Class 10 Hindi Chapter 13: माता का अँचल
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- Hindi
भोलानाथ का बचपन: बाबू जी का साथ, मइयाँ का दुलार
शिवपूजन सहाय के उपन्यास-अंश में तारकेश्वरनाथ उर्फ़ भोलानाथ दिन भर पिता के साथ रहता है: पूजा, गंगा-यात्रा, कुश्ती और भोजन। माँ उसे बड़े कौर खिलाती, तेल-काजल लगाकर सजाती है। यह तीस के दशक के गाँव का प्यारा चित्र है।
What you will be able to do
- शिवपूजन सहाय के जीवन और उनके उपन्यास देहाती दुनिया का परिचय दे सकेंगे।
- आंचलिक रचना की विशेषताएँ पहचानकर इस पाठ में उनके उदाहरण बता सकेंगे।
- भोलानाथ और बाबू जी के आपसी दुलार के प्रसंगों का वर्णन कर सकेंगे।
- मइयाँ के भोजन कराने और सजाने के ढंग से माँ की ममता को समझा सकेंगे।
- पाठ में आए लोक-शब्दों और देसी बोली के प्रयोग का अर्थ बता सकेंगे।
Key points
शिवपूजन सहाय (1893–1963) बिहार के रचनाकार थे; माता का अँचल उनके उपन्यास देहाती दुनिया का एक अंश है।
इस अंश में तीस के दशक के ग्रामीण जीवन, बच्चों के खेल और माता-पिता के वात्सल्य का चित्रण है।
कथावाचक का असली नाम तारकेश्वरनाथ है, पर पिता उसे प्यार से भोलानाथ कहते हैं।
बचपन में बच्चा पिता के साथ बैठक में सोता, उन्हीं के साथ उठता, नहाता और पूजा पर बैठता था।
पिता उसके माथे पर भभूत का त्रिपुंड लगाते, जिससे लंबी जटाओं वाला बच्चा छोटा बम-भोला लगता था।
पिता राम-नाम लिखी आटे की गोलियाँ गंगा में मछलियों को खिलाते, और बच्चा उनके कंधे पर बैठा हँसता रहता।
रास्ते में झूला, घर पर कुश्ती और गालों पर मीठे-खट्टे चुंबन पिता-पुत्र के खुले स्नेह को दिखाते हैं।
माँ का मानना था कि बच्चे को बड़े कौर खिलाने चाहिए; वह पक्षियों के नाम लेकर दही-भात खिलाती थी।
माँ ज़बरदस्ती सिर में सरसों का तेल डालकर, काजल की बिंदी और चोटी करके बच्चे को कन्हैया बना देती थी।
Full explanation
शिवपूजन सहाय और देहाती दुनिया
शिवपूजन सहाय हिंदी के ऐसे लेखक थे, जिन्होंने गाँव की ज़िंदगी को उसी की बोली और उसी के रंग में लिखा। उनका जन्म सन् 1893 में बिहार में हुआ और देहांत सन् 1963 में। वे उपन्यासकार और कहानीकार होने के साथ एक बड़े संपादक भी थे। मतवाला जैसी चर्चित पत्रिका से उनका नाम जुड़ा रहा, और हिंदी पत्रकारिता को उन्होंने बहुत कुछ दिया। हिंदी की सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण सम्मान भी मिला।
माता का अँचल उनके उपन्यास देहाती दुनिया का एक अंश है। यह उपन्यास सन् 1926 में आया, और इसे हिंदी के शुरुआती आंचलिक उपन्यासों में गिना जाता है। आंचलिक रचना का अर्थ है ऐसी रचना, जिसमें किसी ख़ास इलाक़े की बोली, रीति-रिवाज़, खान-पान, खेल और लोक-गीत जीवित हो उठें। आगे चलकर फणीश्वरनाथ रेणु और नागार्जुन ने इसी परंपरा को और आगे बढ़ाया।
इस अंश में तीस के दशक के एक गाँव का जीवन है। कथा एक छोटे बच्चे की आँखों से कही गई है, जो बड़ा होकर अपने बचपन को याद कर रहा है। इसीलिए भाषा में बच्चों जैसी शरारत भी है और बड़ों जैसी समझ भी। पढ़ते हुए लगता है, जैसे हम उसी चबूतरे पर, उन्हीं बच्चों के बीच बैठे हों।
तारकेश्वरनाथ उर्फ़ भोलानाथ: पिता का साया
कथावाचक बचपन से ही पिता के बहुत क़रीब था। माँ से उसका रिश्ता लगभग दूध पीने तक सीमित था, बाक़ी सारा समय वह पिता के साथ बिताता। रात को वह बाहर की बैठक में पिता के पास ही सोता। सुबह-सुबह पिता जब उठकर नहाते और पूजा पर बैठते, तो बच्चे को भी साथ उठाते, नहलाते और पूजा पर बिठा लेते।
पूजा के समय बच्चा ज़िद करता कि उसके माथे पर भी भभूत का तिलक लगे। पिता कभी हँसकर, कभी थोड़ा झुँझलाकर और कभी हल्की डाँट के साथ उसके चौड़े माथे पर त्रिपुंड बना देते। बच्चे के सिर पर लंबी जटाएँ थीं। भभूत लगते ही वह पूरा छोटा-सा शिव-भक्त, यानी बम-भोला, दिखने लगता।
