Class 9 Hindi Chapter 8: रैदास के पद

रैदास के पद is Chapter 8 of NCERT / CBSE Class 9 Hindi (Hindi medium). This page has the complete chapter notes across 2 topics, 50 practice MCQs with answers and explanations, 20 important short and long questions and 34 flashcards, all written to the NCERT / CBSE syllabus and free to read.
  • 2 topics
  • 50 MCQs
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  • 6 long answers
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  • Hindi

संत रैदास और पहला पद: तुम चंदन, हम पानी

रैदास निर्गुण संत परंपरा के कवि थे, जिन्होंने आडंबर छोड़कर मन की शुद्धता को सच्चा धर्म माना। पहले पद में वे चंदन-पानी, बादल-मोर, चाँद-चकोर, दीपक-बाती और मोती-धागे जैसे जोड़ों से भक्त और प्रभु के अटूट रिश्ते को दिखाते हैं।

What you will be able to do

  • संत रैदास के जीवन, भाषा और रचनाओं का परिचय दे सकूँगा।
  • निर्गुण संत काव्य की मुख्य विशेषताएँ बता सकूँगा।
  • पहले पद की हर पंक्ति का सरल अर्थ अपने शब्दों में लिख सकूँगा।
  • पद में आए जोड़ों के आधार पर भक्त और आराध्य के संबंध को समझा सकूँगा।
  • अनन्य भक्ति और समर्पण के भाव को उदाहरणों से स्पष्ट कर सकूँगा।

Key points

  • संत रविदास, जिन्हें रैदास कहा जाता है, काशी (वाराणसी) में जन्मे; हिंदी साहित्य कोश उनका जीवन-काल सन् 1388 से 1518 के बीच मानता है।

  • वे संत कवि थे; उन्होंने बाहरी आडंबरों का खंडन किया और मन की शुद्धता तथा भीतर की भक्ति को सच्चा धर्म माना।

  • उनकी भाषा सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा है; उसमें खड़ी बोली, अवधी, उर्दू-फ़ारसी और राजस्थानी के शब्द भी घुले हैं।

  • उनके कई पद आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं; उनकी रचनाएँ रैदास बानी नाम के संग्रह में मिलती हैं।

  • पहले पद की टेक है कि प्रभु के नाम की लगन लग चुकी है, अब वह छूट नहीं सकती।

  • चंदन और पानी: पानी में चंदन घिसने से उसकी सुगंध पानी के हर अंश में बस जाती है; भक्त भी प्रभु के गुणों से भर जाता है।

  • बादल और मोर, चाँद और चकोर: भक्त प्रभु को उसी चाह से देखता है, जैसे मोर बादल को और चकोर चाँद को।

  • दीपक और बाती, मोती और धागा, सोना और सुहागा: दोनों साथ हों, तभी रोशनी, माला और चमक बनती है।

  • अंतिम जोड़ा स्वामी और दास का है; कवि प्रभु को स्वामी और ख़ुद को सेवक मानकर पूरा समर्पण दिखाता है।

Full explanation

संत रैदास: काशी के संत कवि

रैदास का पूरा नाम संत रविदास है, पर लोकजीवन में वे रैदास नाम से प्रसिद्ध हुए। उनका जन्म काशी, यानी आज के वाराणसी, में हुआ। हिंदी साहित्य कोश के अनुसार उनका जीवन-काल सन् 1388 से सन् 1518 के बीच माना जाता है, यानी वे पंद्रहवीं शताब्दी के संत थे। यह वही समय है, जब कबीर भी काशी में अपनी वाणी कह रहे थे। रैदास को संत कवियों की परंपरा में बहुत ऊँचा स्थान मिला है।

रैदास का जीवन बहुत सादा था। उनके बारे में प्रसिद्ध है कि वे अपना पारंपरिक काम करते हुए भी भजन गाते रहते थे। उनके लिए काम और भक्ति अलग-अलग नहीं थे। उस समय समाज में जाति के आधार पर बहुत भेदभाव था। बहुत-से लोगों को मंदिरों में जाने और धर्म-ग्रंथ पढ़ने से रोका जाता था। ऐसे समय में रैदास ने कहा कि भगवान तक पहुँचने के लिए किसी ऊँची जाति, बड़े कर्मकांड या महँगे तीर्थ की ज़रूरत नहीं है। सच्चा और शुद्ध मन ही काफ़ी है। उनकी इस बात ने लाखों साधारण लोगों को आत्मसम्मान दिया।

संत काव्य: मन की भक्ति, दिखावे का विरोध

भक्तिकाल में भक्ति की दो बड़ी धाराएँ थीं। सगुण धारा के कवि ईश्वर को राम या कृष्ण के रूप में देखते थे और उनकी लीलाओं का गान करते थे। निर्गुण धारा के कवि मानते थे कि ईश्वर किसी एक रूप में बँधा नहीं है; वह हर जगह और हर मन में है। कबीर, रैदास और नामदेव इसी निर्गुण संत परंपरा के कवि हैं। रैदास अपने पदों में राम, हरि और प्रभु जैसे नाम लेते हैं, पर उनका राम किसी मूर्ति में नहीं, मन के भीतर बसता है।

संत कवियों की कुछ बातें एक जैसी हैं। पहली, वे बाहरी आडंबरों, यानी दिखावे के धार्मिक कर्मों, का विरोध करते हैं। दूसरी, वे जाति-पाँति के भेदभाव को नहीं मानते और सबको बराबर समझते हैं। तीसरी, वे मन की शुद्धता, सच्चाई और प्रेम को सबसे बड़ा धर्म मानते हैं। चौथी, वे जनता की भाषा में लिखते हैं, ताकि हर कोई उनकी बात समझ सके। रैदास में ये सभी गुण मिलते हैं। बराबरी, प्रेम और आपसी मेल की उनकी सीख आज भी उतनी ही ज़रूरी है।

भाषा और रचनाएँ

रैदास ने सरल और व्यवहार में बोली जाने वाली ब्रजभाषा में लिखा। उनकी भाषा में अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्द भी मिल जाते हैं। इसका कारण यह है कि संत घूम-घूमकर लोगों से मिलते थे और जनता की मिली-जुली बोली में बात करते थे। उनकी भाषा में बड़े-बड़े संस्कृत शब्दों का बोझ नहीं है। रोज़ की चीज़ें, जैसे पानी, दीपक, धागा और सोना, उनकी कविता में आकर गहरा अर्थ देने लगती हैं।

रैदास की कई भक्ति-रचनाएँ आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल की गई हैं। उनकी वाणी रैदास बानी नाम के संग्रह में संकलित है। हमारी पाठ्यपुस्तक में उनके दो पद लिए गए हैं। पद गाने के लिए रचे गए छोटे गीत होते हैं। पद की पहली पंक्ति टेक कहलाती है, जो गाते समय बार-बार लौटती है। आगे की पंक्तियाँ उसी भाव को अलग-अलग उदाहरणों से फैलाती हैं।

टेक: नाम की लगन अब नहीं छूटेगी

पहले पद की टेक है: अब कैसे छूटै राम रट लागी। इसका सरल अर्थ है कि मुझे राम के नाम की रट, यानी लगन, लग गई है, अब यह भला कैसे छूट सकती है। रट शब्द का सामान्य अर्थ है किसी बात को बार-बार दोहराना। पर यहाँ यह रटकर याद करना नहीं, बल्कि प्रेम से आराध्य का नाम जपना है। जैसे किसी को कोई गहरी आदत लग जाए, वैसे ही भक्त के मन को प्रभु के नाम की आदत लग गई है।

इस टेक में भक्त का आत्मविश्वास भी दिखता है। वह कह रहा है कि यह रिश्ता अब इतना गहरा हो चुका है कि कोई इसे तोड़ नहीं सकता। आगे की हर पंक्ति इसी बात का सबूत देती है। हर पंक्ति प्रभु जी तुम से शुरू होती है और फिर एक जोड़ा सामने आता है, जिसमें प्रभु बड़ा और भक्त छोटा है, पर दोनों अलग नहीं हो सकते। यही दोहराव पद को लय भी देता है और भाव को गहरा भी करता है।

चंदन और पानी: सुगंध जो हर अंग में बस जाए

पहला जोड़ा है: प्रभु जी तुम चंदन हम पानी। पुराने समय में चंदन की लकड़ी को पत्थर पर पानी के साथ घिसा जाता था। घिसते-घिसते चंदन की सुगंध पानी के कण-कण में फैल जाती थी। रैदास कहते हैं कि प्रभु चंदन हैं और भक्त पानी। पंक्ति के दूसरे हिस्से में वे बताते हैं कि उस चंदन की बास, यानी सुगंध, भक्त के अंग-अंग में समा गई है।

इसका भाव यह है कि भक्त ने प्रभु के गुणों को अपने भीतर पूरी तरह उतार लिया है। जैसे सुगंधित पानी को देखकर उसमें से चंदन अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही भक्त के मन से प्रभु को अलग नहीं किया जा सकता। यहाँ भक्त का अपना कोई अलग अहंकार नहीं बचा। पानी साधारण है, पर चंदन के मेल से वह पूजा के योग्य बन जाता है। इस तरह इस जोड़े में आश्रय और आश्रित का संबंध है: प्रभु आश्रय हैं, भक्त उन पर टिका हुआ आश्रित है।

