Class 9 Hindi Chapter 6: रीढ़ की हड्डी
- 3 topics
- 75 MCQs
- 21 short answers
- 9 long answers
- 51 flashcards
- 15 games
- ~130 min read
- Hindi
एकांकी, लेखक और मेहमानों के आने की तैयारी
जगदीशचंद्र माथुर की एकांकी रीढ़ की हड्डी लड़की देखने की रस्म पर व्यंग्य है। पहले दृश्य में रामस्वरूप, प्रेमा और रतन मेहमानों के स्वागत की हड़बड़ी में हैं, उमा की पढ़ाई छिपाने की योजना बनती है और मक्खन मँगाना याद आता है।
What you will be able to do
- एकांकी विधा की पहचान और उसके मुख्य तत्व, जैसे पात्र, संवाद और रंग-निर्देश, बता सकूँगा।
- जगदीशचंद्र माथुर का साहित्यिक परिचय दे सकूँगा।
- एकांकी के पात्रों और उनके आपसी संबंधों का परिचय दे सकूँगा।
- रामस्वरूप के आधुनिक दिखावे और रूढ़िवादी व्यवहार के अंतर को उदाहरण से समझा सकूँगा।
- प्रेमा के संवादों से उस दौर में स्त्री-शिक्षा की स्थिति का अनुमान लगा सकूँगा।
Key points
रीढ़ की हड्डी सन् 1939 में लिखी गई एकांकी है, जो विवाह की पुरानी रीतियों और स्त्री-शिक्षा पर संकीर्ण सोच पर चोट करती है।
जगदीशचंद्र माथुर (1917, शाहजहाँपुर) प्रशासक और नाटककार थे; कोणार्क उनका सबसे प्रसिद्ध और सबसे ज़्यादा खेला गया नाटक है।
एकांकी एक अंक का नाटक है, जिसमें कम पात्र, एक मुख्य घटना और तेज़ गति होती है।
कोष्ठक में दिए रंग-निर्देश मंच-सज्जा, पात्रों की वेशभूषा, हाव-भाव और आवाज़ के बारे में बताते हैं।
मुख्य पात्र हैं: उमा, उसके माता-पिता रामस्वरूप और प्रेमा, लड़का शंकर, उसके पिता गोपालप्रसाद और घरेलू सहायक रतन।
रामस्वरूप ने उमा को बी.ए. तक पढ़ाया, पर रिश्ते के लिए उसकी पढ़ाई छिपाने को तैयार हैं।
प्रेमा पुरानी सोच की हैं; उन्हें अपना ज़माना अच्छा लगता है, जब लड़कियाँ थोड़ा-सा पढ़कर घर सँभालती थीं।
उमा पाउडर लगाने से इनकार करके मुँह फुलाए लेटी है, जो उसकी नाराज़गी और स्वाभिमान का पहला संकेत है।
मक्खन का न आना और रतन की भूलें दृश्य में हास्य भरती हैं, और यही मक्खन एकांकी के अंत में फिर लौटता है।
Full explanation
एकांकी: एक अंक का पूरा नाटक
रीढ़ की हड्डी एक एकांकी है। एकांकी वह छोटा नाटक है जो एक ही अंक में पूरा हो जाता है। बड़े नाटक में कई अंक और कई दृश्य होते हैं, घटनाएँ लंबे समय तक फैली रहती हैं और पात्र भी बहुत होते हैं। एकांकी में आम तौर पर एक मुख्य घटना होती है, गिने-चुने पात्र होते हैं, और कहानी बहुत तेज़ी से अपने चरम बिंदु तक पहुँचती है। इसीलिए एकांकी को पढ़ते या देखते समय दर्शक का ध्यान कहीं भटकता नहीं।
एकांकी को समझने के लिए कुछ बिंदु याद रखिए। पहला, पात्र: इस एकांकी में उमा, रामस्वरूप, प्रेमा, शंकर, गोपालप्रसाद और रतन हैं। दूसरा, संवाद: पात्रों की आपसी बातचीत, जिससे कहानी आगे बढ़ती है। तीसरा, रंग-निर्देश या मंच-निर्देश: कोष्ठक में लिखी वे बातें जो बताती हैं कि कमरा कैसा सजा है, कौन किस ओर से आता है, किसकी आवाज़ कैसी है। चौथा, देश-काल और वातावरण: यह एकांकी सन् 1939 के आस-पास के एक मध्यवर्गीय घर में घटती है। पाँचवाँ, समस्या: लड़कियों की शिक्षा और विवाह को लेकर समाज की संकीर्ण सोच। छठा, परिणाम: अंत में उमा का खुलकर बोलना और रिश्ते का टूट जाना। इन सबके साथ एकांकी में एक मुख्य विचार भी होता है, जो यहाँ आत्मसम्मान और नैतिक साहस है।