इसीलिए पिता उसे प्यार से भोलानाथ कहकर बुलाते थे। उसका असली नाम तारकेश्वरनाथ था, पर घर में भोलानाथ ही चलता था। बच्चा पिता को बाबू जी कहता और माँ को मइयाँ। बाबू जी जब रामायण पढ़ते, तो भोलानाथ उनकी बग़ल में बैठकर आईने में अपना चेहरा देखता रहता। जैसे ही बाबू जी उसकी तरफ़ देखते, वह शरमाकर मुस्कुराता और आईना नीचे रख देता। बाबू जी भी मुस्कुरा उठते। ऐसे छोटे-छोटे पल इस रिश्ते की मिठास दिखाते हैं।
राम-नाम, गंगा और मछलियाँ
पूजा पूरी होने के बाद बाबू जी राम-नाम लिखने बैठते। उनके पास एक बही थी, जिसमें वे रोज़ एक हज़ार बार राम का नाम लिखते, और फिर उसे पाठ वाली पोथी के साथ बाँधकर रख देते। इसके बाद वे काग़ज़ की छोटी-छोटी पर्चियों पर पाँच सौ बार राम-नाम लिखते। इन पर्चियों को आटे की गोलियों में लपेटा जाता।
फिर बाबू जी ये गोलियाँ लेकर गंगा की ओर निकलते। भोलानाथ इस यात्रा में भी उनके कंधे पर सवार रहता। गंगा के किनारे बाबू जी एक-एक गोली पानी में डालते, और मछलियाँ उन्हें खाने आतीं। बच्चा कंधे पर बैठा-बैठा यह सब देखता और ख़ूब हँसता।
लौटते समय रास्ते में झुके हुए पेड़ों की डालियाँ मिलतीं। बाबू जी बच्चे को उन पर बिठाकर झूला झुलाते। इस पूरे प्रसंग में दो बातें साफ़ दिखती हैं। पहली, बाबू जी की गहरी धार्मिकता और जीवों के प्रति दया। दूसरी, उनका बच्चे को हर काम में साथ रखना। पूजा भी, गंगा-यात्रा भी और झूला भी, बच्चे का पूरा संसार पिता के इर्द-गिर्द घूमता है।
कुश्ती, मूँछें और खट्टे-मीठे चुंबन
बाबू जी कभी-कभी भोलानाथ से कुश्ती भी लड़ते। वे जान-बूझकर ढीले पड़ जाते, ताकि बच्चे का हौसला बढ़े। बच्चा उन्हें पटक देता, और वे पीठ के बल चित हो जाते। फिर भोलानाथ उनकी छाती पर चढ़ बैठता और उनकी लंबी मूँछें खींचने लगता।
बाबू जी हँसते-हँसते उसके हाथ मूँछों से छुड़ाते और उन्हीं हाथों को चूम लेते। फिर वे उससे खट्टा और मीठा चुंबन माँगते। बच्चा बारी-बारी से अपना बायाँ और दायाँ गाल आगे कर देता। बाएँ गाल का खट्टा चुंबन लेने के बाद जब बाबू जी दाएँ गाल का मीठा चुंबन लेते, तो अपनी खुरदुरी दाढ़ी-मूँछ उसके कोमल गाल पर गड़ा देते।
बच्चा चिढ़कर फिर उनकी मूँछें नोचने लगता। इस पर बाबू जी झूठ-मूठ रोने का नाटक करते, और भोलानाथ दूर खड़ा होकर खिलखिलाकर हँसता। यह दृश्य बताता है कि उस समय के एक पिता भी बच्चे के साथ बच्चा बन जाते थे। उनके प्यार में कोई औपचारिकता नहीं, बस खुला खेल और हँसी है। कई घरों में पिता को सख़्त माना जाता है, पर यहाँ पिता सबसे प्यारे साथी हैं।
दो ढंग से खाना: बाबू जी का कटोरा, मइयाँ के बड़े कौर
हँसी-ठिठोली के बाद दोनों घर लौटते, और रसोई में साथ खाने बैठते। बाबू जी अपने हाथ से फूल के कटोरे में दूध और भात मिलाकर भोलानाथ को खिलाते। जब बच्चे का पेट भर जाता, तब मइयाँ आतीं और ज़िद करतीं कि वह थोड़ा और खाए।
मइयाँ बाबू जी से शिकायत करतीं कि वे बच्चे के मुँह में चार-चार दानों के छोटे कौर देते हैं। इससे बच्चा थोड़ा खाकर ही समझ लेता है कि बहुत खा लिया। उनका मानना था कि बच्चे को भरपूर कौर खिलाने चाहिए। वे एक कहावत भी सुनातीं, जिसका भाव था कि बड़ा कौर खाने वाला ही दुनिया में अपनी जगह बनाता है। वे यह भी कहतीं कि मर्द क्या जानें बच्चों को कैसे खिलाया जाता है, और माँ के हाथ से खाकर ही बच्चे का पेट भरता है।
इसके बाद मइयाँ थाली में दही-भात मिलातीं, और हर कौर को तोता, मैना, कबूतर, हंस या मोर का नाम देतीं। वे कहतीं कि जल्दी खा लो, वरना ये चिड़ियाँ उड़ जाएँगी। भोलानाथ इतनी तेज़ी से कौर निगलता कि चिड़ियों को उड़ने का मौक़ा ही न मिलता। माँ की यह तरकीब आज भी बहुत-से घरों में आज़माई जाती है।
तेल, काजल और छोटा कन्हैया
खाना ख़त्म होते ही बाबू जी कहते कि अब तुम राजा हो, जाओ खेलो। भोलानाथ उछलता-कूदता, रस्सी से बँधा लकड़ी का घोड़ा उठाता और नंगे बदन गली में भाग जाता। पर कभी-कभी मइयाँ उसे बीच में ही पकड़ लेतीं।
फिर बच्चा कितना भी छटपटाए, मइयाँ उसके सिर पर एक चुल्लू सरसों का तेल डाल ही देतीं। भोलानाथ रोने लगता, और बाबू जी मइयाँ पर नाराज़ होते। पर मइयाँ तेल से सिर तर करके और उबटन लगाकर ही छोड़तीं। इसके बाद वे उसकी नाभि और माथे पर काजल की बिंदी लगातीं, चोटी गूँथकर उसमें फूलदार डोरी बाँधतीं, और रंगीन कुर्ता-टोपी पहना देतीं।