घन और मोर, चाँद और चकोर: देखने की चाह

दूसरा जोड़ा है: प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा। घन का अर्थ है बादल। जंगल में जब काले बादल घिरते हैं, तो मोर ख़ुशी से नाचने लगता है। भक्त कहता है कि प्रभु वन के बादल हैं और वह मोर है, जो उन्हें देखते ही आनंद से भर जाता है। पंक्ति का अगला हिस्सा एक और उदाहरण जोड़ता है: जैसे चितवत चंद चकोरा। यानी जैसे चकोर पक्षी चाँद को एकटक निहारता है।

चितवत का अर्थ है देखना या निहारना। चकोर के बारे में मान्यता है कि वह चाँद का ऐसा प्रेमी है कि रात भर उसी की ओर देखता रहता है। इन दोनों उदाहरणों में एक ही भाव है: भक्त की आँखें और मन केवल अपने आराध्य की ओर लगे हैं। उसे किसी और चीज़ में सुख नहीं मिलता। यही अनन्य भक्ति है। ध्यान दीजिए कि मोर और चकोर दोनों प्रेम करते हैं, पर बदले में कुछ माँगते नहीं। उनका सुख बस देखने में है। रैदास की भक्ति भी ऐसी ही निःस्वार्थ है।

दीपक और बाती: दिन-रात जलती ज्योति

तीसरा जोड़ा है: प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती। दीपक में तेल होता है और बाती उसी तेल को खींचकर जलती है। अकेली बाती जल्दी जलकर ख़त्म हो जाएगी और बाती के बिना दीपक रोशनी नहीं देगा। दोनों मिलते हैं, तभी उजाला होता है। रैदास कहते हैं कि इस मेल से जो ज्योति जलती है, वह दिन-रात जलती रहती है।

इसका भाव है कि भक्त का प्रभु से मेल उसके जीवन को हमेशा के लिए रोशन कर देता है। यह रोशनी केवल पूजा के समय नहीं, हर पल रहती है। बाती की तरह भक्त भी ख़ुद को प्रभु के प्रेम में जलाकर दूसरों के लिए उजाला बनता है। दिन-रात शब्द बताता है कि यह भक्ति कभी-कभार की नहीं, लगातार चलने वाली है।

मोती और धागा, सोना और सुहागा

चौथा जोड़ा है: प्रभु जी तुम मोती, हम धागा। माला में मोती सुंदर और क़ीमती होते हैं, पर धागा ही उन्हें एक साथ पिरोकर रखता है। धागा मोतियों के भीतर से गुज़रता है, बाहर से दिखता भी कम है। भक्त कहता है कि वह धागे जैसा साधारण है, पर प्रभु के गुणों को अपने भीतर पिरोकर रखता है। इसी पंक्ति में अगला उदाहरण आता है: जैसे सोने मिलत सुहागा।

सुहागा एक प्राकृतिक खनिज है, जिसे अंग्रेज़ी में बोरैक्स कहते हैं। सोना पिघलाते समय सुनार उसमें सुहागा मिलाते हैं, तो सोने का मैल अलग होकर ऊपर आ जाता है और सोना पहले से ज़्यादा दमकने लगता है। लोकभाषा में सोने पे सुहागा का अर्थ है किसी अच्छी चीज़ का और भी अच्छा हो जाना। यहाँ भाव है कि प्रभु और भक्त का मेल सोने और सुहागे जैसा शुभ और सुंदर है। दोनों मिलकर एक-दूसरे की शोभा बढ़ाते हैं।

स्वामी और दास: पूरा समर्पण

अंतिम जोड़ा है: प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा। भक्त कहता है कि प्रभु मालिक हैं और वह उनका सेवक है। फिर वह अपना नाम लेकर कहता है कि रैदास ऐसी ही भक्ति करता है। पद की अंतिम पंक्ति में कवि का नाम आना संत कविता की परंपरा है, जिसे छाप कहते हैं।

यहाँ दास होना ग़ुलामी नहीं, प्रेम भरा समर्पण है। भक्त अपने अहंकार को छोड़कर ख़ुद को पूरी तरह आराध्य को सौंप देता है। पूरे पद को साथ रखकर देखें, तो हर जोड़े में एक ही बात है: प्रभु बड़ा है, भक्त छोटा है, पर दोनों का रिश्ता अटूट है। चंदन की सुगंध, बादल का आनंद, चाँद की चाह, दीपक की ज्योति, मोती की माला और सोने की चमक, सब इस अटूट रिश्ते के अलग-अलग रूप हैं। इसलिए पहला पद अनन्य भक्ति और पूरे समर्पण का सुंदर उदाहरण है।

Concepts and terms

पद

गाने के लिए रचा गया छोटा गीत। इसकी पहली पंक्ति टेक कहलाती है, जो बार-बार दोहराई जाती है और पूरे पद का मूल भाव बताती है।

निर्गुण भक्ति

ईश्वर को किसी रूप, मूर्ति या आकार में न बाँधकर मन के भीतर उसकी भक्ति करना। कबीर, रैदास और नामदेव इसी धारा के संत हैं।

आडंबर

दिखावे के लिए किए गए धार्मिक कर्म, जिनमें मन का भाव न हो। संत कवियों ने ऐसे दिखावे का विरोध किया।

अनन्य भक्ति

ऐसी भक्ति जिसमें भक्त का मन केवल अपने आराध्य में लगा हो, किसी और सहारे की चाह न हो।

आराध्य और आराधक

जिसकी पूजा की जाए वह आराध्य, और जो पूजा करे वह आराधक या भक्त। पद में प्रभु आराध्य हैं और रैदास भक्त।

सावधान

भ्रम और सच

करके देखो

Title:

उपमाओं की जोड़ी-माला

Safety:

कैंची और गोंद का प्रयोग ध्यान से कीजिए और बचा काग़ज़ कूड़ेदान में डालिए।

What You Notice:

जैसे धागा पट्टियों को जोड़कर माला बनाता है, वैसे ही पद में भक्त प्रभु के गुणों को अपने भीतर पिरोता है।

Did you know

गुरु ग्रंथ साहिब में अलग-अलग भाषाओं और प्रदेशों के कई संतों की वाणी है। रैदास की वाणी को भी इसमें आदर के साथ स्थान मिला है।

चकोर एक पक्षी है, जिसके बारे में लोककथा है कि वह रात भर चाँद को ही निहारता रहता है। इसी कारण कविता में चकोर सच्चे प्रेम का प्रतीक बन गया।

सुहागा एक प्राकृतिक खनिज है, जिसे अंग्रेज़ी में बोरैक्स कहते हैं। सुनार सोना पिघलाते समय इसे डालते हैं, ताकि मैल अलग हो जाए और सोना चमके।

Memory tricks

छह जोड़े: चं–घ–चाँ–दी–मो–स्वा — चंदन-पानी, घन-मोर, चाँद-चकोर, दीपक-बाती, मोती-धागा, स्वामी-दास।

Practice MCQs with answers (25)

Q1 रैदास को संत कवियों में क्यों गिना जाता है? beginner
  • A उन्होंने आडंबर छोड़कर मन की शुद्ध भक्ति को धर्म माना
  • B उन्होंने राजाओं की वीरता के लंबे-लंबे गीत लिखे
  • C उन्होंने केवल प्रकृति और ऋतुओं का वर्णन किया
  • D उन्होंने संस्कृत में बहुत कठिन शास्त्र और लंबी टीकाएँ लिखीं
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Answer: उन्होंने आडंबर छोड़कर मन की शुद्ध भक्ति को धर्म माना
Why:

मन की शुद्धता।

Q2 रैदास का जन्म किस नगर में हुआ? beginner
  • A मथुरा
  • B उज्जैन
  • C अयोध्या
  • D काशी
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Answer: काशी
Why:

आज का वाराणसी।

Q3 हिंदी साहित्य कोश के अनुसार रैदास किस शताब्दी के संत हैं? intermediate
  • A बारहवीं शताब्दी
  • B पंद्रहवीं शताब्दी
  • C अठारहवीं शताब्दी
  • D उन्नीसवीं शताब्दी
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Answer: पंद्रहवीं शताब्दी
Why:

सन् 1388 से 1518।

Q4 रैदास की भाषा में ब्रजभाषा के साथ दूसरे शब्द क्यों मिले हैं? intermediate
  • A उन्हें ब्रजभाषा ठीक से नहीं आती थी, इसलिए वे भूल जाते थे
  • B राजा ने उन्हें हर भाषा का एक शब्द रखने का आदेश दिया था
  • C संत घूम-घूमकर जनता की मिली-जुली बोली में बात करते थे
  • D वे केवल विदेशी यात्रियों के लिए कविता लिखते थे
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Answer: संत घूम-घूमकर जनता की मिली-जुली बोली में बात करते थे
Why:

लोक की भाषा।

Q5 रैदास की रचनाएँ किस संग्रह में मिलती हैं? beginner
  • A रैदास बानी
  • B रामचरितमानस
  • C सूरसागर
  • D पद्मावत
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Answer: रैदास बानी
Why:

वाणी।

Q6 निर्गुण संत परंपरा की सबसे बड़ी पहचान क्या है? intermediate
  • A ईश्वर की मूर्ति बनाकर रोज़ बड़े उत्सव मनाना
  • B केवल राजदरबार में बैठकर भजन गाना
  • C ईश्वर को किसी एक रूप में बाँधे बिना मन से भक्ति
  • D हर दिन किसी नए तीर्थ की यात्रा करना
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Answer: ईश्वर को किसी एक रूप में बाँधे बिना मन से भक्ति
Why:

कबीर, रैदास, नामदेव।

Q7 रैदास के समय में उनकी वाणी साधारण लोगों को आत्मसम्मान क्यों देती थी? advanced
  • A वे कहते थे कि केवल धनी लोग ही भगवान को पा सकते हैं
  • B वे कहते थे कि भक्ति के लिए संस्कृत पढ़ना ज़रूरी है
  • C वे कहते थे कि तीर्थ गए बिना कोई भक्त नहीं बनता
  • D वे कहते थे कि प्रभु तक पहुँचने के लिए शुद्ध मन ही काफ़ी है
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Answer: वे कहते थे कि प्रभु तक पहुँचने के लिए शुद्ध मन ही काफ़ी है
Why:

जाति-भेद का विरोध।

Q8 पद की पहली पंक्ति को क्या कहा जाता है? beginner
  • A छाप
  • B टेक
  • C दोहा
  • D चौपाई
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Answer: टेक
Why:

बार-बार दोहराई जाती है।

Q9 पहले पद की टेक में भक्त किस बात को असंभव बताता है? beginner
  • A प्रभु के नाम की लगन का छूटना
  • B भजन के लिए रोज़ मंदिर तक जाना
  • C किसी बड़े गुरु से दीक्षा पा लेना
  • D राम का नाम लिखकर याद कर लेना
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Answer: प्रभु के नाम की लगन का छूटना
Why:

नाम-जप की लगन।

Q10 टेक में आए रट शब्द का अर्थ यहाँ क्या है? intermediate
  • A परीक्षा के लिए रटकर याद करना
  • B किसी को ज़ोर से पुकारना
  • C प्रेम से बार-बार नाम जपना
  • D किसी बात पर ज़िद पकड़ना
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Answer: प्रेम से बार-बार नाम जपना
Why:

लगन।

Q11 चंदन-पानी वाले जोड़े में कौन किस पर टिका हुआ है? intermediate
  • A प्रभु भक्त पर टिके हैं
  • B भक्त प्रभु पर टिका है
  • C दोनों अलग-अलग खड़े हैं
  • D पानी चंदन को सुगंध देता है
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Answer: भक्त प्रभु पर टिका है
Why:

भक्त प्रभु पर टिका है।

Q12 चंदन की बास के अंग-अंग में समा जाने से कवि क्या कहना चाहता है? intermediate
  • A भक्त ने बहुत महँगा इत्र ख़रीदकर लगाया है
  • B चंदन का पानी पीने से रोग दूर हो जाते हैं
  • C भक्त को चंदन की लकड़ी बेचनी है
  • D प्रभु के गुण भक्त के पूरे मन में घुल गए हैं
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Answer: प्रभु के गुण भक्त के पूरे मन में घुल गए हैं
Why:

अलग न होने वाला मेल।

Q13 पद में घन शब्द का अर्थ क्या है? beginner
  • A जंगल
  • B बादल
  • C पहाड़
  • D तूफ़ान
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Answer: बादल
Why:

मेघ।

Q14 मोर और बादल के उदाहरण से भक्त की कौन-सी भावना दिखती है? beginner
  • A बारिश से डरकर किसी घर में जाकर छिप जाना
  • B जंगल में भटककर रास्ता भूल जाना
  • C बादलों से बहुत तेज़ हवा माँगना
  • D आराध्य को देखकर मन का आनंद से भर उठना
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Answer: आराध्य को देखकर मन का आनंद से भर उठना
Why:

मोर का नाच।

Q15 चकोर पक्षी को किसका परम प्रेमी माना जाता है? beginner
  • A सूरज का
  • B बादल का
  • C चंद्रमा का
  • D तारों का
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Answer: चंद्रमा का
Why:

एकटक देखता है।

Q16 चकोर और चाँद वाला उदाहरण भक्ति की किस विशेषता को सबसे अच्छी तरह दिखाता है? intermediate
  • A मन और नज़र का केवल आराध्य पर टिक जाना
  • B भक्त का पूरी रात भर जागकर पढ़ाई करना
  • C भक्त का चाँद की यात्रा पर जाना
  • D भक्त का पक्षियों को दाना डालना
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Answer: मन और नज़र का केवल आराध्य पर टिक जाना
Why:

अनन्य भक्ति।

Q17 दीपक और बाती वाली उपमा के ज़रिए रैदास क्या कहना चाहते हैं? beginner
  • A दीपक में तेल डालना भक्त का रोज़ का ज़रूरी काम है
  • B प्रभु से जुड़कर भक्त का जीवन उजाले से भर जाता है
  • C बाती को हमेशा दीपक से अलग करके रखना चाहिए
  • D रात में दीया जलाना एक पुरानी परंपरा भर है
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Answer: प्रभु से जुड़कर भक्त का जीवन उजाले से भर जाता है
Why:

ज्योति दिन-रात।

Q18 ज्योति के दिन-रात जलने की बात भक्ति के बारे में क्या बताती है? intermediate
  • A भक्ति केवल त्योहारों के दिन होती है
  • B भक्ति के लिए हमेशा बिजली की ज़रूरत होती है
  • C भक्ति लगातार चलती है, कभी-कभार की नहीं
  • D भक्ति केवल रात के समय करनी चाहिए
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Answer: भक्ति लगातार चलती है, कभी-कभार की नहीं
Why:

हर पल का भाव।

Q19 मोती और धागे के जोड़े में धागा किसका प्रतीक है? intermediate
  • A साधारण भक्त का, जो गुणों को पिरोकर रखता है
  • B सबसे क़ीमती गहने का, जो सबसे ऊपर दिखता है
  • C टूटे हुए रिश्ते का, जो जुड़ नहीं सकता
  • D कपड़े सिलने वाले दर्ज़ी का, जो सुई चलाता है
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Answer: साधारण भक्त का, जो गुणों को पिरोकर रखता है
Why:

माला बनती है।

Q20 सुनार सोना पिघलाते समय सुहागा क्यों मिलाते हैं? intermediate
  • A ताकि सोना वज़न में पहले से भारी हो जाए
  • B ताकि सोने का रंग नीला हो जाए
  • C ताकि सोना जल्दी ठंडा हो जाए
  • D ताकि मैल अलग हो और सोने की चमक बढ़े
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Answer: ताकि मैल अलग हो और सोने की चमक बढ़े
Why:

बोरैक्स।

Q21 जैसे सोने मिलत सुहागा में प्रभु और भक्त के मेल को कैसा बताया गया है? intermediate
  • A दुखी, जिससे दोनों दूर हो जाते हैं
  • B शुभ, जिससे दोनों की शोभा बढ़ती है
  • C महँगा, जिसे केवल धनी पा सकते हैं
  • D कठोर, जिसमें कोई प्रेम नहीं होता
Show answer
Answer: शुभ, जिससे दोनों की शोभा बढ़ती है
Why:

सोने पे सुहागा।

Q22 भक्त ख़ुद को दास कहता है। यहाँ दास होने का अर्थ क्या है? advanced
  • A किसी राजा का ख़रीदा हुआ ग़ुलाम
  • B डर के कारण आज्ञा मानने वाला नौकर
  • C अहंकार छोड़कर प्रेम से पूरा समर्पण
  • D पैसों के लिए काम करने वाला मज़दूर
Show answer
Answer: अहंकार छोड़कर प्रेम से पूरा समर्पण
Why:

स्वामी-दास का भाव।

Q23 पद की अंतिम पंक्ति में कवि का अपना नाम लेना क्या कहलाता है? intermediate
  • A टेक
  • B अंतरा
  • C मुखड़ा
  • D छाप
Show answer
Answer: छाप
Why:

संत कविता की परंपरा।

Q24 अभिकथन: पहले पद में हर जोड़े में प्रभु को बड़ा और भक्त को छोटा बताया गया है। कारण: रैदास भक्त को आराध्य पर आश्रित और समर्पित मानते हैं। advanced
  • A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
  • B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
  • C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
  • D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Answer: दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
Why:

चंदन-पानी, स्वामी-दास।

Q25 नीचे दिए कथनों को पढ़िए। I. रैदास के कई पद गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं। II. रैदास सगुण धारा के कवि थे और मूर्ति-पूजा पर ज़ोर देते थे। III. पहले पद में भक्त ख़ुद को पानी, मोर, बाती और धागा कहता है। रैदास और पहले पद के बारे में कौन-से कथन ठीक हैं? intermediate
  • A केवल I और II
  • B केवल II और III
  • C केवल I और III
  • D I, II और III तीनों
Show answer
Answer: केवल I और III
Why:

रैदास निर्गुण संत थे।

Important short questions (7)

