Class 10 Hindi Chapter 11: नौबतखाने में इबादत
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अमीरुद्दीन से बिस्मिल्ला खाँ: शहनाई की साधना
डुमराँव में जन्मे अमीरुद्दीन बचपन में ननिहाल काशी आ गए, जहाँ बालाजी मंदिर के नौबतखाने में उनका रियाज़ चला। रसूलनबाई और बतूलनबाई के गीतों ने उनमें संगीत की ललक जगाई, और वे जीवन भर ख़ुदा से एक सच्चे सुर की दुआ माँगते रहे।
What you will be able to do
- यतींद्र मिश्र के जीवन और रचनाओं का परिचय दे सकेंगे।
- व्यक्ति-चित्र विधा की पहचान करते हुए पाठ की शैली समझा सकेंगे।
- बिस्मिल्ला खाँ के बचपन, परिवार और काशी के नौबतखाने से जुड़ाव का वर्णन कर सकेंगे।
- शहनाई के इतिहास, सुषिर-वाद्य और डुमराँव के महत्त्व को स्पष्ट कर सकेंगे।
- सच्चे सुर के लिए खाँ साहब की दुआ और विनम्रता का अर्थ समझा सकेंगे।
Key points
अयोध्या में सन् 1977 में जन्मे यतींद्र मिश्र ने लखनऊ विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया।
वे सहित नाम की अर्द्धवार्षिक पत्रिका के संपादक हैं; यदा-कदा और ड्योढ़ी पर आलाप उनके काव्य-संग्रह हैं।
नौबतखाने में इबादत शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर लिखा एक रोचक व्यक्ति-चित्र है।
बिस्मिल्ला खाँ का बचपन का नाम अमीरुद्दीन था; उनका जन्म बिहार के डुमराँव में हुआ और पाँच-छह साल की उम्र में वे ननिहाल काशी आ गए।
काशी के पंचगंगा घाट पर बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी के नौबतखाने में उनके मामा और नाना शहनाई बजाते थे।
शहनाई की रीड नरकट से बनती है, जो डुमराँव में सोन नदी के किनारे मिलती है; इसीलिए डुमराँव शहनाई के लिए अहम है।
रसूलनबाई और बतूलनबाई के ठुमरी, टप्पे और दादरे सुनकर किशोर अमीरुद्दीन के मन में संगीत की लगन जागी।
शहनाई फूँककर बजने वाला सुषिर-वाद्य है; अरब में ऐसे वाद्य को नय कहते थे, और शहनाई को शाहेनय यानी सुषिर-वाद्यों का शाह कहा गया।
अस्सी बरस तक खाँ साहब हर नमाज़ के बाद ख़ुदा से एक सच्चे सुर की दुआ माँगते रहे; उन्हें लगता था कि सुर की तमीज़ अभी अधूरी है।
Full explanation
यतींद्र मिश्र: कविता और संगीत के रसिक
यतींद्र मिश्र युवा पीढ़ी के ऐसे रचनाकार हैं, जिनकी रुचि कविता के साथ-साथ संगीत, नृत्य और दूसरी ललित कलाओं में भी गहरी है। उनका जन्म सन् 1977 में उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया। आजकल वे स्वतंत्र लेखन करते हैं और सहित नाम की एक अर्द्धवार्षिक पत्रिका का संपादन भी करते हैं। कलाओं को बढ़ावा देने के लिए वे सन् 1999 से विमला देवी फ़ाउंडेशन नाम का एक सांस्कृतिक न्यास भी चला रहे हैं।
उनके तीन काव्य-संग्रह छपे हैं: ड्योढ़ी पर आलाप, यदा-कदा, और अयोध्या तथा अन्य कविताएँ। प्रसिद्ध गायिका गिरिजा देवी के जीवन और रियाज़ पर उनकी पुस्तक का नाम गिरिजा है। रीतिकाल के अंतिम बड़े कवि द्विजदेव की ग्रंथावली का सह-संपादन किया, और कुँवर नारायण पर दो पुस्तकें तैयार कीं। रूपंकर कलाओं पर उनकी संपादित पुस्तक थाती भी चर्चित है। उन्हें ऋतुराज सम्मान, हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार और भारत भूषण अग्रवाल कविता सम्मान जैसे कई पुरस्कार मिले हैं।
व्यक्ति-चित्र: सुरों में ढला जीवन
नौबतखाने में इबादत भारत के महान शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर लिखा गया एक व्यक्ति-चित्र है। इसमें लेखक केवल उनका परिचय नहीं देता, बल्कि उनकी रुचियों, उनके मन की बुनावट, उनकी लगन और संगीत-साधना को बड़ी संवेदनशील भाषा में उतारता है।
लेखक यह भी साफ़ करता है कि संगीत एक आराधना है। इसकी अपनी विधि है, अपना शास्त्र है। इस शास्त्र को जानना ही काफ़ी नहीं, उसका लगातार अभ्यास भी ज़रूरी है। अभ्यास के लिए गुरु-शिष्य परंपरा, पूरी तल्लीनता, धैर्य और मन का मंथन चाहिए। बिस्मिल्ला खाँ में यही धैर्य और लगन थी, इसीलिए अस्सी की उम्र पार करके भी उनका रियाज़ नहीं रुका। लेखक ख़ुद शास्त्रीय संगीत की परंपरा के गहरे जानकार हैं, इसलिए पाठ में रागों, वाद्यों और संगीत-परंपराओं की अनेक गूँजें सुनाई देती हैं। भाषा सहज और बहती हुई है, और प्रसंगों से भरी है।
काशी, बालाजी मंदिर और नौबतखाना
कहानी लगभग सन् 1916 से 1922 के बीच की काशी से शुरू होती है। गंगा के पंचगंगा घाट पर बालाजी का एक मंदिर है। उसकी ड्योढ़ी, यानी प्रवेश-द्वार, के ऊपर एक नौबतखाना है, जहाँ से रोज़ मंगल-ध्वनि गूँजती है।
यहाँ दो छोटे भाई हैं: छह साल का अमीरुद्दीन और नौ साल का शम्सुद्दीन। अमीरुद्दीन को अभी यह भी नहीं पता कि राग किसे कहते हैं। उसके मामा लोग बात-बात पर भीमपलासी और मुलतानी जैसे रागों के नाम लेते रहते हैं, पर छोटे अमीरुद्दीन के लिए ये भारी-भरकम शब्द एक पहेली हैं।