अब भोलानाथ पूरा कन्हैया लगने लगता। वह सिसकते हुए बाबू जी की गोद में बाहर आता। यह प्रसंग माँ की चिंता और ममता को दिखाता है। तेल, उबटन और काजल उस समय बच्चे की सेहत और नज़र से बचाव के लिए ज़रूरी माने जाते थे। बच्चा रोए तो भी माँ अपना फ़र्ज़ नहीं छोड़ती, क्योंकि उसका प्यार केवल लाड़ नहीं, देखभाल भी है।
Concepts and terms
किसी लंबे उपन्यास से लिया गया एक हिस्सा, जो अपने-आप में पूरी तस्वीर देता है।
किसी अंचल या क्षेत्र की बोली, रहन-सहन और लोक-संस्कृति का सजीव चित्रण।
माता-पिता का अपनी संतान के प्रति कोमल स्नेह।
माथे पर भस्म या चंदन से बनी तीन आड़ी रेखाओं वाला तिलक।
बोलचाल और गाँव की बोली से आए शब्द, जैसे मइयाँ, लिलार, महतारी, सानना।
सावधान
भ्रम और सच
करके देखो
Title:
मेरे घर के लाड़-प्यार की डायरी
Safety:
किसी की निजी बात उसकी अनुमति के बिना कक्षा में मत पढ़िए।
What You Notice:
आप पाएँगे कि समय बदलने पर भी माता-पिता के प्यार के तरीक़े बहुत कुछ वैसे ही हैं।
Did you know
देहाती दुनिया सन् 1926 में छपा था, और इसे हिंदी के शुरुआती आंचलिक उपन्यासों में गिना जाता है।
त्रिपुंड माथे पर लगाई जाने वाली तीन आड़ी रेखाएँ हैं, जो प्रायः शिव-भक्त भस्म या चंदन से बनाते हैं।
आंचलिक रचना किसी ख़ास क्षेत्र की बोली, रीति-रिवाज़, खान-पान और लोक-जीवन को केंद्र में रखती है।
Memory tricks
पिता के पाँच साथ: पू-गं-झू-कु-भो — पूजा, गंगा, झूला, कुश्ती, भोजन। भोलानाथ का दिन इन्हीं में बीतता था।
Practice MCQs with answers (25)
- A रेणु का मैला आँचल
- B देहाती दुनिया
- C गोदान
- D बलचनमा
Show answer
Why:
शिवपूजन सहाय।
- A शहर के बड़े दफ़्तरों और मशीनों का वर्णन
- B विदेश यात्रा
- C गाँव की बोली, खेल और रीति-रिवाज़
- D युद्ध की कहानी
Show answer
Why:
अंचल।
- A बचपन याद करते कथावाचक की
- B गाँव के बूढ़े पुरोहित और गुरु जी की
- C माँ की
- D मूसन तिवारी की
Show answer
Why:
मैं-शैली।
- A भोलानाथ
- B बैजू
- C मूसन
- D तारकेश्वरनाथ
Show answer
Why:
घर का नाम अलग।
- A वह गाँव का सबसे सीधा और भोला बच्चा माना जाता था
- B वह मंदिर में रहता था
- C भभूत और जटाओं से वह बम-भोला लगता था
- D उसका जन्म शिवरात्रि पर हुआ
Show answer
Why:
त्रिपुंड।
- A केवल रात में सोने तक
- B दूध पीने तक
- C केवल नहाने तक
- D केवल खेल तक
Show answer
Why:
पिता के अंग।
- A पूजा-पाठ से गहरी चिढ़ और उदासी
- B डर
- C घमंड
- D बाल-सुलभ भोलापन
Show answer
Why:
मुस्कान।
- A धार्मिकता और जीव-दया
- B पैसे बचाने की आदत और कंजूसी
- C मछली पकड़ने का शौक़
- D आलस
Show answer
Why:
राम-नाम।
- A नाव में
- B पिता के कंधे पर
- C घोड़े पर
- D किनारे की सीढ़ी पर
Show answer
Why:
हँसता।
- A उनका सचमुच बहुत कमज़ोर और बीमार होना
- B खेल से ऊब
- C बच्चे का उत्साह बढ़ाना
- D बच्चे से डर
Show answer
Why:
हौसला।
- A बच्चे के साथ बच्चा बन जाने वाला
- B कठोर अनुशासन रखने वाला और ग़ुस्सैल
- C उदासीन
- D चिंतित
Show answer
Why:
नकली रोना।
- A बाबू जी बच्चे को बहुत ज़्यादा मिर्च वाला खाना देते थे
- B बाबू जी जल्दी में थे
- C बाबू जी खाना गिरा देते थे
- D छोटे कौर से बच्चा कम खाकर भी भरा मान लेता था
Show answer
Why:
चार-चार दाने।
- A बच्चे को कम खाना चाहिए, वरना वह आलसी बनेगा
- B भरपूर खाने वाला बच्चा जीवन में आगे बढ़ेगा
- C खाना बर्बाद होता है
- D चिड़ियाँ भूखी हैं
Show answer
Why:
ठौर।
- A चिड़ियों के नामों से
- B देवताओं के नामों से
- C फलों के नामों से
- D गाँव वालों के नामों से
Show answer
Why:
तोता, मैना।
- A चिड़ियाँ सचमुच थाली से उड़कर भाग जाती थीं
- B बच्चा चिड़ियों से डरता था
- C खेल-खेल में बच्चा जल्दी और ज़्यादा खा लेगा
- D मइयाँ चिड़ियाँ पालती थीं
Show answer
Why:
तरकीब।
- A पिता
- B दादी
- C बहन
- D माता
Show answer
Why:
लोक-शब्द।
- A अब पढ़ने बैठो
- B अब सो जाओ
- C अब तुम राजा हो
- D अब पूजा करो