संत रैदास का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

संत रविदास, जिन्हें रैदास कहते हैं, काशी में जन्मे। वे पंद्रहवीं शताब्दी के निर्गुण संत कवि थे। उन्होंने आडंबरों का विरोध किया और मन की शुद्धता को धर्म माना। उनकी रचनाएँ रैदास बानी में हैं और कई पद गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं।

रैदास की भाषा की दो विशेषताएँ लिखिए।

पहली विशेषता यह है कि उनकी भाषा सरल और व्यवहार की ब्रजभाषा है। दूसरी, उसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्द भी मिले हैं। रोज़ की चीज़ों के उदाहरणों से वे गहरी बात आसानी से कह देते हैं।

पहले पद की टेक का अर्थ और भाव लिखिए।

टेक का अर्थ है कि भक्त को राम के नाम की लगन लग गई है और अब वह छूट नहीं सकती। भाव यह है कि भक्त और प्रभु का रिश्ता इतना गहरा हो चुका है कि उसे कोई तोड़ नहीं सकता। यहाँ रट का अर्थ प्रेम से नाम जपना है।

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी का भाव स्पष्ट कीजिए।

चंदन को पानी में घिसने से उसकी सुगंध पानी के हर कण में बस जाती है। इसी तरह प्रभु के गुण भक्त के पूरे मन में घुल गए हैं। अब दोनों को अलग नहीं किया जा सकता। प्रभु आश्रय हैं और भक्त उन पर टिका आश्रित।

मोर-बादल और चकोर-चाँद के उदाहरण भक्ति के किस भाव को प्रकट करते हैं?

मोर बादल को देखकर नाचता है और चकोर चाँद को एकटक निहारता है। दोनों का सुख अपने प्रिय को देखने में है। इसी तरह भक्त का मन केवल प्रभु में लगा है। यह अनन्य और निःस्वार्थ भक्ति का भाव है।

दीपक और बाती के उदाहरण से रैदास क्या समझाते हैं?

बाती और दीपक दोनों मिलें, तभी रोशनी होती है। रैदास कहते हैं कि प्रभु दीपक हैं और भक्त बाती। प्रभु से मेल भक्त के जीवन में ऐसी ज्योति जलाता है, जो दिन-रात जलती रहती है।

सुहागा क्या है? सोने और सुहागे का उदाहरण पद में क्यों दिया गया है?

सुहागा एक प्राकृतिक खनिज है, जिसे बोरैक्स कहते हैं। यह सोने का मैल अलग करके उसकी चमक बढ़ाता है। पद में यह उदाहरण बताता है कि प्रभु और भक्त का मेल शुभ है और दोनों की शोभा बढ़ाता है।

Long answer questions (3)

पहले पद के किन-किन जोड़ों से प्रभु और भक्त का रिश्ता दिखाया गया है? हर जोड़े का भाव समझाइए।

पहले पद में रैदास ने छह जोड़े दिए हैं। चंदन और पानी से बताया कि प्रभु के गुण भक्त के हर अंग में बस गए हैं। बादल और मोर से भक्त का आनंद, और चाँद-चकोर से उसका एकटक प्रेम दिखाया। दीपक और बाती से बताया कि प्रभु से मेल जीवन को रोशन करता है।

मोती और धागे से कहा कि भक्त साधारण धागे की तरह प्रभु के गुणों को पिरोकर रखता है। सोने और सुहागे से मेल की शुभता दिखाई। अंत में स्वामी और दास से पूरा समर्पण प्रकट किया। हर जोड़े में प्रभु बड़ा और भक्त छोटा है, पर दोनों अलग नहीं हो सकते।

निर्गुण संत परंपरा की विशेषताएँ बताते हुए समझाइए कि रैदास इस परंपरा के कवि क्यों माने जाते हैं।

निर्गुण संत परंपरा ईश्वर को किसी एक रूप या मूर्ति में नहीं बाँधती; वह हर मन में बसता है। इस परंपरा के संत बाहरी आडंबरों और जाति-भेद का विरोध करते हैं। वे मन की शुद्धता, प्रेम और सच्चाई को धर्म मानते हैं और जनता की भाषा में बात करते हैं।

रैदास में ये सभी गुण मिलते हैं। उन्होंने कहा कि प्रभु तक पहुँचने के लिए शुद्ध मन काफ़ी है, ऊँची जाति या बड़ा कर्मकांड नहीं। दूसरे पद में वे तीर्थ और व्रत की चिंता छोड़ देते हैं। उनकी भाषा सरल ब्रजभाषा है। इसलिए वे कबीर और नामदेव की तरह निर्गुण संत कवि माने जाते हैं।

रैदास ने अपने पद में रोज़ की साधारण चीज़ों को ही उपमा क्यों बनाया होगा? अपने विचार लिखिए।

रैदास जनता के संत थे। उनके सुनने वाले किसान, कारीगर और मज़दूर थे, जो रोज़ पानी, दीपक, धागा और सोना देखते थे। इन्हीं चीज़ों से बात कहने पर हर व्यक्ति उसे तुरंत समझ लेता था। कठिन शास्त्रीय शब्दों की जगह घर की चीज़ें मन को जल्दी छूती हैं।

इससे यह संदेश भी मिलता है कि भक्ति कोई दूर की, कठिन चीज़ नहीं है। वह रोज़ के जीवन में ही है। जो दीपक हम रोज़ जलाते हैं, वही प्रभु से मेल का प्रतीक बन सकता है। इस तरह रैदास ने भक्ति को आम लोगों के घर तक पहुँचा दिया।

Flashcards (17)

रैदास का दूसरा नाम क्या है?
संत रविदास।
रैदास का जन्म कहाँ हुआ?
काशी (वाराणसी) में।
हिंदी साहित्य कोश के अनुसार रैदास का जीवन-काल?
सन् 1388 से 1518।
रैदास किस भक्ति धारा के कवि हैं?
निर्गुण संत परंपरा।
रैदास ने किसका खंडन किया?
बाहरी आडंबरों का।
रैदास की मुख्य भाषा?
सरल ब्रजभाषा।
रैदास की रचनाओं का संग्रह?
रैदास बानी।
उनके पद किस ग्रंथ में शामिल हैं?
आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब में।
पद की पहली पंक्ति को क्या कहते हैं?
टेक।
पद में रट का अर्थ?
लगन, प्रेम से नाम जपना।
बास शब्द का अर्थ?
गंध, सुगंध।
घन शब्द का अर्थ?
बादल, मेघ।
चितवत का अर्थ?
देखना, निहारना।
चकोर किसका प्रेमी माना जाता है?
चंद्रमा का।
सुहागा क्या है?
एक प्राकृतिक खनिज, बोरैक्स।
पद में भक्त ख़ुद को क्या कहता है?
दास, यानी सेवक।
पद के अंत में कवि का नाम आने को क्या कहते हैं?
छाप।

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  • प्रभु और भक्त
  • प्रभु या भक्त
  • सही या भ्रम
  • पहले पद के जोड़ों का क्रम
  • झटपट उत्तर

दूसरा पद, अलंकार और संत नामदेव

दूसरे पद में रैदास कहते हैं कि प्रभु रिश्ता तोड़ भी दें, तो वे नहीं तोड़ेंगे; तीर्थ और व्रत की चिंता छोड़कर वे प्रभु के चरणों पर भरोसा करते हैं। इसी विषय में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार, पदों की भाषा और महाराष्ट्र के संत नामदेव के पदों से तुलना भी है।

What you will be able to do

  • दूसरे पद की हर पंक्ति का सरल अर्थ और भाव लिख सकूँगा।
  • तीर्थ और व्रत की जगह प्रभु-चरणों पर भरोसे का अर्थ समझा सकूँगा।
  • पदों में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार पहचान सकूँगा।
  • पदों की भाषा, लय और भक्ति-भाव जैसी विशेषताएँ उदाहरण के साथ बता सकूँगा।
  • रैदास और नामदेव के पदों की समानता और अंतर बता सकूँगा।

Key points

  • दूसरे पद की शुरुआत में भक्त कहता है कि प्रभु नाता तोड़ भी दें, तो वह नहीं तोड़ेगा, क्योंकि उनसे टूटकर वह किससे जुड़ेगा।

  • भक्त को तीर्थ और व्रत न करने की कोई चिंता नहीं; उसे केवल प्रभु के कमल जैसे चरणों का भरोसा है।

  • भक्त जहाँ भी जाता है, वहीं प्रभु की पूजा है; यह पंक्ति ईश्वर के हर जगह होने, यानी सर्वव्यापकता, का भाव देती है।

  • भक्त अपना मन हरि से जोड़कर बाक़ी सब सांसारिक मोह से नाता तोड़ लेता है।

  • पद के अंत में रैदास कहते हैं कि मन, कर्म और वचन से हर पहर उन्हें प्रभु की ही आशा है।

  • अनुप्रास: एक व्यंजन की बार-बार आवृत्ति, जैसे चितवत चंद चकोरा में च की।

  • उपमा: प्रसिद्ध वस्तु से समानता दिखाना, जैसे सोने और सुहागे के मेल से प्रभु-भक्त के मेल की तुलना।

