Class 10 Hindi Chapter 12: संस्कृति
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- Hindi
संस्कृति और सभ्यता: खोज की शक्ति और उसका फल
भदंत आनंद कौसल्यायन आग और सुई-धागे के उदाहरण से बताते हैं कि खोज करने की शक्ति संस्कृति है और उस खोज का फल सभ्यता। खोज करने वाला संस्कृत है, जबकि बिना मेहनत विरासत पाने वाला केवल सभ्य कहलाएगा।
What you will be able to do
- भदंत आनंद कौसल्यायन के जीवन, रचनाओं और हिंदी-सेवा का परिचय दे सकेंगे।
- सभ्यता और संस्कृति शब्दों के बारे में फैली उलझन का कारण बता सकेंगे।
- आग और सुई-धागे के उदाहरण से संस्कृति और सभ्यता का अंतर समझा सकेंगे।
- संस्कृत व्यक्ति और सभ्य व्यक्ति का भेद न्यूटन के उदाहरण से स्पष्ट कर सकेंगे।
- भौतिक प्रेरणा और ज्ञानेप्सा को खोज के दो स्रोतों के रूप में पहचान सकेंगे।
Key points
सन् 1905 में अंबाला ज़िले के सोहाना गाँव में जन्मे भदंत आनंद कौसल्यायन बचपन में हरनाम दास कहलाते थे।
वे बौद्ध भिक्षु और हिंदी के बड़े सेवक थे; वर्धा में वे लंबे समय तक गांधी जी के साथ रहे।
लेखक के अनुसार सभ्यता और संस्कृति ऐसे शब्द हैं, जिनका प्रयोग बहुत होता है पर अर्थ बहुत कम लोग समझते हैं।
भौतिक या आध्यात्मिक जैसे विशेषण जुड़ने से इन दोनों शब्दों का अर्थ और भी धुँधला हो जाता है।
जिस योग्यता या प्रेरणा से कोई खोज होती है, वह संस्कृति है; उस खोज से मिली चीज़ सभ्यता है।
नई चीज़ खोजने वाला संस्कृत है; उसकी संतान को वह चीज़ बिना प्रयास मिलती है, इसलिए वह सभ्य है, संस्कृत नहीं।
न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत खोजा, इसलिए वह संस्कृत था; आज का विद्यार्थी ज़्यादा जानकर भी उतना संस्कृत नहीं।
आग की खोज में भूख की प्रेरणा और सुई-धागे की खोज में सर्दी-गरमी से बचाव और सजने की इच्छा रही होगी।
भरे पेट वाला जो व्यक्ति तारों का रहस्य जानने को बेचैन रहता है, वह ज्ञानेप्सा से प्रेरित सच्चा संस्कृत मनीषी है।
Full explanation
भदंत आनंद कौसल्यायन: भिक्षु, यात्री और हिंदी-सेवी
भदंत आनंद कौसल्यायन सन् 1905 में पैदा हुए। उनका गाँव सोहाना था, जो उस समय के पंजाब के अंबाला ज़िले में पड़ता था। बचपन में उनका नाम हरनाम दास था। लाहौर के नेशनल कॉलेज से बी.ए. करने के बाद उन्होंने बौद्ध भिक्षु का जीवन अपनाया। उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया, और इसी सिलसिले में देश-विदेश की बहुत यात्राएँ कीं। गांधी जी के व्यक्तित्व का उन पर गहरा असर था, और वे वर्धा में लंबे समय तक उनके साथ रहे। सन् 1988 में उनका देहांत हुआ।
उनकी बीस से ज़्यादा पुस्तकें छपी हैं। इनमें जो भूल ना सका, भिक्षु के पत्र, रेल का टिकट, बहानेबाज़ी, कहाँ क्या देखा, आह! ऐसी दरिद्रता और यदि बाबा ना होते ख़ास हैं। बौद्ध दर्शन पर उन्होंने मौलिक ग्रंथ भी लिखे और अनुवाद भी किए। जातक कथाओं का उनका हिंदी अनुवाद सबसे ज़्यादा याद किया जाता है।
कौसल्यायन जी हिंदी के सच्चे सेवक थे। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा और हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग जैसी संस्थाओं के ज़रिए उन्होंने देश के भीतर और बाहर हिंदी को फैलाने का बड़ा काम किया। लगातार यात्राओं ने उन्हें बहुत तरह के अनुभव दिए, और इन्हीं अनुभवों ने उनके लेखन को समृद्ध बनाया। उनके निबंध, संस्मरण और यात्रा-वृत्तांत रोज़ की बोलचाल वाली सरल भाषा में हैं। यही कारण है कि गहरी बात भी उनके यहाँ आसानी से समझ में आ जाती है।
निबंध का प्रश्न: दो शब्द, बहुत-सी उलझन
संस्कृति एक विचार-प्रधान निबंध है। इसमें लेखक हमें एक ऐसे प्रश्न पर सोचने के लिए उकसाता है, जिसे हम अक्सर हल्के में ले लेते हैं। सभ्यता और संस्कृति, ये दोनों शब्द हम रोज़ सुनते हैं। अख़बार, भाषण और किताबें इनसे भरे रहते हैं। पर लेखक का कहना है कि जितना ज़्यादा इनका प्रयोग होता है, उतनी ही कम इनकी सही समझ है।
उलझन तब और बढ़ जाती है, जब इनके साथ तरह-तरह के विशेषण जोड़ दिए जाते हैं। कोई भौतिक सभ्यता की बात करता है, कोई आध्यात्मिक सभ्यता की। ऐसे में जो थोड़ा-सा अर्थ हमारे मन में साफ़ था, वह भी गड़बड़ा जाता है। तब कुछ बुनियादी सवाल खड़े होते हैं। क्या सभ्यता और संस्कृति एक ही चीज़ के दो नाम हैं? अगर दो अलग चीज़ें हैं, तो उनमें फ़र्क़ क्या है?
