बार फिर एक नया चश्मा मिला। धीरे-धीरे हालदार साहब की यह आदत ही बन गई कि हर बार चौराहे पर रुकें, पान खाएँ और मूर्ति को ध्यान से देखें। एक दिन उनकी जिज्ञासा इतनी बढ़ गई कि उन्होंने पानवाले से पूछ ही लिया।
पानवाला और कैप्टन का रहस्य
पानवाला मोटा, काला और ख़ुशमिज़ाज आदमी था। उसके मुँह में हमेशा पान ठुँसा रहता था। सवाल सुनते ही उसकी आँखें हँस पड़ीं, उसकी तोंद हिली, और उसने बताया कि यह काम कैप्टन चश्मेवाला करता है। फिर अपनी बोली में उसने समझाया कि जब किसी ग्राहक को वैसा ही फ्रेम चाहिए होता है, तो कैप्टन मूर्ति वाला फ्रेम उतारकर उसे दे देता है और मूर्ति पर दूसरा लगा देता है।
अब हालदार साहब को बात समझ में आई। कैप्टन को नेताजी की बिना चश्मे वाली मूर्ति बुरी लगती थी, मानो चश्मे के बिना नेताजी को तकलीफ़ हो रही हो। इसलिए वह अपनी गिनी-चुनी चीज़ों में से एक फ्रेम मूर्ति पर लगा देता था। लेखक की यह कल्पना बहुत प्यारी है कि फ्रेम उतारते समय कैप्टन शायद नेताजी से माफ़ी भी माँगता होगा।
हालदार साहब ने पूछा कि मूर्ति का असली चश्मा कहाँ गया। पानवाले ने हँसते हुए कहा कि मास्टर बनाना भूल गया। हालदार साहब इस बात पर हैरान भी हुए और भावुक भी। शायद मास्टर जी समझ ही नहीं पाए होंगे कि पत्थर में काँच जैसा पारदर्शी चश्मा कैसे बनाएँ। या बनाते समय वह टूट गया होगा। इन सब बातों से हालदार साहब कैप्टन की देशभक्ति के आगे नतमस्तक हो गए।
कैप्टन: फ़ौजी नहीं, फेरीवाला
हालदार साहब को लगा कि कैप्टन शायद नेताजी का कोई साथी होगा, या आज़ाद हिंद फ़ौज का कोई पुराना सिपाही। पर पानवाले ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि वह लँगड़ा भला फ़ौज में क्या जाएगा, वह तो पागल है। हालदार साहब को पानवाले का एक देशभक्त का इस तरह मज़ाक उड़ाना अच्छा नहीं लगा।
तभी कैप्टन सामने से आता दिखा। वह बहुत बूढ़ा, कमज़ोर और लँगड़ा था। उसके सिर पर गांधी टोपी थी और आँखों पर काला चश्मा। एक हाथ में छोटी-सी संदूकची थी और दूसरे में एक बाँस, जिस पर बहुत-से चश्मे टँगे थे। हालदार साहब समझ गए कि बेचारे की दुकान भी नहीं है, वह फेरी लगाकर चश्मे बेचता है।
अब कहानी का असली मोड़ सामने आता है। जिस आदमी के पास अपनी दुकान तक नहीं, जो ग़रीब और लाचार है, वही नेताजी के सम्मान की इतनी चिंता करता है। लोग उसे कैप्टन कहकर चिढ़ाते होंगे, पर असल में यह नाम उसकी देशभक्ति को सही ढंग से पहचानता है। सेना में न होकर भी उसके मन में एक सैनिक जैसा देशप्रेम है।
Concepts and terms
क़िस्सा सुनाने का रोचक, बातचीत जैसा ढंग। इसमें लेखक कभी-कभी सीधे पाठक से बात करने लगता है।
गाँव से बड़ा और शहर से छोटा बसावट वाला इलाक़ा। इसमें गिने-चुने पक्के मकान, एक बाज़ार और कुछ स्कूल होते हैं।
कस्बे या शहर का स्थानीय प्रशासन, जो सड़क, सफ़ाई और सार्वजनिक सुविधाओं का काम देखता है।
जो दुकान के बजाय घूम-घूमकर सामान बेचे। कैप्टन बाँस पर चश्मे टाँगकर फेरी लगाता है।
देश, उसके लोगों, प्रकृति और नायकों के प्रति सच्चा प्रेम और उसके लिए कुछ करने की इच्छा।
सावधान
भ्रम और सच
करके देखो
Title:
हमारे चौराहे की मूर्ति
Safety:
सड़क पर अकेले मत जाइए; चौराहे पर गाड़ियों से सावधान रहिए और मूर्ति पर चढ़िए मत।
What You Notice:
आप देखेंगे कि कई मूर्तियाँ लगने के बाद भुला दी जाती हैं, जबकि कहानी का कैप्टन एक मूर्ति के सम्मान की रोज़ चिंता करता था।
Did you know
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व किया था। दिल्ली चलो और तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा उनके प्रसिद्ध नारे हैं।
बस्ट उस मूर्ति को कहते हैं, जिसमें केवल सिर, गर्दन और छाती का ऊपरी हिस्सा बना हो। कहानी की मूर्ति भी ऐसी ही, लगभग दो फुट ऊँची थी।