Show answer
Why:
काठ का घोड़ा।
- A बच्चे को सताने का शौक़ और कठोरता
- B देखभाल भरी ममता
- C जल्दबाज़ी
- D लापरवाही
Show answer
Why:
सेहत की चिंता।
- A बच्चे को स्कूल में ज़्यादा अंक दिलवाना
- B बच्चे को डराना
- C खेल में जिताना
- D बच्चे को बुरी नज़र से बचाना
Show answer
Why:
लोक-विश्वास।
- A कन्हैया
- B बम-भोला
- C राजा
- D सिपाही
Show answer
Why:
चोटी और फूलदार डोरी।
- A कथा को पढ़ना बहुत कठिन और उबाऊ बनता है
- B कथा में गाँव की असलियत आती है
- C कथा शहरी लगती है
- D कोई प्रभाव नहीं
Show answer
Why:
आंचलिक भाषा।
- A गाल
- B ठोड़ी
- C माथा
- D कंधा
Show answer
Why:
त्रिपुंड।
- A भोजन, गंगा-यात्रा, पूजा, राम-नाम लेखन
- B गंगा-यात्रा, भोजन, पूजा, कुश्ती
- C कुश्ती, पूजा, भोजन, गंगा-यात्रा
- D पूजा, राम-नाम लेखन, गंगा-यात्रा, भोजन
Show answer
Why:
सुबह से।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
पिता के अंग।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C I, II और III तीनों
- D केवल I और III
Show answer
Why:
बड़े कौर मइयाँ के।
Important short questions (7)
यह शिवपूजन सहाय के उपन्यास देहाती दुनिया का अंश है। इसे हिंदी के शुरुआती आंचलिक उपन्यासों में गिना जाता है, जिसमें गाँव की बोली और जीवन सजीव है।
पूजा के समय पिता उसके माथे पर भभूत का त्रिपुंड लगाते थे। लंबी जटाओं के साथ वह छोटा बम-भोला लगता, इसलिए पिता उसे भोलानाथ कहने लगे।
वे तड़के नहाकर पूजा करते, रामायण पढ़ते और बही में राम-नाम लिखते। फिर राम-नाम की पर्चियाँ आटे की गोलियों में लपेटकर गंगा की मछलियों को खिलाते।
पिता जान-बूझकर हारकर बच्चे का हौसला बढ़ाते हैं। मूँछें खिंचवाकर भी वे हँसते रहते हैं, यानी वे स्नेही, धैर्यवान और विनोदी हैं।
बाबू जी कटोरे से छोटे-छोटे कौर खिलाते थे। मइयाँ भरपूर कौर बनाकर चिड़ियों के नाम लेते हुए जल्दी-जल्दी खिलाती थीं, ताकि बच्चा पेट भर खाए।
वे सिर में सरसों का तेल डालकर उबटन लगातीं, नाभि और माथे पर काजल की बिंदी लगातीं। फिर चोटी गूँथकर फूलदार डोरी बाँधतीं और रंगीन कुर्ता-टोपी पहनातीं।
मइयाँ का अर्थ है माँ, और लिलार का अर्थ है माथा। ऐसे शब्द कहानी को गाँव की असली बोली से जोड़ते हैं।
Long answer questions (3)
भोलानाथ का अपने पिता से बहुत गहरा रिश्ता था। वह रात को उनके साथ बैठक में सोता, और सुबह उन्हीं के साथ उठकर नहाता। पूजा के समय पिता उसके माथे पर त्रिपुंड लगाते और उसे भोलानाथ कहते। गंगा जाते समय वह उनके कंधे पर बैठा रहता, और लौटते समय वे उसे पेड़ की डाल पर झुलाते। घर पर पिता उससे कुश्ती लड़ते और जान-बूझकर हार जाते। वे खट्टे-मीठे चुंबन माँगते और नकली रोना रोकर उसे हँसाते। अपने हाथ से उसे खाना भी खिलाते। इस तरह पिता उसके पिता भी थे और सबसे प्यारे साथी भी।
पाठ में पिता का प्यार खेल और साथ से भरा है। वे बच्चे के साथ पूजा करते, घूमते, कुश्ती लड़ते और हँसाते हैं। माँ का प्यार देखभाल और चिंता से भरा है। वे मानती हैं कि बच्चे को भरपूर खाना चाहिए, इसलिए बड़े कौर बनाकर चिड़ियों के नाम से खिलाती हैं। बच्चा रोए तो भी वे सिर में तेल डालती हैं, काजल लगाती हैं और उसे सजाती हैं। पिता बच्चे की ख़ुशी देखते हैं, जबकि माँ उसकी सेहत और भलाई। दोनों का प्यार सच्चा है, बस उसके रंग अलग हैं।
आंचलिक रचना में किसी इलाक़े की बोली, रीति-रिवाज़ और लोक-जीवन जीवित हो उठते हैं। इस पाठ में यह सब साफ़ दिखता है। भाषा में मइयाँ, बाबू जी, लिलार, महतारी और अफर जाना जैसे पूर्वी बोली के शब्द हैं। रीति-रिवाज़ भी गाँव के हैं, जैसे भभूत का त्रिपुंड, राम-नाम की बही, और मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाना। खान-पान में गोरस-भात और दही-भात है। माँ का सरसों का तेल डालना और काजल की बिंदी लगाना भी गाँव की पुरानी मान्यताओं से जुड़ा है। इन सबसे तीस के दशक का एक पूरा गाँव आँखों के सामने आ जाता है।
Flashcards (17)
Play this topic
- शब्द और अर्थ
- बाबू जी या मइयाँ?