लेखक इन सवालों का जवाब किसी कठिन परिभाषा से नहीं देता। वह पाठक को कल्पना की यात्रा पर ले चलता है, और रोज़मर्रा के उदाहरणों से बात खोलता है। यही इस निबंध की सबसे बड़ी ख़ूबी है। एक भारी दार्शनिक विषय को वह चूल्हे की आग और कपड़े सिलने की सुई जैसी परिचित चीज़ों से समझा देता है।
आग और सुई-धागा: दो बड़े आविष्कार
ज़रा उस ज़माने के बारे में सोचिए, जब मनुष्य आग को जानता ही नहीं था। आज हर घर में रसोई है और चूल्हा जलता है, इसलिए आग हमें मामूली लगती है। पर जिस पहले आदमी ने आग जलाने का तरीक़ा खोजा होगा, वह कितना बड़ा खोजी रहा होगा! उसके बाद ही पका हुआ खाना, ठंड से बचाव, अँधेरे में रोशनी और जंगली जानवरों से सुरक्षा संभव हुई।
इसी तरह उस समय की कल्पना कीजिए, जब कपड़े सिलने का कोई साधन नहीं था। फिर किसी के मन में एक नया विचार आया। लोहे के एक टुकड़े को घिसकर पतला किया जाए, और उसके एक सिरे पर छेद बनाया जाए। फिर उस छेद में धागा डालकर कपड़े के दो टुकड़े जोड़े जाएँ। यह विचार भी किसी चमत्कार से कम नहीं था। उस व्यक्ति को भी हम एक महान आविष्कारक ही कहेंगे।
शक्ति और उसका फल: दो चीज़ें अलग-अलग
अब लेखक इन दोनों उदाहरणों में दो-दो चीज़ें अलग करके दिखाता है। आग वाले उदाहरण में एक है आग खोज सकने की शक्ति, और दूसरी है खोजी गई आग। सुई-धागे के उदाहरण में भी एक है उसे खोज सकने की शक्ति, और दूसरा है ख़ुद सुई-धागा। लेखक कहता है कि वह योग्यता या प्रेरणा, जिससे खोज हुई, संस्कृति है। और जो चीज़ खोजी गई, जो मनुष्य ने अपने और दूसरों के काम के लिए बनाई, वह सभ्यता है। जिस व्यक्ति में यह शक्ति जितनी ज़्यादा और जितनी निखरी हुई होगी, वह उतना ही बड़ा आविष्कारक होगा।
संस्कृत और सभ्य: न्यूटन का उदाहरण
इस परिभाषा से एक दिलचस्प नतीजा निकलता है। कोई संस्कृत व्यक्ति अपनी बुद्धि से कोई नई चीज़ खोजता है। उसकी संतान को वही चीज़ बिना किसी मेहनत के, विरासत में मिल जाती है। लेखक कहता है कि असली संस्कृत व्यक्ति तो वही है, जिसके विवेक ने नया सत्य देखा। संतान उस चीज़ का उपयोग करके अपने पूर्वज जितनी सभ्य तो बन सकती है, पर उसे संस्कृत नहीं कहा जा सकता।
लेखक इसे एक आधुनिक उदाहरण से और साफ़ करता है। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत खोजा, इसलिए वह संस्कृत मानव था। आज भौतिकी पढ़ने वाला एक विद्यार्थी गुरुत्वाकर्षण के बारे में तो जानता ही है, साथ में वह ऐसी बहुत-सी बातें भी जानता है, जिनका न्यूटन को शायद पता ही नहीं था। फिर भी हम उस विद्यार्थी को न्यूटन से ज़्यादा सभ्य भले कह लें, ज़्यादा संस्कृत नहीं कह सकते। कारण साफ़ है। विद्यार्थी को ज्ञान बना-बनाया मिला है, जबकि न्यूटन ने उसे अपनी खोज से पाया।
इस बात को अपनी कक्षा पर लागू करके देखिए। मोबाइल फ़ोन चलाना हम सब जानते हैं, इसलिए उस अर्थ में हम सभ्य हैं। पर जिन वैज्ञानिकों ने रेडियो तरंगों और बिजली के नियम खोजे, संस्कृत तो वे थे। इसका अर्थ यह नहीं कि विरासत में मिली चीज़ का उपयोग करना बुरा है। लेखक बस यह याद दिलाता है कि असली गौरव खोजने की शक्ति में है, केवल उपयोग में नहीं।
खोज के पीछे क्या था: भूख, मौसम और ज्ञान की प्यास
अब लेखक पूछता है कि ये खोजें हुईं क्यों। आग की खोज के पीछे शायद भूख की आग, यानी पेट भरने की ज़रूरत, एक कारण रही होगी। सुई-धागे की खोज के पीछे सर्दी और गरमी से शरीर को बचाने, और शरीर को सजाने की इच्छा रही होगी। इन्हें हम भौतिक प्रेरणाएँ कह सकते हैं, क्योंकि ये शरीर की ज़रूरतों से पैदा होती हैं।
पर लेखक यहीं नहीं रुकता। वह एक ऐसे आदमी की कल्पना करता है, जिसका पेट भरा है और तन भी ढका है। वह खुले आसमान के नीचे लेटा है, और ऊपर टिमटिमाते तारे देख रहा है। उसे नींद नहीं आती, क्योंकि वह जानना चाहता है कि मोतियों से भरा यह थाल आख़िर है क्या। उसकी बेचैनी किसी भूख या ठंड से नहीं, ज्ञान की प्यास से पैदा हुई है। लेखक के अनुसार केवल पेट भरने और तन ढकने की इच्छा संस्कृति को जन्म नहीं देती। सच्चा संस्कृत मनुष्य सारी ज़रूरतें पूरी होने पर भी खाली नहीं बैठ सकता।