  • रूपक: उपमेय और उपमान को एक ही मान लेना, जैसे चरन कमल में चरणों को ही कमल कह देना।

  • नामदेव तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी के महाराष्ट्र के निर्गुण संत थे; उन्होंने भी आडंबर और रूढ़ियों का विरोध कर प्रेम और समरसता की बात कही।

Full explanation

दूसरा पद: अटूट नाता

पहले पद में रैदास ने भक्त और प्रभु के रिश्ते को सुंदर जोड़ों से दिखाया था। दूसरे पद में वही रिश्ता और भी पक्के रूप में सामने आता है। यहाँ भक्त केवल प्रेम की बात नहीं करता, बल्कि एक तरह का वचन देता है। वह कहता है कि यह नाता उसकी ओर से कभी नहीं टूटेगा, चाहे कुछ भी हो जाए। इस पद में निष्ठा, विश्वास और कभी न डिगने वाली भक्ति का भाव है।

पद की पहली पंक्ति है: जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ। तोरौ का अर्थ है तोड़ो। भक्त कहता है कि हे राम, अगर तुम यह नाता तोड़ भी दो, तो भी मैं नहीं तोड़ूँगा। फिर वह इसका कारण बताता है: तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ। यानी तुमसे नाता तोड़कर मैं भला किससे जोड़ूँ? उसके लिए प्रभु के अलावा कोई दूसरा सहारा है ही नहीं।

इस पंक्ति में एक बहुत मानवीय भाव है। हम अपने सबसे प्यारे लोगों से भी कभी-कभी रूठ जाते हैं। पर रैदास का भक्त कहता है कि रूठना भी हो, तो प्रभु रूठें, वह ख़ुद कभी नहीं रूठेगा। यह एकतरफ़ा नहीं, बिना शर्त का प्रेम है। आज भी पक्की दोस्ती के लिए यही बात कही जाती है कि तुम छोड़ दो, तो भी मैं साथ नहीं छोड़ूँगा।

तीर्थ और व्रत की चिंता नहीं

दूसरी पंक्ति में भक्त कहता है: तीरथ बरत न करूँ अंदेसा। तीरथ यानी तीर्थ, जैसे काशी, प्रयाग या मथुरा, जहाँ लोग पूजा और स्नान के लिए जाते हैं। बरत यानी व्रत या उपवास। अंदेसा का अर्थ है चिंता, शक या दुविधा। भक्त कहता है कि उसे इस बात की कोई चिंता नहीं कि वह तीर्थ नहीं गया या व्रत नहीं रखा। पंक्ति का दूसरा हिस्सा कारण बताता है: तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां। उसे केवल प्रभु के कमल जैसे चरणों का भरोसा है।

यहाँ रैदास धार्मिक कर्मकांड का मज़ाक़ नहीं उड़ाते, पर उसकी जगह मन की भक्ति को सबसे ऊपर रखते हैं। उनके अनुसार अगर मन प्रभु में लगा है, तो तीर्थ और व्रत की ज़रूरत नहीं रह जाती। उस समय बहुत-से ग़रीब और तथाकथित नीची जाति के लोग न तीर्थ जा सकते थे, न बड़े अनुष्ठान करा सकते थे। रैदास की यह बात उन्हें बताती थी कि प्रभु तक पहुँचने का रास्ता उनके लिए भी पूरी तरह खुला है। इसीलिए यह पंक्ति निष्ठा और विश्वास का सबसे सुंदर उदाहरण है।

जहाँ जाओ, वहीं पूजा

तीसरी पंक्ति है: जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा। भक्त कहता है कि जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ प्रभु की ही पूजा होती है। इस पंक्ति से ईश्वर की सर्वव्यापकता का भाव निकलता है, यानी ईश्वर हर जगह है। उसे किसी एक मंदिर, एक मूर्ति या एक तीर्थ में बाँधा नहीं जा सकता। निर्गुण संतों का यही विश्वास था।

पंक्ति के दूसरे हिस्से में भक्त कहता है: तुम सा देव ओर नहिं दूजा। यानी तुम्हारे जैसा कोई दूसरा देवता नहीं है। यहाँ फिर अनन्य भक्ति का भाव लौटता है। भक्त का मन किसी दूसरे सहारे की ओर नहीं जाता। पहली बात बताती है कि प्रभु हर जगह हैं, दूसरी बताती है कि प्रभु जैसा कोई नहीं। दोनों बातें मिलकर भक्त के पूरे विश्वास को दिखाती हैं।

हरि से जोड़ा, सबसे तोड़ा

चौथी पंक्ति में जोड़ने और तोड़ने का खेल फिर आता है। भक्त कहता है: मैं अपनो मन हरि से जोरौ। यानी उसने अपना मन हरि से जोड़ लिया है। आगे वह कहता है: हरि सो जोरि सबन सो तोरों। मतलब हरि से जुड़कर उसने बाक़ी सबसे नाता तोड़ लिया है।

यहाँ सबसे नाता तोड़ने का अर्थ परिवार या समाज को छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ है सांसारिक मोह, लालच और अहंकार से मन हटा लेना। जब मन एक ऊँचे लक्ष्य से जुड़ जाता है, तो छोटी-छोटी चीज़ों का खिंचाव अपने आप कम हो जाता है। ध्यान दीजिए कि पहली पंक्ति में भक्त ने कहा था कि वह प्रभु से नहीं तोड़ेगा, और यहाँ वह कहता है कि प्रभु के लिए वह बाक़ी सबसे तोड़ देगा। इस तरह पद की शुरुआत और अंत एक-दूसरे को पूरा करते हैं।

हर पहर की आशा: मन, कर्म, वचन

अंतिम पंक्ति है: सबही पहर तुम्हारी आसा। पहर या प्रहर दिन-रात का आठवाँ भाग है, जो लगभग तीन घंटे का होता है। सबही पहर का अर्थ है हर समय, दिन-रात। भक्त को हर पल प्रभु की ही आशा है। फिर कवि अपनी छाप लगाकर कहता है कि यह बात रैदास मन, कर्म और वचन से कह रहे हैं।

मन, कर्म और वचन का अर्थ है सोच, काम और बोली। सच्ची भक्ति वही है, जिसमें तीनों एक जैसे हों। ऐसा न हो कि मुँह से प्रभु का नाम हो, पर मन में लालच और काम में बेईमानी हो। रैदास कहते हैं कि उनकी निष्ठा तीनों रूपों में पूरी है। यह पंक्ति पूरे पद का निचोड़ है: अडिग विश्वास, बिना शर्त प्रेम और हर समय की लगन।

अलंकार: कविता के गहने

जैसे गहने शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, वैसे ही अलंकार कविता की शोभा बढ़ाते हैं। रैदास के पदों में तीन प्रमुख अलंकार मिलते हैं। पहला है अनुप्रास। जहाँ एक ही व्यंजन वर्ण एक से अधिक बार आए और ध्वनि में सौंदर्य पैदा करे, वहाँ अनुप्रास होता है। पहले पद के अंश चितवत चंद चकोरा में च वर्ण बार-बार आता है, इसलिए यहाँ अनुप्रास है। बोलते समय यह अंश कानों में मधुर गूँज पैदा करता है।

दूसरा है उपमा। जब किसी के रूप, गुण या स्वभाव को किसी जानी-मानी वस्तु से मिलाकर बताया जाए, तब उपमा होती है। जैसे सोने मिलत सुहागा में प्रभु और भक्त के मेल की तुलना सोने और सुहागे के मेल से की गई है। उपमा में अक्सर जैसे, सा, सी, सम जैसे शब्द आते हैं, जिन्हें वाचक शब्द कहते हैं। पहले पद में जैसे चितवत चंद चकोरा भी इसी तरह की तुलना है।

तीसरा है रूपक। रूपक में समानता इतनी गहरी होती है कि दोनों को अलग नहीं, एक ही मान लिया जाता है। दूसरे पद के चरन कमल में चरणों को कमल जैसा नहीं, बल्कि कमल ही कह दिया गया है। यहाँ जैसे शब्द नहीं है। उपमा और रूपक का अंतर याद रखने का आसान तरीक़ा है: उपमा कहती है वह कमल जैसा है, रूपक कहता है वह कमल ही है।

पदों की दूसरी विशेषताएँ

रैदास के दोनों पदों की कुछ और विशेषताएँ भी हैं। पहली, अनन्य भक्ति का भाव, जो दूसरे पद की पहली पंक्ति में सबसे साफ़ दिखता है। दूसरी, सरल और लोकधर्मी भाषा, जिसमें मोरा, बाती, राती, तीरथ और बरत जैसे बोलचाल के शब्द हैं। आज हम इन्हें मोर, बत्ती, रात, तीर्थ और व्रत कहते हैं। तीसरी, उपमा और तुलना, जो पहले पद के हर जोड़े में है। चौथी, लय और गेयता: पंक्तियों के अंत में पानी-समानी, बाती-राती, तोरौ-जोरौ जैसी तुक है, इसलिए पद आसानी से गाए जा सकते हैं। पाँचवीं, दृढ़ निष्ठा और आस्था, जो तीर्थ-व्रत की चिंता छोड़ने वाली पंक्ति में झलकती है।