जगदीशचंद्र माथुर: प्रशासक भी, नाटककार भी
जगदीशचंद्र माथुर का जन्म सन् 1917 में उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में हुआ। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और फिर भारतीय सिविल सेवा, यानी आई.सी.एस., में चुने गए। वे बिहार के शिक्षा सचिव, आकाशवाणी के महानिदेशक और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव जैसे बड़े पदों पर रहे। इतनी व्यस्त प्रशासनिक ज़िंदगी के बीच भी उन्होंने जीवन भर लिखना नहीं छोड़ा।
लेखन की शुरुआत उन्होंने प्रयाग में पढ़ते समय ही कर दी थी। उस समय की प्रसिद्ध पत्रिकाओं, जैसे चाँद और रूपाभ, में उनके एकांकी छपने लगे थे। उन्होंने इतिहास पर आधारित नाटक भी लिखे और समाज की समस्याओं पर आधारित एकांकी भी। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में कोणार्क, भोर का तारा, शारदीया, पहला राजा और ओ मेरे सपने गिने जाते हैं। दस तस्वीरें और जिन्होंने जीना जाना भी उन्हीं की कलम से निकले। कोणार्क उनका सबसे चर्चित और सबसे ज़्यादा मंच पर खेला गया नाटक है। उनकी सारी रचनाएँ चार खंडों वाली रचनावली में संकलित हैं। सन् 1978 में उनका निधन हुआ। हिंदी रंगमंच को आगे बढ़ाने में उनके नाटकों और एकांकियों का बड़ा योगदान माना जाता है।
एकांकी की पृष्ठभूमि: 1939 का समाज
यह एकांकी सन् 1939 में लिखी गई थी। उस समय भारतीय समाज में लड़कियों को पढ़ाई और काम के बराबर अवसर नहीं मिलते थे। बहुत-से परिवार मानते थे कि लड़की को बस इतना पढ़ना चाहिए कि वह चिट्ठी लिख सके और घर का हिसाब रख सके। विवाह के लिए ऐसी लड़की खोजी जाती थी जो सुंदर हो, घर के काम जानती हो और ज़्यादा पढ़ी-लिखी न हो। विवाह तय करते समय लड़के वाले लड़की को देखने आते थे और उससे तरह-तरह के प्रश्न पूछते थे, मानो किसी चीज़ को परखा जा रहा हो।
लेखक इसी रस्म को कहानी का केंद्र बनाते हैं। वे दिखाते हैं कि पढ़े-लिखे और समाज में ऊँचे माने जाने वाले लोग भी लड़कियों के मामले में कितने पिछड़े विचार रखते थे। साथ ही वे यह भी दिखाते हैं कि लड़की के माता-पिता किस दबाव में अपनी ही बेटी की उपलब्धियाँ छिपाने लगते हैं। एकांकी में बहुत-सी जगह हँसी आती है, पर उस हँसी के पीछे एक कड़वी सच्चाई है। इसी को व्यंग्य कहते हैं। एकांकी की नायिका उमा उस पढ़ी-लिखी, आत्मविश्वासी स्त्री का प्रतीक है जो इस अपमान को चुपचाप स्वीकार नहीं करती।
पहला दृश्य: तख्त, दरी और हड़बड़ी
एकांकी का पहला रंग-निर्देश बताता है कि एक साधारण ढंग से सजा कमरा है। अंदर के दरवाज़े से एक अधेड़ उम्र के सज्जन पीछे की ओर चलते हुए आते हैं, जो एक तख्त का एक सिरा पकड़े हैं; दूसरा सिरा घरेलू सहायक रतन ने पकड़ा है। ये सज्जन उमा के पिता बाबू रामस्वरूप हैं। इस छोटे-से निर्देश से ही दर्शक समझ जाते हैं कि घर में किसी ख़ास मेहमान के आने की तैयारी चल रही है और सब कुछ जल्दी-जल्दी हो रहा है।