अमीरुद्दीन के दोनों मामा, सादिक हुसैन और अलीबख्श, देश भर में मशहूर शहनाई वादक हैं। वे अलग-अलग रियासतों के दरबारों में बजाने जाते हैं। फिर भी उनकी दिनचर्या में बालाजी का मंदिर सबसे ऊपर है। रोज़ सुबह सबसे पहले वे उसी ड्योढ़ी पर शहनाई बजाते हैं। लेखक हल्के मज़ाक में कहता है कि मंदिर की मूर्तियों को रागों की कितनी समझ है, पता नहीं, पर वे रोज़ बदल-बदलकर ललित, कल्याण, मुलतानी और भैरव जैसे राग सुनती रहती हैं। यह अलीबख्श के घर का ख़ानदानी पेशा है, और उनके पिता भी यहीं शहनाई बजाते थे।
डुमराँव: जहाँ से आती है शहनाई की साँस
अमीरुद्दीन का जन्म बिहार के डुमराँव में एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ। पाँच-छह साल वहाँ बिताकर वह अपने ननिहाल काशी आ गया। लेखक कहता है कि इतिहास में डुमराँव का कोई बड़ा स्थान हो, ऐसा नहीं लगता। पर शहनाई और डुमराँव का रिश्ता बहुत गहरा है।
शहनाई बजाने के लिए रीड का इस्तेमाल होता है। रीड भीतर से पोली होती है, और उसी में फूँक मारकर शहनाई बजाई जाती है। यह रीड नरकट नाम की एक घास से बनती है, जो मुख्य रूप से डुमराँव में सोन नदी के किनारों पर उगती है। यानी शहनाई की आवाज़ में डुमराँव की मिट्टी की साँस शामिल है।
डुमराँव का एक और महत्त्व यह है कि यही बिस्मिल्ला खाँ की जन्मभूमि है। उनके परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ भी डुमराँव के ही थे। उनके पिता का नाम उस्ताद पैग़ंबरबख्श खाँ और माँ का नाम मिट्ठन था। अमीरुद्दीन उनके छोटे बेटे थे। आगे चलकर यही अमीरुद्दीन दुनिया भर में उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के नाम से जाने गए।
रसूलनबाई और बतूलनबाई: संगीत की पहली वर्णमाला
अब अमीरुद्दीन चौदह साल का है। वही काशी है, वही बालाजी मंदिर, जहाँ उसे रियाज़ के लिए नौबतखाने जाना पड़ता है। पर मंदिर तक जाने का एक ख़ास रास्ता है, जो दो गायिका बहनों, रसूलनबाई और बतूलनबाई, के घर के सामने से गुज़रता है। अमीरुद्दीन को इसी रास्ते से जाना अच्छा लगता है।
इस रास्ते पर उसे कभी ठुमरी, कभी टप्पा, तो कभी दादरा सुनाई देता है। जब दोनों बहनें गातीं, तो किशोर अमीरुद्दीन का मन ख़ुशी से भर जाता। बिस्मिल्ला खाँ ने अपने अनेक साक्षात्कारों में माना कि बचपन में संगीत के प्रति उनका लगाव इन्हीं दोनों बहनों को सुनकर जागा। लेखक बहुत सुंदर ढंग से कहता है कि उनके कोमल मन की स्लेट पर संगीत की पहली वर्णमाला इन्हीं दो बहनों ने लिखी।
यह प्रसंग बताता है कि बच्चे का मन किस तरह आसपास की चीज़ों से सीखता है। कोई औपचारिक पाठ नहीं, कोई किताब नहीं, बस रोज़ एक रास्ते से गुज़रते हुए सुने गीत, और एक महान कलाकार की नींव पड़ गई।
शहनाई का इतिहास: सुषिर-वाद्यों का शाह
वैदिक काल के ग्रंथों में शहनाई का कोई ज़िक्र नहीं मिलता। संगीत-शास्त्र में इसे सुषिर-वाद्य, यानी फूँककर बजने वाले वाद्यों में गिना जाता है। अरब देशों में ऐसे फूँक वाले वाद्य को, जिसमें नरकट या रीड की नली हो, नय कहते थे। शहनाई को शाहेनय कहा गया, यानी सुषिर-वाद्यों का बादशाह। शायद इसकी मधुर, गूँजती और मंगल भरी आवाज़ के कारण इसे यह ऊँचा दर्जा मिला।
सोलहवीं सदी के आख़िरी हिस्से में तानसेन की रची एक बंदिश में शहनाई, मुरली, वंशी, शृंगी और मुरछंग जैसे वाद्यों का वर्णन मिलता है। यह बंदिश संगीत राग कल्पद्रुम नाम के ग्रंथ में मिलती है। अवधी के पारंपरिक लोकगीतों और चैती में भी शहनाई का बार-बार ज़िक्र आता है। वहाँ यह हमेशा शुभ अवसरों और मंगल-विधानों से जुड़ी रही है।
जैसे दक्षिण भारत में नागस्वरम् शुभ घड़ी की ध्वनि है, वैसे ही उत्तर भारत में शहनाई प्रभाती की मंगल-ध्वनि को पूरा करती है। बिस्मिल्ला खाँ इसी मंगल-ध्वनि के नायक कहे जाते हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी शहनाई को दी और उसे मंदिर की ड्योढ़ी से दुनिया के बड़े मंचों तक पहुँचाया।
एक सच्चे सुर की दुआ
बिस्मिल्ला खाँ अस्सी बरस तक ख़ुदा से एक ही चीज़ माँगते रहे, एक सच्चा सुर। उनकी पाँचों वक़्त की नमाज़ इसी एक सुर की प्रार्थना में बीतती रही। नमाज़ के बाद सज्दे में वे बड़ी विनम्रता से दुआ करते कि हे मालिक, मुझे ऐसा सुर दे, जिसमें इतना असर हो कि सुनने वालों की आँखों से सच्चे मोतियों जैसे आँसू बह निकलें।
उन्हें भरोसा था कि किसी दिन ख़ुदा उन पर मेहरबान होगा। वह सुर का एक फल उनकी तरफ़ फेंक देगा और कहेगा कि ले अमीरुद्दीन, इसे खा ले और अपनी इच्छा पूरी कर ले। यह कल्पना बहुत प्यारी है, क्योंकि इसमें एक महान कलाकार एक बच्चे जैसी मासूमियत से ईश्वर से माँग रहा है।
लेखक यहाँ एक सुंदर उपमा देता है। कस्तूरी हिरन अपनी ही नाभि की सुगंध से बेचैन होकर पूरे जंगल में उसे खोजता फिरता है। जबकि वह सुगंध उसी के भीतर होती है। ठीक वैसे ही खाँ साहब भी उस सुर को खोज रहे थे, जो पहले से उनके भीतर था। अस्सी बरस बाद भी वे यही सोचते रहे कि सातों सुरों को बरतने का सलीक़ा उन्हें अभी तक क्यों नहीं आया। इतनी ऊँचाई पर पहुँचकर भी अपने को अधूरा मानना ही उनकी महानता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
Concepts and terms
किसी व्यक्ति के जीवन, स्वभाव, रुचियों और मन का रोचक, भावपूर्ण चित्रण। यह पाठ बिस्मिल्ला खाँ का व्यक्ति-चित्र है।