किस्सागोई का अर्थ है क़िस्सा सुनाने की कला। स्वयं प्रकाश की कहानियाँ ऐसे लगती हैं, जैसे कोई सामने बैठकर बातें करते हुए किस्सा सुना रहा हो।
Memory tricks
कहानी के चार पात्र: हा-पा-कै-मो — हालदार साहब, पानवाला, कैप्टन, मोतीलाल। हापा कैमो।
Practice MCQs with answers (25)
- A इंदौर
- B भोपाल
- C जयपुर
- D उज्जैन
Show answer
Why:
मध्यप्रदेश।
- A चिकित्सा-शास्त्र
- B मैकेनिकल इंजीनियरिंग
- C क़ानून
- D पत्रकारिता
Show answer
Why:
औद्योगिक संस्थान।
- A कठिन संस्कृतनिष्ठ भाषा
- B काव्यात्मक छंद
- C किस्सागोई
- D पत्र-शैली
Show answer
Why:
बातचीत जैसा।
- A केवल नक़्शे की सीमाओं और रेखाओं से
- B केवल सेना से
- C केवल नेताओं से
- D लोगों और प्रकृति से
Show answer
Why:
नदी, पहाड़, जीव।
- A गहरा क्रोध और शिकायत
- B पूरी प्रशंसा
- C हल्का व्यंग्य
- D डर
Show answer
Why:
कबूतरों की छतरी।
- A कम बजट और समय की कमी
- B मास्टर जी का देश भर में बहुत प्रसिद्ध होना
- C नेताजी की इच्छा
- D लॉटरी
Show answer
Why:
शासनावधि ख़त्म।
- A मूर्ति बिल्कुल बेकार और बेढंगी थी
- B मूर्ति टूटी थी
- C मूर्ति छिपी थी
- D मूर्ति प्रभावशाली थी
Show answer
Why:
सफल प्रयास।
- A बहुत ग़ुस्सा और अपमानित
- B कौतुक भरा
- C डर
- D ऊब
Show answer
Why:
मुसकान।
- A मूर्ति के रंग, आकार और क़ीमत का
- B पत्थर का
- C मूर्तिकार का
- D भावना का
Show answer
Why:
देशभक्ति।
- A देश के प्रति गंभीरता
- B हर बात पर हँसने की आदत
- C लापरवाही
- D घमंड
Show answer
Why:
संवेदनशील।
- A काले मोटे फ्रेम का चौकोर
- B लाल रंग का
- C तार के फ्रेम का गोल
- D कोई नहीं
Show answer
Why:
बदलाव।
- A पान की दुकान का मालिक उनका रिश्तेदार था
- B बदलते चश्मे की जिज्ञासा
- C जीप ख़राब होती थी
- D वहाँ भीड़ थी
Show answer
Why:
कौतूहल।
- A ख़ुशमिज़ाज
- B उदास और चिड़चिड़ा
- C डरपोक
- D घमंडी
Show answer
Why:
मसख़रा।
- A उसे नेताजी की मूर्ति से नफ़रत थी
- B मूर्ति टूट रही थी
- C उसके पास फ्रेम कम थे
- D नगरपालिका का आदेश था
Show answer
Why:
छोटी दुकान।
- A वह बहुत डरपोक और चालाक व्यापारी था
- B वह मूर्ति को जीवित नेता जैसा मानता था
- C वह पागल था
- D वह चोर था
Show answer
Why:
गहरा सम्मान।
- A बहुत ज़्यादा हँसाने वाली
- B बेकार
- C डराने वाली
- D चकित और भावुक करने वाली
Show answer
Why:
द्रवित।
- A नगरपालिका का कोई बड़ा अधिकारी
- B आज़ाद हिंद फ़ौज का सिपाही
- C मूर्तिकार
- D पानवाला
Show answer
Why:
कैप्टन नाम।
- A सच्चे देशभक्त की अनदेखी
- B कैप्टन के प्रति गहरा आदर और प्रेम
- C डर
- D चिंता
Show answer
Why:
मज़ाक।
- A वह बहुत बड़ी दुकान का मालिक है
- B वह जादूगर है
- C वह फेरीवाला है
- D वह मूर्तिकार है
Show answer
Why:
दुकान नहीं।
- A सिर से पैर तक पूरा शरीर
- B केवल पैर और घुटने
- C केवल हाथ
- D सिर से छाती तक का भाग
Show answer
Why:
आधी मूर्ति।
- A गहरा दुख और शोक
- B हैरानी भरा मज़ा
- C तेज़ ग़ुस्सा
- D डर
Show answer
Why:
मुसकान।
- A केवल अमीर और ताक़तवर लोगों
- B केवल अफ़सरों
- C केवल नेताओं
- D साधारण, ग़रीब लोगों
Show answer
Why:
कैप्टन।
- A बनमाली पुरस्कार
- B ज्ञानपीठ पुरस्कार
- C भारत रत्न
- D मूर्तिदेवी
Show answer
Why:
पहल सम्मान भी।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- B अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- C दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
छोटा आदमी, बड़ा मन।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C I, II और III तीनों
- D केवल I और III
Show answer
Why:
कैप्टन फेरीवाला था।
Important short questions (7)
स्वयं प्रकाश मध्यवर्ग के जीवन को बारीकी से चित्रित करते हैं। उनकी कहानियाँ वर्ग-शोषण और जाति, धर्म तथा लिंग के भेदभाव का विरोध करती हैं। रोचक किस्सागोई उनकी शैली की सबसे बड़ी ख़ूबी है।