- सही या भ्रम
- भोलानाथ की सुबह
- झटपट उत्तर
खेल, शरारतें और माँ के आँचल की छाँव
भोलानाथ और उसके साथी मिट्टी, ठीकरों और टूटी चीज़ों से दुकान, भोज, बरात और खेती के खेल रचते हैं। शरारतों के बाद एक दिन साँप से डरकर भागा भोलानाथ पिता को छोड़ माँ के आँचल में छिपता है।
What you will be able to do
- भोलानाथ और उसके साथियों के खेलों तथा खेल-सामग्री का वर्णन कर सकेंगे।
- बच्चों की तुकबंदियों और लोक-गीतों की भूमिका पहचान सकेंगे।
- मूसन तिवारी, गुरु जी और चूहे-साँप वाले प्रसंगों से बच्चों के स्वभाव को समझा सकेंगे।
- संकट के समय बच्चे के माँ की शरण में जाने का कारण स्पष्ट कर सकेंगे।
- शीर्षक की सार्थकता और तब तथा आज की ग्रामीण संस्कृति के अंतर पर विचार लिख सकेंगे।
Key points
बच्चे चबूतरे के कोने को नाटक-घर और बाबू जी की नहाने वाली चौकी को रंगमंच बना लेते थे।
मिठाई की दुकान में ढेले, पत्ते, गीली मिट्टी और घड़े के टुकड़े ही लड्डू, पूरी, जलेबी और बताशे बन जाते थे।
घरौंदे और भोज के खेल में पानी घी, धूल आटा और बालू चीनी बनती; बाबू जी पंगत में बैठते तो बच्चे भाग जाते।
बरात के खेल में कनस्तर बाजा, टूटी चूहेदानी पालकी और आम की गुठली शहनाई बनती थी।
खेती के खेल में चबूतरा खेत, कंकड़ बीज और गली कुआँ बन जाती; फ़सल कटते ही बच्चे गीत गाते।
साथियों को देखते ही भोलानाथ रोना भूल जाता, क्योंकि बच्चों का मन खेल और मंडली में तुरंत रम जाता है।
बूढ़े दूल्हे और मूसन तिवारी को चिढ़ाने जैसी शरारतों पर बच्चों को डाँट और गुरु जी की सज़ा भी मिली।
चूहे के बिल में पानी डालते समय साँप निकल आया, और बच्चे गिरते-पड़ते, लहूलुहान होकर भागे।
डरा हुआ भोलानाथ बाबू जी की पुकार अनसुनी कर सीधे मइयाँ के आँचल में छिपा; माँ ही उसकी सबसे बड़ी शरण बनी।
Full explanation
साथियों का झुंड: रोना भूलकर खेल
सज-धजकर, सिसकता हुआ भोलानाथ जब बाबू जी की गोद में बाहर आता, तो गली में उसके साथियों का झुंड उसका इंतज़ार कर रहा होता। उन्हें देखते ही वह रोना भूल जाता और गोद से उतरकर उनकी टोली में घुस जाता।
बच्चों का स्वभाव ही ऐसा होता है। उनका दुख ज़्यादा देर नहीं टिकता, और साथियों का साथ मिलते ही उनका मन खेल में रम जाता है। हमउम्र दोस्तों के साथ बच्चे को जो आज़ादी और बराबरी मिलती है, वह बड़ों के साथ नहीं मिलती। इसीलिए भोलानाथ कुछ ही पलों में सब कुछ भूलकर तमाशे में डूब जाता है।
और ये तमाशे भी साधारण नहीं थे। बच्चे तरह-तरह के नाटक रचते थे। चबूतरे का एक कोना उनका नाटक-घर बन जाता, और बाबू जी जिस छोटी चौकी पर बैठकर नहाते थे, वही उनका रंगमंच बन जाती। इन बच्चों के पास न महँगे खिलौने थे, न बाज़ार की कोई चीज़। फिर भी उनकी कल्पना ने हर मामूली चीज़ को खेल का हिस्सा बना दिया।
मिठाई की दुकान और घरौंदे का भोज
एक खेल था मिठाई की दुकान। सरकंडे के खंभों पर काग़ज़ का छोटा-सा शामियाना तानकर दुकान सजती। ढेले लड्डू बनते, पत्ते पूरी-कचौरी, गीली मिट्टी जलेबी, और फूटे घड़े के टुकड़े बताशे। ठीकरे तौलने के बाट बनते, और जस्ते के छोटे टुकड़े पैसे। बच्चे ख़ुद ही दुकानदार थे और ख़ुद ही ग्राहक। बाबू जी भी कभी-कभी मज़े के लिए दो-चार चीज़ें ख़रीद लेते।
थोड़ी देर बाद दुकान समेटकर घरौंदा बनता। धूल की मेड़ से दीवार उठती और तिनकों से छप्पर। दातून के खंभे लगते, और माचिस की डिबियों से किवाड़ बनते। घड़े का मुँह चूल्हा बनता, और दीया कड़ाही। कलछी का काम पूजा में इस्तेमाल होने वाली बाबू जी की आचमनी से लिया जाता।
फिर भोज की तैयारी होती। पानी घी बनता, धूल आटा, और बालू चीनी। बच्चे ख़ुद ही भोज पकाते और ख़ुद ही पंगत में खाने बैठते। जब पंगत जम जाती, तो बाबू जी चुपचाप आकर कतार के आख़िर में बैठ जाते। उन्हें देखते ही बच्चे हँसते हुए घरौंदा तोड़कर भाग जाते। बाबू जी भी हँसी से लोट-पोट होकर पूछते कि अगला भोज कब होगा। इस प्रसंग में बड़ों का बच्चों के खेल में चुपचाप शामिल होना बहुत प्यारा लगता है।
बरात और खेती: बड़ों की दुनिया की नक़ल
कभी-कभी बच्चे बरात भी निकालते। कनस्तर तंबूरे की तरह बजता, आम की गुठली घिसकर शहनाई बनती, और टूटी चूहेदानी पालकी। कोई बच्चा समधी बनकर बकरे पर सवार हो जाता। बरात चबूतरे के एक कोने से चलकर दूसरे कोने तक जाती। वहाँ गोबर से लिपा, आम और केले की टहनियों से सजा एक छोटा आँगन होता, जिसमें मिट्टी का कलश रखा रहता।
लौटते समय एक छोटी खाट पर लाल कपड़े का पर्दा डालकर दुल्हन को बिठाया जाता। जैसे ही बाबू जी पर्दा उठाकर दुल्हन का मुँह देखने की कोशिश करते, सारे बच्चे हँसकर भाग खड़े होते।
फिर खेती का खेल शुरू होता। चबूतरे के किनारे घिरनी गाड़ दी जाती, और नीचे की गली कुआँ बन जाती। मूँज की रस्सी में मिट्टी का छोटा बर्तन बाँधकर लटकाया जाता, और दो बच्चे बैल बनकर पानी खींचते। चबूतरा खेत बनता, कंकड़ बीज, और लकड़ी का डंडा हल। बड़ी लगन से खेत जोता, बोया और सींचा जाता। फ़सल तुरंत तैयार हो जाती और बच्चे गीत गाते हुए उसे काट लेते। फिर पैरों से रौंदकर, मिट्टी के कसोरे से सूप का काम लेकर अनाज ओसाया और दीए के तराज़ू पर तौला जाता। तभी बाबू जी पूछ बैठते कि इस बार फ़सल कैसी रही, और बच्चे खेत-खलिहान छोड़कर भाग जाते।