फूँककर बजाए जाने वाले वाद्य, जैसे बाँसुरी, शहनाई, नागस्वरम् और बीन।
संगीत का रोज़ का अभ्यास। खाँ साहब के लिए रियाज़ ही इबादत था।
ताल का वह बिंदु, जहाँ लय का एक चक्र पूरा होकर नया शुरू होता है।
उपासना या प्रार्थना। पाठ के शीर्षक में संगीत को ही इबादत माना गया है।
सावधान
भ्रम और सच
करके देखो
Title:
वाद्यों का चार्ट
Safety:
किसी का वाद्य बिना अनुमति मत छुइए; फूँक वाले वाद्य दूसरों से बाँटकर मत बजाइए।
What You Notice:
आप पाएँगे कि हर वाद्य की आवाज़ बनाने का तरीक़ा अलग है, और शहनाई की मिठास उसकी छोटी-सी रीड से आती है।
Did you know
नौबतखाना मंदिर या महल के मुख्य द्वार के ऊपर बना वह स्थान है, जहाँ से सुबह-शाम मंगल-ध्वनि बजाई जाती थी।
हमारे देश में वाद्यों की चार श्रेणियाँ मानी जाती हैं: तार वाले तत, फूँक वाले सुषिर, चोट से बजने वाले घन, और चमड़ा मढ़े अवनद्ध।
दक्षिण भारत में शुभ अवसरों पर नागस्वरम् बजता है। उत्तर भारत में यही काम शहनाई करती है।
Memory tricks
वाद्यों की चार श्रेणियाँ: त-सु-घ-अ — तत (तार), सुषिर (फूँक), घन (चोट), अवनद्ध (चमड़ा)।
Practice MCQs with answers (25)
- A लखनऊ
- B अयोध्या
- C काशी
- D डुमराँव
Show answer
Why:
उत्तर प्रदेश।
- A केवल विज्ञान और गणित के कठिन विषय
- B केवल खेल
- C कविता के साथ संगीत और कलाएँ
- D केवल राजनीति
Show answer
Why:
ललित कलाएँ।
- A एकांकी नाटक
- B यात्रा-वृत्तांत
- C आत्मकथा
- D व्यक्ति-चित्र
Show answer
Why:
खाँ साहब का चित्र।
- A शास्त्र, अभ्यास और धैर्य
- B केवल महँगे वाद्य और बड़े मंच
- C केवल अच्छी आवाज़
- D केवल प्रसिद्धि
Show answer
Why:
आराधना।
- A मंदिर के गर्भगृह के भीतर
- B नदी के किनारे
- C बाज़ार में
- D प्रवेश-द्वार के ऊपर
Show answer
Why:
ड्योढ़ी।
- A ये किसी विदेशी भाषा के कठिन शब्द थे
- B मामा झूठ बोलते थे
- C उसे रागों की समझ नहीं थी
- D उसे सुनाई नहीं देता था
Show answer
Why:
राग किस चिड़िया का नाम।
- A दिन की शुरुआत वहीं होती थी
- B वहाँ उन्हें सबसे ज़्यादा पैसा मिलता था
- C मंदिर घर के अंदर था
- D राजा का आदेश था
Show answer
Why:
ख़ानदानी पेशा।
- A गहरा क्रोध और घृणा
- B हल्का विनोद
- C डर
- D उदासी
Show answer
Why:
रोज़ बदलते राग।
- A वहाँ के राजा का बड़ा संगीत-दरबार
- B वहाँ की मिठाई
- C वहाँ का रेलवे स्टेशन
- D रीड बनाने वाला नरकट
Show answer
Why:
सोन नदी।
- A उसमें पानी भरकर ठंडा रखा जाता है
- B उसी से फूँक जाती है
- C वह सजावट है
- D उसमें रंग भरा जाता है
Show answer
Why:
सुषिर।
- A उस्ताद अलीबख्श खाँ
- B सादिक हुसैन
- C उस्ताद सलार हुसैन खाँ
- D पैग़ंबरबख्श खाँ
Show answer
Why:
डुमराँव निवासी।
- A वहाँ गायिका बहनों का संगीत सुनाई देता था
- B वह रास्ता सबसे छोटा, सीधा और बिल्कुल साफ़ था
- C वहाँ मिठाई मिलती थी
- D वहाँ दोस्त रहते थे
Show answer
Why:
ठुमरी, टप्पा।
- A स्कूल में अक्षर लिखना सीखना
- B स्लेट पर चित्र बनाना
- C संगीत के पहले संस्कार
- D हिसाब लगाना
Show answer
Why:
अबोध उम्र।
- A तत-वाद्य
- B घन-वाद्य
- C अवनद्ध-वाद्य
- D सुषिर-वाद्य
Show answer
Why:
फूँक।
- A उसका सबसे भारी और बड़ा आकार
- B मधुर और मंगल भरी आवाज़
- C उसका सस्ता दाम
- D उसका विदेशी होना
Show answer
Why:
सुषिर-वाद्यों का शाह।
- A शहनाई की पुरानी परंपरा
- B तानसेन ने ही पहली शहनाई बनाई थी
- C शहनाई नई है
- D शहनाई केवल अरब में बजती थी
Show answer
Why:
राग कल्पद्रुम।
- A युद्ध और भारी लड़ाई के मैदान
- B शोक-सभा
- C बाज़ार
- D शुभ और मंगल अवसर
Show answer
Why:
मांगलिक विधान।
- A सबसे ऊँची आवाज़ में गाना गाना
- B नागस्वरम् बजाना
- C शहनाई को जीवन समर्पित करना
- D मंदिर बनवाना
Show answer
Why:
अस्सी बरस।
- A बहुत ज़्यादा धन और प्रसिद्धि की चाह
- B दिल छू लेने वाला सुर
- C दुख फैलाना
- D लोगों को रुलाकर डराना
Show answer
Why:
तासीर।
- A बच्चे जैसी मासूमियत
- B कठोर और घमंडी स्वभाव
- C डर
- D लालच
Show answer
Why:
ले जा अमीरुद्दीन।
- A वे जंगल में हिरन पालते थे
- B खोजा गया सुर उन्हीं में था
- C उन्हें सुगंध पसंद थी
- D वे शिकार करते थे
Show answer
Why:
गमक भीतर।
- A घमंड और अहंकार
- B आलस
- C विनम्रता
- D लापरवाही
Show answer
Why:
अधूरापन।
- A अभ्यास
- B आराम
- C भोजन
- D यात्रा
Show answer
Why:
नौबतखाने में।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- B अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- C अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
- D दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
Show answer
Why:
रीड।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C केवल I और III
- D I, II और III तीनों
Show answer
Why:
वैदिक उल्लेख नहीं।
Important short questions (7)