लेखक हल्के व्यंग्य के साथ बताता है कि कस्बा बहुत छोटा था, गिनती के पक्के मकान और एक ही बाज़ार था। नगरपालिका बिना योजना के कभी सड़क, कभी कबूतरों की छतरी, तो कभी कवि-सम्मेलन करवा देती थी।
लेखक अनुमान लगाता है कि अच्छे मूर्तिकारों की जानकारी और बजट की कमी थी। समय बीतता गया, और बोर्ड का कार्यकाल ख़त्म होते-होते जल्दी में स्कूल के ड्राइंग मास्टर को काम दे दिया गया।
उन्हें पहले यह कौतुक भरा लगा। फिर उन्होंने सोचा कि कस्बे के लोगों की कोशिश सराहनीय है, क्योंकि मूर्ति के आकार से ज़्यादा महत्त्व भावना का है। उन्हें यह दुख भी हुआ कि देशभक्ति मज़ाक बनती जा रही है।
कैप्टन को नेताजी की बिना चश्मे वाली मूर्ति बुरी लगती थी, मानो उन्हें तकलीफ़ हो रही हो। इसलिए वह अपने गिने-चुने फ्रेमों में से एक मूर्ति पर लगा देता था। यह उसकी देशभक्ति थी।
हालदार साहब सोचते थे कि वह नेताजी का कोई साथी या आज़ाद हिंद फ़ौज का पुराना सिपाही होगा। पर वह एक बूढ़ा, कमज़ोर और लँगड़ा फेरीवाला निकला, जिसके पास दुकान तक नहीं थी।
पानवाले का कैप्टन को लँगड़ा और पागल कहना बिल्कुल ठीक नहीं था। किसी की शारीरिक कमी का मज़ाक उड़ाना ग़लत है। कैप्टन सच्चा देशभक्त था, उसका सम्मान होना चाहिए था।
Long answer questions (3)
हालदार साहब संवेदनशील और विचारशील व्यक्ति हैं। मूर्ति पर असली चश्मा देखकर वे केवल हँसते नहीं, बल्कि उसके पीछे की भावना पर सोचते हैं। उन्हें दुख है कि देशभक्ति मज़ाक बनती जा रही है। कैप्टन की कहानी जानकर वे उसकी देशभक्ति के आगे नतमस्तक हो जाते हैं, और पानवाले का उसका मज़ाक उड़ाना उन्हें अच्छा नहीं लगता। पानवाला मोटा, ख़ुशमिज़ाज और मसख़रा आदमी है। उसके मुँह में हमेशा पान रहता है, और वह हर बात पर आँखों ही आँखों में हँसता है। वह कैप्टन को लँगड़ा और पागल कहकर उसका मज़ाक उड़ाता है। पर पानवाला भीतर से बुरा नहीं है। आगे चलकर कैप्टन की मृत्यु पर वह उदास होकर अपनी आँखें पोंछता है। यानी उसके मज़ाक के पीछे भी कैप्टन के लिए अपनापन था। इस तरह हालदार साहब गंभीर और भावुक हैं, जबकि पानवाला ऊपर से मसख़रा, पर भीतर से संवेदनशील है।
लेखक के अनुसार देश केवल सीमाओं से घिरी ज़मीन नहीं है। देश बनता है उसके लोगों, नदियों, पहाड़ों, पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों से। इन सबसे प्रेम करना और इनकी भलाई के लिए कोशिश करना ही देशभक्ति है। कहानी बताती है कि देश बनाने में केवल बड़े नेताओं या सैनिकों का नहीं, करोड़ों साधारण नागरिकों का भी हाथ है। कैप्टन चश्मेवाला इसका उदाहरण है। वह ग़रीब फेरीवाला है, पर नेताजी के सम्मान के लिए अपने गिने-चुने फ्रेमों में से एक मूर्ति पर लगाता है। आज भी हम कई तरह से देशभक्ति दिखा सकते हैं, जैसे सार्वजनिक चीज़ों को नुक़सान न पहुँचाना, पानी और बिजली बचाना, पेड़ लगाना और कमज़ोर लोगों की मदद करना। ये छोटे काम भी देश को मज़बूत बनाते हैं।
कैप्टन नाम सुनकर हालदार साहब के मन में शायद एक लंबे, मज़बूत और रौबदार आदमी की तस्वीर बनी होगी। उन्होंने सोचा होगा कि उसकी कड़क मूँछें होंगी। चाल सीधी होगी। शायद वह फ़ौजी वर्दी जैसे कपड़े पहनता होगा। उन्हें लगा होगा कि वह आज़ाद हिंद फ़ौज का कोई पुराना सिपाही है। शायद वह नेताजी के साथ लड़ा था। इसीलिए उनकी मूर्ति की इतनी परवाह करता है। शायद उसके पास चश्मों की कोई बड़ी, सजी हुई दुकान होगी। पर जब असली कैप्टन सामने आया, तो वह बहुत बूढ़ा, कमज़ोर और लँगड़ा निकला, जिसके पास दुकान तक नहीं थी। इस अंतर ने हालदार साहब को और भी गहराई से छू लिया, क्योंकि उन्होंने समझा कि देशभक्ति के लिए किसी वर्दी या पद की ज़रूरत नहीं होती।
Flashcards (17)
Play this topic
- शब्द और अर्थ
- किसका गुण?