इन खेलों में बच्चे बड़ों की दुनिया की नक़ल करते हैं: दुकान, भोज, शादी और खेती। खेल-खेल में वे गाँव के पूरे जीवन को सीख लेते हैं।
तुकबंदियाँ और शरारतें
इन बच्चों के खेल गीतों और तुकबंदियों से भरे थे। ददरी के मेले जाते लोगों को देखकर वे कूद-कूदकर एक तुकबंदी गाते। ओहार वाली पालकी देखते, तो दुल्हन के बारे में चिढ़ाने वाली तुकबंदी चिल्लाते। एक बार इसी पर एक बूढ़े दूल्हे ने उन्हें दूर तक दौड़ाकर ढेले मारे। लेखक बड़े मज़ाकिया ढंग से उस दूल्हे की घोड़े जैसी सूरत याद करता है।
आम के मौसम में आँधी आती, तो बच्चे बाग़ की ओर दौड़ते और टपके हुए रसीले आम चूसते। एक दिन तेज़ आँधी के साथ घनघोर बादल घिरे, बिजली चमकी और मूसलाधार बारिश हुई। बच्चे बारिश रोकने के लिए एक तुकबंदी गाने लगे, पर बारिश और तेज़ हो गई। वे पेड़ की जड़ से ऐसे चिपक गए, जैसे कुत्ते के कान में छोटे कीड़े चिपके रहते हैं। बारिश थमी तो बाग़ में बिच्छू दिखे, और सब डरकर भागे।
रास्ते में बूढ़े मूसन तिवारी मिले, जिन्हें कम दिखता था। टोली का सबसे ढीठ लड़का बैजू उन्हें चिढ़ाने लगा, और बाक़ी बच्चे भी सुर मिलाने लगे। तिवारी जी ने उन्हें दौड़ाया, और न पकड़ पाने पर सीधे पाठशाला जा पहुँचे। गुरु जी ने चार लड़कों को उन्हें पकड़ लाने भेजा। बैजू तो भाग निकला, पर भोलानाथ पकड़ा गया और गुरु जी ने उसकी अच्छी ख़बर ली। बाबू जी दौड़े आए, गुरु जी से विनती करके उसे घर ले चले। रास्ते में फिर वही दोस्त गाते मिले, और भोलानाथ रोना भूलकर उनमें जा मिला।
चूहे का बिल, साँप और भगदड़
दोस्तों के साथ भोलानाथ मक्के के खेत की ओर भागा, जहाँ चिड़ियाँ दाना चुग रही थीं। बच्चे उन्हें पकड़ने दौड़े, पर एक भी हाथ न आई। भोलानाथ दूर खड़ा होकर चिड़ियों को भरपेट खाने को कहने वाला एक गीत गाता रहा। गाँव के बड़े यह देखकर हँसते और कहते कि बच्चों के लिए चिड़िया की जान भी खेल है। लोक-कहावत भी है कि बच्चे और बंदर दूसरे का दर्द नहीं समझते।
फिर बच्चे एक टीले पर पहुँचे और चूहों के बिल में पानी डालने लगे। बहुत देर तक नीचे से ऊपर पानी उलीचते-उलीचते सब थक गए। तभी बिल से एक साँप निकल आया। लेखक मज़ेदार ढंग से कहता है कि गणेश जी के चूहे को बचाने शिव जी का साँप आ पहुँचा।
अब तो भगदड़ मच गई। बच्चे चीखते-चिल्लाते भागे। कोई मुँह के बल गिरा, कोई पीठ के बल। कुछ के सिर फूटे, कुछ के दाँत टूट गए। भोलानाथ का पूरा शरीर लहूलुहान हो गया, और काँटे चुभ-चुभकर उसके तलवे छलनी कर गए। यह प्रसंग बताता है कि बचपन की शरारतें कभी-कभी कितनी भारी पड़ सकती हैं।
माता का अँचल: संकट में सबसे बड़ी शरण
भोलानाथ बेतहाशा दौड़ता हुआ घर पहुँचा। बाबू जी बरामदे में बैठे हुक्का पी रहे थे। उन्होंने उसे बार-बार पुकारा, पर वह उनकी आवाज़ अनसुनी करके सीधे भीतर मइयाँ के पास दौड़ गया। मइयाँ चावल साफ़ कर रही थीं। भोलानाथ उनकी गोद में जाकर उनके आँचल में छिप गया।
बेटे को डर से काँपते देखकर मइयाँ ज़ोर से रो पड़ीं और सारा काम छोड़ दिया। वे घबराकर डर का कारण पूछने लगीं। कभी उसे सीने से कसकर लगातीं, कभी अपने आँचल से उसका शरीर पोंछकर उसे चूमतीं। झटपट हल्दी पीसकर घावों पर लगाई गई, और घर में हलचल मच गई। भोलानाथ बस धीमे से साँप-साँप बुदबुदाता रहा। उसका शरीर काँप रहा था, रोंगटे खड़े थे, और आँखें खुलने को तैयार न थीं।
तभी बाबू जी दौड़ते हुए आए और बेटे को अपनी बाँहों में उठाना चाहा। पर भोलानाथ ने माँ का आँचल नहीं छोड़ा। लेखक उस आँचल को प्रेम और शांति का शामियाना कहता है। यहीं पाठ का सबसे गहरा सच सामने आता है। बच्चा भले ही दिन भर पिता के साथ खेले, पर संकट के क्षण में उसे जो सुरक्षा और सुकून चाहिए, वह माँ की गोद में ही मिलता है। इसीलिए शीर्षक माता का अँचल पूरी कहानी का सार है।
Concepts and terms
आसपास की बेकार या सस्ती चीज़ें, जिन्हें बच्चे कल्पना से खिलौना बना लेते हैं।
तुक मिलाकर बनाई गई छोटी, लयदार पंक्तियाँ, जिन्हें बच्चे खेलते समय गाते हैं।
गाँव का रहन-सहन, खेल, मेल-जोल, रीति-रिवाज़ और लोक-गीत।
संकट के समय सुरक्षा और सांत्वना देने वाली जगह। भोलानाथ के लिए यह माँ का आँचल है।
शीर्षक का कहानी के केंद्रीय भाव या चरम बिंदु से गहरा जुड़ाव।
सावधान
भ्रम और सच
मिलाकर देखो
Scenario:
आठ साल का अयान रोज़ शाम पिता के साथ पार्क में क्रिकेट खेलता था। पिता उसे बल्लेबाज़ी सिखाते, उसकी हर अच्छी शॉट पर ताली बजाते, और कभी-कभी जान-बूझकर आउट होकर उसे जिताते थे।
एक दिन पार्क में खेलते हुए एक आवारा कुत्ता भौंकता हुआ उसकी ओर दौड़ा। अयान डरकर भागा, गिरा और उसके घुटने छिल गए। पिता पास ही खड़े थे और उसे पुकार रहे थे।
पर अयान रोता हुआ सीधा घर भागा और माँ से लिपट गया। माँ ने घाव धोकर दवा लगाई और देर तक उसे गोद में बिठाए रखा। पिता घर आए, तो मुस्कुराकर बोले, खेल में मैं, पर डर में माँ!