हमारी सभ्यता का बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों से आया है, जिन्हें भौतिक ज़रूरतों ने खोज के लिए प्रेरित किया। पर कुछ हिस्सा उन विचारशील मनीषियों से भी आया है, जिन्होंने किसी बाहरी दबाव के बिना, केवल अपने भीतर की सहज जिज्ञासा से सत्य खोजा। तारे देखकर जागने वाला वही मनीषी हमारे आज के ज्ञान की नींव रखने वालों में पहला था। इस तरह लेखक खोज के दो स्रोत सामने रखता है: भौतिक प्रेरणा और ज्ञानेप्सा। अगले हिस्से में वह पूछेगा कि क्या इनके अलावा भी कोई तीसरा स्रोत है।
Concepts and terms
वह भीतरी योग्यता, प्रवृत्ति या प्रेरणा, जिसके बल पर मनुष्य कुछ नया खोजता या रचता है।
संस्कृति से उपजा परिणाम, यानी खोजी गई चीज़ें और जीने के तरीक़े।
जिसकी बुद्धि या विवेक ने अपने बल पर किसी नए सत्य को देखा या खोजा।
ज्ञान पाने की तीव्र इच्छा, जो पेट भरा होने पर भी मनुष्य को चैन से बैठने नहीं देती।
भूख, सर्दी-गरमी या शरीर की ज़रूरतों से पैदा होने वाली खोज की प्रेरणा।
सावधान
भ्रम और सच
करके देखो
Title:
मेरी पसंद के आविष्कार
Safety:
बिजली या आग से जुड़े किसी प्रयोग को बड़ों की देखरेख के बिना मत दोहराइए।
What You Notice:
आप पाएँगे कि आज की लगभग हर सुविधा किसी पुराने खोजी की देन है, और हम उसका फल अनायास भोग रहे हैं।
Did you know
भदंत एक आदरसूचक उपाधि है, जो बौद्ध परंपरा में भिक्षुओं के नाम के साथ लगाई जाती है।
जातक कथाएँ गौतम बुद्ध के पिछले जन्मों की कहानियाँ मानी जाती हैं, और कौसल्यायन जी ने इनका हिंदी अनुवाद किया।
संस्कृति शब्द संस्कार से जुड़ा है, जिसका अर्थ है माँजना या निखारना। यानी संस्कृति मन को निखारने वाली शक्ति है।
Memory tricks
जड़ और फल — संस्कृति जड़ है, सभ्यता फल। जड़ दिखती नहीं, पर फल उसी से आता है।
Practice MCQs with answers (25)
- A 1905
- B 1915
- C 1895
- D 1925
Show answer
Why:
सोहाना गाँव।
- A किसी राजघराने का सदस्य होने का
- B बौद्ध भिक्षु होने का
- C सेना में होने का
- D डॉक्टर होने का
Show answer
Why:
आदरसूचक उपाधि।
- A विनोबा भावे
- B नेहरू जी
- C गांधी जी
- D टैगोर
Show answer
Why:
वर्धा।
- A संस्कृत के लंबे और कठिन समासों वाली भाषा
- B केवल अंग्रेज़ी शब्द
- C काव्यात्मक छंद
- D बोलचाल की सरल भाषा
Show answer
Why:
निबंध और संस्मरण।
- A इन शब्दों का किसी भी किताब में न मिलना
- B इनके साथ जुड़े भौतिक-आध्यात्मिक जैसे विशेषण
- C इनका नया होना
- D इनका विदेशी होना
Show answer
Why:
गलत-सलत।
- A गणित के लंबे सूत्र और जटिल समीकरण
- B कविताएँ
- C रोज़मर्रा के उदाहरण
- D कहानियाँ गढ़ना
Show answer
Why:
आग, सुई-धागा।
- A संस्कृति
- B सभ्यता
- C असभ्यता
- D परंपरा
Show answer
Why:
योग्यता।
- A संस्कृति
- B ज्ञानेप्सा
- C प्रेरणा
- D सभ्यता
Show answer
Why:
परिणाम।
- A इससे भोजन, रोशनी और सुरक्षा मिली
- B इससे मनुष्य तुरंत अमीर और बहुत ताक़तवर हो गया
- C यह आसान थी
- D यह विदेश से आई
Show answer
Why:
जीवन बदला।
- A जिसके पास सबसे ज़्यादा धन और सबसे बड़ा घर हो
- B जो संस्कृत बोले
- C जो पूजा करे
- D जिसने अपने विवेक से नया सत्य देखा
Show answer
Why:
आविष्कर्ता।
- A वह अपने पूर्वज से हमेशा कम पढ़ी-लिखी होती है
- B उसे खोजी चीज़ बिना प्रयास मिली
- C वह आलसी होती है
- D वह चीज़ तोड़ देती है
Show answer
Why:
अनायास।
- A भौतिकी की सबसे मोटी किताब लिखना
- B उसका अमीर होना
- C गुरुत्वाकर्षण की खोज
- D उसका लंबा जीवन
Show answer
Why:
सिद्धांत।
- A वह न्यूटन से हमेशा कम बुद्धिमान ही होता है
- B उसका ज्ञान खोजा हुआ नहीं, पाया हुआ है
- C उसे गणित नहीं आता
- D वह विदेश में नहीं रहता
Show answer
Why:
विरासत।
- A संस्कृत
- B असभ्य
- C सभ्य
- D मनीषी
Show answer
Why:
उपयोग।
- A पेट की भूख
- B तारों को जानने की इच्छा
- C राजा का आदेश
- D खेल का शौक़
Show answer
Why:
ज्वाला।
- A खेती के लिए ज़मीन जोतना और फ़सल काटना
- B युद्ध
- C व्यापार
- D मौसम से बचाव और शरीर सजाना
Show answer
Why:
शीतोष्ण।
- A भौतिक प्रेरणा
- B ज्ञानेप्सा
- C त्याग
- D आध्यात्मिक प्रेरणा
Show answer
Why:
शरीर की ज़रूरत।
- A पेट की भूख और रात की ठंड से
- B डर से
- C बीमारी से
- D ज्ञान की प्यास से
Show answer
Why:
ज्ञानेप्सा।