- सही या भ्रम
- कहानी का क्रम
- झटपट उत्तर
सरकंडे का चश्मा: बची रही उम्मीद
दो साल बाद एक दिन मूर्ति बिना चश्मे के मिलती है, क्योंकि कैप्टन नहीं रहा। हालदार साहब त्यागियों पर हँसने वाले समाज को लेकर दुखी होते हैं। पर अगली बार बच्चों का बनाया सरकंडे का चश्मा उन्हें नई उम्मीद देता है।
What you will be able to do
- कैप्टन की मृत्यु के बाद हालदार साहब और पानवाले के मन में आए बदलाव को समझा सकेंगे।
- देश के लिए त्याग करने वालों पर हँसने वाले समाज के बारे में हालदार साहब की चिंता का आशय स्पष्ट कर सकेंगे।
- सरकंडे के चश्मे का प्रतीकात्मक अर्थ और उससे जगी आशा की व्याख्या कर सकेंगे।
- कहानी की भाषा में स्थानीय बोली, अंग्रेज़ी शब्दों, निपात और वाच्य के प्रयोग को पहचान सकेंगे।
- दैनिक जीवन में देशप्रेम दिखाने वाले कामों को पहचानकर उन्हें अपनाने की योजना बना सकेंगे।
Key points
हालदार साहब दो साल तक कस्बे से गुज़रते हुए मूर्ति पर कभी गोल, कभी चौकोर, कभी लाल, कभी धूप वाला चश्मा देखते रहे।
एक दिन मूर्ति पर कोई चश्मा नहीं था; अगली बार भी नहीं था, और पानवाले ने भीगी आँखों से बताया कि कैप्टन मर गया।
हालदार साहब दुखी होकर सोचते हैं कि जो समाज देश के लिए सब कुछ त्यागने वालों पर हँसता है, उसका भविष्य क्या होगा।
उन्हें यह भी पीड़ा है कि वही समाज अपने स्वार्थ के लिए बिकने के मौक़े खोजता रहता है।
अगली बार उन्होंने तय किया कि चौराहे पर नहीं रुकेंगे, क्योंकि मूर्ति बिना चश्मे की होगी और उसे देखना दुखद होगा।
आदत से उनकी आँखें मूर्ति की ओर उठ गईं, और उन्होंने ड्राइवर से तुरंत जीप रोकने को कहा।
इस बार नेताजी की आँखों पर सरकंडे का एक नन्हा चश्मा टिका था, जैसा बच्चे खेल में बनाते हैं; हालदार साहब सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए।
सरकंडे का चश्मा बताता है कि नई पीढ़ी में देशप्रेम ज़िंदा है; इसी बात पर हालदार साहब की आँखें भर आईं।
कहानी की भाषा में बोलचाल, स्थानीय बोली और अंग्रेज़ी शब्दों का स्वाभाविक मेल है, जैसे आइडिया, रियल और चेंज।
Full explanation
दो साल के बदलते चश्मे
कैप्टन से मिलने के बाद भी हालदार साहब अगले दो साल तक अपने दौरों में उसी कस्बे से निकलते रहे। हर बार वे मूर्ति पर नया चश्मा देखते। कभी गोल फ्रेम होता, कभी चौकोर, कभी लाल, कभी काला, कभी धूप वाला और कभी बड़े काँचों वाला। चश्मा चाहे जैसा हो, पर कोई न कोई चश्मा ज़रूर होता था।
यह चश्मा हालदार साहब की धूल भरी, थकाने वाली यात्रा में कुछ पल की ख़ुशी और कौतुक देता था। इससे पता चलता है कि मूर्ति और कैप्टन का चश्मा उनके लिए एक भावनात्मक सहारा बन चुका था। वे इसे देखकर संतोष पाते थे कि कोई तो है, जो देश के नायक का सम्मान करता है।
इन दो सालों में कैप्टन ने एक भी बार मूर्ति को बिना चश्मे के नहीं छोड़ा। यह उसकी लगन और निष्ठा का प्रमाण है। ग़रीबी, बुढ़ापा और शारीरिक कमज़ोरी के बावजूद वह यह काम लगातार करता रहा, बिना किसी को बताए और बिना किसी इनाम की आशा के।
कैप्टन नहीं रहा
फिर एक दिन नेताजी की आँखें ख़ाली दिखीं, उन पर कोई चश्मा नहीं था। पानवाले की दुकान पर भी ताला लगा था, और चौराहे की ज़्यादातर दुकानें बंद थीं। अगली बार भी मूर्ति बिना चश्मे के थी। पान लेते हुए हालदार साहब ने धीमी आवाज़ में पूछा कि आज नेताजी की आँखों पर चश्मा क्यों नहीं है।
इस बार पानवाला हँसा नहीं। वह उदास हो गया, सिर झुकाकर अपनी धोती के कोने से आँखें पोंछीं और बोला कि कैप्टन मर गया। यह पल पानवाले के चरित्र का दूसरा पहलू दिखाता है। जो आदमी कैप्टन को पागल कहकर हँसता था, वही उसकी मौत पर रो पड़ता है। यानी उसके मज़ाक के पीछे भी कैप्टन के लिए अपनापन छिपा था।
हालदार साहब इसके बाद कुछ पूछ नहीं पाए। कुछ पल चुपचाप खड़े रहे, पैसे दिए और जीप में बैठकर चले गए। लेखक ने यहाँ कोई लंबा वर्णन नहीं किया। बस चुप्पी दिखाई है। और यही चुप्पी दुख को सबसे गहराई से व्यक्त करती है।
क्या होगा उस कौम का?