रामस्वरूप रतन पर बार-बार झुँझलाते हैं। वे उससे पूछते हैं कि क्या भगवान के यहाँ अक्ल बँटते समय वह देर से पहुँचा था। वे अपनी जवानी की ताक़त का बखान भी करते हैं कि तख्त उठाना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं। फिर रतन को दरी और धोबी के यहाँ से आई चद्दर लाने भेजते हैं, और ख़ुद मेज़पोश ठीक करते हैं, गुलदस्ता साफ़ करते हैं और कुर्सियाँ झाड़ते हैं। रतन चद्दर की जगह धोती माँग बैठता है, जिस पर प्रेमा हैरान होकर आती हैं। यह छोटी-सी ग़लतफ़हमी दृश्य में हास्य भरती है। साथ ही यह दिखाती है कि मेहमानों को ख़ुश करने के लिए घर के लोग कितने घबराए हुए हैं। रामस्वरूप हारमोनियम और सितार भी मँगवाते हैं, ताकि मेहमानों के सामने बेटी का गाना-बजाना दिखाया जा सके।
प्रेमा: पुराने ज़माने की सोच
प्रेमा उमा की माँ हैं। वे बताती हैं कि उमा मुँह फुलाए लेटी है। रामस्वरूप उन्हें ताना देते हैं कि माँ होकर भी वे बेटी को नहीं सँभाल पा रहीं। इस पर प्रेमा अपना मन खोलती हैं। उनके अनुसार पति ने ही बेटी को पढ़ा-लिखाकर सिर चढ़ा रखा है। वे कहती हैं कि पढ़ाई-लिखाई का यह झमेला उनकी समझ में नहीं आता। उनके ज़माने में लड़कियाँ अक्षर और गिनती सीख लेतीं, और ज़्यादा हुआ तो स्त्री-सुबोधिनी जैसी किताब पढ़ लेतीं, जिसमें घर-गृहस्थी की सीखें होती थीं। उन्हें लगता है कि उस किताब की बातें बी.ए., एम.ए. की पढ़ाई से भी बढ़कर थीं।
प्रेमा के इन संवादों से उस समय की स्त्री-शिक्षा की स्थिति साफ़ दिखती है। अधिकतर स्त्रियों को बहुत थोड़ी शिक्षा मिलती थी, और उन्हें यही सिखाया जाता था कि उनका असली काम घर सँभालना है। प्रेमा बुरी माँ नहीं हैं। वे बस उसी सोच में पली हैं, जो उनके समाज ने उन्हें दी। इसलिए वे बेटी की पढ़ाई को उसकी ताक़त नहीं, बल्कि परेशानी की जड़ मानती हैं। उन्होंने उमा के सामने पाउडर भी रखा था, ताकि वह सज-धजकर मेहमानों के सामने आए। उनका मानना है कि आजकल लड़की कितनी भी सुंदर हो, बिना सजावट के कोई नहीं पूछता। यह सोच दिखाती है कि लड़की को उसके गुणों से नहीं, उसके रूप से परखा जाता था।
रामस्वरूप: आधुनिकता का दिखावा, भीतर समझौता
रामस्वरूप पहली नज़र में प्रगतिशील लगते हैं। उन्होंने उमा को कॉलेज तक पढ़ाया है, और वे गोपालप्रसाद के पुराने विचारों पर मन ही मन ग़ुस्सा भी होते हैं। वे प्रेमा से कहते हैं कि वे लोग ख़ुद पढ़े-लिखे हैं, वकील हैं, सभाओं में जाते हैं, फिर भी ऐसी बहू चाहते हैं जो ज़्यादा पढ़ी न हो। लड़के के बारे में वे कहते हैं कि बाप सेर है तो लड़का सवा सेर। यानी बेटा पिता से भी एक क़दम आगे है। शंकर मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है, पर कहता है कि शादी का सवाल अलग है और पढ़ाई का अलग।
फिर भी रामस्वरूप इस रिश्ते को हाथ से नहीं जाने देना चाहते। वे मानते हैं कि मजबूरी है और मतलब अपना है। इसलिए वे गोपालप्रसाद से उमा की असली पढ़ाई छिपाने और उसे केवल मैट्रिक तक पढ़ी बताने को तैयार हो जाते हैं। जब प्रेमा कहती हैं कि अच्छा होता उमा को बस इंट्रेंस तक पढ़ाया होता, तो रामस्वरूप घबराकर उन्हें चुप करा देते हैं, कहीं मेहमान सुन न लें। यही उनके चरित्र का अंतर्द्वंद्व है: विचार आधुनिक, पर व्यवहार में समाज के डर से समझौता। एकांकी इसी दोहरेपन पर चोट करती है, क्योंकि जो व्यक्ति सच जानते हुए भी ग़लत के आगे झुकता है, वह भी अन्याय का हिस्सा बन जाता है।
हास्य के छींटे: ग्रामोफ़ोन और मक्खन
