Class 10 Hindi Chapter 10: एक कहानी यह भी

एक कहानी यह भी is Chapter 10 of NCERT / CBSE Class 10 Hindi (Hindi medium). This page has the complete chapter notes across 2 topics, 50 practice MCQs with answers and explanations, 20 important short and long questions and 34 flashcards, all written to the NCERT / CBSE syllabus and free to read.
  • 2 topics
  • 50 MCQs
  • 14 short answers
  • 6 long answers
  • 34 flashcards
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  • Hindi

मन्नू भंडारी का घर, पिता और बचपन

इस आत्मकथ्य में मन्नू भंडारी अपने पिता के कोमल पर क्रोधी और शक्की स्वभाव, माँ के चुपचाप त्याग और बचपन की हीन-भावना को याद करती हैं। वे बताती हैं कि अजमेर के मोहल्ले के लोग ही उनकी कहानियों के पात्र बने।

What you will be able to do

  • मन्नू भंडारी के जीवन, रचनाओं और सम्मानों का परिचय दे सकेंगे।
  • आत्मकथ्य और सिलसिलेवार आत्मकथा में अंतर स्पष्ट कर सकेंगे।
  • लेखिका के पिता के व्यक्तित्व के उजले और धुँधले, दोनों पक्षों का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • माँ के त्याग और लेखिका की हीन-भावना के कारणों पर अपना मत दे सकेंगे।
  • पुराने मोहल्ले की पड़ोस-संस्कृति की तुलना आज के महानगरीय जीवन से कर सकेंगे।

Key points

  • मन्नू भंडारी का जन्म सन् 1931 में मध्य प्रदेश के मंदसौर ज़िले के भानपुरा गाँव में हुआ; इंटर तक की पढ़ाई अजमेर में हुई।

  • हिंदी से एम.ए. करने के बाद वे दिल्ली के मिरांडा हाउस कॉलेज में प्राध्यापिका रहीं; सन् 2021 में उनका देहांत हुआ।

  • आपका बंटी और महाभोज उनके उपन्यास हैं; यही सच है, त्रिशंकु, मैं हार गई और एक प्लेट सैलाब कहानी-संग्रह हैं।

  • एक कहानी यह भी सिलसिलेवार आत्मकथा नहीं, बल्कि लेखकीय जीवन से जुड़े लोगों और घटनाओं का आत्मकथ्य है।

  • पिता इंदौर में प्रतिष्ठित थे; आर्थिक झटके के बाद अजमेर आकर उन्होंने विषयवार अंग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोश पर काम किया।

  • शब्दकोश से नाम तो मिला, पैसा नहीं; गिरती आर्थिक हालत ने उन्हें क्रोधी, अहंकारी और शक्की बना दिया।

  • साँवले रंग और गोरी बहन सुशीला से तुलना ने लेखिका के मन में हीन-भावना की ऐसी गाँठ बाँधी, जो कभी नहीं खुली।

  • माँ बेपढ़ी, धैर्यवान और त्यागी थीं, पर उनकी असहाय सहनशीलता लेखिका का आदर्श नहीं बन सकी।

  • उस समय मोहल्ला परिवार जैसा था; लेखिका की कई आरंभिक कहानियों के पात्र इसी मोहल्ले से आए।

Full explanation

मन्नू भंडारी: सादगी में गहराई

मन्नू भंडारी आज़ादी के बाद के हिंदी कथा-साहित्य की सबसे प्रमुख लेखिकाओं में गिनी जाती हैं। उनका जन्म सन् 1931 में मध्य प्रदेश के मंदसौर ज़िले के भानपुरा गाँव में हुआ। पर उनका बचपन और किशोरावस्था राजस्थान के अजमेर शहर में बीती, जहाँ उन्होंने इंटर तक पढ़ाई की। आगे चलकर हिंदी से एम.ए. करके वे दिल्ली के प्रसिद्ध मिरांडा हाउस कॉलेज में लंबे समय तक प्राध्यापिका रहीं। सन् 2021 में उनका देहांत हुआ।

उनकी कहानियों के कई संग्रह छपे, जैसे त्रिशंकु, यही सच है, एक प्लेट सैलाब और मैं हार गई। उनके उपन्यासों में महाभोज और आपका बंटी बहुत चर्चित हुए। आपका बंटी में माता-पिता के अलगाव के बीच पिसते एक बच्चे का मन है, तो महाभोज में राजनीति की कड़वी सच्चाई। उन्होंने फ़िल्मों और धारावाहिकों के लिए पटकथाएँ भी लिखीं। हिंदी अकादमी के शिखर सम्मान सहित उन्हें कई बड़े पुरस्कार मिले, जिनमें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी और कोलकाता की भारतीय भाषा परिषद के सम्मान शामिल हैं।

उनकी रचनाओं की सबसे बड़ी पहचान है भाषा और शिल्प की सादगी, और अनुभव की सच्चाई। वे भारी-भरकम शब्दों के बजाय सीधी, बोलचाल की भाषा में गहरी बात कह देती हैं। उनकी रचनाओं में स्त्री के मन की अनुभूतियाँ भी बहुत बारीकी से उभरती हैं।

आत्मकथ्य, आत्मकथा नहीं

एक कहानी यह भी को पढ़ने से पहले एक बात समझ लेना ज़रूरी है। मन्नू भंडारी ने अपने जीवन की कोई क्रमवार, पूरी आत्मकथा नहीं लिखी। इसके बजाय उन्होंने आत्मकथ्य लिखा, जिसमें केवल उन लोगों और घटनाओं की बात है, जिन्होंने उनके लेखक बनने में भूमिका निभाई।

इस अंश में उनके किशोर जीवन की घटनाएँ हैं। इसमें दो व्यक्ति सबसे ज़्यादा उभरकर आते हैं। एक हैं उनके पिता, और दूसरी हैं उनके कॉलेज की हिंदी प्राध्यापिका शीला अग्रवाल। दोनों ने अलग-अलग ढंग से लेखिका के व्यक्तित्व को गढ़ा। लेखिका ने बड़ी सुंदरता से दिखाया है कि एक साधारण लड़की असाधारण बनने की राह पर पहले क़दम कैसे रखती है। सन् 1946-47 में आज़ादी के आंदोलन की आँधी ने उन्हें भी छुआ, और उन्होंने उत्साह, संगठन-क्षमता और जोश के साथ उसमें हिस्सा लिया। इसकी चर्चा अगले भाग में होगी।

ऊपर की मंज़िल पर पिता का साम्राज्य

लेखिका की यादें अजमेर के ब्रह्मपुरी मोहल्ले के एक दो-मंज़िला मकान से शुरू होती हैं। ऊपर की मंज़िल पिता की थी। वहाँ चारों ओर किताबें, पत्रिकाएँ और अख़बार बेतरतीब बिखरे रहते थे। पिता या तो उनके बीच बैठकर कुछ पढ़ते रहते, या किसी को बोलकर लिखवाते, यानी डिक्टेशन देते रहते। नीचे की मंज़िल पर माँ सब बच्चों के साथ रहती थीं।

अजमेर आने से पहले पिता इंदौर में थे। वहाँ उनका बड़ा नाम और सम्मान था। वे कांग्रेस से जुड़े थे और समाज-सुधार के कामों में भी सक्रिय थे। वे शिक्षा की केवल बातें नहीं करते थे, बल्कि आठ-दस विद्यार्थियों को अपने घर में रखकर पढ़ाते भी थे। उनमें से कई आगे चलकर बड़े पदों पर पहुँचे। उन दिनों उनकी उदारता की भी ख़ूब चर्चा होती थी। वे एक ओर बहुत कोमल और संवेदनशील थे, तो दूसरी ओर बहुत ग़ुस्सैल और अहंकारी भी।

पर लेखिका ने यह सब केवल सुना था। उन्होंने जिन पिता को देखा, वे इन गुणों के खंडहर, यानी भग्नावशेष ढो रहे थे। एक बड़े आर्थिक झटके के कारण वे इंदौर छोड़कर अजमेर आ गए थे।

शब्दकोश, नाम और गिरती हालत

अजमेर में पिता ने अपने अकेले दम पर एक बड़ा काम हाथ में लिया। उन्होंने विषयवार अंग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोश के अधूरे काम को आगे बढ़ाया। ऐसा शब्दकोश उस समय कोई और नहीं था। इससे उन्हें बहुत यश और प्रतिष्ठा मिली, पर धन नहीं मिला।

लेखिका मानती हैं कि शायद इसी गिरती आर्थिक हालत ने उनके व्यक्तित्व की सारी अच्छाइयों को धीरे-धीरे निचोड़ लिया। जैसे-जैसे पैसा घटता गया, उनका अहंकार और बढ़ता गया। वह अहंकार उन्हें यह भी नहीं करने देता था कि वे अपने बच्चों को अपनी तंगी के बारे में बताएँ। उनकी नवाबी आदतें, अधूरी इच्छाएँ और ऊँचाई से हाशिए पर खिसक जाने का दर्द, सब ग़ुस्सा बनकर निकलता था, और उससे माँ हमेशा सहमी रहती थीं।