जीप में बैठे हालदार साहब बार-बार एक ही बात सोचते रहे। उन्हें चिंता हुई कि उस समाज का भविष्य क्या होगा, जो देश के लिए अपना घर, परिवार, जवानी और पूरा जीवन होम कर देने वालों पर भी हँसता है। होम करना यानी यज्ञ की आग में आहुति की तरह सब कुछ अर्पित कर देना।
उनकी पीड़ा का दूसरा हिस्सा और भी तीखा है। वे सोचते हैं कि यही समाज अपने निजी फ़ायदे के लिए बिकने के मौक़े ढूँढ़ता रहता है। यानी लोग स्वार्थ के लिए अपने सिद्धांत, ईमान और देश के हित तक को बेचने को तैयार रहते हैं। एक ओर त्याग करने वालों का मज़ाक, दूसरी ओर स्वार्थ के लिए समझौता, यही समाज की सबसे बड़ी बीमारी है।
यहाँ हालदार साहब की चिंता केवल कैप्टन के लिए नहीं, पूरे देश के लिए है। नेताजी जैसे सेनानियों ने सब कुछ त्यागा, और कैप्टन जैसे लोग चुपचाप उनका सम्मान करते रहे। पर लोग उन्हें पागल कहते रहे। हालदार साहब को डर है कि अगर समाज ऐसे लोगों की क़द्र नहीं करेगा, तो देशभक्ति धीरे-धीरे ख़त्म हो जाएगी।
चौराहे पर न रुकने का फ़ैसला
पंद्रह दिन बाद हालदार साहब फिर उसी कस्बे से गुज़रने वाले थे। कस्बे में घुसने से पहले ही उनके मन में ख़याल आया कि चौराहे पर नेताजी की मूर्ति तो होगी, पर उसकी आँखों पर चश्मा नहीं होगा। क्योंकि मास्टर बनाना भूल गया, और कैप्टन अब रहा नहीं।
इसलिए उन्होंने तय किया कि आज चौराहे पर रुकेंगे नहीं, पान भी नहीं खाएँगे और मूर्ति की ओर देखेंगे भी नहीं। उन्होंने ड्राइवर से भी कह दिया कि आज बहुत काम है, चौराहे पर रुकना नहीं। यह फ़ैसला उनकी गहरी निराशा और मायूसी को दिखाता है। उन्हें बिना चश्मे की मूर्ति देखना असहनीय लग रहा था, क्योंकि वह उन्हें कैप्टन की मौत और समाज की उदासीनता की याद दिलाती।
पर आदत से मजबूर उनकी आँखें चौराहा आते ही मूर्ति की ओर उठ गईं। यह बात बहुत मानवीय है। हम जिस चीज़ से प्यार करते हैं, उससे मुँह फेरना चाहें, तब भी मन बार-बार उसी ओर खिंचता है।
सरकंडे का चश्मा
मूर्ति पर नज़र पड़ते ही हालदार साहब चीख पड़े, रोको! जीप तेज़ थी, ड्राइवर ने ज़ोर से ब्रेक लगाए, और राह चलते लोग देखने लगे। जीप ठीक से रुकी भी नहीं थी कि हालदार साहब कूदकर तेज़ क़दमों से मूर्ति की ओर लपके और उसके ठीक सामने सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए।
नेताजी की आँखों पर सरकंडे का एक नन्हा-सा चश्मा टिका था, ठीक वैसा, जैसा बच्चे खेल-खेल में बना लेते हैं। यह किसी दुकान का चश्मा नहीं था। इसे कस्बे के किसी बच्चे या बच्चों ने अपने हाथों से बनाया था, ताकि नेताजी की मूर्ति बिना चश्मे के न रहे।
हालदार साहब भावुक हो उठे, और ज़रा-सी इस चीज़ ने उनकी आँखें नम कर दीं। उनका सावधान की मुद्रा में खड़े होना एक सैनिक के सलामी देने जैसा है। यह सलामी नेताजी के लिए भी है, कैप्टन के लिए भी और उन बच्चों के लिए भी, जिन्होंने देशभक्ति की लौ बुझने नहीं दी।
सरकंडे के चश्मे का अर्थ
सरकंडे का चश्मा कहानी का सबसे बड़ा प्रतीक है। यह बताता है कि कैप्टन के जाने के बाद भी देशप्रेम ख़त्म नहीं हुआ। नई पीढ़ी ने उस ज़िम्मेदारी को अपने हाथ में ले लिया है। बच्चों के पास पैसे नहीं थे, असली चश्मा नहीं था, फिर भी उन्होंने अपने साधनों से जो बन सका, वह किया।
इससे हालदार साहब की निराशा आशा में बदल जाती है। जो डर उन्हें था कि देशभक्ति मज़ाक बनकर मिट जाएगी, वह डर दूर हो जाता है। उन्हें भरोसा होता है कि जब तक बच्चों में ऐसी भावना है, तब तक देश का भविष्य सुरक्षित है। कहानी की शुरुआत में ही कहा गया था कि देश बनाने में बड़े ही नहीं, बच्चे भी शामिल हैं। अंत उसी बात को सच कर देता है।
सरकंडा सस्ता, साधारण और कमज़ोर है। पर उससे बना चश्मा कीमती फ्रेमों से भी ज़्यादा मूल्यवान है, क्योंकि उसमें सच्ची भावना है। यह फिर से वही बात दोहराता है, जो हालदार साहब ने शुरू में सोची थी: महत्त्व चीज़ के रूप या क़ीमत का नहीं, उसके पीछे की भावना का है।
कहानी की भाषा और शैली