एकांकी के पहले हिस्से में कई जगह हल्का-फुल्का हास्य है। जब प्रेमा लगातार बोलती जाती हैं। तब रामस्वरूप मज़ाक़ करते हैं कि ग्रामोफ़ोन दो तरह का होता है। एक आदमी का बनाया, जिसे जब चाहे रोक लो। दूसरा भगवान का बनाया, जिसका रिकॉर्ड एक बार चढ़ जाए तो रुकता ही नहीं। प्रेमा इसे ठठोली, यानी मज़ाक़, कहकर टाल देती हैं। यह संवाद पति-पत्नी के आपसी रिश्ते की सहजता भी दिखाता है।
सबसे मज़ेदार प्रसंग मक्खन का है। नाश्ते में नमकीन, फल, चाय और टोस्ट तैयार हैं, पर ऐन वक़्त पर पता चलता है कि मक्खन तो आया ही नहीं। रामस्वरूप झुँझलाते हैं कि दुकान दूर है और प्रेमा को ठीक समय पर कोई बात याद नहीं आती। रतन को मक्खन लाने भेजा जाता है, पर वह दरवाज़े पर ही खड़ा रह जाता है और तभी मेहमान आ पहुँचते हैं। रामस्वरूप उसे अंदर के दरवाज़े से भगाते हैं। यह छोटी बात आगे चलकर बड़ा अर्थ लेती है। एकांकी के अंत में, जब सब कुछ बिखर चुका है, रतन मक्खन लेकर लौटता है। उस समय यह मक्खन पूरी तैयारी की व्यर्थता और दिखावे की खोखली दौड़ का प्रतीक बन जाता है।
Concepts and terms
एक अंक में पूरा होने वाला छोटा नाटक। इसमें एक मुख्य घटना, सीमित पात्र, कसे हुए संवाद और जल्दी आने वाला चरम बिंदु होता है।
कोष्ठक में लिखी वे सूचनाएँ जो मंच की सजावट, रोशनी, पात्रों के कपड़े, चाल और भाव बताती हैं। ये निर्देशक और अभिनेता की मदद करती हैं।
हँसी-मज़ाक़ के सहारे किसी बुराई या ग़लत सोच पर चोट करना। इस एकांकी में विवाह की रस्मों और दोहरी सोच पर व्यंग्य है।
अपने लिए एक नियम और दूसरों के लिए दूसरा। रामस्वरूप बेटी को पढ़ाते हैं, पर रिश्ते के लिए उसकी पढ़ाई छिपाते हैं।
पुराने ज़माने की ऐसी सोच जो नए समय में ठीक न बैठे। रामस्वरूप गोपालप्रसाद के विचारों को इसी नाम से पुकारते हैं।
सावधान
भ्रम और सच
करके देखो
Title:
एक दृश्य का मंचन
Safety:
फ़र्नीचर उठाते-रखते समय सावधानी रखें; भारी चीज़ें शिक्षक की मदद से ही हटाएँ।
What You Notice:
रंग-निर्देश के बिना वही संवाद फीके लगते हैं; मंच पर चाल और भाव संवादों को जीवंत बनाते हैं।
Did you know
जगदीशचंद्र माथुर आकाशवाणी के महानिदेशक भी रहे। उनके कार्यकाल में रेडियो के कार्यक्रमों में साहित्य और संगीत को बड़ा स्थान मिला।
यह एकांकी सन् 1939 में लिखी गई, जब भारत में बहुत कम लड़कियाँ कॉलेज तक पहुँच पाती थीं। उस समय बी.ए. पास लड़की बहुत बड़ी बात मानी जाती थी।
माथुर का नाटक कोणार्क ओडिशा के सूर्य मंदिर बनाने वाले शिल्पियों की कथा पर आधारित है और देश भर में मंच पर खेला गया है।
Memory tricks
एकांकी के पाँच खंभे: पा–सं–रं–स–प — पात्र, संवाद, रंग-निर्देश, समस्या और परिणाम।
Practice MCQs with answers (25)
- A इसमें केवल एक ही पात्र पूरे समय बोलता रहता है
- B इसे केवल रेडियो पर ही सुनाया जा सकता है
- C यह एक ही अंक में पूरा होने वाला छोटा नाटक है
- D इसमें कोई संवाद नहीं, केवल कथा-वर्णन है
Show answer
Why:
एक अंक।
- A काशी हिंदू विश्वविद्यालय
- B दिल्ली विश्वविद्यालय
- C पटना विश्वविद्यालय
- D इलाहाबाद विश्वविद्यालय
Show answer
Why:
प्रयाग।
- A आकाशवाणी के महानिदेशक
- B भारत के मुख्य न्यायाधीश
- C बिहार के शिक्षा सचिव
- D मंत्रालय में संयुक्त सचिव
Show answer
Why:
वे प्रशासक थे, न्यायाधीश नहीं।
- A भोर का तारा
- B आषाढ़ का एक दिन
- C अँधेरे बंद कमरे
- D लहरों के राजहंस
Show answer