Activity:
अपने घर के बड़ों से पूछिए कि बचपन में डर लगने पर वे किसके पास जाते थे, और क्यों। उत्तरों को तालिका में लिखकर कक्षा में चर्चा कीजिए।
Analysis:
माता और पिता, दोनों का प्यार बच्चे के लिए ज़रूरी है, पर उनके रंग अलग होते हैं। यही बात शिवपूजन सहाय ने लगभग सौ साल पहले माता का अँचल में कही थी, और आज भी उतनी ही सच है।
Did you know
ज्योनार का अर्थ है भोज या दावत, और जीमना का अर्थ है भोजन करना। दोनों शब्द आज भी कई इलाक़ों की बोली में चलते हैं।
ओहार पालकी या डोली पर पर्दे के लिए डाला जाने वाला कपड़ा है। पुराने समय में दुल्हन ओहार वाली डोली में ससुराल जाती थी।
ददरी का मेला बलिया (उत्तर प्रदेश) में गंगा किनारे लगने वाला एक बहुत पुराना पशु-मेला है।
Memory tricks
चार खेल: दु-घ-ब-खे — दुकान, घरौंदा-भोज, बरात, खेती।
Practice MCQs with answers (25)
- A साथी उसे डराकर ज़बरदस्ती चुप करा देते थे
- B उसे भूख लगती थी
- C बाबू जी डाँटते थे
- D साथियों में उसका मन तुरंत रम जाता था
Show answer
Why:
बाल-स्वभाव।
- A गाँव की चौपाल पर बना बड़ा मंच
- B मंदिर का आँगन
- C बाबू जी की नहाने वाली चौकी
- D खाट
Show answer
Why:
चबूतरा।
- A हिसाब-किताब की गहरी और पक्की समझ
- B कल्पनाशीलता
- C लालच
- D आलस
Show answer
Why:
मिट्टी की जलेबी।
- A पानी से
- B बालू से
- C धूल से
- D मिट्टी से
Show answer
Why:
ज्योनार।
- A बच्चों के खेल को बिगाड़ने की इच्छा
- B भूख
- C नाराज़गी
- D बच्चों के खेल में स्नेह भरी भागीदारी
Show answer
Why:
फिर कब भोज होगा।
- A घिसी हुई आम की गुठली से
- B बाँस की खोखली नली से
- C काग़ज़ से
- D पत्ते से
Show answer
Why:
अमोला।
- A केवल समय बर्बाद कर रहे थे और कुछ नहीं
- B पैसे कमा रहे थे
- C बड़ों की दुनिया की नक़ल करके सीख रहे थे
- D बड़ों को चिढ़ा रहे थे
Show answer
Why:
खेल-खेल में।
- A गाँव का पुराना बड़ा पोखर
- B चबूतरे के नीचे की गली
- C घड़ा
- D गड्ढा
Show answer
Why:
घिरनी।
- A बच्चों का बाबू जी से बहुत ज़्यादा डरना
- B फ़सल ख़राब होना
- C बड़ों के आते ही खेल का जादू टूटना
- D भूख
Show answer
Why:
हँसते हुए भागना।
- A उन्हें स्कूल में यह गृहकार्य मिला था
- B बड़े मजबूर करते थे
- C पैसा मिलता था
- D लय से खेल में उत्साह और मज़ा आता है
Show answer
Why:
लोक-गीत।
- A बच्चों ने उसे चिढ़ाने वाली तुकबंदी गाई
- B बच्चों ने उसकी पालकी तोड़ दी थी
- C बच्चे आम चुरा रहे थे
- D बच्चे रास्ता रोक रहे थे
Show answer
Why:
ओहार।
- A जैसे दीवार पर छिपकली
- B जैसे कुत्ते के कान में किलनी
- C जैसे फूल पर भौंरा
- D जैसे पेड़ पर बेल
Show answer
Why:
अँठई।
- A बहुत अच्छा, साहसी और प्रशंसा के योग्य काम
- B बहादुरी
- C शरारत, जो बड़ों के प्रति अनादर बन गई
- D सेवा
Show answer
Why:
कम दिखता था।
- A बैजू
- B भोलानाथ
- C मूसन
- D तारकेश्वर
Show answer
Why:
नौ-दो ग्यारह।
- A ग़ुस्से में आकर और ज़्यादा डाँटना-फटकारना और पीटना
- B पुचकारना और गुरु जी से विनती करके घर लाना
- C अनदेखा करना
- D हँसना
Show answer
Why:
चिरौरी।
- A बच्चे चिड़ियों से बहुत प्यार करते हैं
- B चिड़ियाँ ख़तरनाक हैं
- C खेत ख़राब हुआ
- D बच्चे दूसरों का दर्द नहीं समझते
Show answer
Why:
पराई पीर।
- A गहरी और कठोर धार्मिक आस्था
- B हल्का हास्य
- C क्रोध
- D शोक
Show answer
Why:
वाहन।
- A शरारत कभी-कभी भारी पड़ती है
- B बच्चे खेल में हमेशा जीतते और ख़ुश रहते हैं
- C साँप बहुत ज़हरीला था
- D गाँव की सड़कें ख़राब थीं
Show answer
Why:
भगदड़।
- A गुरु जी के पास
- B बैजू के घर
- C बाग़ में
- D मइयाँ की गोद में
Show answer
Why:
आँचल।
- A पिता ने उसे घर से निकाल दिया था
- B माँ ने मिठाई दी थी
- C माँ की गोद में सहज सुरक्षा थी
- D पिता सो रहे थे
Show answer
Why:
ममता।
- A अधीर ममता
- B झुँझलाहट
- C डर से उपजा ग़ुस्सा
- D उदासीनता
Show answer
Why:
अधीर।
- A खेत
- B भोज
- C बाज़ार
- D मेला
Show answer
Why:
दावत।
- A दूल्हे की पगड़ी
- B शादी का बाजा
- C घोड़े की लगाम
- D पालकी का पर्दा
Show answer
Why:
डोली।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- B अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- C दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