व्याकरण की दृष्टि से भी पद रोचक हैं। चंदन, पानी, दीपक, बाती, मोती और धागा संज्ञा शब्द हैं, क्योंकि ये चीज़ों के नाम हैं। तुम, हम, मैं और जाकी सर्वनाम हैं, क्योंकि ये नाम की जगह आए हैं। भक्तिकाल में रैदास और कबीर दोनों ने निराकार प्रभु की भक्ति पर ज़ोर दिया। इसके पीछे उस समय की सामाजिक स्थिति थी: जाति के आधार पर भेदभाव, महँगे कर्मकांड और कुछ लोगों का मंदिरों से बाहर रखा जाना। निराकार भक्ति हर व्यक्ति के लिए बराबर खुली थी, इसलिए वह आम जनता में बहुत लोकप्रिय हुई।

संत नामदेव: महाराष्ट्र की संत वाणी

पाठ में रैदास जैसे ही एक और संत कवि के दो पद दिए गए हैं: संत नामदेव। उनका जन्म तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी में महाराष्ट्र में हुआ। वे भी निर्गुण संत परंपरा के कवि थे। उन्होंने बाहरी आडंबरों और सामाजिक रूढ़ियों का विरोध किया और समाज में बराबरी, प्रेम तथा निराकार भक्ति की बात कही। उनकी वाणी भी गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल है।

नामदेव के पहले पद में जीवन की अस्थिरता का भाव है। वे कहते हैं कि माता, पिता, शरीर और यह सारा संसार पहले नहीं था; कोई किसी का स्थायी साथी नहीं है। जैसे पेड़ पर पक्षी कुछ समय के लिए बसेरा करते हैं और फिर उड़ जाते हैं, वैसे ही मनुष्य संसार में कुछ समय के लिए है। अंत में वे बताते हैं कि सच्चे गुरु की कृपा से उन्हें परम तत्व का दर्शन हुआ। दूसरे पद में प्रभु से बिछड़ने की बेचैनी है, जिसे तालाबेली कहा गया है। नामदेव कहते हैं कि जैसे बछड़े के बिना गाय अकेली और व्याकुल रहती है, और पानी के बिना मछली तड़पती है, वैसे ही राम-नाम के बिना उनका मन तड़पता है।

दोनों संतों में कई समानताएँ हैं। दोनों निर्गुण भक्ति के कवि हैं और दोनों आडंबर का विरोध करते हैं। दोनों रोज़ के जीवन से उदाहरण लेते हैं: रैदास के पास चंदन, दीपक और धागा है, तो नामदेव के पास गाय, बछड़ा और मछली। अंतर भी है। रैदास के पदों में भक्त और प्रभु के मिलन का आनंद और समर्पण अधिक है। नामदेव के पदों में संसार की नश्वरता, गुरु की महिमा और बिछड़ने की तड़प अधिक है। भाषा में भी नामदेव के पदों पर पश्चिमी और मराठी बोलियों का रंग है।

Concepts and terms

अनुप्रास अलंकार

जहाँ एक ही व्यंजन वर्ण एक से अधिक बार आकर ध्वनि का सौंदर्य बढ़ाए। उदाहरण: चितवत चंद चकोरा।

उपमा अलंकार

जहाँ किसी प्रसिद्ध वस्तु से समानता दिखाकर रूप, गुण या धर्म बताया जाए। इसमें जैसे, सा, सम जैसे शब्द प्रायः आते हैं।

रूपक अलंकार

जहाँ बहुत अधिक समानता के कारण उपमेय पर उपमान का आरोप कर दोनों को एक ही मान लिया जाए, जैसे चरण ही कमल हैं।

सर्वव्यापकता

ईश्वर का हर जगह होना। भक्त जहाँ भी जाए, वहीं प्रभु की पूजा संभव है, किसी एक मंदिर या तीर्थ तक सीमित नहीं।

मन, कर्म, वचन

सोच, काम और बोली, तीनों में एक जैसी निष्ठा। रैदास कहते हैं कि उनकी आशा तीनों रूपों में केवल प्रभु से है।

सावधान

भ्रम और सच

करके देखो

Title:

पदों की भजन-संध्या

Safety:

वाद्य धीमी आवाज़ में बजाइए, ताकि पास की कक्षाओं को परेशानी न हो।

What You Notice:

पद गाने के लिए ही बने हैं; लय और तुक के साथ गाने पर उनका भाव और गहराई से समझ आता है।

मिलाकर देखो

Scenario:

इशिता की दादी हर साल हरिद्वार जाकर गंगा-स्नान करती थीं। इस साल घुटनों के दर्द के कारण डॉक्टर ने लंबी यात्रा से मना कर दिया। दादी उदास रहने लगीं कि इस बार उनका तीर्थ छूट जाएगा। इशिता ने स्कूल में रैदास के पद पढ़े थे। उसने दादी को तीर्थ-व्रत वाली पंक्ति का अर्थ समझाया और रैदास से जुड़ी कहावत भी सुनाई, मन चंगा तो कठौती में गंगा। फिर उसने सुझाव दिया कि दादी हर सुबह घर के आँगन में बैठकर भजन गाएँ और मोहल्ले के बच्चों को कहानियाँ सुनाएँ। कुछ हफ़्तों में दादी का मन फिर से खिल उठा।

Activity:

अपने घर के किसी बुज़ुर्ग से पूछिए कि उनके लिए भक्ति या आस्था का क्या अर्थ है, और उनके विचार पाँच वाक्यों में लिखिए।

Analysis:

इशिता ने पाठ को केवल परीक्षा तक नहीं रखा; उसने रैदास की सीख से एक उदास मन को सहारा दिया।

Did you know

रैदास से जुड़ी एक प्रसिद्ध कहावत है: मन चंगा तो कठौती में गंगा। यानी मन शुद्ध हो, तो घर के छोटे बरतन का पानी भी गंगाजल जैसा पवित्र है।

संत नामदेव की वाणी भी गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल है। महाराष्ट्र के पंढरपुर में उनकी स्मृति में आज भी बड़ा मेला लगता है।

प्रहर या पहर दिन-रात के आठवें हिस्से को कहते हैं, जो लगभग तीन घंटे का होता है। सबही पहर कहने का अर्थ है पूरे दिन-रात, हर समय।

Memory tricks

अलंकार की तिकड़ी: अ–उ–रू — अनुप्रास में ध्वनि दोहराई, उपमा में जैसे से तुलना, रूपक में दोनों एक ही।

Practice MCQs with answers (25)

Q1 तुम तोड़ो तो भी मैं नहीं तोड़ूँगा, राम से कहे इस वचन में भक्त का कौन-सा भाव सबसे गहरा है? beginner
  • A प्रभु से रूठने की ज़िद
  • B बिना शर्त का अटूट प्रेम
  • C संसार की चीज़ों का मोह
  • D पूजा-पाठ से ऊब और थकान
Show answer
Answer: बिना शर्त का अटूट प्रेम
Why:

मैं नहीं तोड़ूँगा।

Q2 भक्त के अनुसार प्रभु से नाता तोड़कर वह क्या नहीं कर पाएगा? intermediate
  • A फिर से कभी तीर्थ नहीं जा पाएगा
  • B अपने घर का काम नहीं कर पाएगा
  • C किसी और से नाता जोड़ नहीं पाएगा
  • D भजन गाने के लिए गुरु नहीं ढूँढ़ पाएगा
Show answer
Answer: किसी और से नाता जोड़ नहीं पाएगा
Why:

कवन सौं जोरौ।

Q3 दूसरे पद में तोरौ और जोरौ का अर्थ क्रम से क्या है? beginner
  • A तोड़ो और जोड़ो
  • B दौड़ो और रोको
  • C छोड़ो और भागो
  • D रोओ और हँसो
Show answer
Answer: तोड़ो और जोड़ो
Why:

नाते का खेल।

Q4 तीर्थ-व्रत वाली पंक्ति में भक्त अपना भरोसा कहाँ टिकाता है? intermediate
  • A गंगा के पवित्र और पुराने घाटों पर
  • B मंदिर के ऊँचे सुनहरे शिखर पर
  • C पुजारी के बताए नियमों पर
  • D प्रभु के कमल जैसे चरणों पर
Show answer
Answer: प्रभु के कमल जैसे चरणों पर
Why:

चरन कमल एक भरोसा।

Q5 अंदेसा शब्द का अर्थ इस पंक्ति में क्या है? beginner
  • A चिंता या आशंका
  • B ख़ुशी या उत्सव
  • C भरोसा या विश्वास
  • D यात्रा या सफ़र
Show answer
Answer: चिंता या आशंका
Why:

शक, दुविधा।

Q6 तीर्थ-व्रत की जगह रैदास किसे भक्ति की असली नींव मानते हैं? intermediate
  • A मंदिर में चढ़ाए गए महँगे चढ़ावे को
  • B हर साल नए तीर्थ की लंबी यात्रा को
  • C प्रभु के चरणों पर अटल भरोसे को
  • D दिन भर भूखा रहकर किए गए उपवास को
Show answer
Answer: प्रभु के चरणों पर अटल भरोसे को
Why:

मन की भक्ति।

Q7 तीर्थ-व्रत की चिंता छोड़ने वाली बात उस समय के ग़रीब लोगों के लिए क्यों महत्वपूर्ण थी? advanced
  • A इससे उन्हें तीर्थ जाने के लिए सरकार से पैसे मिलने लगे
  • B इससे उन्हें व्रत रखने की पुरानी आदत छोड़नी पड़ी
  • C इससे उन्हें राजा के दरबार में जगह मिल गई
  • D इससे उन्हें लगा कि प्रभु तक उनका रास्ता भी खुला है
Show answer
Answer: इससे उन्हें लगा कि प्रभु तक उनका रास्ता भी खुला है
Why:

सबके लिए भक्ति।

Q8 किस अंश से पता चलता है कि रैदास के प्रभु किसी एक स्थान में बँधे नहीं हैं? intermediate
  • A प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा
  • B जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा
  • C तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां
  • D जैसे चितवत चंद चकोरा
Show answer
Answer: जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा
Why:

हर जगह पूजा।

Q9 तुम सा देव ओर नहिं दूजा में कौन-सा भाव सबसे प्रबल है? intermediate
  • A सभी देवताओं की एक साथ मिलकर पूजा करना
  • B देवताओं की आपस में तुलना करके लड़ना
  • C नए देवता की मूर्ति बनाकर रखना
  • D प्रभु के अलावा किसी और का सहारा न लेना
Show answer
Answer: प्रभु के अलावा किसी और का सहारा न लेना
Why:

अनन्य भक्ति।

Q10 हरि सो जोरि सबन सो तोरों में सबसे नाता तोड़ने का सही अर्थ क्या है? advanced
  • A लालच, अहंकार और सांसारिक मोह से मन हटाना
  • B घर-परिवार छोड़कर हमेशा के लिए जंगल चले जाना
  • C सब दोस्तों से झगड़ा करके बात बंद कर देना
  • D अपने गाँव के लोगों से कोई काम न रखना
Show answer
Answer: लालच, अहंकार और सांसारिक मोह से मन हटाना
Why:

मोह से मुक्ति।

Q11 सबही पहर तुम्हारी आसा में सबही पहर का अर्थ क्या है? beginner
  • A केवल सुबह के समय
  • B केवल पूजा के समय
  • C हर समय, दिन-रात
  • D केवल त्योहार के दिन
Show answer
Answer: हर समय, दिन-रात
Why:

आठ पहर।

Q12 मन क्रम वचन कहकर रैदास अपनी भक्ति की कौन-सी विशेषता बताते हैं? intermediate
  • A केवल मुँह से बड़े-बड़े भजन गाने की आदत
  • B सोच, काम और बोली तीनों में एक जैसी निष्ठा
  • C केवल मन में सोचते रहना, कुछ न करना
  • D केवल काम करते रहना, प्रभु का नाम न लेना
Show answer
Answer: सोच, काम और बोली तीनों में एक जैसी निष्ठा
Why:

तीनों एक।

Q13 किसी पंक्ति में एक ही व्यंजन की ध्वनि बार-बार गूँजे, तो वहाँ कौन-सा अलंकार माना जाता है? beginner
  • A उपमा
  • B रूपक
  • C यमक
  • D अनुप्रास
Show answer
Answer: अनुप्रास
Why:

ध्वनि का सौंदर्य।

Q14 चितवत चंद चकोरा में अनुप्रास किस वर्ण की आवृत्ति से बना है? beginner
  • A त वर्ण
  • B र वर्ण
  • C च वर्ण
  • D क वर्ण
Show answer
Answer: च वर्ण
Why:

तीन बार।

Q15 जैसे सोने मिलत सुहागा में कौन-सा अलंकार है? intermediate
  • A रूपक
  • B उपमा
  • C अनुप्रास
  • D श्लेष
Show answer
Answer: उपमा
Why:

जैसे वाचक शब्द।

Q16 चरन कमल में रूपक अलंकार क्यों माना जाता है? advanced
  • A चरणों को कमल जैसा नहीं, कमल ही कह दिया गया है
  • B इसमें एक ही वर्ण बार-बार आया है और ध्वनि बनी है
  • C इसमें जैसे शब्द से दो चीज़ों की तुलना की गई है
  • D इसमें एक शब्द के दो अलग-अलग अर्थ निकलते हैं
Show answer
Answer: चरणों को कमल जैसा नहीं, कमल ही कह दिया गया है
Why:

उपमेय पर उपमान का आरोप।

Q17 उपमा और रूपक में मुख्य अंतर क्या है? intermediate
  • A उपमा केवल गद्य में आती है, जबकि रूपक केवल पद्य में आता है
  • B उपमा में समानता दिखती है, रूपक में दोनों एक हो जाते हैं
  • C उपमा में वर्ण दोहराते हैं, रूपक में शब्द दोहराते हैं
  • D उपमा संस्कृत का अलंकार है, रूपक हिंदी का नहीं
Show answer
Answer: उपमा में समानता दिखती है, रूपक में दोनों एक हो जाते हैं
Why:

जैसा बनाम वही।

Q18 पदों में लयात्मकता और गेयता किस बात से आती है? intermediate
  • A पंक्तियों के बहुत लंबे और बिना किसी तुक के होने से
  • B हर पंक्ति में नई भाषा के शब्द डालने से
  • C पंक्तियों के अंत की तुक और नियमित दोहराव से
  • D पदों में संख्याओं और तारीख़ों के होने से
Show answer
Answer: पंक्तियों के अंत की तुक और नियमित दोहराव से
Why:

बाती-राती, तोरौ-जोरौ।

Q19 पदों में आए बाती और राती शब्दों को आज बोलचाल में क्या कहते हैं? beginner
  • A बत्ती और रात
  • B बात और रानी
  • C बाट और रस्सी
  • D बादल और राख
Show answer
Answer: बत्ती और रात
Why:

लोक के शब्द।

Q20 पठित पदों के आधार पर इनमें से कौन-सा शब्द सर्वनाम है? beginner
  • A चंदन
  • B धागा
  • C दीपक
  • D तुम
Show answer
Answer: तुम
Why:

नाम की जगह।

Q21 रैदास और कबीर जैसे संतों ने निराकार भक्ति पर ज़ोर क्यों दिया होगा? advanced
  • A जाति-भेद और महँगे कर्मकांड से आम लोग दूर रखे जाते थे
  • B उस समय मंदिर बनाने के लिए पत्थर बिलकुल नहीं मिलता था
  • C राजाओं ने सभी मूर्तियों पर पूरी तरह रोक लगा दी थी
  • D लोगों को मूर्ति बनाने की कला बिलकुल नहीं आती थी
Show answer
Answer: जाति-भेद और महँगे कर्मकांड से आम लोग दूर रखे जाते थे
Why:

सामाजिक परिस्थिति।

Q22 नामदेव संसार में मनुष्य के रहने की तुलना किससे करते हैं? intermediate
  • A नदी में चलती हुई किसी पुरानी नाव से
  • B पहाड़ पर बने किसी पक्के क़िले से
  • C पेड़ पर पक्षियों के कुछ दिन के बसेरे से
  • D खेत में खड़ी पकी हुई फ़सल से
Show answer
Answer: पेड़ पर पक्षियों के कुछ दिन के बसेरे से
Why:

तरवर पंखि-बसेरा।

Q23 नामदेव के दूसरे पद में बछड़े बिना गाय और पानी बिना मछली के उदाहरण क्या दिखाते हैं? intermediate
  • A पशुओं की देखभाल का सही तरीक़ा
  • B खेती और मछली पालन का महत्व
  • C गाँव के जीवन की सुंदरता
  • D प्रभु से बिछड़ने की गहरी व्याकुलता
Show answer
Answer: प्रभु से बिछड़ने की गहरी व्याकुलता
Why:

तालाबेली।

Q24 अभिकथन: रैदास दूसरे पद में तीर्थ और व्रत की चिंता नहीं करते। कारण: उनके लिए प्रभु के चरणों पर भरोसा ही सबसे बड़ा सहारा है। advanced
  • A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
  • B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
  • C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
  • D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
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Answer: दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
Why:

चरन कमल एक भरोसा।

Q25 नीचे दिए कथनों को पढ़िए। I. नामदेव भी निर्गुण संत परंपरा के कवि थे। II. चरन कमल में उपमा अलंकार है, क्योंकि जैसे शब्द आया है। III. सबही पहर का अर्थ हर समय है। पदों और अलंकारों के बारे में कौन-से कथन सही हैं? intermediate
  • A केवल I और II
  • B केवल II और III
  • C I, II और III तीनों
  • D केवल I और III
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Answer: केवल I और III
Why:

चरन कमल में रूपक है।

Important short questions (7)

दूसरे पद की पहली पंक्ति में नाता न तोड़ने की बात से रैदास की कैसी निष्ठा प्रकट होती है?