- A भोजन से भरी थाली के लिए
- B गहनों के डिब्बे के लिए
- C तारों भरे आकाश के लिए
- D नदी के लिए
Show answer
Why:
रात।
- A आराम से खाली बैठकर समय बिताता है
- B नई खोज में लगा रहता है
- C सो जाता है
- D धन जमा करता है
Show answer
Why:
निठल्ला नहीं।
- A आलसी
- B व्यापारी
- C मनीषी
- D सैनिक
Show answer
Why:
विचारशील।
- A बहुत मेहनत से
- B बिना प्रयास के
- C देर से
- D ग़ुस्से में
Show answer
Why:
विरासत।
- A मीठा और खट्टा
- B ऊँचा और नीचा
- C दिन और रात
- D ठंडा और गरम
Show answer
Why:
सुई-धागा।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
सभ्य, संस्कृत नहीं।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C केवल I और III
- D I, II और III तीनों
Show answer
Why:
संतान सभ्य है।
Important short questions (7)
उन्होंने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा और हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के ज़रिए हिंदी फैलाई। उनका यह काम देश के भीतर और विदेशों में भी चला।
ये शब्द बोले तो बहुत जाते हैं, पर इनके अर्थ पर कम सोचा जाता है। ऊपर से भौतिक या आध्यात्मिक जैसे विशेषण जुड़कर इनका थोड़ा-बहुत अर्थ भी उलझा देते हैं।
आग जला सकने की खोजी शक्ति संस्कृति है। उस शक्ति से मिली आग, जिसका हम सब उपयोग करते हैं, सभ्यता है।
जिसकी बुद्धि या विवेक ने अपने बल पर किसी नए सत्य को देखा या कोई नई चीज़ खोजी, वही सच्चा संस्कृत व्यक्ति है। उसकी खोज का केवल उपयोग करने वाला सभ्य हो सकता है, संस्कृत नहीं।
विद्यार्थी को गुरुत्वाकर्षण और बाद का ज्ञान बना-बनाया मिला है। न्यूटन ने वह सिद्धांत अपनी बुद्धि से खोजा था, इसलिए संस्कृत वही है।
मनुष्य को सर्दी और गरमी से शरीर बचाना था। साथ ही उसमें अपने शरीर को सजाने की इच्छा भी थी, और इन दोनों के लिए कपड़े सिलना ज़रूरी था।
वह दिखाना चाहता है कि खोज केवल भूख या ठंड से नहीं होती। पेट भरा होने पर भी ज्ञान की प्यास मनुष्य को खोज के लिए बेचैन रखती है, और यही ज्ञानेप्सा है।
Long answer questions (3)
आग की खोज ने मनुष्य का जीवन पूरी तरह बदल दिया। इससे पहले मनुष्य कच्चा भोजन खाता था। ठंड से बचने का भी उसके पास कोई साधन नहीं था। आग मिलने पर उसे पका भोजन मिला, जो सुपाच्य और स्वादिष्ट था। रात के अँधेरे में रोशनी मिली। जाड़े में गरमी मिली, और जंगली जानवरों से बचाव भी हुआ। आज घर-घर चूल्हा जलता है, इसलिए यह खोज हमें सामान्य लगती है। पर उस पहले खोजी की कल्पना कीजिए। उसने कुछ ऐसा किया, जो पहले कभी नहीं हुआ था। लेखक के अनुसार इस खोज के पीछे पेट की भूख की प्रेरणा रही होगी। यानी यह एक भौतिक प्रेरणा थी, जो शरीर की ज़रूरत से पैदा हुई।
लेखक के अनुसार संस्कृत व्यक्ति वह है, जो अपनी बुद्धि और विवेक से कोई नया सत्य खोजता है। सभ्य व्यक्ति वह है, जो उस खोज का फल विरासत में पाकर उसका उपयोग करता है। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत खोजा। यह उसकी अपनी खोज थी, इसलिए वह संस्कृत मानव था। आज भौतिकी का विद्यार्थी गुरुत्वाकर्षण भी जानता है, और बाद की कई खोजें भी। ज्ञान की मात्रा में वह न्यूटन से आगे हो सकता है। फिर भी यह ज्ञान उसे बना-बनाया मिला है। इसलिए हम उसे न्यूटन से ज़्यादा सभ्य कह सकते हैं, पर ज़्यादा संस्कृत नहीं। यानी संस्कृति का माप ज्ञान की मात्रा से नहीं, खोज की शक्ति से होता है।
भौतिक प्रेरणा शरीर की ज़रूरतों से पैदा होती है। भूख ने आग की खोज कराई। सर्दी-गरमी से बचने और शरीर सजाने की इच्छा ने सुई-धागे की खोज कराई। ज्ञानेप्सा का अर्थ है ज्ञान पाने की प्यास। इसका शरीर की ज़रूरत से कोई संबंध नहीं होता। लेखक एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण देता है, जिसका पेट भरा है और तन भी ढका है। फिर भी वह रात में तारे देखकर सो नहीं पाता, क्योंकि उनका रहस्य जानना चाहता है। लेखक के अनुसार ऐसे मनीषियों ने भी हमारी सभ्यता को बहुत कुछ दिया है। वे किसी बाहरी दबाव के बिना, अपनी सहज जिज्ञासा से खोज करते हैं। इस तरह दोनों प्रेरणाएँ संस्कृति के स्रोत हैं।
Flashcards (17)
Play this topic
- शब्द और अर्थ
- संस्कृति या सभ्यता?