कहानी की भाषा बोलचाल की सहज हिंदी है, जिसमें स्थानीय बोली और अंग्रेज़ी शब्द घुले-मिले हैं। पानवाले की बोली में गिराक, किदर और उदर जैसे शब्द हैं, जिन्हें मानक हिंदी में ग्राहक, किधर और उधर कहेंगे। इससे पात्र असली और जीवंत लगते हैं।
हालदार साहब के मुँह से निकले आइडिया, रियल और चेंज जैसे अंग्रेज़ी शब्द बताते हैं कि आज की हिंदी में दूसरी भाषाओं के शब्द स्वाभाविक रूप से आ गए हैं। इससे भाषा में ताज़गी और अपनापन आता है, और वह आज के बोलने वालों के क़रीब लगती है। एक भाषा जब दूसरी भाषा के शब्द अपनाती है, तो वह और समृद्ध होती है।
कहानी में निपात का भी सुंदर प्रयोग है। ही, भी और तो जैसे शब्द वाक्य में ज़ोर लाते हैं। व्याकरण की दृष्टि से कहानी के वाक्यों को कर्मवाच्य और भाववाच्य में बदलकर भी अभ्यास किया जा सकता है। कर्मवाच्य में कर्म प्रधान होता है, जैसे पान खाया जा रहा था, और भाववाच्य में क्रिया का भाव, जैसे अब चला जाए।
Concepts and terms
कोई चीज़, जो अपने से बड़े भाव को दिखाए। सरकंडे का चश्मा नई पीढ़ी की देशभक्ति और आशा का प्रतीक है।
किसी अच्छी उम्मीद का टूट जाना। कैप्टन के न रहने पर हालदार साहब को लगता है कि देशभक्ति की परंपरा ख़त्म हो गई।
किसी इलाक़े की बोलचाल वाली भाषा, जो मानक हिंदी से थोड़ी अलग हो। पानवाले की बोली में किदर और उदर जैसे शब्द हैं।
ही, भी, तो, तक जैसे छोटे शब्द, जो वाक्य में किसी बात पर ज़ोर देते हैं।
क्रिया का वह रूप, जिससे पता चले कि वाक्य में कर्ता, कर्म या भाव में से किसकी प्रधानता है।
सावधान
भ्रम और सच
मिलाकर देखो
Scenario:
हमारे मोहल्ले के पार्क में डॉ. भीमराव आंबेडकर की एक छोटी मूर्ति है। कुछ महीनों से उस पर धूल जमी थी, और उसके आसपास लोग कचरा फेंकने लगे थे। एक बुज़ुर्ग चाचा रोज़ सुबह उसे कपड़े से पोंछते थे, पर उनके बीमार होने के बाद यह काम बंद हो गया।
कक्षा आठ और दस के कुछ बच्चों ने यह देखा। उन्होंने रविवार को मिलकर मूर्ति साफ़ की, आसपास का कचरा उठाया और कूड़ेदान रखवाने के लिए नगरपालिका को पत्र लिखा। एक बच्ची ने गत्ते पर लिखकर तख़्ती लगाई: यह हमारा सम्मान है, इसे साफ़ रखें।
जब चाचा ठीक होकर पार्क लौटे, तो साफ़ मूर्ति और तख़्ती देखकर उनकी आँखें नम हो गईं।
Activity:
अपने इलाक़े में किसी सार्वजनिक चीज़, जैसे बस-स्टॉप, पार्क की बेंच या मूर्ति, को चुनिए। अपनी कक्षा के साथ उसकी सफ़ाई या मरम्मत की एक छोटी योजना बनाइए।
Analysis:
देशभक्ति बड़े भाषणों से नहीं, ऐसे छोटे और लगातार कामों से दिखती है। जब नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी का अच्छा काम आगे बढ़ाती है, तो समाज में आशा बनी रहती है।
Did you know
सरकंडा एक लंबी, पतली, खोखली घास जैसी डंठल होती है। गाँवों में बच्चे इससे खिलौने, कलम और छोटी-छोटी चीज़ें बनाते हैं।
अटेंशन यानी सावधान की मुद्रा, जिसमें सीधे तनकर, पैर जोड़कर और हाथ बगल में रखकर खड़ा हुआ जाता है। सैनिक सम्मान देने के लिए ऐसे खड़े होते हैं।
निपात वे शब्द हैं, जो किसी बात पर ज़ोर देने के लिए आते हैं, जैसे ही, भी, तो, तक और भर। ये वाक्य का अर्थ बदल देते हैं।
Memory tricks
कहानी का अंत: चु-दु-रो-आ — चश्मा नहीं, दुख, रोको! और आँसू।
Practice MCQs with answers (25)
- A लंबी यात्रा की थकान और चिढ़
- B यात्रा में ख़ुशी के पल
- C काम में देरी
- D ड्राइवर से झगड़ा
Show answer
Why:
कौतुक, प्रफुल्लता।
- A निष्ठा
- B लापरवाही
- C लालच
- D डर
Show answer
Why:
लगातार।
- A चौराहे पर बहुत बड़ा मेला लगा था
- B बारिश हो रही थी
- C ज़्यादातर दुकानें बंद थीं
- D मूर्ति टूटी थी
Show answer
Why:
शोक।
- A वह कैप्टन से बहुत डरता था और ख़ुश था
- B उसे दुकान का नुक़सान हुआ
- C वह नाटक कर रहा था
- D उसके मन में कैप्टन के लिए अपनापन था
Show answer
Why:
मज़ाक के पीछे।
- A उन्हें इस बात से कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ा
- B दुख से स्तब्ध होना
- C वे जल्दी में थे
- D वे नाराज़ थे
Show answer
Why:
कुछ पूछ न पाए।
- A विदेशी शासकों और उनके सैनिकों से
- B केवल पानवाले से
- C त्यागियों पर हँसने वाले समाज से