पिता पहले सब पर आँख मूँदकर भरोसा करते थे। पर अपने ही लोगों से मिले धोखों ने उन्हें इतना शक्की बना दिया कि कभी-कभी बच्चे भी उनके शक की चपेट में आ जाते। लेखिका साफ़ कहती हैं कि यह पिता की कहानी वे उनकी तारीफ़ के लिए नहीं सुना रहीं। वे यह समझना चाहती हैं कि पिता की कौन-सी अच्छाइयाँ और कमियाँ उनके अपने स्वभाव में बुनी हुई हैं, और पिता के किस व्यवहार ने उनके मन में कौन-सी गाँठें डाल दीं।

रंग की तुलना और मन की गाँठ

लेखिका का रंग साँवला था, और बचपन में वे दुबली और कमज़ोर भी थीं। पिता को गोरा रंग बहुत पसंद था। लेखिका से दो साल बड़ी बहन सुशीला ख़ूब गोरी, तंदुरुस्त और हँसमुख थी। पिता हर बात में दोनों की तुलना करते और सुशीला की तारीफ़ करते।

इस लगातार तुलना ने लेखिका के मन में हीन-भावना की एक गहरी गाँठ डाल दी। वे लिखती हैं कि इतना नाम और सम्मान पाने के बाद भी वे इस भावना से कभी उबर नहीं पाईं। आज भी जब कोई उनका परिचय देते हुए उनकी उपलब्धियों की तारीफ़ करता है, तो वे संकोच से सिमट जाती हैं, मानो ज़मीन में गड़ जाएँगी। अपनी किसी भी सफलता पर उन्हें भरोसा नहीं होता, सब कुछ तुक्का लगता है।

यह प्रसंग बताता है कि बचपन में बच्चों की आपस में तुलना कितनी ख़तरनाक हो सकती है। माता-पिता शायद सोचते भी न हों, पर उनकी छोटी-छोटी बातें बच्चे के मन पर जीवन भर का निशान छोड़ सकती हैं।

पिता मुझमें हैं

बड़ी होकर लेखिका को एक और सच समझ आया। पिता के जिस शक्की स्वभाव पर वे कभी झुँझला जाती थीं, वही अब उन्हें अपने भीतर दिखने लगा। जब उनका अपना भरोसा कई बार टूटा, तब उन्हें समझ आया कि पिता का शक भी अपनों के धोखे से पैदा हुआ था।

होश सँभालने के बाद से लेखिका की पिता से लगातार टक्कर रही। फिर भी वे मानती हैं कि पिता कई रूपों में उनके भीतर मौजूद हैं, कहीं कुंठा बनकर, कहीं प्रतिक्रिया बनकर और कहीं उनकी परछाईं बनकर। यहीं वे एक बड़ी बात कहती हैं। जो लोग केवल बाहरी फ़र्क़ देखकर अपनी परंपरा और पुरानी पीढ़ी को नकार देते हैं, वे भूल जाते हैं कि बीता हुआ कल उनके भीतर गहरी जड़ें जमाए रहता है। समय हमें कहीं भी ले जाए, परिस्थितियाँ हमारा रूप कितना भी बदल दें, हम अपनी जड़ों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकते।

माँ: धरती से भी ज़्यादा धैर्य

पिता के ठीक उलटी थीं लेखिका की माँ। वे पढ़ी-लिखी नहीं थीं, और उनका अपना कोई अलग व्यक्तित्व भी नहीं दिखता था। उनमें शायद धरती से भी ज़्यादा धैर्य और सहनशक्ति थी। पिता की हर ज़्यादती को वे अपना भाग्य मानकर सह लेतीं। बच्चों की हर सही-ग़लत ज़िद को अपना कर्तव्य समझकर पूरा करतीं। उन्होंने जीवन भर अपने लिए कुछ नहीं माँगा, केवल दिया।

सब बच्चों को माँ से गहरा लगाव था, जो शायद सहानुभूति से पैदा हुआ था। फिर भी लेखिका साफ़ कहती हैं कि माँ का यह त्याग और सहनशीलता कभी उनका आदर्श नहीं बन सका। कारण यह है कि वह त्याग अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि बेबसी और मजबूरी से भरा था। यहाँ लेखिका एक नई सोच रखती हैं कि स्त्री का चुपचाप सब सहते जाना कोई आदर्श नहीं है।

बचपन के खेल और मोहल्ले का परिवार

लेखिका पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। सबसे बड़ी बहन की शादी उन्हें धुँधली-सी याद है। पर सुशीला के साथ उन्होंने घर के बड़े आँगन में बचपन के सारे खेल खेले, जैसे सतोलिया, लँगड़ी-टाँग, पकड़म-पकड़ाई और काली-टीलो। सहेलियों के साथ गुड्डे-गुड़ियों के ब्याह भी रचाए। भाइयों के साथ गिल्ली-डंडा खेला, पतंग उड़ाई और काँच पीसकर माँजा भी सूता। पर भाइयों का खेल का मैदान घर के बाहर था, जबकि लड़कियों की सीमा घर तक थी।

फिर भी उस ज़माने में घर की दीवारें केवल घर तक नहीं रुकती थीं। पूरा मोहल्ला एक परिवार जैसा था, और किसी भी घर में जाने पर कोई रोक-टोक नहीं थी। लेखिका को आज बड़ी तीव्रता से लगता है कि महानगरों के फ़्लैटों में अपनी-अपनी ज़िंदगी में सिमटे लोग इस पड़ोस-कल्चर से कट गए हैं। इसीलिए वे ज़्यादा अकेले, असहाय और असुरक्षित हो गए हैं।

इसी मोहल्ले ने लेखिका को कहानियों के पात्र दिए। उनकी कम से कम एक दर्जन शुरुआती कहानियों के पात्र यहीं के लोग थे। बरसों बाद भी उनकी बोली, हाव-भाव और भाषा लेखिका के मन में ताज़ा थे। महाभोज उपन्यास के दा साहब भी इसी दौर से निकलकर अचानक जीवित हो उठे, जो ख़ुद लेखिका के लिए एक सुखद आश्चर्य था।

Concepts and terms

आत्मकथ्य

अपने जीवन के कुछ चुने हुए प्रसंगों, लोगों और अनुभवों का वर्णन, पूरे जीवन का क्रमवार ब्योरा नहीं।

हीन-भावना

अपने को दूसरों से कम आँकने का भाव। बचपन की तुलना से यह गाँठ बड़े होने पर भी बनी रह सकती है।

अंतर्विरोध

एक ही व्यक्ति में दो उलटी बातें साथ होना, जैसे पिता का कोमल भी होना और क्रोधी भी।

पड़ोस-कल्चर

मोहल्ले के घरों का आपस में परिवार जैसा रिश्ता, जहाँ हर घर में आना-जाना सहज हो।

सहिष्णुता

सहन करने की शक्ति। लेखिका की माँ में यह बहुत थी, पर वह मजबूरी से भरी थी।

सावधान

भ्रम और सच

करके देखो

Title:

मेरे मोहल्ले का नक़्शा

Safety:

किसी के घर उनकी अनुमति के बिना मत जाइए; बातचीत में बड़ों का साथ रखिए।

What You Notice:

आप पाएँगे कि आपके आसपास ही अनगिनत कहानियाँ बिखरी हैं; बस उन्हें देखने वाली नज़र चाहिए।

Did you know

आत्मकथा में लेखक अपने पूरे जीवन को क्रम से लिखता है, जबकि आत्मकथ्य में वह केवल कुछ चुनी हुई घटनाओं और लोगों की बात करता है।

मन्नू भंडारी की कहानी यही सच है पर रजनीगंधा नाम की लोकप्रिय हिंदी फ़िल्म बनी थी।

महाभोज उपन्यास का प्रमुख पात्र दा साहब है। लेखिका के अनुसार यह पात्र बचपन के मोहल्ले के एक व्यक्ति से प्रेरित था।

Memory tricks

पिता के चार रंग: को-क्रो-अ-श — कोमल, क्रोधी, अहंवादी, शक्की।

Practice MCQs with answers (25)

Q1 मन्नू भंडारी का जन्म किस गाँव में हुआ? beginner
  • A ब्रह्मपुरी मोहल्ला
  • B अजमेर
  • C इंदौर
  • D भानपुरा
Show answer
Answer: भानपुरा
Why:

मंदसौर ज़िला।

Q2 आपका बंटी किस विधा की रचना है? intermediate
  • A कहानी
  • B नाटक
  • C उपन्यास
  • D लंबी कविता-पुस्तक
Show answer
Answer: उपन्यास
Why:

मन्नू भंडारी।

Q3 मन्नू भंडारी की रचनाओं की मुख्य पहचान क्या है? intermediate
  • A सादगी और सच्चा अनुभव
  • B भारी-भरकम संस्कृत शब्द और कठिन शैली
  • C जादुई कल्पना
  • D केवल हास्य
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Answer: सादगी और सच्चा अनुभव
Why:

शिल्प।

Q4 एक कहानी यह भी को आत्मकथा के बजाय आत्मकथ्य क्यों कहा गया है? intermediate
  • A इसमें जन्म से मृत्यु तक का पूरा ब्योरा है
  • B इसमें चुने हुए प्रसंग हैं
  • C यह कविता है
  • D यह किसी और ने लिखा
Show answer
Answer: इसमें चुने हुए प्रसंग हैं
Why:

सिलसिलेवार नहीं।

Q5 इस अंश में लेखिका के व्यक्तित्व को गढ़ने वाले दो प्रमुख लोग कौन हैं? beginner
  • A पिता और शीला अग्रवाल
  • B माँ और बड़ी बहन सुशीला
  • C भाई और पड़ोसी
  • D प्रिंसिपल और डॉक्टर
Show answer
Answer: पिता और शीला अग्रवाल
Why:

घर और कॉलेज।

Q6 ऊपर की मंज़िल को पिता का साम्राज्य कहने से क्या पता चलता है? intermediate
  • A वहाँ पूरा परिवार मिलकर बराबरी से रहता था
  • B वहाँ उनका ही राज चलता था
  • C वहाँ दुकान थी
  • D वहाँ कोई नहीं जाता था
Show answer
Answer: वहाँ उनका ही राज चलता था
Why:

किताबें और डिक्टेशन।

Q7 इंदौर में पिता घर पर विद्यार्थियों को क्यों रखते थे? intermediate
  • A उनसे भारी फ़ीस वसूलकर घर चलाना था
  • B घर ख़ाली था
  • C शिक्षा में सच्चा विश्वास था
  • D सरकारी आदेश था
Show answer
Answer: शिक्षा में सच्चा विश्वास था
Why:

उपदेश ही नहीं।

Q8 लेखिका ने पिता के अच्छे गुणों को भग्नावशेष क्यों कहा? advanced
  • A वे गुण पहले से ज़्यादा चमक रहे थे
  • B वे गुण कभी थे ही नहीं
  • C वे गुण माँ के थे
  • D वे गुण अब टूट-फूट चुके थे
Show answer
Answer: वे गुण अब टूट-फूट चुके थे
Why:

खंडहर।

Q9 शब्दकोश के काम से पिता को क्या नहीं मिला? beginner
  • A धन
  • B यश
  • C प्रतिष्ठा
  • D नाम
Show answer
Answer: धन
Why:

केवल सम्मान।

Q10 पिता अपनी तंगी के बारे में बच्चों को क्यों नहीं बताते थे? advanced
  • A उन्हें तंगी के बारे में कुछ पता ही नहीं था
  • B बच्चे छोटे थे
  • C उनका अहंकार रोकता था
  • D माँ ने मना किया था
Show answer
Answer: उनका अहंकार रोकता था
Why:

विस्फारित अहं।

Q11 पिता के ग़ुस्से का सबसे ज़्यादा असर किस पर पड़ता था? beginner
  • A शहर के पड़ोसियों और दोस्तों पर
  • B सुशीला पर
  • C नौकरों पर
  • D माँ पर
Show answer
Answer: माँ पर
Why:

कँपाती-थरथराती।

Q12 पिता के शक्की होने का मूल कारण लेखिका क्या मानती हैं? intermediate
  • A बचपन से ही उनका जन्मजात स्वभाव
  • B अपनों से मिला विश्वासघात
  • C बीमारी
  • D ग़रीबी में जन्म
Show answer
Answer: अपनों से मिला विश्वासघात
Why:

गहरी चोटें।

Q13 लेखिका पिता की कहानी किस उद्देश्य से सुना रही हैं? advanced
  • A अपने भीतर पिता की छाप खोजने
  • B पिता की केवल बड़ाई और गुणगान करने
  • C पिता की बुराई करने
  • D शब्दकोश बेचने
Show answer
Answer: अपने भीतर पिता की छाप खोजने
Why:

ताने-बाने में गुँथी।

Q14 सुशीला से लगातार तुलना का लेखिका पर क्या असर हुआ? intermediate
  • A सुशीला से गहरी और पक्की दोस्ती
  • B हीन-भावना की गाँठ
  • C घमंड
  • D खेल में रुचि
Show answer
Answer: हीन-भावना की गाँठ
Why:

आज तक नहीं उबरीं।

Q15 लेखिका को अपनी सफलताएँ तुक्का क्यों लगती हैं? advanced
  • A सचमुच उन्हें सब कुछ किस्मत से मिला था
  • B लोग झूठ बोलते थे
  • C मन में दबी हीन-भावना से
  • D उन्हें याद नहीं रहता
Show answer
Answer: मन में दबी हीन-भावना से
Why:

अचेतन की पर्त।

Q16 बड़े होने पर लेखिका को पिता का शक कैसे समझ आया? intermediate
  • A किसी किताब में उसके बारे में पढ़कर
  • B माँ के बताने पर
  • C डॉक्टर के कहने पर
  • D अपने विश्वास टूटने पर
Show answer
Answer: अपने विश्वास टूटने पर
Why:

खंडित विश्वास।

Q17 पीढ़ियों को नकारने वालों के बारे में लेखिका क्या कहती हैं? advanced
  • A वे पूरी तरह अपने अतीत से मुक्त हो जाते हैं
  • B वे हमेशा सही होते हैं
  • C अतीत उनके भीतर जड़ जमाए रहता है
  • D वे कभी नहीं बदलते
Show answer
Answer: अतीत उनके भीतर जड़ जमाए रहता है
Why:

आसन्न अतीत।

Q18 माँ के धैर्य की तुलना लेखिका ने किससे की है? beginner
  • A आकाश से
  • B धरती से
  • C सागर से
  • D पर्वत से
Show answer
Answer: धरती से
Why:

सहनशक्ति।

Q19 माँ का त्याग लेखिका का आदर्श क्यों नहीं बना? intermediate
  • A वह बेबसी से भरा था
  • B माँ ने कभी कोई त्याग किया ही नहीं
  • C माँ बहुत कठोर थीं
  • D लेखिका माँ से दूर रहती थीं
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Answer: वह बेबसी से भरा था
Why:

असहाय मजबूरी।

Q20 भाइयों और बहनों के खेल के दायरे में क्या अंतर था? intermediate
  • A लड़कियाँ पूरे शहर में खुलकर घूमती थीं
  • B कोई अंतर नहीं था
  • C भाई घर में ही रहते थे
  • D लड़कियों की सीमा घर तक थी
Show answer
Answer: लड़कियों की सीमा घर तक थी
Why:

आँगन बनाम बाहर।

Q21 अहंवादी का अर्थ है ______। beginner
  • A घमंडी
  • B विनम्र
  • C डरपोक
  • D आलसी
Show answer
Answer: घमंडी
Why:

अहं।

Q22 भग्नावशेष का अर्थ है ______। beginner
  • A नया महल
  • B बग़ीचा
  • C पुस्तकालय
  • D खंडहर
Show answer
Answer: खंडहर
Why:

टूटे हिस्से।

Q23 लेखिका के अनुसार महानगरों के लोग किस कारण असुरक्षित हो गए हैं? intermediate
  • A बहुत ज़्यादा पड़ोसियों से घिरे रहने से
  • B खेल न खेलने से
  • C पड़ोस से कट जाने से
  • D किताबें न पढ़ने से
Show answer
Answer: पड़ोस से कट जाने से
Why:

फ़्लैट संस्कृति।

Q24 अभिकथन: लेखिका की कई शुरुआती कहानियों के पात्र उनके मोहल्ले के लोग थे। कारण: उस समय मोहल्ला परिवार जैसा था, और लेखिका इन्हीं लोगों के बीच देखते-सुनते बड़ी हुई थीं। advanced
  • A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
  • B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
  • C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
  • D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Answer: दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
Why:

गहरी छाप।

Q25 नीचे दिए कथनों को पढ़िए। I. पिता ने विषयवार अंग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोश पर काम किया। II. लेखिका पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं। III. सुशीला लेखिका से दो साल बड़ी थी। कौन-से कथन सही हैं? intermediate
  • A केवल I और III
  • B केवल I और II
  • C केवल II और III
  • D I, II और III तीनों
Show answer
Answer: केवल I और III
Why:

वे सबसे छोटी थीं।

Important short questions (7)

मन्नू भंडारी की दो कहानियों और दो उपन्यासों के नाम लिखिए।

यही सच है और त्रिशंकु उनके कहानी-संग्रह हैं। महाभोज और आपका बंटी उनके दो प्रसिद्ध उपन्यास हैं।

आत्मकथ्य और आत्मकथा में क्या अंतर है?

आत्मकथा में लेखक अपने पूरे जीवन को क्रम से लिखता है। आत्मकथ्य में वह केवल कुछ चुने हुए लोगों, घटनाओं और अनुभवों की बात करता है।

इंदौर में रहते हुए पिता का समाज में कैसा स्थान था?