- सही या भ्रम
- निबंध का क्रम (पहला भाग)
- झटपट उत्तर
त्याग, कल्याण और अविभाज्य मानव संस्कृति
लेखक त्याग को संस्कृति का तीसरा स्रोत मानता है और सभ्यता को संस्कृति का परिणाम। जो योग्यता विनाश के साधन गढ़े, वह असंस्कृति है। कल्याण से जुड़ी मानव संस्कृति एक है, उसे बाँटा नहीं जा सकता।
What you will be able to do
- त्याग और दूसरों के कल्याण की भावना को संस्कृति के तीसरे स्रोत के रूप में समझा सकेंगे।
- सभ्यता को संस्कृति का परिणाम मानने वाले लेखक के मत को उदाहरणों से स्पष्ट कर सकेंगे।
- असंस्कृति और असभ्यता का अर्थ आत्म-विनाश के साधनों के संदर्भ में समझा सकेंगे।
- मानव संस्कृति की अविभाज्यता और कल्याण वाले अंश की स्थायिता पर अपने विचार लिख सकेंगे।
- सामासिक पदों का विग्रह करके समास के भेद पहचान सकेंगे।
Key points
भूख मिटाने की इच्छा और ज्ञान की प्यास के अलावा दूसरों के भले के लिए त्याग भी संस्कृति का स्रोत है।
अपना कौर दूसरे को देने वाला व्यक्ति और बीमार बच्चे को रात भर गोद में लिए बैठी माँ इसी त्याग के उदाहरण हैं।
लेनिन, कार्ल मार्क्स और सिद्धार्थ के उदाहरण बताते हैं कि मानवता के सुख के लिए अपना सुख छोड़ना भी संस्कृति है।
सभ्यता संस्कृति का परिणाम है; हमारे खाने, पहनने और आने-जाने के ढंग सभ्यता में गिने जाते हैं।
लेखक व्यंग्य में कहता है कि आपस में लड़ने-मरने के तरीक़े भी हमारी सभ्यता में शामिल हो गए हैं।
जो योग्यता मनुष्य से अपने ही विनाश के साधन बनवाए, उसे संस्कृति नहीं, असंस्कृति कहना चाहिए।
कल्याण की भावना से कटते ही संस्कृति असंस्कृति बन जाती है, और उसका निश्चित फल असभ्यता होता है।
हर पल बदलती दुनिया में पुरानी रूढ़ियों को संस्कृति कहकर पकड़े बैठना ठीक नहीं; उनकी रक्षा के लिए गुटबंदी बेकार है।
लेखक के अनुसार मानव संस्कृति बाँटी नहीं जा सकती, और उसका कल्याणकारी अंश ही श्रेष्ठ और टिकाऊ है।
Full explanation
तीसरा स्रोत: दूसरों के लिए अपना सुख छोड़ना
पहले भाग में लेखक ने खोज के दो स्रोत बताए थे, भौतिक प्रेरणा और ज्ञान की प्यास। अब वह एक नया सवाल रखता है। क्या मानव संस्कृति के माता-पिता बस यही दो हैं? इसका उत्तर वह कुछ ऐसे दृश्यों से देता है, जो हमारे आसपास रोज़ दिखते हैं।
एक व्यक्ति अपने मुँह तक आया निवाला रोककर उसे किसी भूखे को खिला देता है। उसे यह विचार कहाँ से आता है? एक माँ अपने बीमार बच्चे को पूरी रात गोद में लिए जागती रहती है। वह ऐसा किस प्रेरणा से करती है? यहाँ न भूख है, न ठंड, न किसी रहस्य को जानने की जिज्ञासा। यहाँ केवल दूसरे का दुख कम करने की चाह है।
लेखक इतिहास से भी उदाहरण देता है। कहा जाता है कि रूस के भाग्य को नया रूप देने वाले लेनिन अपनी मेज़ में रखे सूखी डबलरोटी के टुकड़े ख़ुद न खाकर दूसरों को खिला देते थे। कार्ल मार्क्स ने दुनिया के मज़दूरों को सुखी देखने का सपना देखा, और इसके लिए अपना पूरा जीवन कष्ट में गुज़ारा। इन सबसे बड़ा उदाहरण सिद्धार्थ का है। लगभग ढाई हज़ार साल पहले उन्होंने राजमहल का सुख छोड़ दिया। उनकी इच्छा बस इतनी थी कि लोभ और लालसा में फँसकर आपस में लड़ती मानवता किसी तरह सुख-शांति से रह सके।
इन उदाहरणों के बाद लेखक अपना निष्कर्ष देता है। जो योग्यता आग और सुई-धागे की खोज कराती है, वह संस्कृति है। जो योग्यता तारों का ज्ञान कराती है, वह भी संस्कृति है। और जो योग्यता किसी महान मनुष्य से अपना सब कुछ त्याग करा देती है, वह भी संस्कृति ही है। इस तरह संस्कृति के तीन स्रोत सामने आते हैं: भौतिक ज़रूरत, ज्ञान की प्यास, और दूसरों के कल्याण के लिए त्याग।
सभ्यता: संस्कृति का परिणाम
अब लेखक सभ्यता पर लौटता है। उसके अनुसार सभ्यता संस्कृति से उपजा परिणाम है। हम कैसे भोजन करते हैं, कैसे कपड़े पहनते और ओढ़ते हैं, एक जगह से दूसरी जगह कैसे आते-जाते हैं, ये सब हमारी सभ्यता के अंग हैं। थाली, चम्मच, साइकिल, रेलगाड़ी और पोशाकें, सब किसी न किसी संस्कृत व्यक्ति की खोज-शक्ति के फल हैं।
पर इसी सूची में लेखक एक चुभने वाली बात भी जोड़ता है। वह कहता है कि आपस में लड़कर कट मरने के तरीक़े भी हमारी सभ्यता का हिस्सा हैं। यह सीधा व्यंग्य है। मनुष्य ने तलवार से लेकर बंदूक़ और बम तक जो कुछ बनाया, वह भी किसी खोज-शक्ति का फल ही है। तो क्या उसे भी सभ्यता कहकर गर्व किया जाए? यहीं से निबंध अपने सबसे गंभीर प्रश्न पर पहुँचता है।
असंस्कृति और असभ्यता: कल्याण से कटी खोज
लेखक पूछता है कि जो योग्यता मनुष्य से उसके अपने ही विनाश के साधन बनवाती है, उसे क्या कहें? उसे संस्कृति का नाम दें, या असंस्कृति का? इसी तरह, मनुष्य जिन साधनों के सहारे दिन-रात अपना ही नाश करने में लगा है, उन्हें सभ्यता कहें या असभ्यता? प्रश्न के रूप में कही गई यह बात असल में लेखक का साफ़ उत्तर है।