Why:
बाक़ी मोहन राकेश की।
- A गाँवों में पानी और बिजली की भारी और लगातार कमी
- B विवाह में लड़कियों की शिक्षा को लेकर संकीर्ण सोच
- C शहरों में बढ़ती भीड़ और यातायात की समस्या
- D खेती में आधुनिक मशीनों का तेज़ी से बढ़ता प्रयोग
Show answer
Why:
स्त्री-शिक्षा और विवाह।
- A मंच, वेशभूषा, चाल और भावों की सूचना देना
- B पाठकों से प्रश्न पूछना और उत्तर लिखवाना
- C लेखक का जीवन-परिचय विस्तार से बताना
- D नाटक के कठिन शब्दों के अर्थ समझाना
Show answer
Why:
निर्देशक की मदद।
- A घर में किसी की बीमारी के कारण सन्नाटा है
- B परिवार घर बदलकर कहीं और जा रहा है
- C घर में किसी ख़ास मेहमान के आने की तैयारी है
- D घर में कोई बड़ा उत्सव ख़त्म हो चुका है
Show answer
Why:
तख्त, दरी, चद्दर।
- A लड़की के पिता
- B घर के सहायक
- C लड़की के मामा
- D लड़के के पिता
Show answer
Why:
शंकर के पिता।
- A तौलिया
- B कुर्ता
- C धोती
- D रज़ाई
Show answer
Why:
हास्य की स्थिति।
- A ख़ुद गाकर मेहमानों का मन बहलाने और हँसाने के लिए
- B मेहमानों के सामने उमा का गाना-बजाना दिखाने के लिए
- C पुराने बाजे बेचकर नया बाजा ख़रीदने के लिए
- D रतन को शाम से संगीत सिखाने की तैयारी के लिए
Show answer
Why:
लड़की के गुण दिखाने।
- A उसके पिता रामस्वरूप ने
- B उसकी सहेलियों ने
- C उसके शिक्षकों ने
- D घरेलू सहायक रतन ने
Show answer
Why:
पढ़ा-लिखाकर।
- A तब हर स्त्री कॉलेज तक ज़रूर पढ़ती थी
- B तब पढ़ाई पूरी तरह मुफ़्त और आसान थी
- C तब लड़कियाँ अकसर विदेश पढ़ने जाती थीं
- D तब स्त्रियों को बहुत कम शिक्षा मिलती थी
Show answer
Why:
स्त्री-सुबोधिनी काफ़ी मानी जाती।
- A ताकि वह उसे बाज़ार में ले जाकर बेच सके
- B ताकि वह माथे की पुरानी चोट छिपा सके
- C ताकि वह सजकर मेहमानों के सामने आए
- D ताकि वह स्कूल के नाटक में भाग ले सके
Show answer
Why:
टीम-टाम।
- A आलस और काम से जी चुराना
- B स्वाभिमान और दिखावे से दूरी
- C डर और मेहमानों से घबराहट
- D घमंड और माता-पिता का अनादर
Show answer
Why:
वह सजाकर दिखाई जाना नहीं चाहती।
- A उन्हें लगता है कि प्रेमा बहुत ज़ोर से और बेसुरा गाना गा रही हैं
- B वे चाहते हैं कि प्रेमा जल्दी से रसोई में जाकर चाय बनाएँ
- C उन्हें प्रेमा की ऊँची आवाज़ से सिर में दर्द हो रहा है
- D उन्हें डर है कि बाहर कोई उमा की असली पढ़ाई का ज़िक्र सुन न ले
Show answer
Why:
पढ़ाई छिपानी है।
- A वे ख़ुद लड़कियों की पढ़ाई के पक्ष में हैं
- B वे गोपालप्रसाद से पूरी तरह सहमत हैं
- C वे पढ़ाई को लड़कियों के लिए बेकार समझते हैं
- D वे किसी भी विषय पर कोई राय नहीं रखते
Show answer
Why:
पुराने विचार।
- A बेटा पढ़ाई-लिखाई में पिता से कमज़ोर है
- B बेटा शरीर और वज़न में पिता से भारी है
- C बेटा संकीर्ण सोच में पिता से भी आगे है
- D बेटा पिता की हर बात तुरंत काटता है
Show answer
Why:
नकारात्मक प्रयोग।
- A लड़की को शादी से पहले कॉलेज ज़रूर पढ़ना चाहिए
- B पढ़ाई और शादी दोनों को एक साथ छोड़ देना चाहिए
- C उसे ख़ुद पढ़ाई से बहुत गहरा लगाव है
- D शादी के लिए लड़की की पढ़ाई ज़रूरी न मानी जाए
Show answer
Why:
पढ़ी-लिखी बहू नहीं चाहिए।
- A बेटी को पढ़ाया, पर रिश्ते के लिए उसकी पढ़ाई छिपाने को तैयार हैं