यदा-कदा और ड्योढ़ी पर आलाप उनके काव्य-संग्रह हैं। उन्हें भारत भूषण अग्रवाल कविता सम्मान मिला है।
पंचगंगा घाट पर बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी के ऊपर नौबतखाना है। वहाँ से रोज़ सुबह मंगल-ध्वनि गूँजती है, और अमीरुद्दीन के मामा वहीं से दिन की शुरुआत करते हैं।
पहला, शहनाई की रीड बनाने वाला नरकट डुमराँव में सोन नदी के किनारे मिलता है। दूसरा, शहनाई के सबसे बड़े उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म यहीं हुआ।
मंदिर जाते रास्ते में इन गायिका बहनों के ठुमरी, टप्पे और दादरे सुनकर किशोर अमीरुद्दीन में संगीत की ललक जागी। खाँ साहब ख़ुद मानते थे कि संगीत के पहले संस्कार इन्हीं से मिले।
जो वाद्य फूँककर बजाए जाते हैं, उन्हें सुषिर-वाद्य कहते हैं। बाँसुरी और शहनाई इसके उदाहरण हैं।
अरब में फूँककर बजने वाले रीड वाले वाद्य को नय कहते थे। शहनाई की मधुर और मंगल भरी आवाज़ सबसे अलग थी, इसलिए इसे सुषिर-वाद्यों का शाह, यानी शाहेनय कहा गया।
वे ऐसा सच्चा सुर माँगते थे, जिसमें इतना असर हो कि सुनने वालों की आँखों से मोतियों जैसे आँसू बह निकलें। यानी वे दिल को छू लेने वाला सुर चाहते थे।
Long answer questions (3)
बिस्मिल्ला खाँ की संगीत-साधना कई लोगों और घटनाओं से समृद्ध हुई। सबसे पहले उनका परिवार। उनका जन्म डुमराँव के एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ। पिता पैग़ंबरबख्श खाँ और परदादा सलार हुसैन खाँ भी संगीत से जुड़े थे। ननिहाल काशी में उनके मामा सादिक हुसैन और अलीबख्श देश के जाने-माने शहनाई वादक थे। अलीबख्श उनके उस्ताद भी थे। उनके नाना भी बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे। बचपन में वे छिपकर नाना को सुनते थे। बालाजी मंदिर का नौबतखाना उनकी रियाज़ की जगह था। चौदह साल की उम्र में मंदिर जाते रास्ते पर रसूलनबाई और बतूलनबाई के गीतों ने उनमें संगीत की ललक जगाई। इन सबने मिलकर अमीरुद्दीन को उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ बनाया।
शहनाई फूँककर बजने वाला सुषिर-वाद्य है। वैदिक ग्रंथों में इसका कोई ज़िक्र नहीं मिलता। अरब देशों में रीड वाले फूँक-वाद्य को नय कहा जाता था। शहनाई को शाहेनय, यानी सुषिर-वाद्यों का शाह, कहा गया। सोलहवीं सदी में तानसेन की एक बंदिश में शहनाई का उल्लेख है, जो संगीत राग कल्पद्रुम में मिलती है। अवधी लोकगीतों और चैती में भी शहनाई बार-बार आती है। शहनाई का सबसे बड़ा महत्त्व मंगल से जुड़ा है। विवाह, पूजा और शुभ अवसरों पर इसकी ध्वनि शुभ मानी जाती है। जैसे दक्षिण में नागस्वरम् है, वैसे ही उत्तर में शहनाई सुबह की मंगल-ध्वनि है। बिस्मिल्ला खाँ ने इस वाद्य को मंदिर की ड्योढ़ी से दुनिया के बड़े मंचों तक पहुँचाया।
बिस्मिल्ला खाँ शहनाई के सबसे बड़े उस्ताद थे। फिर भी वे अस्सी बरस तक ख़ुदा से एक सच्चे सुर की दुआ माँगते रहे। उन्हें लगता था कि सातों सुरों को बरतने का सलीक़ा अभी अधूरा है। यह विनम्रता हम विद्यार्थियों के लिए बड़ी सीख है। पहली सीख यह कि सीखना कभी ख़त्म नहीं होता। अच्छे नंबर या एक इनाम मिलते ही अपने को पूरा मान लेना ग़लत है। दूसरी सीख है लगातार अभ्यास। जैसे खाँ साहब रोज़ रियाज़ करते थे, वैसे ही हमें रोज़ पढ़ना और दोहराना चाहिए। तीसरी सीख यह कि घमंड प्रगति को रोक देता है, जबकि विनम्र व्यक्ति हर किसी से कुछ सीख लेता है। सच्ची महानता अपने को छोटा मानकर लगातार आगे बढ़ने में है।
Flashcards (17)
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- शब्द और अर्थ
- डुमराँव या काशी?
- सही या भ्रम
- पाठ का क्रम (पहला भाग)
- झटपट उत्तर
मुहर्रम, काशी और खाँ साहब की सादगी
खाँ साहब मुहर्रम में शोक के नौहे बजाते, पर बालाजी और विश्वनाथ में भी गहरी आस्था रखते थे। कचौड़ी, सुलोचना की फ़िल्में और फटी लुंगी जैसी यादें उनकी सादगी दिखाती हैं। काशी की बदलती परंपराएँ उन्हें दुखी करती थीं।
What you will be able to do
- मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव और उनकी धार्मिक आस्था का वर्णन कर सकेंगे।
- बचपन और जवानी की यादों से खाँ साहब के सहज, मानवीय रूप को पहचान सकेंगे।
- काशी के प्रति उनके प्रेम और साझी संस्कृति के प्रसंगों का विश्लेषण कर सकेंगे।
- फटी लुंगी वाले प्रसंग से सादगी और सच्ची कला-साधना का अर्थ समझा सकेंगे।
- मिश्र वाक्य के उपवाक्यों की पहचान करके उनके भेद बता सकेंगे।
Key points
मुहर्रम के दस दिनों में खाँ साहब के ख़ानदान का कोई व्यक्ति न शहनाई बजाता, न किसी संगीत-कार्यक्रम में जाता।
आठवीं तारीख़ को वे खड़े होकर शहनाई बजाते और दालमंडी से लगभग आठ किलोमीटर पैदल रोते हुए नौहा बजाते जाते।
जवानी की यादों में उन्हें कुलसुम हलवाइन की कचौड़ी और सुलोचना की फ़िल्में अपने रियाज़ से भी ज़्यादा याद आतीं।
चार साल का अमीरुद्दीन नाना की मीठी शहनाई ढूँढ़ता, और मामा के सम पर आने पर पत्थर पटककर दाद देता।