लेखक का मत है कि संस्कृति की असली कसौटी कल्याण है। अगर किसी संस्कृति का कल्याण की भावना से रिश्ता टूट जाए, तो वह असंस्कृति बन जाएगी। और ऐसी असंस्कृति का फल असभ्यता के सिवा कुछ हो ही नहीं सकता। यह परिणाम उतना ही निश्चित है, जितना बीज से पेड़ का उगना।
इस बात को आज के उदाहरणों से समझिए। परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाकर घरों को रोशन करना कल्याण है। उसी ऊर्जा से ऐसे हथियार बनाना, जो पूरे शहर मिटा दें, असंस्कृति है। इंटरनेट से ज्ञान बाँटना कल्याण है, पर उसी से झूठ और नफ़रत फैलाना असभ्यता है। यानी खोज अपने-आप में अच्छी या बुरी नहीं होती। उसके पीछे की भावना और उसका उपयोग तय करता है कि वह संस्कृति है या असंस्कृति।
कूड़ा-करकट और अविभाज्य मानव संस्कृति
निबंध के अंत में लेखक उन लोगों पर टिप्पणी करता है, जो संस्कृति के नाम पर पुरानी रूढ़ियों का ढेर सँभाले बैठे हैं। उसके अनुसार संस्कृति कहकर जिस कूड़े-करकट की ओर इशारा किया जाता है, वह न असली संस्कृति है, न बचाकर रखने लायक़ चीज़। दुनिया हर पल बदल रही है। ऐसी दुनिया में किसी एक चीज़ को कसकर पकड़े रहना संभव ही नहीं है।
लेखक आगे कहता है कि मनुष्य ने जब भी गहरी समझ और मित्रता के भाव से कोई नया सत्य देखा, तो वह कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जिसकी रक्षा के लिए गुट बनाने पड़ें। सच्चा ज्ञान और सच्ची करुणा किसी एक समूह की जागीर नहीं होते। उन्हें बचाने के लिए किसी दलबंदी या झगड़े की ज़रूरत नहीं पड़ती।
निबंध का अंतिम विचार सबसे महत्त्वपूर्ण है। लेखक के अनुसार मानव संस्कृति अविभाज्य है, यानी उसे धर्म, जाति, देश या भाषा के आधार पर बाँटा नहीं जा सकता। आग की खोज किसी एक धर्म की नहीं, पूरी मानवता की है। बुद्ध की करुणा किसी एक देश की नहीं, सबकी है। इस संस्कृति में जितना हिस्सा कल्याण का है, वह अकल्याण वाले हिस्से से बेहतर तो है ही, ज़्यादा टिकाऊ भी है। विनाश के साधन समय के साथ मिट जाते हैं, पर भलाई की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है।
भाषा-अध्ययन: समास और विग्रह
जब दो या अधिक शब्द मिलकर एक छोटा शब्द बनाते हैं, तो इस प्रक्रिया को समास कहते हैं। बने हुए शब्द को समस्त पद या सामासिक पद कहते हैं। समस्त पद को फिर से उसके हिस्सों में तोड़कर दिखाना विग्रह कहलाता है। समास के छह भेद हैं।
अव्ययीभाव समास में पहला पद अव्यय होता है और प्रधान भी, जैसे प्रतिदिन यानी हर दिन, और यथाशक्ति यानी शक्ति के अनुसार। तत्पुरुष समास में दूसरा पद प्रधान होता है और बीच की विभक्ति लुप्त रहती है, जैसे राजपुत्र यानी राजा का पुत्र, और देशभक्ति यानी देश के लिए भक्ति। कर्मधारय में एक पद दूसरे की विशेषता बताता है, जैसे नीलकमल यानी नीला है जो कमल, और महापुरुष यानी महान है जो पुरुष।
समास के बाक़ी भेद और पाठ के पद
द्विगु समास में पहला पद संख्या बताता है और पूरा पद किसी समूह का बोध कराता है, जैसे चौराहा यानी चार राहों का समूह, और नवरत्न यानी नौ रत्नों का समूह। द्वंद्व समास में दोनों पद प्रधान होते हैं और विग्रह में और या अथवा लगता है, जैसे माता-पिता यानी माता और पिता, और दाल-रोटी यानी दाल और रोटी। बहुव्रीहि समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता, और पूरा पद किसी तीसरे अर्थ की ओर इशारा करता है, जैसे दशानन यानी दस मुख हैं जिसके, अर्थात रावण।
इस पाठ में आए कुछ सामासिक पदों को भी पहचानिए। आत्म-विनाश तत्पुरुष है, क्योंकि इसका विग्रह है आत्मा का विनाश। महामानव कर्मधारय है, यानी महान है जो मानव। भौतिक-आध्यात्मिक जैसे जोड़े द्वंद्व की तरह बनते हैं। विग्रह करते समय हमेशा यह देखिए कि कौन-सा पद प्रधान है, और बीच में कौन-सा शब्द या विभक्ति छिपी है।
Concepts and terms
दूसरों के सुख के लिए अपना सुख, भोजन या आराम छोड़ देने की भावना, जिसे लेखक संस्कृति का तीसरा स्रोत मानता है।
वह योग्यता, जो कल्याण से कटकर मनुष्य से विनाश के साधन बनवाती है।
असंस्कृति से उपजे विनाशकारी साधन और तरीक़े।
जिसे बाँटा न जा सके। लेखक मानव संस्कृति को धर्म, देश या समूह में बाँटने के विरुद्ध है।
दो या अधिक शब्दों को जोड़कर बना छोटा शब्द। समस्त पद को अलग करना विग्रह कहलाता है।
सावधान
भ्रम और सच
मिलाकर देखो
Scenario:
एक विद्यालय की विज्ञान-क्लब ने दो प्रोजेक्ट चुने। पहली टीम ने सस्ते पानी-फ़िल्टर का मॉडल बनाया, जिससे गाँव के लोग साफ़ पानी पी सकें।