- B बेटी को बिलकुल नहीं पढ़ाया, पर सबसे झूठ कहते हैं कि वह बी.ए. है
- C मेहमानों से बहुत प्रेम है, पर उन्हें घर नहीं बुलाते
- D संगीत से बहुत प्रेम है, पर घर में कोई बाजा नहीं
Show answer
Why:
दिखावा बनाम समझौता।
- A रतन की बहुत धीमी और सुस्त चाल पर
- B प्रेमा के लगातार बोलते जाने पर
- C उमा के गाने के पुराने शौक़ पर
- D मेहमानों के देर से आने पर
Show answer
Why:
भगवान का बनाया बाजा।
- A कड़ी डाँट
- B लंबी चुप्पी
- C गहरा दुख
- D हँसी-मज़ाक़
Show answer
Why:
परिहास।
- A चीनी
- B मक्खन
- C टोस्ट
- D समोसे
Show answer
Why:
दुकान दूर है।
- A पूरी तैयारी और दिखावे की व्यर्थता का
- B परिवार की बहुत बड़ी और पुरानी अमीरी का
- C रतन की ईमानदारी और कड़ी मेहनत का
- D प्रेमा के स्वादिष्ट घरेलू खाने का
Show answer
Why:
अंत का संवाद।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- B अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- C दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
मतलब अपना है।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C I, II और III तीनों
- D केवल I और III
Show answer
Why:
प्रेमा को पढ़ाई झमेला लगती है।
Important short questions (7)
एक अंक में पूरा होने वाले छोटे नाटक को एकांकी कहते हैं। इस एकांकी की पहली विशेषता है एक मुख्य घटना, यानी लड़की देखने की रस्म। दूसरी विशेषता है सीमित पात्र और कसे हुए संवाद, जिनसे कहानी जल्दी चरम बिंदु तक पहुँचती है।
जगदीशचंद्र माथुर सन् 1917 में शाहजहाँपुर में जन्मे। वे आई.सी.एस. अधिकारी थे और आकाशवाणी के महानिदेशक भी रहे। कोणार्क, भोर का तारा और ओ मेरे सपने उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। सन् 1978 में उनका निधन हुआ।
कोष्ठक में लिखी मंच, वेशभूषा, चाल और भावों की सूचनाएँ रंग-निर्देश कहलाती हैं। पहले रंग-निर्देश से पता चलता है कि एक साधारण कमरे में अधेड़ उम्र के रामस्वरूप और रतन तख्त ला रहे हैं। इससे लगता है कि किसी ख़ास मेहमान के आने की तैयारी है।
प्रेमा कहती हैं कि उनके ज़माने में लड़कियाँ अक्षर और गिनती सीखकर बस घर-गृहस्थी की किताब पढ़ लेती थीं। उन्हें बी.ए. की पढ़ाई झमेला लगती है। इससे पता चलता है कि तब स्त्रियों को बहुत कम शिक्षा मिलती थी और उनका काम घर तक सीमित माना जाता था।
वे बताते हैं कि गोपालप्रसाद पढ़े-लिखे वकील हैं और सभाओं में जाते हैं, फिर भी कम पढ़ी बहू चाहते हैं। उनके विचार दकियानूसी हैं। लड़का शंकर भी उनसे आगे है, यानी बाप सेर तो लड़का सवा सेर।
रामस्वरूप ने बेटी को कॉलेज तक पढ़ाया और गोपालप्रसाद के पुराने विचारों पर ग़ुस्सा भी करते हैं। यह उनकी आधुनिकता है। पर रिश्ते के लिए वे उमा की पढ़ाई छिपाकर उसे मैट्रिक पास बताते हैं। यह समाज के डर से किया गया रूढ़िवादी समझौता है।
पहला, रतन चद्दर की जगह धोती माँग लाता है, जिससे प्रेमा हैरान होकर आती हैं। दूसरा, रामस्वरूप प्रेमा के लगातार बोलने पर भगवान के बनाए ग्रामोफ़ोन की चुटकी लेते हैं। मक्खन का ऐन वक़्त पर याद आना भी हँसी पैदा करता है।
Long answer questions (3)