संकटमोचन मंदिर में हनुमान जयंती पर पाँच दिन की संगीत-सभा होती, जिसमें खाँ साहब ज़रूर बजाते।
काशी से बाहर होने पर भी वे विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा में मुँह करके शहनाई का प्याला घुमाते।
भारतरत्न पाने पर भी वे फटी लुंगी में रहते; उनका कहना था कि सम्मान शहनाई पर मिला है, लुंगी पर नहीं, बस सुर न फटे।
पक्का महाल से मलाई बर्फ़ के जाने, संगतियों के अनादर और रियाज़ की कमी से वे दुखी थे।
21 अगस्त 2006 को नब्बे वर्ष की आयु में उनका देहांत हुआ; वे दो कौमों के बीच भाईचारे के प्रतीक रहे।
Full explanation
मुहर्रम: शोक में भी सुर
खाँ साहब की शहनाई की चर्चा हो, तो मुहर्रम का ज़िक्र ज़रूर आता है। मुहर्रम के महीने में शिया मुसलमान हज़रत इमाम हुसैन और उनके कुछ परिवारजनों की शहादत की याद में शोक मनाते हैं। इसे अज़ादारी कहते हैं, और यह पूरे दस दिन चलती है।
खाँ साहब बताते थे कि इन दिनों उनके ख़ानदान का कोई भी व्यक्ति न शहनाई बजाता है, न किसी संगीत-कार्यक्रम में शामिल होता है। आठवीं तारीख़ उनके लिए बहुत ख़ास होती थी। इस दिन वे खड़े होकर शहनाई बजाते और दालमंडी से फ़ातमान तक, लगभग आठ किलोमीटर, पैदल रोते हुए नौहा, यानी शोक-धुन बजाते चलते। इस दिन कोई राग नहीं बजता, रागों की अदायगी मना होती है। उनकी आँखें इमाम हुसैन और उनके परिवार की शहादत की याद में भीगी रहतीं।
लेखक लिखता है कि उस दिन हज़ारों आँखें नम होती हैं, और हज़ार बरस पुरानी परंपरा फिर से जी उठती है। ऐसे मौक़े पर एक बड़े कलाकार का सहज, मानवीय रूप आसानी से दिख जाता है। जो कलाकार दुनिया भर के मंचों पर तालियाँ बटोरता है, वही शोक के दिन एक साधारण श्रद्धालु की तरह नंगे पाँव, रोता हुआ चलता है।
जवानी की यादें: कचौड़ी और सुलोचना
मुहर्रम के ग़मगीन माहौल से अलग, फ़ुर्सत के पलों में खाँ साहब अपनी जवानी के दिनों को याद करते थे। मज़े की बात यह है कि उन्हें अपना रियाज़ कम, और उन दिनों का अपना जुनून ज़्यादा याद आता था। अपने पिता और उस्ताद से ज़्यादा उन्हें पक्का महाल की कुलसुम हलवाइन की कचौड़ी की दुकान, और फ़िल्मी नायिकाएँ गीताबाली और सुलोचना याद आती थीं।
सुलोचना उनकी सबसे पसंदीदा हीरोइन थीं। उनका ज़िक्र आते ही खाँ साहब के चेहरे पर एक रहस्यमय मुस्कान और गालों पर चमक आ जाती। उनकी अनुभवी आँखों में और जल्दी से खिलखिलाकर हँस देने की उनकी आदत में ईश्वर की दी हुई एक सरलता थी, जो बुढ़ापे में भी बनी रही।
कुलसुम की कचौड़ी को वे संगीतमय कचौड़ी कहते थे। कारण यह था कि जब कुलसुम खौलते घी में कचौड़ी डालती, तो उससे उठने वाली छन्न की आवाज़ में उन्हें संगीत के सारे आरोह-अवरोह सुनाई देते। लेखक हँसकर कहता है कि खाँ साहब रियाज़ी भी थे और स्वादी भी। यानी वे साधना में जितने गहरे थे, जीवन के छोटे-छोटे स्वादों का आनंद लेने में भी उतने ही आगे।
चार साल का अमीरुद्दीन और मीठी शहनाई
खाँ साहब की उसी बच्चों जैसी हँसी में बचपन की कई यादें बंद थीं। जब अमीरुद्दीन मुश्किल से चार साल का था, तब वह छिपकर नाना को शहनाई बजाते सुनता। रियाज़ के बाद जब नाना उठकर चले जाते, तो वह छोटी-बड़ी ढेर सारी शहनाइयों में से नाना वाली शहनाई ढूँढ़ता। एक-एक शहनाई को फूँककर देखता और नापसंद करके फेंक देता। उसे लगता कि नाना मीठी वाली शहनाई कहीं और छिपाकर रखते हैं।
मामा अलीबख्श, यानी उसके गुरु, बजाते-बजाते जैसे ही सम पर पहुँचते, तो नन्हा अमीरुद्दीन धड़ से एक पत्थर ज़मीन पर दे मारता। सम पर आने की समझ उसे बचपन में ही आ गई थी। बस उसे यह नहीं पता था कि दाद वाह कहकर या सिर हिलाकर दी जाती है, पत्थर पटककर नहीं। यह प्रसंग बहुत प्यारा है, क्योंकि इसमें एक बच्चे की स्वाभाविक संगीत-समझ और उसकी मासूमियत, दोनों दिखती हैं।
बचपन में फ़िल्मों का बुख़ार भी कम नहीं था। उस समय थर्ड क्लास का टिकट छह पैसे का था। अमीरुद्दीन दो पैसे मामा से, दो मौसी से और दो नानी से जुटाता, फिर घंटों लाइन में लगकर टिकट लेता। बाद में जब उसे बालाजी मंदिर पर रोज़ शहनाई बजाने के बदले एक अठन्नी मिलने लगी, तो सुलोचना की हर नई फ़िल्म और कुलसुम की कचौड़ी, दोनों उसी कमाई से चलते। लेखक कहता है कि अब इसमें कोई शक नहीं कि नाना की मीठी शहनाई आख़िर अमीरुद्दीन के हाथ लग चुकी थी।
काशी: संकटमोचन, विश्वनाथ और बालाजी
काशी में संगीत-आयोजन की एक बहुत पुरानी और अनोखी परंपरा है। शहर के दक्षिण में लंका नामक जगह पर संकटमोचन मंदिर है। वहाँ हनुमान जयंती के मौक़े पर पाँच दिन तक शास्त्रीय और उपशास्त्रीय गायन-वादन की बड़ी सभा होती है। बिस्मिल्ला खाँ इसमें हमेशा शामिल होते थे।
खाँ साहब अपने मज़हब के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। पर काशी विश्वनाथ के प्रति भी उनकी श्रद्धा अपार थी। जब भी वे काशी से बाहर होते, तो थोड़ी देर के लिए ही सही, विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा में मुँह करके बैठते और शहनाई का प्याला उसी ओर घुमा देते। उनके भीतर की आस्था रीड के रास्ते सुर बनकर बहती।