दूसरी टीम ने एक ऐसा ऐप बनाया, जो दूसरों की तस्वीरें बिगाड़कर मज़ाक बना देता था। ऐप तकनीकी रूप से बहुत अच्छा था, और कई बच्चों को मज़ेदार भी लगा।
कुछ बच्चों ने तर्क दिया कि दूसरी टीम ने ज़्यादा कठिन कोड लिखा है, इसलिए उसे जीतना चाहिए। पहली टीम के बच्चों ने चुपचाप अपना मॉडल गाँव के स्कूल को दान करने की बात कही।
निर्णायकों ने पहले प्रोजेक्ट को पुरस्कार दिया। उन्होंने कहा कि तकनीक का मूल्य उसके उपयोग से तय होता है।
Activity:
अपनी कक्षा में पाँच ऐसी तकनीकों की सूची बनाइए, जिनका अच्छा और बुरा, दोनों तरह का उपयोग हो सकता है। हर एक के आगे दोनों उपयोग लिखिए।
Analysis:
खोज की शक्ति अपने-आप में तटस्थ होती है। उसे संस्कृति बनाता है कल्याण का भाव। यही इस निबंध का केंद्रीय संदेश है, और आज के तकनीकी युग में यह पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है।
Did you know
सिद्धार्थ ही आगे चलकर गौतम बुद्ध कहलाए। लेखक स्वयं बौद्ध भिक्षु थे, इसलिए निबंध में बुद्ध के त्याग की चर्चा ख़ास है।
प्रज्ञा और मैत्री बौद्ध दर्शन के महत्त्वपूर्ण शब्द हैं। प्रज्ञा का अर्थ है गहरी समझ, और मैत्री का अर्थ है सबके प्रति मित्रता का भाव।
संस्कृत भाषा की लोकप्रिय उक्ति वसुधैव कुटुंबकम् का अर्थ है कि पूरी धरती एक परिवार है। यह विचार अविभाज्य मानव संस्कृति से मेल खाता है।
Memory tricks
संस्कृति के तीन स्रोत: भू-ज्ञा-त्या — भूख (भौतिक प्रेरणा), ज्ञान की प्यास (ज्ञानेप्सा), त्याग (कल्याण)।
समास के छह भेद: अ-त-क-द्वि-द्वं-ब — अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वंद्व, बहुव्रीहि।
Practice MCQs with answers (25)
- A पेट की भूख
- B तारों की जिज्ञासा
- C धन का लालच
- D दूसरों के लिए त्याग
Show answer
Why:
कौर।
- A दूसरों का कल्याण
- B अपनी तारीफ़ सुनने की इच्छा और दिखावा
- C भूख न लगना
- D डर
Show answer
Why:
त्याग।
- A माँ को उस समय भूख और ठंड बहुत लगती है
- B उसमें अपना नहीं, दूसरे का दुख है
- C माँ को नींद नहीं आती
- D माँ डरती है
Show answer
Why:
ममता।
- A वे रोज़ बहुत बड़ा और शानदार भोज कराते थे
- B वे भिक्षु थे
- C वे सूखी डबलरोटी दूसरों को खिला देते थे
- D वे वैज्ञानिक थे
Show answer
Why:
मेज़ की दराज़।
- A उन्हें दुनिया की कोई भी नौकरी नहीं मिली थी
- B मज़दूरों के सुख का सपना पूरा करने के लिए
- C वे बीमार थे
- D वे यात्रा करते थे
Show answer
Why:
संसार के मज़दूर।
- A राज्य का और विस्तार करके नई धरती जीतना
- B धन कमाना
- C घूमना
- D तृष्णा से लड़ती मानवता को सुख देना
Show answer
Why:
ढाई हज़ार वर्ष।
- A वे लेखक के सबसे पुराने, निकट और प्रिय मित्र थे
- B वे रूस के थे
- C उन्होंने राजसुख छोड़कर पूरी मानवता की चिंता की
- D वे वैज्ञानिक थे
Show answer
Why:
सर्वस्व त्याग।
- A संस्कृति का परिणाम
- B संस्कृति का कारण
- C संस्कृति का शत्रु
- D संस्कृति से अलग चीज़
Show answer
Why:
फल।
- A असंस्कृति
- B ज्ञानेप्सा
- C तृष्णा
- D सभ्यता
Show answer
Why:
परिणाम।
- A व्यंग्यपूर्ण
- B प्रशंसा से भरा हुआ और गौरवपूर्ण
- C हास्यपूर्ण
- D भक्तिपूर्ण
Show answer
Why:
चुभती बात।
- A संस्कृति
- B असंस्कृति
- C सभ्यता
- D ज्ञानेप्सा
Show answer
Why:
आत्म-विनाश।
- A खोज से मिलने वाला धन और भारी मुनाफ़ा
- B पुरानापन
- C कल्याण की भावना
- D शक्ति
Show answer
Why:
भलाई।
- A वह असंस्कृति बन जाएगी
- B वह और अधिक मज़बूत और सुंदर बनेगी
- C वह सभ्यता बनेगी
- D कुछ नहीं बदलेगा
Show answer
Why:
अवश्यंभावी।
- A सच्ची संस्कृति
- B ज्ञानेप्सा
- C मैत्री
- D असंस्कृति
Show answer
Why:
विनाश।
- A उसकी रक्षा हर हाल में करनी चाहिए
- B वह न संस्कृति है, न रक्षा के योग्य
- C वही असली संस्कृति है
- D उसे संग्रहालय में रखें
Show answer
Why:
रूढ़ियाँ।
- A संसार बहुत जल्दी पूरी तरह नष्ट हो जाएगा
- B मौसम बदलता है
- C किसी चीज़ को जकड़कर नहीं रखा जा सकता
- D लोग बदलते हैं
Show answer
Why:
परिवर्तन।
- A समझ की
- B करुणा की
- C ज्ञान की
- D दलबंदी की
Show answer
Why:
गुटबंदी।
- A उसे केवल एक ही देश के लोग अपना सकते हैं
- B वह बहुत छोटी है
- C उसे धर्म या देश में बाँटा नहीं जा सकता
- D वह नई है
Show answer
Why:
एक मानवता।
- A वह कमज़ोर है और जल्दी मिट जाता है
- B वह श्रेष्ठ और स्थायी है
- C वह बेकार है
- D वह पुराना है
Show answer
Why:
अकल्याण से बेहतर।
- A बहुव्रीहि
- B द्विगु
- C द्वंद्व
- D तत्पुरुष
Show answer
Why:
रावण।
- A बहुव्रीहि
- B द्विगु
- C द्वंद्व
- D कर्मधारय
Show answer
Why:
चार राहों का समूह।
- A आत्मा और विनाश