इंदौर में पिता का बड़ा नाम और सम्मान था। वे कांग्रेस और समाज-सुधार से जुड़े थे। वे घर में विद्यार्थियों को रखकर पढ़ाते थे, और उनकी उदारता की चर्चा होती थी।

शब्दकोश का काम पिता के लिए वरदान भी था और बोझ भी, कैसे?

शब्दकोश अपनी तरह का पहला था, इसलिए उससे पिता को बड़ा यश मिला। पर उससे धन नहीं मिला। गिरती आर्थिक हालत ने उनके स्वभाव को कड़वा बना दिया।

पिता का शक्की स्वभाव बच्चों पर कैसे असर डालता था?

अपनों के धोखों से पिता इतने शक्की हो गए थे कि कभी-कभी बच्चे भी उनके शक का निशाना बन जाते। इससे घर में डर और तनाव बना रहता था।

लेखिका के मन में हीन-भावना कैसे पैदा हुई?

लेखिका साँवली और दुबली थीं, जबकि पिता को गोरा रंग पसंद था। पिता उनकी तुलना गोरी, स्वस्थ बहन सुशीला से करते और उसी की तारीफ़ करते। इसी से हीन-भावना बनी।

पुराने मोहल्ले और आज के फ़्लैटों के जीवन में लेखिका क्या अंतर देखती हैं?

पुराने मोहल्ले में सब घर परिवार जैसे थे और कहीं भी आना-जाना सहज था। आज फ़्लैटों में लोग अपने में सिमटे हैं, इसलिए ज़्यादा अकेले और असुरक्षित हैं।

Long answer questions (3)

लेखिका के पिता के व्यक्तित्व के उजले और धुँधले पक्षों का विश्लेषण कीजिए। उनके बदलाव का क्या कारण था?

लेखिका के पिता के व्यक्तित्व में दो बिल्कुल उलटे पक्ष थे। उजले पक्ष में वे शिक्षा-प्रेमी, उदार और समाज-सुधारक थे। इंदौर में वे घर पर विद्यार्थियों को रखकर पढ़ाते थे। उन्होंने अकेले दम पर विषयवार अंग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोश बनाया। वे बेटी को रसोई से दूर रखकर देश-दुनिया की समझ देना चाहते थे। धुँधले पक्ष में वे बहुत क्रोधी, अहंकारी और शक्की थे। उनके ग़ुस्से से माँ हमेशा सहमी रहतीं। गोरे रंग के मोह में उन्होंने लेखिका की तुलना सुशीला से की, जिससे हीन-भावना पैदा हुई। इस बदलाव का बड़ा कारण आर्थिक झटका था। शब्दकोश से यश तो मिला, पर धन नहीं। ऊँचाई से हाशिए पर पहुँचने का दर्द ग़ुस्सा बन गया। अपनों के धोखों ने उन्हें शक्की बना दिया।

लेखिका ने माँ के त्याग को अपना आदर्श क्यों नहीं माना? क्या आप उनसे सहमत हैं? तर्क सहित लिखिए।

लेखिका की माँ अनपढ़ थीं और उनमें धरती जैसा धैर्य था। वे पिता की हर ज़्यादती चुपचाप सह लेतीं और बच्चों की हर ज़िद पूरी करतीं। उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा। फिर भी लेखिका ने इसे आदर्श नहीं माना। कारण यह था कि वह त्याग अपनी इच्छा से नहीं, बेबसी से था। माँ के पास न शिक्षा थी, न अपनी आवाज़, न कोई और रास्ता। मैं लेखिका से सहमत हूँ। त्याग तभी सुंदर है, जब वह अपनी मर्ज़ी से हो। जो स्त्री डर और लाचारी में सब सहती है, उसका जीवन आदर्श नहीं, अन्याय का उदाहरण है। आज की स्त्री को शिक्षा, आत्मसम्मान और अपनी बात कहने का साहस चाहिए। प्रेम और त्याग बने रहें, पर बेबसी नहीं।

पड़ोस-कल्चर का मनुष्य के जीवन में क्या महत्त्व है? आज के शहरों में यह क्यों कम होता जा रहा है?

पड़ोस हमारे जीवन का बहुत बड़ा सहारा है। मुश्किल समय में सबसे पहले पड़ोसी ही काम आते हैं। लेखिका के बचपन में पूरा मोहल्ला परिवार जैसा था। बच्चे किसी भी घर में खेल सकते थे, और बड़े सबका ध्यान रखते थे। ऐसे माहौल में बच्चे सुरक्षित महसूस करते हैं और मिल-जुलकर रहना सीखते हैं। बुज़ुर्गों को अकेलापन नहीं सताता। लेखिका को तो कहानियों के पात्र भी इसी मोहल्ले से मिले। आज के शहरों में यह रिश्ता कमज़ोर हो रहा है। लोग नौकरी और व्यस्तता में उलझे हैं। फ़्लैटों के बंद दरवाज़ों के पीछे सब अपनी दुनिया में रहते हैं। कई लोग सालों तक अपने पड़ोसी का नाम भी नहीं जानते। इसे बदलने के लिए हमें छोटे क़दम उठाने होंगे, जैसे त्योहार साथ मनाना, पड़ोसियों से मिलना और ज़रूरत में मदद करना।

Flashcards (17)

मन्नू भंडारी का जन्म कब और कहाँ हुआ?
सन् 1931, भानपुरा, मंदसौर।
लेखिका की इंटर तक की पढ़ाई कहाँ हुई?
अजमेर में।
मन्नू भंडारी ने दिल्ली में कहाँ पढ़ाया?
मिरांडा हाउस कॉलेज।
महाभोज किस विधा में है?
उपन्यास।
आत्मकथ्य का अर्थ?
जीवन के चुने हुए प्रसंग।
लेखिका का बचपन किस मोहल्ले में बीता?
ब्रह्मपुरी, अजमेर।
अजमेर से पहले पिता कहाँ थे?
इंदौर में।
पिता अजमेर क्यों आए?
बड़े आर्थिक झटके के कारण।
पिता ने कौन-सा शब्दकोश बनाया?
विषयवार अंग्रेज़ी-हिंदी।
अहंवादी का अर्थ?
घमंडी।
भग्नावशेष का अर्थ?
खंडहर, टूटे हिस्से।
लेखिका की बहन सुशीला कैसी थी?
गोरी, स्वस्थ, हँसमुख।
तुलना से लेखिका में क्या पैदा हुआ?
हीन-भावना।
पिता शक्की क्यों हो गए?
अपनों के धोखे से।
माँ का त्याग आदर्श क्यों नहीं बना?
वह मजबूरी से भरा था।
लेखिका कितने भाई-बहनों में थीं?
पाँच में सबसे छोटी।
लेखिका की शुरुआती कहानियों के पात्र कहाँ से आए?
अपने मोहल्ले से।

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  • शब्द और अर्थ
  • पिता या माँ?
  • सही या भ्रम
  • पाठ का क्रम (पहला भाग)
  • झटपट उत्तर

शीला अग्रवाल, आज़ादी का आंदोलन और पिता से टक्कर

प्राध्यापिका शीला अग्रवाल ने लेखिका को चुनकर पढ़ना और सक्रिय होकर जीना सिखाया। सन् 1946-47 के आंदोलन में लेखिका हड़तालों और भाषणों में आगे रहीं, जिससे पिता से टकराव बढ़ा। पर कई बार वही पिता बेटी पर गर्व भी करते दिखे।

What you will be able to do

  • शीला अग्रवाल के लेखिका के पढ़ने और सोचने पर पड़े प्रभाव को समझा सकेंगे।
  • लेखिका द्वारा पढ़े गए प्रमुख उपन्यासों और लेखकों की सूची बना सकेंगे।
  • सन् 1946-47 के आंदोलन में लेखिका की भूमिका का वर्णन कर सकेंगे।
  • पिता के अंतर्विरोधों और लेखिका से उनकी वैचारिक टकराहट का विश्लेषण कर सकेंगे।
  • पाठ में आए मुहावरों का अर्थ समझकर अपने वाक्यों में प्रयोग कर सकेंगे।

Key points

  • सुशीला की शादी और भाइयों के बाहर जाने के बाद लेखिका को पहली बार अपने अस्तित्व का एहसास हुआ, और पिता का ध्यान उन पर गया।

  • पिता रसोई को भटियारखाना कहते थे; वे चाहते थे कि बेटी घर की राजनीतिक बहसों में बैठे और देश को समझे।

  • सन् 1945 में फ़र्स्ट इयर में हिंदी प्राध्यापिका शीला अग्रवाल ने लेखिका को साहित्य की सच्ची दुनिया से जोड़ा।

  • उनके साथ लेखिका ने प्रेमचंद, जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल और भगवतीचरण वर्मा जैसे लेखकों को चुनकर पढ़ा और बहसें कीं।

  • शीला अग्रवाल ने घर में बैठकर देश को समझने की आदत को सक्रिय भागीदारी में बदल दिया।

  • आंदोलन के दिनों में लेखिका नारे लगातीं, हड़तालें करवातीं और भाषण देतीं; पिता को यह खुलापन सहन नहीं होता था।