शरण।
- A केवल I और II
- B केवल I और III
- C केवल II और III
- D I, II और III तीनों
Show answer
Why:
बैजू भागा।
Important short questions (7)
ढेले लड्डू, पत्ते पूरी-कचौरी, गीली मिट्टी जलेबी और घड़े के टुकड़े बताशे बनते। ठीकरे बाट और जस्ते के टुकड़े पैसे बनते थे।
भोलानाथ मिट्टी, ठीकरे, तिनके और टूटी चीज़ों से खेलता था, जो मुफ़्त थीं। हम बाज़ार के खिलौने, वीडियो-गेम और मोबाइल से खेलते हैं, जिन पर पैसा लगता है।
यह बहुत प्यारा लगा। वे पंगत में बैठकर या फ़सल का हाल पूछकर बच्चों को हँसाते थे, जिससे पता चलता है कि वे बच्चों का मन समझते थे।
तिवारी जी पाठशाला पहुँचे, और गुरु जी के भेजे लड़कों ने भोलानाथ को पकड़ लिया। गुरु जी ने उसे सज़ा दी, फिर बाबू जी विनती करके उसे घर ले गए।
बिल में पानी डालते समय उसमें से साँप निकल आया। भागते समय बच्चे गिरे, किसी का सिर फूटा, और भोलानाथ का शरीर लहूलुहान हो गया।
वे रो पड़ीं और काम छोड़कर डर का कारण पूछने लगीं। उसे सीने से लगाया, आँचल से पोंछकर चूमा, और घावों पर हल्दी लगवाई।
एक शीर्षक हो सकता है माँ की गोद। कारण यह कि पूरी कहानी इसी क्षण पर पहुँचती है, जब डरा हुआ बच्चा पिता को छोड़कर माँ की गोद में शरण लेता है।
Long answer questions (3)
भोलानाथ दिन भर पिता के साथ रहता था। वे उसके साथ पूजा करते, घूमते, खेलते और खाना खिलाते थे। फिर भी साँप से डरकर वह पिता की पुकार अनसुनी करके माँ के पास गया। इसका पहला कारण है माँ की सहज कोमलता। बच्चा जानता है कि माँ की गोद सबसे सुरक्षित जगह है। दूसरा कारण है माँ की ममता। मइयाँ उसे देखकर रो पड़ीं, सीने से लगाया और घावों पर हल्दी लगाई। तीसरा कारण यह कि पिता खेल के साथी थे, पर दर्द और डर में बच्चे को सांत्वना चाहिए थी। वह सांत्वना माँ ही दे सकती थीं।
पाठ के गाँव में बच्चे मिट्टी, ठीकरे और टूटी चीज़ों से सामूहिक खेल खेलते थे। गली, चबूतरा और बाग़ ही उनका खेल का मैदान था। आज गाँवों में भी मोबाइल और टीवी पहुँच गए हैं, इसलिए बच्चे बाहर कम और घर में ज़्यादा खेलते हैं। पहले लोग पैदल या बैलगाड़ी से मेले जाते थे, आज पक्की सड़कें, बसें और मोटरसाइकिलें हैं। कुएँ की जगह नल और हैंडपंप आ गए हैं, और खेती में ट्रैक्टर चलते हैं। पर कुछ चीज़ें घटी भी हैं, जैसे सामूहिक खेल, लोक-गीत और पड़ोसियों से मेल-जोल। सुविधाएँ बढ़ी हैं, पर सादगी कुछ कम हुई है।
पाठ में माता-पिता, दोनों का वात्सल्य बहुत सुंदर ढंग से दिखाया गया है। बाबू जी का प्यार साथ और खेल का है। वे बच्चे को पूजा पर बिठाते, कंधे पर गंगा ले जाते, कुश्ती में जान-बूझकर हारते और उसके खेलों में भी शामिल होते हैं। मार पड़ने पर वे दौड़कर पाठशाला पहुँचते हैं। मइयाँ का प्यार देखभाल का है। वे बच्चे को भरपूर खिलाती हैं, तेल-काजल लगाकर सजाती हैं, और डर के समय उसे आँचल में छिपाकर रो पड़ती हैं। दोनों का प्यार अलग रंग का है, पर दोनों में बच्चे की भलाई की चिंता है। यही सच्चा वात्सल्य है।
Flashcards (17)
Play this topic
- शब्द और अर्थ
- खेल की चीज़: असली रूप क्या?
- सही या भ्रम
- कहानी का क्रम (दूसरा भाग)
- झटपट उत्तर
Class 10 Hindi Chapter 13 — frequently asked questions
यह शिवपूजन सहाय के उपन्यास देहाती दुनिया का अंश है। इसे हिंदी के शुरुआती आंचलिक उपन्यासों में गिना जाता है, जिसमें गाँव की बोली और जीवन सजीव है।
पूजा के समय पिता उसके माथे पर भभूत का त्रिपुंड लगाते थे। लंबी जटाओं के साथ वह छोटा बम-भोला लगता, इसलिए पिता उसे भोलानाथ कहने लगे।
वे तड़के नहाकर पूजा करते, रामायण पढ़ते और बही में राम-नाम लिखते। फिर राम-नाम की पर्चियाँ आटे की गोलियों में लपेटकर गंगा की मछलियों को खिलाते।
ढेले लड्डू, पत्ते पूरी-कचौरी, गीली मिट्टी जलेबी और घड़े के टुकड़े बताशे बनते। ठीकरे बाट और जस्ते के टुकड़े पैसे बनते थे।
भोलानाथ मिट्टी, ठीकरे, तिनके और टूटी चीज़ों से खेलता था, जो मुफ़्त थीं। हम बाज़ार के खिलौने, वीडियो-गेम और मोबाइल से खेलते हैं, जिन पर पैसा लगता है।
यह बहुत प्यारा लगा। वे पंगत में बैठकर या फ़सल का हाल पूछकर बच्चों को हँसाते थे, जिससे पता चलता है कि वे बच्चों का मन समझते थे।
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