भक्त कहता है कि प्रभु नाता तोड़ भी दें, तो वह नहीं तोड़ेगा। प्रभु से टूटकर वह किससे जुड़ेगा, उसका कोई और सहारा नहीं। यह बिना शर्त के प्रेम और अटूट निष्ठा का भाव है।

तीर्थ-व्रत वाली पंक्ति का अर्थ लिखकर उसका भाव स्पष्ट कीजिए।

भक्त कहता है कि उसे तीर्थ और व्रत न करने की कोई चिंता नहीं। उसे केवल प्रभु के कमल जैसे चरणों का भरोसा है। भाव यह है कि मन की सच्ची भक्ति बाहरी कर्मकांड से ऊपर है।

दूसरे पद की कौन-सी पंक्ति ईश्वर की सर्वव्यापकता बताती है? समझाइए।

जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा वाली पंक्ति यह भाव देती है। भक्त जहाँ भी जाता है, वहीं प्रभु की पूजा होती है। यानी ईश्वर हर जगह है, किसी एक मंदिर या तीर्थ में सीमित नहीं।

मन, क्रम, वचन से भक्ति करने का क्या अर्थ है? एक उदाहरण दीजिए।

इसका अर्थ है सोच, काम और बोली, तीनों में एक जैसी सच्चाई। जैसे कोई ईमानदारी की बात कहे, मन में भी ईमानदार रहे और काम भी ईमानदारी से करे। तभी उसकी निष्ठा पूरी मानी जाती है।

अनुप्रास और उपमा अलंकार की परिभाषा पदों के एक-एक उदाहरण के साथ लिखिए।

जहाँ एक व्यंजन वर्ण बार-बार आए, वहाँ अनुप्रास होता है। चितवत चंद चकोरा में च बार-बार आता है। जहाँ प्रसिद्ध वस्तु से समानता दिखाई जाए, वहाँ उपमा होती है। सोने और सुहागे के मेल से प्रभु-भक्त के मेल की तुलना इसका उदाहरण है।

रूपक अलंकार किसे कहते हैं? चरन कमल में यह कैसे है?

जहाँ गहरी समानता के कारण उपमेय पर उपमान का आरोप हो, वहाँ रूपक होता है। तब दोनों को एक ही मान लिया जाता है। चरन कमल में चरणों को कमल जैसा नहीं, कमल ही कहा गया है। इसलिए यहाँ रूपक है।

रैदास और नामदेव के पदों में दो समानताएँ लिखिए।

पहली समानता यह है कि दोनों निर्गुण संत हैं और आडंबर का विरोध करते हैं। दूसरी, दोनों रोज़ के जीवन से उदाहरण लेते हैं। रैदास के पास दीपक और धागा है, तो नामदेव के पास गाय और मछली।

Long answer questions (3)

दूसरे पद का भावार्थ अपने शब्दों में लिखिए।

दूसरे पद में भक्त प्रभु से अपने अटूट नाते की बात करता है। वह कहता है कि प्रभु नाता तोड़ भी दें, तो भी वह नहीं तोड़ेगा, क्योंकि उसका कोई दूसरा सहारा नहीं। उसे तीर्थ और व्रत न करने की चिंता नहीं, क्योंकि उसे प्रभु के चरणों का भरोसा है।

वह जहाँ जाता है, वहीं प्रभु की पूजा होती है, और प्रभु जैसा कोई दूसरा देव नहीं। उसने मन हरि से जोड़कर सांसारिक मोह से नाता तोड़ लिया है। अंत में रैदास कहते हैं कि मन, कर्म और वचन से हर पहर उन्हें प्रभु की ही आशा है। पूरा पद अडिग विश्वास का गीत है।

रैदास के पदों की भाषा और काव्य-सौंदर्य की विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।

रैदास की भाषा सरल, लोकधर्मी ब्रजभाषा है। उसमें मोरा, बाती, राती, तीरथ और बरत जैसे बोलचाल के शब्द हैं। पदों में अनन्य भक्ति और दृढ़ निष्ठा का भाव है, जो प्रभु से नाता न तोड़ने वाली पंक्ति में दिखता है।

काव्य-सौंदर्य के लिए अलंकारों का सुंदर प्रयोग है। चितवत चंद चकोरा में अनुप्रास, सोने और सुहागे वाले अंश में उपमा और चरन कमल में रूपक है। पानी-समानी, बाती-राती, तोरौ-जोरौ जैसी तुक से पदों में लय और गेयता है। रोज़ की चीज़ों से दी गई उपमाएँ गहरी बात को सरल बना देती हैं।

रैदास और नामदेव के पदों की तुलना कीजिए। दोनों में क्या समानताएँ और अंतर हैं?

रैदास काशी के और नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, पर दोनों निर्गुण परंपरा के कवि हैं। दोनों आडंबर और रूढ़ियों का विरोध करते हैं और मन की सच्ची भक्ति को महत्व देते हैं। दोनों ने रोज़ की चीज़ों से उपमाएँ लीं: रैदास ने चंदन, दीपक और धागा, नामदेव ने गाय, बछड़ा और मछली।

अंतर यह है कि रैदास के पदों में प्रभु से मिलन का आनंद और पूरा समर्पण अधिक है। नामदेव के पदों में संसार की नश्वरता, गुरु की कृपा और प्रभु से बिछड़ने की व्याकुलता अधिक है। नामदेव संसार को पेड़ पर पक्षियों का बसेरा कहते हैं। भाषा में भी नामदेव पर मराठी और पश्चिमी बोलियों का रंग है।

Flashcards (17)

दूसरे पद में तोरौ का अर्थ?
तोड़ो।
भक्त प्रभु से नाता क्यों नहीं तोड़ेगा?
उनसे टूटकर किससे जुड़ेगा, कोई दूसरा सहारा नहीं।
तीरथ और बरत के आज के रूप?
तीर्थ और व्रत।
अंदेसा का अर्थ?
चिंता, शक, आशंका।
भक्त को किसका भरोसा है?
प्रभु के चरण-कमलों का।
ईश्वर के हर जगह होने का भाव किस पंक्ति में है?
जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा।
हरि से जुड़कर भक्त किससे नाता तोड़ता है?
सांसारिक मोह और बाक़ी सब से।
एक पहर कितने समय का होता है?
लगभग तीन घंटे।
मन, क्रम, वचन का अर्थ?
सोच, काम और बोली।
अनुप्रास अलंकार किसे कहते हैं?
व्यंजन वर्ण की बार-बार आवृत्ति।
चितवत चंद चकोरा में कौन-सा अलंकार?
अनुप्रास।
उपमा अलंकार का उदाहरण?
जैसे सोने मिलत सुहागा।
चरन कमल में कौन-सा अलंकार?
रूपक।
संत नामदेव कहाँ के थे?
महाराष्ट्र के।
नामदेव संसार की तुलना किससे करते हैं?
पेड़ पर पक्षियों के बसेरे से।
तालाबेली का अर्थ?
व्याकुलता, बेचैनी।
पठित पदों से दो सर्वनाम?
तुम, हम (मैं भी)।

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  • अलंकार और उदाहरण
  • रैदास या नामदेव
  • सही या भ्रम
  • दूसरे पद का क्रम
  • झटपट उत्तर

Class 9 Hindi Chapter 8 — frequently asked questions

संत रैदास का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

संत रविदास, जिन्हें रैदास कहते हैं, काशी में जन्मे। वे पंद्रहवीं शताब्दी के निर्गुण संत कवि थे। उन्होंने आडंबरों का विरोध किया और मन की शुद्धता को धर्म माना। उनकी रचनाएँ रैदास बानी में हैं और कई पद गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं।

रैदास की भाषा की दो विशेषताएँ लिखिए।

पहली विशेषता यह है कि उनकी भाषा सरल और व्यवहार की ब्रजभाषा है। दूसरी, उसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्द भी मिले हैं। रोज़ की चीज़ों के उदाहरणों से वे गहरी बात आसानी से कह देते हैं।

पहले पद की टेक का अर्थ और भाव लिखिए।

टेक का अर्थ है कि भक्त को राम के नाम की लगन लग गई है और अब वह छूट नहीं सकती। भाव यह है कि भक्त और प्रभु का रिश्ता इतना गहरा हो चुका है कि उसे कोई तोड़ नहीं सकता। यहाँ रट का अर्थ प्रेम से नाम जपना है।

दूसरे पद की पहली पंक्ति में नाता न तोड़ने की बात से रैदास की कैसी निष्ठा प्रकट होती है?

भक्त कहता है कि प्रभु नाता तोड़ भी दें, तो वह नहीं तोड़ेगा। प्रभु से टूटकर वह किससे जुड़ेगा, उसका कोई और सहारा नहीं। यह बिना शर्त के प्रेम और अटूट निष्ठा का भाव है।

तीर्थ-व्रत वाली पंक्ति का अर्थ लिखकर उसका भाव स्पष्ट कीजिए।

भक्त कहता है कि उसे तीर्थ और व्रत न करने की कोई चिंता नहीं। उसे केवल प्रभु के कमल जैसे चरणों का भरोसा है। भाव यह है कि मन की सच्ची भक्ति बाहरी कर्मकांड से ऊपर है।

दूसरे पद की कौन-सी पंक्ति ईश्वर की सर्वव्यापकता बताती है? समझाइए।

जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा वाली पंक्ति यह भाव देती है। भक्त जहाँ भी जाता है, वहीं प्रभु की पूजा होती है। यानी ईश्वर हर जगह है, किसी एक मंदिर या तीर्थ में सीमित नहीं।

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