  • प्रिंसिपल की शिकायत और चौपड़ पर भाषण, दोनों प्रसंगों में पिता का ग़ुस्सा अंत में गर्व में बदल गया।

  • पिता एक ओर विशिष्ट बनने की लालसा रखते थे, दूसरी ओर समाज में अपनी छवि की चिंता; यही उनका अंतर्विरोध था।

  • मई 1947 में शीला अग्रवाल को नोटिस मिला; छात्राओं के विरोध से अगस्त में थर्ड इयर खुला, और फिर 15 अगस्त 1947 आया।

Full explanation

छत्र-छाया हटी, अपना अस्तित्व दिखा

उस समय लेखिका के परिवार में लड़की की शादी के लिए दो शर्तें ज़रूरी मानी जाती थीं: उम्र सोलह साल और पढ़ाई मैट्रिक तक। सन् 1944 में सुशीला ने ये दोनों शर्तें पूरी कीं, और ब्याह के बाद कोलकाता चली गई। उधर दोनों बड़े भाई भी पढ़ाई के लिए शहर से बाहर निकल गए।

इन सबकी छाया हटते ही लेखिका को पहली बार अपने अस्तित्व का एहसास हुआ। पिता का ध्यान भी पहली बार उन पर टिका। जिस उम्र में लड़कियों को अच्छी गृहिणी और कुशल रसोइया बनाने की तैयारी होती थी, उस उम्र में पिता चाहते थे कि लेखिका रसोई से दूर रहें। वे रसोई को भटियारखाना कहते थे। उनके हिसाब से वहाँ समय बिताना अपनी प्रतिभा और क्षमता को भट्टी में झोंकने जैसा था।

घर में तरह-तरह की राजनीतिक पार्टियों के लोग जुटते और गरमागरम बहसें होतीं। बहस करना पिता का प्रिय शौक़ था। लेखिका चाय-नाश्ता लेकर जातीं, तो पिता उन्हें वहीं बिठा लेते। उनकी इच्छा थी कि बेटी सुने और समझे कि देश में क्या चल रहा है। सन् 1942 के आंदोलन के बाद पूरा देश उबल रहा था। लेखिका को पार्टियों की नीतियों की गहरी समझ तो नहीं थी, पर क्रांतिकारियों और शहीदों के बलिदान उनके मन को गहराई से छूते थे। दसवीं तक वे बिना ख़ास समझ के बहसें सुनतीं और बिना चुने कुछ भी पढ़ लेतीं।

शीला अग्रवाल: एक नई खिड़की

सन् 1945 में दसवीं पास करके लेखिका फ़र्स्ट इयर में आईं। जिस सावित्री गर्ल्स हाई स्कूल में उन्होंने अक्षर सीखे थे, वह एक साल पहले ही कॉलेज बना था। उसी साल वहाँ हिंदी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल आईं, और लेखिका के जीवन में एक नई खिड़की खुल गई।

शीला अग्रवाल ने लेखिका को साहित्य की दुनिया में सचमुच प्रवेश दिलाया। उन्होंने केवल पढ़ने की आदत को चुनकर पढ़ने की आदत में बदला। वे ख़ुद किताबें चुनकर देतीं और पढ़ी हुई किताबों पर लंबी बहसें करतीं। दो साल में ही लेखिका का पढ़ना शरत्चंद्र और प्रेमचंद से आगे बढ़कर जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल और भगवतीचरण वर्मा तक फैल गया।

उस समय जैनेंद्र की छोटे-छोटे, सरल वाक्यों वाली शैली लेखिका को बहुत भाई। उनका उपन्यास सुनीता अच्छा लगा। अज्ञेय का शेखर: एक जीवनी उन्होंने पढ़ा तो सही, पर उस उम्र में वह समझ में नहीं आया। कुछ साल बाद अज्ञेय का नदी के द्वीप पढ़ा, जिसने मन को इतना बाँधा कि उन्होंने शेखर को फिर से पढ़ा, इस बार समझ के साथ। जैनेंद्र का त्यागपत्र और भगवतीचरण वर्मा का चित्रलेखा भी इसी दौर में पढ़े। लेखिका कहती हैं कि यह मूल्यों के मंथन का समय था, जब पाप-पुण्य और सही-ग़लत की पुरानी धारणाओं पर सवाल उठ रहे थे।

घर की चारदीवारी से सड़क तक

शीला अग्रवाल ने केवल साहित्य का दायरा नहीं बढ़ाया। पिता ने घर बैठे देश की हालत समझने का जो सिलसिला शुरू किया था, शीला अग्रवाल उसे खींचकर सक्रिय भागीदारी तक ले गईं। सन् 1946-47 के दिनों में घर बैठे रहना वैसे भी संभव नहीं था। हर शहर में प्रभात-फेरियाँ, हड़तालें, जुलूस और भाषण हो रहे थे। हर युवा पूरे जोश से इनमें कूद पड़ना चाहता था।

लेखिका भी युवा थीं, और शीला अग्रवाल की जोशीली बातों ने उनकी नसों में बहते ख़ून को जैसे लावा बना दिया था। नतीजा यह हुआ कि एक तूफ़ान शहर में था और दूसरा घर में। पिता बेटी को इतनी ही आज़ादी देना चाहते थे कि वह उनकी मौजूदगी में घर आए लोगों के बीच बैठे और बातें समझे। पर हाथ उठाकर नारे लगाती, हड़तालें करवाती और लड़कों के साथ शहर की सड़कों पर घूमती बेटी उन्हें अपनी सारी आधुनिकता के बावजूद सहन नहीं होती थी। दूसरी ओर, किसी की दी हुई सीमित आज़ादी में चलना लेखिका को भी मंज़ूर नहीं था।

लेखिका लिखती हैं कि जब नसों में लावा बहता हो, तो सारे डर और रोक-टोक टूट जाते हैं। अपने ग़ुस्से से सबको कँपा देने वाले पिता से उनकी टक्कर तभी से शुरू हुई, और राजेंद्र यादव से शादी होने तक चलती रही।

प्रिंसिपल का पत्र: ग़ुस्सा जो गर्व बना

पिता की सबसे बड़ी कमज़ोरी थी यश की भूख। उनका जीवन इस सिद्धांत पर चलता था कि व्यक्ति को कुछ ख़ास बनकर जीना चाहिए, ऐसे काम करे, जिनसे समाज में उसका नाम, सम्मान और दबदबा बने। इसी कमज़ोरी के कारण लेखिका दो-एक बार उनके ग़ुस्से से बच गईं।

एक बार कॉलेज की प्रिंसिपल का पत्र आया कि पिता आकर मिलें और बताएँ कि उनकी बेटी के ख़िलाफ़ अनुशासन का क़दम क्यों न उठाया जाए। चिट्ठी पढ़ते ही पिता आग-बबूला हो गए। वे बड़बड़ाने लगे कि यह लड़की उन्हें कहीं मुँह दिखाने लायक़ नहीं छोड़ेगी, और उनके किसी और बच्चे ने ऐसे दिन नहीं दिखाए। वे भन्नाते हुए कॉलेज गए। लेखिका डरकर पड़ोस की एक सहेली के घर जा बैठीं और माँ से कह दिया कि जब पिता का ग़ुस्सा उतर जाए, तब बुलाना।

पर जब माँ ने आकर बताया कि पिता तो ख़ुश हैं, तो लेखिका को यक़ीन नहीं हुआ। डरते-डरते घर पहुँचीं, तो पिता गदगद थे। वे बता रहे थे कि सारे कॉलेज पर तीन लड़कियों का ऐसा रौब है कि उनके एक इशारे पर सब छात्राएँ कक्षाएँ छोड़कर मैदान में नारे लगाने लगती हैं। प्रिंसिपल परेशान थीं और चाहती थीं कि बेटी को घर बिठा लिया जाए। पर पिता बड़े गर्व से कह आए थे कि यह आंदोलन तो पूरे देश की आवाज़ है, उसे कौन रोक सकता है। लेखिका हक्की-बक्की थीं। जो पिता जाते समय मुँह छिपाने की बात कर रहे थे, वही लौटकर बेटी की तारीफ़ कर रहे थे।

चौपड़ का भाषण और डॉक्टर अंबालाल

एक और घटना आज़ाद हिंद फ़ौज के मुक़दमे के दिनों की है। सब कॉलेजों, स्कूलों और दुकानों को बंद करने की अपील थी। विद्यार्थियों की टोली घूम-घूमकर हड़ताल करवा रही थी। शाम को अजमेर के सारे विद्यार्थी चौपड़, यानी मुख्य बाज़ार के चौराहे पर जुटे, और भाषण हुए। लेखिका ने भी वहाँ भाषण दिया।