एकांकी का पहला तत्व पात्र हैं; यहाँ उमा, रामस्वरूप, प्रेमा, शंकर, गोपालप्रसाद और रतन हैं। दूसरा तत्व संवाद है; पात्रों की स्वाभाविक और व्यंग्य भरी बातचीत से कहानी आगे बढ़ती है। तीसरा तत्व रंग-निर्देश है; कोष्ठक में कमरे की सजावट, पात्रों की चाल, आवाज़ और कपड़ों की जानकारी दी गई है। चौथा तत्व देश-काल है; यह सन् 1939 के आस-पास के एक मध्यवर्गीय घर की कहानी है।
पाँचवाँ तत्व समस्या है; लड़कियों की शिक्षा और विवाह को लेकर समाज की संकीर्ण सोच। छठा तत्व चरम बिंदु और परिणाम है; उमा खुलकर अपनी बात कहती है और रिश्ता टूट जाता है। अंत में मुख्य विचार उभरता है कि आत्मसम्मान और नैतिक साहस ही सच्ची रीढ़ है। इन सभी तत्वों के कारण यह एक सफल एकांकी है।
रामस्वरूप ने उमा को बी.ए. तक पढ़ाया, जो उस समय बहुत बड़ी बात थी। वे गोपालप्रसाद के दकियानूसी विचारों पर ग़ुस्सा भी करते हैं और मानते हैं कि पढ़े-लिखे लोगों को ऐसी सोच नहीं रखनी चाहिए। यह उनका आधुनिक पक्ष है।
पर रिश्ते की चाह में वे बार-बार समझौता करते हैं। वे गोपालप्रसाद से कह चुके हैं कि उमा केवल मैट्रिक तक पढ़ी है। प्रेमा जब पढ़ाई का ज़िक्र करती हैं, तो वे घबराकर उन्हें चुप करा देते हैं। वे उमा को सजा-धजाकर, गाना-बजाना दिखाकर मेहमानों के सामने पेश करना चाहते हैं। चश्मे के बारे में भी वे झूठ बोलते हैं। इस तरह उनके विचार और व्यवहार में बड़ा अंतर है। लेखक दिखाते हैं कि सच जानते हुए भी ग़लत के आगे झुकना भी एक तरह की कमज़ोरी है।
प्रेमा खुलकर पुराने विचार रखती हैं। उन्हें लगता है कि लड़की के लिए थोड़ा-सा पढ़ना और घर-गृहस्थी की सीख काफ़ी है। वे बेटी की ऊँची पढ़ाई को परेशानी की जड़ मानती हैं और चाहती हैं कि वह सजकर मेहमानों के सामने आए। उनकी सोच पुरानी है, पर उसमें कोई छिपाव नहीं।
रामस्वरूप की सोच आधुनिक है, क्योंकि उन्होंने बेटी को पढ़ाया। पर व्यवहार में वे वही सब करते हैं जो पुरानी सोच माँगती है: पढ़ाई छिपाना, झूठ बोलना और बेटी को दिखाने की तैयारी। इसलिए रामस्वरूप की सोच ज़्यादा उलझी हुई लगती है। प्रेमा जो सोचती हैं, वही कहती हैं, जबकि रामस्वरूप जानते हैं कि यह ग़लत है, फिर भी करते हैं। यही अंतर्द्वंद्व उन्हें एकांकी का सबसे दिलचस्प पात्र बनाता है।
Flashcards (17)
Play this topic
- पात्र और परिचय
- विचार या व्यवहार
- सही या भ्रम
- पहले दृश्य का क्रम
- झटपट उत्तर
गोपालप्रसाद, शंकर और लड़की की परख
गोपालप्रसाद और उनका बेटा शंकर आते हैं। पुराने ज़माने की शेखी, शादी को बिज़नेस कहना, सुंदरता पर टैक्स का मज़ाक़ और कम पढ़ी बहू की ज़िद के बाद उमा पान लेकर आती है, और उसे गाने, चित्रकारी और सिलाई के प्रश्नों से परखा जाता है।
What you will be able to do
- गोपालप्रसाद और शंकर के चरित्र की विशेषताएँ संवादों और रंग-निर्देशों के आधार पर बता सकूँगा।
- शादी को बिज़नेस कहने और सुंदरता पर टैक्स वाले प्रसंगों में छिपा व्यंग्य समझा सकूँगा।
- लड़कों और लड़कियों की शिक्षा को लेकर गोपालप्रसाद के तर्कों की कमज़ोरी पहचान सकूँगा।
- चश्मे वाले प्रसंग में रामस्वरूप के झूठ और उसके कारण पर विचार कर सकूँगा।
- उमा को परखने के ढंग में छिपी स्त्री के प्रति वस्तु जैसी दृष्टि का विश्लेषण कर सकूँगा।
Key points
रंग-निर्देश के अनुसार गोपालप्रसाद की आँखों से चतुराई झलकती है; वे अनुभवी और चालबाज़ हैं।