- B आत्मा से विनाश
- C विनाश है जो आत्मा
- D आत्मा का विनाश
Show answer
Why:
तत्पुरुष।
- A द्विगु
- B अव्ययीभाव
- C द्वंद्व
- D कर्मधारय
Show answer
Why:
माता-पिता।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
कल्याण।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C I, II और III तीनों
- D केवल I और III
Show answer
Why:
कूड़ा-करकट।
Important short questions (7)
पहला, अपना निवाला रोककर भूखे को खिला देने वाला व्यक्ति। दूसरा, बीमार बच्चे को रात भर गोद में लिए जागती माँ।
दोनों ने दूसरों के सुख के लिए अपना सुख छोड़ा। लेनिन अपनी सूखी रोटी दूसरों को देते थे, और मार्क्स ने मज़दूरों के सपने के लिए कष्ट भरा जीवन जिया।
संस्कृति कारण है और सभ्यता उसका परिणाम। संस्कृति की खोज-शक्ति से जो चीज़ें और जीने के ढंग बनते हैं, वे सभ्यता हैं।
जो योग्यता कल्याण की भावना से कटकर मनुष्य से उसके अपने विनाश के साधन बनवाती है, वह असंस्कृति है। उसका फल असभ्यता होता है।
दुनिया हर पल बदल रही है, इसलिए किसी चीज़ को जकड़कर नहीं रखा जा सकता। ऐसा ढेर कल्याण से कटी रूढ़ियाँ हैं, असली संस्कृति नहीं।
आग, सुई-धागा या करुणा जैसी देन किसी एक धर्म या देश की नहीं, पूरी मानवता की है। इसलिए संस्कृति को बाँटा नहीं जा सकता।
द्विगु में पहला पद संख्या बताता है, जैसे नवरत्न यानी नौ रत्नों का समूह। बहुव्रीहि में पूरा पद किसी तीसरे की ओर संकेत करता है, जैसे दशानन यानी रावण।
Long answer questions (3)
लेखक के अनुसार संस्कृति का तीसरा स्रोत है दूसरों के कल्याण के लिए त्याग। इसमें न भूख है, न जिज्ञासा, केवल दूसरे का दुख कम करने की चाह है। वह रोज़ के दो उदाहरण देता है। एक व्यक्ति अपना निवाला रोककर भूखे को खिला देता है। एक माँ बीमार बच्चे को रात भर गोद में लिए जागती है। इतिहास से भी उदाहरण आते हैं। लेनिन अपनी सूखी रोटी दूसरों को खिला देते थे। मार्क्स ने मज़दूरों के सुख के लिए कष्ट सहा। सबसे बड़ा उदाहरण सिद्धार्थ का है, जिन्होंने लोभ में लड़ती मानवता के सुख के लिए राजमहल छोड़ा। इस तरह त्याग भी संस्कृति है।
लेखक के अनुसार संस्कृति की असली कसौटी कल्याण है। जो योग्यता मनुष्य से उसके अपने ही विनाश के साधन बनवाए, वह संस्कृति नहीं हो सकती। उसे असंस्कृति कहना होगा। उन साधनों को, जिनसे मनुष्य दिन-रात अपना नाश कर रहा है, सभ्यता नहीं, असभ्यता कहना चाहिए। आज के समय में परमाणु हथियार इसका साफ़ उदाहरण हैं। परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाना कल्याण है, पर शहर मिटाने वाले बम बनाना असंस्कृति है। यानी खोज अपने-आप में अच्छी या बुरी नहीं होती। उसके पीछे की भावना और उसका उपयोग ही तय करता है कि वह संस्कृति है या असंस्कृति।
लेखक का मानना है कि मानव संस्कृति को धर्म, जाति या देश के आधार पर बाँटा नहीं जा सकता। इतिहास में संस्कृति को बाँटने की कोशिशें हुई हैं। देश के बँटवारे के समय धर्म के नाम पर लोगों को अलग किया गया, और भारी हिंसा हुई। पर संस्कृति ने बार-बार अपनी एकता भी दिखाई है। बिस्मिल्ला खाँ काशी के मंदिर में शहनाई बजाते थे, और हर धर्म के लोग उन्हें सुनते थे। प्राकृतिक आपदाओं के समय भी लोग धर्म पूछे बिना एक-दूसरे की मदद करते हैं। इन उदाहरणों से साफ़ है कि कल्याण वाली संस्कृति सबकी साझी है, और वही टिकाऊ है।
Flashcards (17)
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- शब्द और अर्थ
- संस्कृति या असंस्कृति?
- सही या भ्रम
- निबंध का क्रम (दूसरा भाग)
- झटपट उत्तर
Class 10 Hindi Chapter 12 — frequently asked questions
उन्होंने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा और हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के ज़रिए हिंदी फैलाई। उनका यह काम देश के भीतर और विदेशों में भी चला।
ये शब्द बोले तो बहुत जाते हैं, पर इनके अर्थ पर कम सोचा जाता है। ऊपर से भौतिक या आध्यात्मिक जैसे विशेषण जुड़कर इनका थोड़ा-बहुत अर्थ भी उलझा देते हैं।
आग जला सकने की खोजी शक्ति संस्कृति है। उस शक्ति से मिली आग, जिसका हम सब उपयोग करते हैं, सभ्यता है।
पहला, अपना निवाला रोककर भूखे को खिला देने वाला व्यक्ति। दूसरा, बीमार बच्चे को रात भर गोद में लिए जागती माँ।
दोनों ने दूसरों के सुख के लिए अपना सुख छोड़ा। लेनिन अपनी सूखी रोटी दूसरों को देते थे, और मार्क्स ने मज़दूरों के सपने के लिए कष्ट भरा जीवन जिया।
संस्कृति कारण है और सभ्यता उसका परिणाम। संस्कृति की खोज-शक्ति से जो चीज़ें और जीने के ढंग बनते हैं, वे सभ्यता हैं।
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