इसी बीच पिता के एक बहुत पुराने ख़याल वाले, दक़ियानूसी दोस्त घर आए। उन्होंने पिता को ख़ूब खरी-खोटी सुनाई, यानी अच्छी तरह उनकी लू उतारी। उन्होंने कहा कि आपने लड़कियों को आज़ादी तो दी, पर आपकी बेटी उलटे-सीधे लड़कों के साथ हड़तालें करवाती घूम रही है, क्या यह आपके घर की लड़की को शोभा देता है? मित्र तो आग लगाकर लौट गए, पर पिता दिन भर भड़कते रहे। उन्होंने तय कर लिया कि अब बेटी का घर से निकलना बंद।

रात को लेखिका घर लौटीं, तो देखा कि अजमेर के सबसे सम्मानित व्यक्ति और पिता के गहरे मित्र डॉक्टर अंबालाल बैठे हैं। उन्होंने बड़े प्यार से लेखिका का स्वागत किया और बताया कि वे चौपड़ पर उनका भाषण सुनकर सीधे बधाई देने आए हैं। वे अंग्रेज़ी में बोले कि उन्हें लेखिका पर सचमुच गर्व है, और पिता को घर से निकलने की सलाह दी। वे लगातार तारीफ़ करते रहे, और सुनते-सुनते पिता के चेहरे पर पहले संतोष, फिर गर्व उभर आया। बाद में माँ ने दोपहर के ग़ुस्से की बात बताई, तब लेखिका ने राहत की साँस ली।

पिता के अंतर्विरोध

आज पीछे मुड़कर लेखिका सोचती हैं कि उस उम्र में उनका भाषण कितना अच्छा रहा होगा! शायद यह डॉक्टर साहब का स्नेह था, जो तारीफ़ बनकर बह रहा था। या शायद उस समय के अजमेर में किसी लड़की का भीड़ के सामने बिना झिझक बोलना ही बड़ी बात थी।

पर लेखिका पिता के बारे में एक गहरी बात कहती हैं। पिता अनेक अंतर्विरोधों में जीते थे। एक ओर उनमें ख़ुद ख़ास बनने और बच्चों को ख़ास बनाने की तेज़ इच्छा थी। दूसरी ओर उन्हें समाज में अपनी छवि की भी उतनी ही चिंता थी। लेखिका पूछती हैं कि क्या ये दोनों साथ चल सकते हैं? जो कुछ अलग और ख़ास करना चाहता है, उसे समाज की आलोचना झेलनी ही पड़ती है। पिता को शायद यह एहसास नहीं था कि इन दोनों इच्छाओं का रास्ता ही टकराव का है।

यही कारण है कि पिता का व्यवहार दूसरों की राय से बदलता रहता था। दक़ियानूसी मित्र की बात सुनकर वे भड़क जाते, और डॉक्टर अंबालाल की तारीफ़ सुनकर गर्व से भर जाते।

नोटिस, थर्ड इयर और सबसे बड़ी ख़ुशी

मई 1947 में कॉलेज ने शीला अग्रवाल को नोटिस दे दिया। उन पर लड़कियों को भड़काने और अनुशासन बिगाड़ने का आरोप लगाया गया। कोई हंगामा न हो, इसलिए जुलाई में थर्ड इयर की कक्षाएँ बंद कर दी गईं, और लेखिका समेत दो-तीन छात्राओं का कॉलेज में आना रोक दिया गया।

पर लेखिका और उनकी साथियों ने बाहर रहकर भी इतना विरोध किया कि अगस्त में कॉलेज को थर्ड इयर फिर से खोलना पड़ा। यह उनकी जीत थी। पर इस जीत की ख़ुशी उस बड़ी ख़ुशी के आगे फीकी पड़ गई, जिसका सबको बरसों से इंतज़ार था। वह थी 15 अगस्त 1947, देश की आज़ादी, जिसे लेखिका सदी की सबसे बड़ी उपलब्धि कहती हैं।

मुहावरों से सजी भाषा

इस आत्मकथ्य की भाषा में मुहावरों का बहुत सुंदर प्रयोग है, जो इसे रोचक और जीवंत बनाता है। लू उतारना का अर्थ है किसी को खरी-खोटी सुनाकर उसका घमंड तोड़ना। जैसे, कप्तान ने मैच हारने पर ढीले खिलाड़ियों की अच्छी लू उतारी। आग लगाना का अर्थ है किसी के मन में ग़ुस्सा भड़काना। जैसे, पड़ोसन ने झूठी बात कहकर दोनों भाइयों के बीच आग लगा दी।

थू-थू करना का अर्थ है किसी की बहुत बुराई या निंदा करना। जैसे, रिश्वत लेते पकड़े जाने पर पूरे दफ़्तर ने उसकी थू-थू की। आग-बबूला होना का अर्थ है बहुत ज़्यादा ग़ुस्सा होना। जैसे, टूटा गमला देखकर दादी आग-बबूला हो गईं। इन मुहावरों से पिता के ग़ुस्से और समाज की तीखी सोच, दोनों आँखों के सामने आ जाते हैं।

Concepts and terms

चुनकर पढ़ना

बिना सोचे कुछ भी पढ़ने के बजाय अच्छे लेखकों और विषयों को समझ-बूझकर पढ़ना। शीला अग्रवाल ने यही सिखाया।

सक्रिय भागीदारी

घटनाओं को केवल सुनने-जानने के बजाय उनमें आगे बढ़कर हिस्सा लेना।

अंतर्विरोध

एक ही व्यक्ति में दो टकराने वाली इच्छाएँ, जैसे बेटी को आगे बढ़ाना पर समाज की बातों से डरना।

यश-लिप्सा

नाम और प्रसिद्धि की बहुत तेज़ भूख। लेखिका इसे पिता की सबसे बड़ी कमज़ोरी मानती हैं।

मुहावरा

ऐसा वाक्यांश, जिसका अर्थ शब्दों के सीधे अर्थ से अलग हो, जैसे आग-बबूला होना यानी बहुत ग़ुस्सा होना।

सावधान

भ्रम और सच

मिलाकर देखो

Scenario:

अनन्या के स्कूल में छात्र-परिषद का चुनाव था। उसने पहली बार चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया और मंच पर साफ़ पानी और लाइब्रेरी के समय पर ज़ोरदार भाषण दिया।

घर पहुँची तो चाचा ने पिता से शिकायत की कि लड़की का मंच पर लड़कों के बीच बोलना ठीक नहीं। पिता चुप रहे, पर उनका चेहरा तना हुआ था।

शाम को प्रधानाचार्य का फ़ोन आया कि अनन्या का भाषण सबसे अच्छा था। पिता का चेहरा खिल उठा और उन्होंने सबको गर्व से यह बात बताई।

Activity:

अपने परिवार से पूछिए कि उनके समय में लड़कियों के मंच पर बोलने या खेल में आगे आने पर लोग क्या कहते थे। तीन बदलावों की सूची बनाइए।

Analysis:

जब घर के लोग दूसरों की राय से अपना व्यवहार बदलते हैं, तो बच्चे उलझन में पड़ते हैं। लेखिका के पिता की तरह हमें भी पूछना चाहिए कि हम बच्चे की योग्यता पर भरोसा करते हैं या समाज की राय पर।

Did you know

आज़ाद हिंद फ़ौज के अफ़सरों पर सन् 1945-46 में दिल्ली के लाल क़िले में मुक़दमा चला था। इसके विरोध में पूरे देश में हड़तालें और जुलूस हुए।

चौपड़ यानी किसी शहर के मुख्य बाज़ार का वह चौराहा, जहाँ चार रास्ते मिलते हैं। पुराने शहरों में सभाएँ अक्सर यहीं होती थीं।

पाठ में जिन राजेंद्र का ज़िक्र है, वे हिंदी के बड़े कथाकार और हंस पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव हैं, जिनसे लेखिका का विवाह हुआ।

Memory tricks

पिता का ग़ुस्सा, फिर गर्व: दो बार — प्रिंसिपल का पत्र और चौपड़ का भाषण।

चार मुहावरे: लू-आग-थू-बबूला — लू उतारना, आग लगाना, थू-थू करना, आग-बबूला होना।

Practice MCQs with answers (25)

Q1 सुशीला और भाइयों के जाने के बाद लेखिका को पहली बार क्या महसूस हुआ? intermediate
  • A गहरा अकेलापन और हमेशा का डर
  • B अपने अस्तित्व का एहसास
  • C घर छोड़ने की इच्छा
  • D पढ़ाई से ऊब
Show answer
Answer: अपने अस्तित्व का एहसास
Why:

छत्र-छाया हटी।

Q2 पिता लेखिका को रसोई से दूर क्यों रखना चाहते थे? intermediate
  • A रसोई में आग से गंभीर ख़तरा रहता था
  • B माँ को अकेले पसंद था
  • C वहाँ प्रतिभा नष्ट होती है
  • D रसोई छोटी थी
Show answer
Answer: वहाँ प्रतिभा नष्ट होती है
Why:

भटियारखाना।

Q3 पिता राजनीतिक बहसों में बेटी को क्यों बिठाते थे? beginner
  • A मेहमानों को चाय पिलाते रहने के लिए
  • B उसे डाँटने
  • C घर में जगह कम थी
  • D देश की हालत समझाने
Show answer
Answer: देश की हालत समझाने
Why:

सुनो और जानो।

Q4 दसवीं तक लेखिका के पढ़ने का ढंग कैसा था? intermediate
  • A बिना चुने कुछ भी
  • B केवल अच्छे और चुने हुए लेखक
  • C केवल पाठ्य-पुस्तकें
  • D बिल्कुल नहीं पढ़ती थीं
Show answer
Answer: बिना चुने कुछ भी
Why:

बिना समझ।

Q5 शीला अग्रवाल का लेखिका पर पहला बड़ा असर क्या था? beginner
  • A गाना और नाचना सिखाना
  • B खाना बनाना सिखाना
  • C खेल सिखाना
  • D चुनकर पढ़ने की आदत
Show answer
Answer: चुनकर पढ़ने की आदत
Why:

साहित्य की दुनिया।

Q6 शेखर: एक जीवनी पहली बार लेखिका को क्यों समझ नहीं आया? intermediate
  • A उस उम्र की समझ सीमित थी
  • B किताब किसी विदेशी भाषा में छपी थी
  • C किताब फटी थी
  • D शीला अग्रवाल ने मना किया
Show answer
Answer: उस उम्र की समझ सीमित थी
Why:

बाद में फिर पढ़ा।

Q7 लेखिका ने उस दौर को मूल्यों के मंथन का युग क्यों कहा? advanced
  • A सब लोग पुराने नियमों को आँख मूँदकर मान रहे थे
  • B पुरानी धारणाओं पर सवाल उठ रहे थे
  • C समुद्र-मंथन की कथा पढ़ी
  • D चुनाव हो रहे थे
Show answer
Answer: पुरानी धारणाओं पर सवाल उठ रहे थे
Why:

पाप-पुण्य पर प्रश्न।

Q8 शीला अग्रवाल ने पिता की शुरू की गई देश-समझ को किस रूप में बदला? intermediate
  • A घर में बैठकर केवल अख़बार पढ़ना
  • B चुप रहना
  • C सक्रिय भागीदारी
  • D विदेश जाना
Show answer
Answer: सक्रिय भागीदारी
Why:

चारदीवारी से बाहर।

Q9 रगों में ख़ून की जगह लावा बहना, यह कल्पना किस भाव को दिखाती है? intermediate
  • A उमड़ता जोश
  • B गहरी बीमारी और कमज़ोरी
  • C डर
  • D उदासी
Show answer
Answer: उमड़ता जोश
Why:

आंदोलन।

Q10 एक बवंडर शहर में, एक घर में, इसका आशय क्या है? advanced
  • A शहर और घर, दोनों में भयंकर आँधी आई
  • B घर में मेहमान आए
  • C बाहर आंदोलन, भीतर टकराव
  • D शहर में मेला था
Show answer
Answer: बाहर आंदोलन, भीतर टकराव
Why:

पिता से टक्कर।

Q11 पिता को बेटी की कौन-सी बात सहन नहीं होती थी? intermediate
  • A घर में बैठकर किताबें पढ़ते रहना
  • B लड़कों के साथ सड़कों पर आंदोलन
  • C माँ की मदद
  • D देर तक सोना
Show answer
Answer: लड़कों के साथ सड़कों पर आंदोलन
Why:

आधुनिकता की सीमा।

Q12 लेखिका पिता की सबसे बड़ी कमज़ोरी किसे मानती हैं? beginner
  • A पैसे का गहरा लालच और कंजूसी
  • B आलस
  • C डर
  • D यश की भूख
Show answer
Answer: यश की भूख
Why:

यश-लिप्सा।

Q13 प्रिंसिपल का पत्र पढ़कर पिता की पहली प्रतिक्रिया क्या थी? beginner
  • A बहुत ख़ुशी और बेटी पर गर्व
  • B उदासीनता
  • C बहुत ग़ुस्सा
  • D हँसी
Show answer
Answer: बहुत ग़ुस्सा
Why:

आग-बबूला।

Q14 पिता के गुस्से से बचने के लिए लेखिका कहाँ चली गईं? intermediate
  • A पड़ोस की सहेली के घर
  • B सीधे कॉलेज की प्रिंसिपल के पास
  • C नानी के घर
  • D मंदिर
Show answer
Answer: पड़ोस की सहेली के घर
Why:

ग़ुबार निकलने तक।

Q15 कॉलेज से लौटकर पिता का ख़ुश होना लेखिका के लिए क्यों अविश्वसनीय था? intermediate
  • A पिता पहले से ही हमेशा ख़ुश रहते थे
  • B प्रिंसिपल पिता की रिश्तेदार थीं
  • C लेखिका सो रही थीं
  • D वे ग़ुस्से में गए थे
Show answer
Answer: वे ग़ुस्से में गए थे
Why:

मुँह दिखाने का डर।

Q16 यह तो पूरे देश की पुकार है, यह कहते हुए पिता के मन में कौन-सा भाव था? intermediate
  • A प्रिंसिपल के प्रति गहरा डर
  • B बेटी पर गर्व
  • C शर्म
  • D ऊब
Show answer
Answer: बेटी पर गर्व
Why:

गद्गद स्वर।

Q17 दक़ियानूसी मित्र की बातों के पीछे कौन-सी सोच थी? intermediate
  • A लड़कियों को घर तक सीमित रखना
  • B लड़कियों को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाना
  • C आंदोलन का समर्थन
  • D पढ़ाई का महत्त्व
Show answer
Answer: लड़कियों को घर तक सीमित रखना
Why:

मान-मर्यादा।

Q18 डॉक्टर अंबालाल की तारीफ़ से पिता के चेहरे पर क्या बदलाव आया? beginner
  • A ग़ुस्सा और भी ज़्यादा बढ़ गया
  • B डर छा गया
  • C नींद आई
  • D संतोष गर्व में बदला
Show answer
Answer: संतोष गर्व में बदला
Why:

धुआँधार तारीफ़।

Q19 पिता के व्यवहार में बार-बार बदलाव का मूल कारण क्या था? advanced
  • A उनकी गंभीर और लंबी बीमारी
  • B दूसरों की राय पर निर्भरता
  • C उनका अपना पक्का विचार
  • D बेटी का डर
Show answer
Answer: दूसरों की राय पर निर्भरता
Why:

अंतर्विरोध।

Q20 लेखिका के अनुसार पिता की दो इच्छाओं का रास्ता कैसा था? advanced
  • A पूरी तरह एक-दूसरे से मेल खाता
  • B बहुत आसान
  • C टकराव का
  • D छोटा
Show answer
Answer: टकराव का
Why:

विशिष्टता बनाम छवि।

Q21 निषिद्ध का अर्थ है ______। beginner
  • A जिसकी पूरी छूट हो
  • B जो नया हो
  • C जो भारी हो
  • D जिस पर रोक हो
Show answer
Answer: जिस पर रोक हो
Why:

प्रवेश।

Q22 वर्चस्व का अर्थ है ______। beginner
  • A कमज़ोरी
  • B दबदबा
  • C डर
  • D भूख
Show answer
Answer: दबदबा
Why:

समाज में।

Q23 थर्ड इयर खुलने की ख़ुशी लेखिका को फीकी क्यों लगी? intermediate
  • A आज़ादी की बड़ी ख़ुशी सामने थी
  • B उन्हें कॉलेज से कोई लगाव नहीं था
  • C वे बीमार थीं
  • D शीला अग्रवाल नाराज़ थीं
Show answer
Answer: आज़ादी की बड़ी ख़ुशी सामने थी
Why:

15 अगस्त 1947।

Q24 अभिकथन: प्रिंसिपल की शिकायत के बाद भी पिता बेटी पर गर्व करते लौटे। कारण: पिता को यश की भूख थी, और बेटी का कॉलेज पर रौब उन्हें विशिष्टता का प्रमाण लगा। advanced
  • A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
  • B अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
  • C दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
  • D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Answer: दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
Why:

यश-लिप्सा।

Q25 नीचे दिए कथनों को पढ़िए। I. शीला अग्रवाल हिंदी की प्राध्यापिका थीं। II. डॉक्टर अंबालाल ने भाषण की कड़ी निंदा की। III. मई 1947 में शीला अग्रवाल को नोटिस मिला। कौन-से कथन सही हैं? intermediate
  • A केवल I और II
  • B केवल I और III
  • C केवल II और III
  • D I, II और III तीनों
Show answer
Answer: केवल I और III
Why:

उन्होंने तारीफ़ की।

Important short questions (7)

पिता ने रसोई को भटियारखाना क्यों कहा होगा?

पिता चाहते थे कि बेटी पढ़-लिखकर कुछ ख़ास बने। उनकी नज़र में रसोई में समय बिताना प्रतिभा को भट्टी में झोंकने जैसा था, इसलिए उन्होंने यह तीखा शब्द चुना।

शीला अग्रवाल ने लेखिका के पढ़ने के ढंग को कैसे बदला?