वे अक्सर कहते थे कि काशी छोड़कर कहाँ जाएँ? यहाँ गंगा मइया हैं, बाबा विश्वनाथ हैं, बालाजी का मंदिर है। यहाँ उनके ख़ानदान की कई पीढ़ियों ने शहनाई बजाई है। जिस ज़मीन ने उन्हें तालीम और अदब दिया, वह और कहाँ मिलेगी? उनके लिए शहनाई और काशी से बढ़कर इस धरती पर कोई जन्नत नहीं थी। मरते दम तक न शहनाई छूटेगी, न काशी।
काशी: संस्कृति की पाठशाला
लेखक काशी को संस्कृति की पाठशाला कहता है। शास्त्रों में इसे आनंदकानन कहा गया है। यहाँ कलाओं के देवता हनुमान हैं और नृत्य करने वाले विश्वनाथ हैं। यहाँ का इतिहास हज़ारों बरस पुराना है। इसमें पंडित कंठे महाराज, विद्याधरी, बड़े रामदास जी और मौजुद्दीन खाँ जैसे कलाकार हैं, और इन कलाकारों पर जान छिड़कने वाले अनगिनत रसिक लोग हैं।
इस काशी की अपनी तहज़ीब है, अपनी बोली है, अपने ख़ास लोग हैं। इसके अपने उत्सव हैं और अपने ग़म भी। शादी का सेहरा-बन्ना भी इसका है, और मुहर्रम का नौहा भी। यहाँ संगीत और भक्ति को अलग नहीं किया जा सकता, न भक्ति को किसी भी धर्म के कलाकार से। कजरी-चैती, विश्वनाथ-विशालाक्षी और बिस्मिल्ला खाँ-गंगा भी यहाँ एक-दूसरे से जुड़े हैं।
जैसे काशी में बाबा विश्वनाथ और बिस्मिल्ला खाँ एक-दूसरे के पूरक हैं, वैसे ही मुहर्रम के ताज़िए और होली के अबीर-गुलाल भी। यही गंगा-जमुनी संस्कृति है। खाँ साहब इसके सबसे सुंदर प्रतीक थे, एक ऐसा नायाब हीरा, जो हमेशा दो कौमों को मिल-जुलकर, भाईचारे से रहने की प्रेरणा देता रहा।
फटी लुंगी और सच्चा सुर
खाँ साहब की सादगी का सबसे सुंदर प्रसंग फटी लुंगी, यानी तहमद का है। एक दिन उनकी एक शिष्या ने डरते-डरते टोका कि बाबा, अब तो आपको भारतरत्न मिल चुका है, इतनी प्रतिष्ठा है, फिर भी आप फटी लुंगी पहनकर सबसे मिलते हैं, यह अच्छा नहीं लगता।
खाँ साहब मुस्कराए और बड़े लाड़ से बोले कि पगली, भारतरत्न उन्हें शहनाई पर मिला है, लुंगी पर नहीं। अगर वे भी बनाव-सिंगार में लगे रहते, तो पूरी उम्र उसी में बीत जाती और रियाज़ कब होता। फिर हँसकर वादा किया कि आगे से फटी लुंगी नहीं पहनेंगे, पर साथ ही यह भी कहा कि मालिक से उनकी बस यही दुआ है कि सुर फटा न दे। लुंगी तो आज फटी है, कल सिल जाएगी।
यह प्रसंग बताता है कि सच्चे कलाकार के लिए बाहरी दिखावा नहीं, उसकी कला सबसे ज़रूरी है। कपड़ा फटे तो सिल सकता है, पर अगर सुर बिगड़ जाए, तो कलाकार का सब कुछ बिगड़ जाता है।
बदलती काशी और एक अमर देन
सन् 2000 तक काशी बहुत बदल चुकी थी। पक्का महाल, यानी विश्वनाथ मंदिर से लगे इलाक़े से मलाई बर्फ़ बेचने वाले जा चुके थे। देसी घी में वह पुरानी बात नहीं रही, न वह कचौड़ी-जलेबी। गायकों के मन में अपने संगतकारों के लिए आदर नहीं बचा था। घंटों रियाज़ करने की परवाह कोई नहीं करता था। कजली, चैती और अदब का ज़माना जैसे बीत गया था। एक सच्चे साधक और संवेदनशील इंसान के नाते खाँ साहब को इन सबकी कमी बहुत खलती थी।
फिर भी लेखक कहता है कि कुछ है, जो आज भी केवल काशी में बचा है। काशी आज भी संगीत के सुर पर जागती है और उसी की थाप पर सोती है। यहाँ मरना भी मंगल माना जाता है।
बिस्मिल्ला खाँ को भारतरत्न, पद्मविभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और कई विश्वविद्यालयों की मानद उपाधियाँ मिलीं। पर लेखक कहता है कि वे इन सम्मानों से नहीं, बल्कि अपनी अजेय संगीत-यात्रा के कारण हमेशा संगीत के नायक रहेंगे। 21 अगस्त 2006 को नब्बे वर्ष की उम्र में वे इस दुनिया से विदा हुए। लेखक की नज़र में उनकी सबसे बड़ी देन है अस्सी बरस तक संगीत को पूरा-पूरा सीखने की ललक, यानी जिजीविषा को अपने भीतर ज़िंदा रखा।
मिश्र वाक्य और उपवाक्य
इस पाठ में कई मिश्र वाक्य हैं। मिश्र वाक्य में एक प्रधान उपवाक्य होता है, और एक या अधिक उपवाक्य उस पर आश्रित होते हैं। आश्रित उपवाक्य के तीन भेद हैं।
संज्ञा उपवाक्य प्रायः कि से शुरू होकर किसी संज्ञा का काम करता है। जैसे, खाँ साहब को भरोसा था कि ख़ुदा मेहरबान होगा। यहाँ कि ख़ुदा मेहरबान होगा संज्ञा उपवाक्य है, क्योंकि यह भरोसे का विषय बताता है।
विशेषण उपवाक्य जो, जिसकी, जिसके जैसे शब्दों से शुरू होकर किसी संज्ञा की विशेषता बताता है। जैसे, यह वही घाट है, जहाँ नौबतखाना है, या रीड वह नली है, जिसमें फूँक मारी जाती है। क्रियाविशेषण उपवाक्य जब, जहाँ, जैसे, क्योंकि जैसे शब्दों से जुड़कर क्रिया के समय, स्थान या कारण को बताता है। जैसे, जब मामा सम पर आते, तब अमीरुद्दीन पत्थर पटकता।
Concepts and terms
शोक मनाना, मातम करना। मुहर्रम में इमाम हुसैन की याद में अज़ादारी होती है।
शोक-गीत, जो मुहर्रम में इमाम हुसैन की शहादत की याद में गाया या बजाया जाता है।
हिंदू और मुस्लिम परंपराओं के मेल से बनी साझी संस्कृति, जैसे गंगा और जमुना का संगम।
जीने की, और आगे बढ़ते रहने की गहरी इच्छा।
जिस वाक्य में एक प्रधान उपवाक्य और उस पर आश्रित एक या अधिक उपवाक्य हों।
सावधान
भ्रम और सच
मिलाकर देखो
Scenario:
शहर के एक मोहल्ले में ईद और दीवाली, दोनों पर एक साथ मेला लगता था। वहाँ के बुज़ुर्ग ढोलक वादक रहमत चाचा हर दीवाली पर मंदिर के आँगन में भजन-संध्या में ढोलक बजाते थे।
कुछ लोगों ने एक साल कहा कि अब यह परंपरा बंद होनी चाहिए। रहमत चाचा उदास हो गए, पर उन्होंने किसी से झगड़ा नहीं किया।
मंदिर के पुजारी और मोहल्ले के बच्चों ने मिलकर उन्हें फिर से बुलाया। उस रात भजन-संध्या में सबसे ज़्यादा तालियाँ रहमत चाचा की ढोलक पर बजीं।
Activity:
अपने इलाक़े के किसी ऐसे उत्सव या कलाकार के बारे में पता कीजिए, जो अलग-अलग समुदायों को जोड़ता हो। उस पर पाँच वाक्य लिखिए।
Analysis:
संगीत की कोई जाति या धर्म नहीं होता। बिस्मिल्ला खाँ और रहमत चाचा जैसे कलाकार दिखाते हैं कि कला दिलों को जोड़ने का सबसे सुंदर पुल है, और इस पुल को बचाए रखना पूरे समाज की ज़िम्मेदारी है।
Did you know
मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है। इसमें शिया मुसलमान कर्बला में शहीद हुए हज़रत इमाम हुसैन की याद में शोक मनाते हैं।
बिस्मिल्ला खाँ को सन् 2001 में भारतरत्न मिला। उसी वर्ष स्वर-कोकिला लता मंगेशकर को भी यह सम्मान दिया गया।
काशी को शास्त्रों में आनंदकानन, यानी आनंद का वन कहा गया है।
Memory tricks
आश्रित उपवाक्य के तीन भेद: सं-वि-क्रि — संज्ञा उपवाक्य, विशेषण उपवाक्य, क्रियाविशेषण उपवाक्य।
Practice MCQs with answers (25)
- A नमाज़ पढ़ना और रोज़े रखना
- B भोजन करना
- C घर से निकलना
- D शहनाई बजाना
Show answer
Why:
अज़ादारी।
- A भीड़ के सामने अपनी कला का प्रदर्शन
- B गहरी धार्मिक आस्था
- C थकान
- D मजबूरी
Show answer
Why:
शहादत की याद।
- A उस दिन शहनाई की रीड टूट जाती थी
- B सरकारी रोक
- C शोक की मर्यादा
- D श्रोता नहीं आते थे
Show answer
Why:
निषेध।
- A सहज मानवीय रूप
- B कठोर और घमंडी कलाकार का रूप
- C व्यापारी का रूप
- D नेता का रूप
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Why:
नम आँखें।
- A उस्ताद की कड़ी डाँट और सज़ा
- B उन दिनों का जुनून
- C स्कूल की पढ़ाई
- D घर का काम
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Why:
कचौड़ी, सुलोचना।
- A आरोह-अवरोह
- B तेज़ बारिश और बिजली की गड़गड़ाहट
- C रेल की सीटी
- D चिड़िया का गीत
Show answer
Why:
संगीतमय कचौड़ी।
- A केवल खाने-पीने के शौक़ीन और आलसी
- B केवल रियाज़ करने वाले
- C साधना और जीवन-रस, दोनों में डूबे
- D दोनों से दूर
Show answer
Why:
संतुलन।
- A उसे शहनाई से बहुत चिढ़ और नफ़रत थी
- B वह खेल रहा था
- C नाना ने कहा था
- D मीठी शहनाई ढूँढ़ रहा था
Show answer
Why:
बाल-मन।
- A उसे संगीत बिल्कुल पसंद नहीं था
- B वह शरारत करके मामा को चिढ़ाता था
- C उसमें लय की स्वाभाविक समझ थी
- D वह पत्थर इकट्ठा करता था
Show answer
Why:
दाद का अनोखा ढंग।
- A मिठाई का
- B फ़िल्मों का
- C पतंग का
- D किताबों का
Show answer
Why:
सुलोचना।
- A नाना जैसी मधुर कला मिलना
- B सचमुच कोई छिपी हुई शहनाई मिल जाना
- C शहनाई चोरी करना
- D नई शहनाई ख़रीदना
Show answer
Why:
प्रतीक।
- A दीपावली
- B होली
- C मुहर्रम
- D हनुमान जयंती
Show answer
Why:
पाँच दिन।
- A काशी लौटने की जल्दबाज़ी और बेचैनी
- B सब धर्मों के प्रति श्रद्धा
- C दिशा का भ्रम
- D श्रोताओं का आदेश
Show answer
Why:
आस्था रीड से।
- A काशी में उन्हें सबसे ज़्यादा पैसा मिलता था
- B उनके पास पासपोर्ट नहीं था
- C वे यात्रा से डरते थे
- D वहीं उनकी तालीम और जड़ें थीं
Show answer
Why:
जन्नत।
- A वहाँ देश के सबसे ज़्यादा स्कूल-कॉलेज बने हुए हैं
- B वहाँ केवल एक धर्म है
- C वहाँ कला, भक्ति और परंपराएँ घुली-मिली हैं
- D वहाँ परीक्षाएँ होती हैं
Show answer
Why:
आनंदकानन।
- A साझी संस्कृति
- B धर्मों के बीच गहरे और कड़वे झगड़े
- C संगीत पर रोक
- D भक्ति की कमी
Show answer
Why:
कजरी, चैती।
- A वे नई लुंगी ख़रीदने के लिए ग़रीब हैं
- B लुंगी फ़ैशन है
- C सम्मान शहनाई पर मिला है
- D शिष्या को डाँट दिया
Show answer
Why:
लुंगी पर नहीं।
- A कपड़े और रूप-रंग हमेशा सुंदर दिखें
- B धन बढ़े
- C प्रसिद्धि बढ़े
- D कला में कमी न आए
Show answer
Why:
लुंगी सिल जाएगी।
- A काशी में गर्मी का पूरी तरह ख़त्म होना
- B पुरानी परंपराओं का लुप्त होना
- C बाज़ार का बढ़ना
- D नई दुकानें खुलना
Show answer
Why:
अदब का ज़माना।
- A वे संगतकार का महत्त्व समझते थे
- B वे ख़ुद कभी किसी के संगतकार नहीं रहे
- C उन्हें गायकों से जलन थी
- D वे गायक बनना चाहते थे
Show answer
Why:
सच्चे साधक।
- A केवल भारतरत्न और बड़े पुरस्कारों से
- B धन से
- C अपनी अजेय संगीत-यात्रा से
- D फ़िल्मों से
Show answer
Why:
सम्मानों से नहीं।
- A उत्सव मनाना
- B यात्रा करना
- C भोजन बाँटना
- D शोक मनाना
Show answer
Why:
मुहर्रम।
- A संज्ञा उपवाक्य
- B विशेषण उपवाक्य
- C क्रियाविशेषण उपवाक्य
- D प्रधान उपवाक्य
Show answer
Why:
कि से शुरू।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