- D बच्चों से
Show answer
Why:
कौम।
- A स्वार्थ के लिए ईमान बेचना
- B अपनी दुकान का सारा सामान बेच देना
- C नौकरी ढूँढ़ना
- D बाज़ार जाना
Show answer
Why:
समझौता।
- A घर बनाना
- B घर लौटना
- C खाना पकाना
- D अर्पित करना
Show answer
Why:
यज्ञ की आहुति।
- A बिना चश्मे की मूर्ति देखना असहनीय था
- B उनकी जीप का ब्रेक पूरी तरह ख़राब था
- C पान महँगा हो गया था
- D चौराहा बंद था
Show answer
Why:
मायूसी।
- A ड्राइवर ने उन्हें ज़बरदस्ती दिखाया
- B वहाँ शोर हुआ
- C आदत और लगाव के कारण
- D किसी ने बुलाया
Show answer
Why:
आदत से मजबूर।
- A प्लास्टिक
- B सरकंडा
- C लोहे का तार
- D काँच
Show answer
Why:
बच्चों जैसा।
- A मास्टर मोतीलाल ने बड़े ध्यान से
- B पानवाले ने
- C नगरपालिका ने
- D कस्बे के बच्चों ने
Show answer
Why:
जैसा बच्चे बनाते हैं।
- A डर और भारी घबराहट
- B सम्मान और सलामी
- C थकान
- D ग़ुस्सा
Show answer
Why:
अटेंशन।
- A ग़रीबी और पूरी तरह हार मान लेना
- B खिलौनों का शौक़
- C नई पीढ़ी की देशभक्ति
- D मूर्ति का अपमान
Show answer
Why:
आशा।
- A उन्हें देशभक्ति ज़िंदा दिखी
- B उन्हें सरकंडे से बहुत ज़्यादा डर लगता था
- C उनकी आँख में धूल गई
- D वे बीमार थे
Show answer
Why:
निराशा से आशा।
- A निराशा
- B क्रोध
- C भय
- D आशा
Show answer
Why:
सरकंडा।
- A सरकंडा बाज़ार में सोने से महँगा बिकता है
- B वह बड़ा है
- C उसमें सच्ची भावना है
- D वह रंगीन है
Show answer
Why:
भावना का महत्त्व।
- A दरवाज़ा
- B खिड़की
- C मेज़
- D फ्रेम
Show answer
Why:
चश्मे का।
- A भाषा बहुत कठिन और बनावटी हो जाती है
- B भाषा सहज और आज की लगती है
- C अर्थ खो जाता है
- D कहानी अंग्रेज़ी हो जाती है
Show answer
Why:
बोलचाल।
- A भी
- B अब
- C नहीं
- D पाए
Show answer
Why:
ज़ोर देने वाला।
- A पानवाला आगे भी रोज़ पान खाता रहेगा
- B पानवाले ने एक पान खा लिया था
- C पान खाया जाए
- D पानवाले द्वारा पान खाया जा रहा था
Show answer
Why:
कर्म प्रधान।
- A सरकंडे के चश्मे से
- B उनके ज़ोर-ज़ोर से गाने और हँसने से
- C उनके पत्र से
- D उनकी तस्वीर से
Show answer
Why:
संकेत।
- A कोई बड़ा त्योहार और उत्सव
- B कोई दुखद घटना
- C छुट्टी का दिन
- D चुनाव
Show answer
Why:
शोक।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- B अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- C दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
नई पीढ़ी।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C I, II और III तीनों
- D केवल I और III
Show answer
Why:
वे न रुकने का सोच रहे थे।
Important short questions (7)
पानवाला उदास हो गया। उसने मुँह का पान थूका, सिर झुकाया और धोती के कोने से आँखें पोंछते हुए बताया कि कैप्टन मर गया। जो कभी कैप्टन का मज़ाक उड़ाता था, वही अब रो रहा था।
उन्हें दुख हुआ कि समाज देश के लिए घर, परिवार, जवानी और जीवन त्यागने वालों पर हँसता है। साथ ही वही समाज अपने स्वार्थ के लिए बिकने के मौक़े खोजता रहता है।
कैप्टन के न रहने से उन्हें लगा कि मूर्ति पर अब चश्मा नहीं होगा। बिना चश्मे की मूर्ति उन्हें कैप्टन की मौत और समाज की उदासीनता की याद दिलाती, इसलिए वे बहुत मायूस थे।
यह चश्मा बताता है कि कैप्टन के बाद भी देशभक्ति ख़त्म नहीं हुई। कस्बे के बच्चों ने नेताजी के सम्मान की ज़िम्मेदारी ले ली है। इससे उम्मीद जगती है कि नई पीढ़ी देश को सँभालेगी।
सावधान की मुद्रा सैनिक की सलामी जैसी है। हालदार साहब ने इस तरह नेताजी, कैप्टन और सरकंडे का चश्मा बनाने वाले बच्चों, तीनों के प्रति सम्मान प्रकट किया।
मान लो, कोई ग्राहक आ गया। उसे चौड़े फ्रेम चाहिए। तो कैप्टन उसके लिए कहाँ से लाएगा? इसलिए उसने उसे मूर्ति वाला फ्रेम दे दिया, और मूर्ति पर दूसरा लगा दिया।
इससे भाषा सहज, जीवंत और आज के बोलने वालों के क़रीब लगती है। नए विचारों के लिए नए शब्द मिल जाते हैं, और भाषा का शब्द-भंडार बढ़कर वह और समृद्ध हो जाती है।