पहले लेखिका बिना चुने कुछ भी पढ़ लेती थीं। शीला अग्रवाल ख़ुद अच्छी किताबें चुनकर देतीं और उन पर लंबी बहसें करतीं। इससे पढ़ाई समझ-बूझ वाली बन गई।

लेखिका द्वारा पढ़े गए किन्हीं चार उपन्यासों के नाम लेखकों सहित लिखिए।

जैनेंद्र के सुनीता और त्यागपत्र, अज्ञेय का नदी के द्वीप, और भगवतीचरण वर्मा का चित्रलेखा।

आंदोलन के दिनों में लेखिका की क्या भूमिका थी?

लेखिका हाथ उठाकर नारे लगातीं, हड़तालें करवातीं और जुलूसों में शामिल होतीं। उनके और दो सहेलियों के इशारे पर पूरा कॉलेज कक्षाएँ छोड़ देता था। उन्होंने चौपड़ पर भाषण भी दिया।

पिता के दक़ियानूसी मित्र ने आकर क्या कहा?

उन्होंने पिता को खरी-खोटी सुनाई कि उनकी बेटी उलटे-सीधे लड़कों के साथ हड़तालें करवाती घूम रही है। उन्होंने पूछा कि क्या यह भले घर की लड़की को शोभा देता है।

लेखिका आज अपने भाषण की तारीफ़ को किस नज़र से देखती हैं?

उन्हें लगता है कि उस उम्र में भाषण बहुत अच्छा नहीं रहा होगा। शायद डॉक्टर साहब का स्नेह तारीफ़ बना, या उस समय किसी लड़की का भीड़ में बिना झिझक बोलना ही बड़ी बात थी।

आग लगाना और थू-थू करना मुहावरों का अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए।

आग लगाना: चुगलख़ोर पड़ोसी ने झूठी बातें कहकर दोनों दोस्तों में आग लगा दी। थू-थू करना: परीक्षा में नक़ल पकड़े जाने पर पूरी कक्षा ने उसकी थू-थू की।

Long answer questions (3)

लेखिका के व्यक्तित्व के निर्माण में पिता और शीला अग्रवाल की भूमिका की तुलना कीजिए।

लेखिका के व्यक्तित्व को दो लोगों ने सबसे ज़्यादा गढ़ा, उनके पिता और प्राध्यापिका शीला अग्रवाल। दोनों का असर अलग-अलग ढंग का था। पिता ने लेखिका को रसोई से दूर रखा और घर की राजनीतिक बहसों में बिठाया। इससे उनमें देश के प्रति जागरूकता आई। पर उनका क्रोध, शक और सुशीला से तुलना लेखिका के मन में हीन-भावना और विद्रोह भी भर गई। शीला अग्रवाल ने लेखिका को चुनकर पढ़ना सिखाया। जैनेंद्र, अज्ञेय और यशपाल जैसे लेखकों से परिचय कराया। उन्होंने घर बैठे देश को समझने की आदत को आंदोलन में सक्रिय भागीदारी में बदला। इस तरह पिता ने ज़मीन तैयार की, और शीला अग्रवाल ने उस पर साहित्य और साहस के बीज बोए।

लेखिका और उनके पिता के बीच विचारों के टकराव को पाठ के प्रसंगों के आधार पर समझाइए।

लेखिका और पिता, दोनों आधुनिक सोच वाले थे, पर दोनों की आज़ादी की सीमा अलग थी। पिता चाहते थे कि बेटी घर में बैठकर देश की बातें सुने और समझे। इससे आगे की आज़ादी उन्हें मंज़ूर नहीं थी। लेखिका आंदोलन में सक्रिय थीं। वे नारे लगातीं, हड़तालें करवातीं और लड़कों के साथ सड़कों पर घूमतीं। पिता को यह सहन नहीं होता था। लेखिका को भी किसी की दी हुई सीमित आज़ादी मंज़ूर नहीं थी। प्रिंसिपल के पत्र और दक़ियानूसी मित्र की बातों पर पिता भड़क उठे। पर तारीफ़ मिलते ही वे गर्व करने लगे। लेखिका मानती हैं कि पिता ख़ास बनने की चाह और समाज की छवि के डर के बीच फँसे थे। यह टकराव शादी तक चलता रहा।

इस आत्मकथ्य के आधार पर सन् 1946-47 के स्वतंत्रता आंदोलन का माहौल और उसमें युवाओं की भागीदारी का चित्र प्रस्तुत कीजिए।

सन् 1946-47 में पूरा देश आज़ादी के जोश से उबल रहा था। सन् 1942 के आंदोलन के बाद हर शहर में प्रभात-फेरियाँ, हड़तालें, जुलूस और भाषण आम बात थे। युवा इसमें सबसे आगे थे। आज़ाद हिंद फ़ौज के मुक़दमे के विरोध में विद्यार्थियों की टोलियाँ घूम-घूमकर स्कूल, कॉलेज और दुकानें बंद करवाती थीं। अजमेर का पूरा विद्यार्थी-वर्ग चौपड़ पर जुटता और भाषण होते। लड़कियाँ भी पीछे नहीं थीं। लेखिका और उनकी दो सहेलियों के इशारे पर पूरा कॉलेज कक्षाएँ छोड़कर नारे लगाने लगता। शीला अग्रवाल को नोटिस मिलने पर छात्राओं ने इतना विरोध किया कि कॉलेज को झुकना पड़ा। इस माहौल से पता चलता है कि आज़ादी केवल नेताओं ने नहीं, आम युवाओं ने भी मिलकर जीती।

Flashcards (17)

परिवार में लड़की की शादी की दो शर्तें क्या थीं?
सोलह साल उम्र, मैट्रिक पढ़ाई।
सुशीला शादी के बाद कहाँ गई?
कोलकाता।
पिता रसोई को क्या कहते थे?
भटियारखाना।
पिता का प्रिय शौक़ क्या था?
बहस करना।
लेखिका की हिंदी प्राध्यापिका कौन थीं?
शीला अग्रवाल।
शीला अग्रवाल ने पढ़ने की आदत को कैसे बदला?
चुनकर पढ़ने में।
लेखिका को किसकी शैली बहुत भाई?
जैनेंद्र की।
शेखर: एक जीवनी किसका उपन्यास है?
अज्ञेय का।
चित्रलेखा किसका उपन्यास है?
भगवतीचरण वर्मा का।
प्रिंसिपल ने पत्र में क्या लिखा?
अनुशासन की कार्रवाई क्यों न हो।
पिता ने कॉलेज से लौटकर क्या कहा?
यह पूरे देश की पुकार है।
लेखिका ने भाषण कहाँ दिया?
चौपड़ पर।
भाषण पर बधाई देने कौन आए?
डॉक्टर अंबालाल।
शीला अग्रवाल को नोटिस कब मिला?
मई 1947 में।
थर्ड इयर फिर कब खुला?
अगस्त 1947 में।
आग-बबूला होना का अर्थ?
बहुत ग़ुस्सा होना।
लू उतारना का अर्थ?
खरी-खोटी सुनाना।

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  • शब्द और अर्थ
  • ग़ुस्सा या गर्व?
  • सही या भ्रम
  • पाठ का क्रम (दूसरा भाग)
  • झटपट उत्तर

Class 10 Hindi Chapter 10 — frequently asked questions

मन्नू भंडारी की दो कहानियों और दो उपन्यासों के नाम लिखिए।

यही सच है और त्रिशंकु उनके कहानी-संग्रह हैं। महाभोज और आपका बंटी उनके दो प्रसिद्ध उपन्यास हैं।

आत्मकथ्य और आत्मकथा में क्या अंतर है?

आत्मकथा में लेखक अपने पूरे जीवन को क्रम से लिखता है। आत्मकथ्य में वह केवल कुछ चुने हुए लोगों, घटनाओं और अनुभवों की बात करता है।

इंदौर में रहते हुए पिता का समाज में कैसा स्थान था?

इंदौर में पिता का बड़ा नाम और सम्मान था। वे कांग्रेस और समाज-सुधार से जुड़े थे। वे घर में विद्यार्थियों को रखकर पढ़ाते थे, और उनकी उदारता की चर्चा होती थी।

पिता ने रसोई को भटियारखाना क्यों कहा होगा?

पिता चाहते थे कि बेटी पढ़-लिखकर कुछ ख़ास बने। उनकी नज़र में रसोई में समय बिताना प्रतिभा को भट्टी में झोंकने जैसा था, इसलिए उन्होंने यह तीखा शब्द चुना।

शीला अग्रवाल ने लेखिका के पढ़ने के ढंग को कैसे बदला?

पहले लेखिका बिना चुने कुछ भी पढ़ लेती थीं। शीला अग्रवाल ख़ुद अच्छी किताबें चुनकर देतीं और उन पर लंबी बहसें करतीं। इससे पढ़ाई समझ-बूझ वाली बन गई।

लेखिका द्वारा पढ़े गए किन्हीं चार उपन्यासों के नाम लेखकों सहित लिखिए।

जैनेंद्र के सुनीता और त्यागपत्र, अज्ञेय का नदी के द्वीप, और भगवतीचरण वर्मा का चित्रलेखा।

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