साझी आस्था।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C I, II और III तीनों
- D केवल I और III
Show answer
Why:
रियाज़ चलता रहा।
Important short questions (7)
मुहर्रम के दस दिन वे शोक मनाते और न शहनाई बजाते, न किसी कार्यक्रम में जाते। आठवीं तारीख़ को वे दालमंडी से आठ किलोमीटर पैदल रोते हुए नौहा बजाते थे।
कुलसुम जब खौलते घी में कचौड़ी डालती, तो छन्न की आवाज़ उठती। इस आवाज़ में खाँ साहब को संगीत के आरोह-अवरोह सुनाई देते थे।
टिकट छह पैसे का था। वह मामा, मौसी और नानी से दो-दो पैसे लेता और घंटों लाइन में लगकर टिकट लेता। बाद में मंदिर से मिली अठन्नी से फ़िल्में देखता।
वे थोड़ी देर के लिए विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा में मुँह करके बैठते। फिर उसी ओर शहनाई का प्याला घुमाकर बजाते, मानो आस्था रीड से बह रही हो।
काशी आनंदकानन है, जहाँ अनेक कलाकार और रसिक हुए। यहाँ की अपनी तहज़ीब और बोली है। यहाँ संगीत, भक्ति और अलग-अलग धर्मों की परंपराएँ एक-दूसरे से घुली-मिली हैं।
वहाँ से मलाई बर्फ़ वाले चले गए, देसी घी और कचौड़ी-जलेबी का स्वाद बदल गया। संगतियों का आदर घटा और लंबे रियाज़ की परवाह किसी को नहीं रही।
जो आश्रित उपवाक्य किसी संज्ञा की विशेषता बताए, उसे विशेषण उपवाक्य कहते हैं। जैसे, रीड वह नली है, जिसमें फूँक मारी जाती है।
Long answer questions (3)
बिस्मिल्ला खाँ एक सच्चे मुसलमान थे। वे पाँचों वक़्त नमाज़ पढ़ते और मुहर्रम में पूरे दस दिन शोक मनाते थे। आठवीं तारीख़ को वे आठ किलोमीटर पैदल रोते हुए नौहा बजाते थे। दूसरी ओर, उनकी पूरी साधना हिंदू मंदिरों से जुड़ी थी। बालाजी मंदिर के नौबतखाने में उनका रियाज़ हुआ। संकटमोचन मंदिर की हनुमान जयंती वाली संगीत-सभा में वे हमेशा बजाते थे। काशी से बाहर भी वे विश्वनाथ और बालाजी की दिशा में शहनाई घुमाते थे। वे कहते थे कि गंगा मइया और बाबा विश्वनाथ के बिना काशी छोड़कर कहाँ जाएँ। लेखक उन्हें दो कौमों को भाईचारे की प्रेरणा देने वाला नायाब हीरा कहता है। इस तरह उनके जीवन में मुहर्रम का नौहा और मंदिर की मंगल-ध्वनि, दोनों साथ-साथ बजते थे।
भारतरत्न मिलने के बाद भी खाँ साहब फटी लुंगी में सबसे मिलते थे। एक शिष्या ने डरते-डरते टोका कि इतनी प्रतिष्ठा के बाद यह अच्छा नहीं लगता। खाँ साहब ने मुस्कराकर कहा कि भारतरत्न उन्हें शहनाई पर मिला है, लुंगी पर नहीं। अगर वे बनाव-सिंगार में लगे रहते, तो रियाज़ कब होता। फिर उन्होंने दुआ की कि मालिक सुर को फटने न दे, लुंगी तो कल सिल जाएगी। इस प्रसंग से उनकी सादगी साफ़ दिखती है। उन्हें दिखावे से कोई मतलब नहीं था। साथ ही उनकी कला-निष्ठा भी झलकती है। उनके लिए सबसे बड़ी चिंता सुर की शुद्धता थी, कपड़ों की नहीं। यह प्रसंग सिखाता है कि सच्चे कलाकार का सम्मान उसकी कला से होता है, बाहरी चमक से नहीं।
सन् 2000 तक काशी बहुत बदल चुकी थी। पक्का महाल से मलाई बर्फ़ बेचने वाले जा चुके थे। देसी घी और कचौड़ी-जलेबी में पुराना स्वाद नहीं रहा। गायक अपने संगतकारों का आदर भूल गए थे। घंटों रियाज़ की परवाह कोई नहीं करता था, और कजली, चैती का ज़माना बीत गया था। मेरे शहर में भी ऐसे बदलाव दिखते हैं। पहले गलियों में कठपुतली का खेल और बहुरूपिये आते थे, अब नहीं आते। दादी बताती हैं कि शादियों में औरतें मिलकर लोकगीत गाती थीं, अब डीजे बजता है। पुराने मिट्टी के खिलौने और हाथ के बने पंखे भी कम दिखते हैं। हर बदलाव बुरा नहीं है, पर अपनी लोक-कलाओं को बचाना हमारी ज़िम्मेदारी है। स्कूलों में लोक-कला के कार्यक्रम इसमें मदद कर सकते हैं।
Flashcards (17)
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- शब्द और अर्थ
- इबादत का कौन-सा रूप?
- सही या भ्रम
- पाठ का क्रम (दूसरा भाग)
- झटपट उत्तर
Class 10 Hindi Chapter 11 — frequently asked questions
यदा-कदा और ड्योढ़ी पर आलाप उनके काव्य-संग्रह हैं। उन्हें भारत भूषण अग्रवाल कविता सम्मान मिला है।
पंचगंगा घाट पर बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी के ऊपर नौबतखाना है। वहाँ से रोज़ सुबह मंगल-ध्वनि गूँजती है, और अमीरुद्दीन के मामा वहीं से दिन की शुरुआत करते हैं।
पहला, शहनाई की रीड बनाने वाला नरकट डुमराँव में सोन नदी के किनारे मिलता है। दूसरा, शहनाई के सबसे बड़े उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म यहीं हुआ।
मुहर्रम के दस दिन वे शोक मनाते और न शहनाई बजाते, न किसी कार्यक्रम में जाते। आठवीं तारीख़ को वे दालमंडी से आठ किलोमीटर पैदल रोते हुए नौहा बजाते थे।
कुलसुम जब खौलते घी में कचौड़ी डालती, तो छन्न की आवाज़ उठती। इस आवाज़ में खाँ साहब को संगीत के आरोह-अवरोह सुनाई देते थे।
टिकट छह पैसे का था। वह मामा, मौसी और नानी से दो-दो पैसे लेता और घंटों लाइन में लगकर टिकट लेता। बाद में मंदिर से मिली अठन्नी से फ़िल्में देखता।
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