Long answer questions (3)
कैप्टन की मृत्यु के बाद हालदार साहब बहुत दुखी थे। उन्हें लगा कि नेताजी की मूर्ति अब हमेशा बिना चश्मे के रहेगी, क्योंकि मास्टर बनाना भूल गया और कैप्टन अब रहा नहीं। वे सोचते रहे कि जो समाज त्याग करने वालों पर हँसता है और स्वार्थ के लिए बिकता है, उसका क्या होगा। इसी मायूसी में उन्होंने तय किया कि चौराहे पर नहीं रुकेंगे और मूर्ति की ओर देखेंगे भी नहीं। पर आदत से उनकी आँखें मूर्ति की ओर उठ गईं। वहाँ उन्होंने सरकंडे का एक छोटा-सा चश्मा देखा, जैसा बच्चे बनाते हैं। उन्होंने तुरंत जीप रुकवाई और मूर्ति के सामने सावधान खड़े हो गए। उनकी आँखें भर आईं, क्योंकि उन्हें दिखा कि कैप्टन के बाद भी देशभक्ति ज़िंदा है और बच्चों ने वह ज़िम्मेदारी उठा ली है। इस तरह उनकी गहरी निराशा एक नई, सुंदर आशा में बदल गई।
हालदार साहब की चिंता है कि जो समाज देश के लिए अपना घर, जवानी और जीवन त्याग देने वालों पर हँसता है, उसका भविष्य अंधकार में है। साथ ही वह समाज अपने स्वार्थ के लिए हर तरह के समझौते को तैयार रहता है। आज भी यह बात सच लगती है। कई बार हम ईमानदारी से काम करने वालों को भोला या पागल कहकर हँसते हैं। सड़क पर घायल की मदद करने वाले, पेड़ बचाने वाले या भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलने वाले लोगों को अक्सर अकेला छोड़ दिया जाता है। दूसरी ओर, थोड़े से फ़ायदे के लिए नियम तोड़ना, रिश्वत देना या ग़लत का साथ देना आम हो गया है। अगर ऐसा चलता रहा, तो अच्छे लोग हिम्मत हार जाएँगे। इसलिए हमें कैप्टन जैसे लोगों का सम्मान करना चाहिए और स्वार्थ के बजाय देशहित को चुनना चाहिए।
देशप्रेम केवल सीमा पर लड़ने का नाम नहीं, बल्कि रोज़ के छोटे-छोटे ज़िम्मेदार कामों का भी नाम है। पहला काम है सार्वजनिक संपत्ति, जैसे बस, ट्रेन, पार्क और मूर्तियों को नुक़सान न पहुँचाना। ये सबके पैसे से बनती हैं। दूसरा, पानी और बिजली बचाना, ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी ये मिल सकें। तीसरा, पेड़ लगाना, प्लास्टिक कम इस्तेमाल करना और अपने आसपास सफ़ाई रखना। चौथा, यातायात के नियम मानना, लाइन में लगना और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना। पाँचवाँ, ज़रूरतमंदों की मदद करना, जैसे किसी बच्चे को पढ़ाना या किसी बुज़ुर्ग को सड़क पार कराना। कहानी के कैप्टन और सरकंडे का चश्मा बनाने वाले बच्चों की तरह, हमारे छोटे काम भी देश को मज़बूत बनाते हैं। इन्हें केवल लिखना नहीं, रोज़ करना भी ज़रूरी है।
Flashcards (17)
Play this topic
- शब्द और अर्थ
- निराशा या आशा?
- सही या भ्रम
- कहानी का अंतिम क्रम
- झटपट उत्तर
Class 10 Hindi Chapter 7 — frequently asked questions
स्वयं प्रकाश मध्यवर्ग के जीवन को बारीकी से चित्रित करते हैं। उनकी कहानियाँ वर्ग-शोषण और जाति, धर्म तथा लिंग के भेदभाव का विरोध करती हैं। रोचक किस्सागोई उनकी शैली की सबसे बड़ी ख़ूबी है।
लेखक हल्के व्यंग्य के साथ बताता है कि कस्बा बहुत छोटा था, गिनती के पक्के मकान और एक ही बाज़ार था। नगरपालिका बिना योजना के कभी सड़क, कभी कबूतरों की छतरी, तो कभी कवि-सम्मेलन करवा देती थी।
लेखक अनुमान लगाता है कि अच्छे मूर्तिकारों की जानकारी और बजट की कमी थी। समय बीतता गया, और बोर्ड का कार्यकाल ख़त्म होते-होते जल्दी में स्कूल के ड्राइंग मास्टर को काम दे दिया गया।
पानवाला उदास हो गया। उसने मुँह का पान थूका, सिर झुकाया और धोती के कोने से आँखें पोंछते हुए बताया कि कैप्टन मर गया। जो कभी कैप्टन का मज़ाक उड़ाता था, वही अब रो रहा था।
उन्हें दुख हुआ कि समाज देश के लिए घर, परिवार, जवानी और जीवन त्यागने वालों पर हँसता है। साथ ही वही समाज अपने स्वार्थ के लिए बिकने के मौक़े खोजता रहता है।
कैप्टन के न रहने से उन्हें लगा कि मूर्ति पर अब चश्मा नहीं होगा। बिना चश्मे की मूर्ति उन्हें कैप्टन की मौत और समाज की उदासीनता की याद दिलाती, इसलिए वे बहुत मायूस थे।
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