शंकर की आवाज़ पतली और खिसियाई हुई है, वह बेढंगी हँसी हँसता है और झुकी कमर उसकी पहचान है।
गोपालप्रसाद अपने ज़माने की ताक़त, भूख और पढ़ाई की बढ़-चढ़कर तारीफ़ करते हैं; रामस्वरूप हाँ में हाँ मिलाते हैं।
वे अचानक आवाज़ बदलकर विवाह की बातचीत को बिज़नेस कहते हैं, जिससे विवाह एक सौदा बन जाता है।
चाय में ज़्यादा चीनी, सुंदरता पर टैक्स और लड़की का सुंदर होना ज़रूरी, ये बातें उनकी सोच की झलक हैं।
वे साफ़ कहते हैं कि बहू ज़्यादा से ज़्यादा मैट्रिक पास चाहिए; शंकर हाँ मिलाता है कि नौकरी तो करानी नहीं।
मोर-मोरनी और शेर-शेरनी के उदाहरण से वे ऊँची शिक्षा को केवल पुरुषों का अधिकार बताते हैं।
उमा के चश्मे को रामस्वरूप आँखें दुखने का बहाना बताकर पढ़ाई से जोड़ने से बचाते हैं।
उमा से गाना, चित्रकारी, सिलाई और इनाम के बारे में ऐसे पूछा जाता है, मानो किसी सामान की जाँच हो रही हो।
Full explanation
आगमन: चतुर पिता और झेंपू बेटा
मेहमानों के आते ही रामस्वरूप हँ-हँ करते हुए दोनों हाथ मलते हैं और उनका स्वागत करते हैं। रंग-निर्देश बहुत छोटे वाक्यों में दोनों मेहमानों का पूरा चित्र खींच देता है। बाबू गोपालप्रसाद की आँखों से दुनियादारी वाली चतुराई टपकती है, और उनकी आवाज़ से पता चलता है कि वे बहुत अनुभवी और फितरती, यानी चालबाज़, आदमी हैं। उनका बेटा शंकर उन नौजवानों में से है जो बात-बात पर खीस निपोरते हैं, यानी दाँत दिखाकर बेढंगी हँसी हँसते हैं। उसकी आवाज़ पतली और खिसियाई हुई है, और झुकी कमर उसकी ख़ास पहचान है।
यह झुकी कमर एकांकी के शीर्षक से सीधे जुड़ती है। शरीर की झुकी कमर आगे चलकर मन और चरित्र की कमज़ोरी का प्रतीक बनती है। बैठते ही गोपालप्रसाद की बेंत गिर जाती है, जिसे रामस्वरूप उठाकर कोने में रख देते हैं। रामस्वरूप बार-बार कहते हैं कि यह मेहमानों की बड़ी मेहरबानी है कि वे आए, और वे तो उनके सेवक हैं। इतनी अधिक विनम्रता असल में चाटुकारिता है, जो लड़की के पिता की कमज़ोर स्थिति दिखाती है। गोपालप्रसाद भी शिष्टाचार में कहते हैं कि जैसा मेरा काम, वैसा आपका काम, पर उनकी बातों में ऊपर से नरमी और भीतर से हिसाब-किताब साफ़ झलकता है।
पुराने ज़माने की शेखी
रामस्वरूप शंकर से उसकी पढ़ाई के बारे में पूछते हैं। शंकर बताता है कि कॉलेज की छुट्टियाँ नहीं हैं, वह सप्ताहांत पर आ गया है, और कोर्स पूरा होने में एक-दो साल लगेंगे, क्योंकि वह एकाध साल का मार्जिन रखकर चलता है। गोपालप्रसाद बात सँभालते हैं कि बेटा एक साल बीमार रहा था, और फिर अपने ज़माने का बखान शुरू कर देते हैं। उनके अनुसार उनके समय में लड़के स्कूल से आकर दर्जनों कचौड़ियाँ खा जाते थे और फिर भी खाने के समय उतनी ही भूख लगती थी। बालाई इतनी सस्ती थी कि चार पैसे में ढेर मिल जाती, और वे अकेले दो आने भर की पचा लेते थे।
वे आगे कहते हैं कि तब वॉलीबॉल, टेनिस या बैडमिंटन जैसे खेल कोई नहीं जानता था, फिर भी कोई लड़का कमज़ोर नहीं कहलाता था। पढ़ाई का हाल यह था कि एक बार बैठ गए तो बारह घंटे की बैठक हो जाती, और उस ज़माने का मैट्रिक भी ऐसी फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी लिखता था कि आज के एम.ए. मुक़ाबला न कर सकें। रामस्वरूप हर बात पर जी हाँ, जी हाँ कहकर हँसते जाते हैं। इस पूरी बातचीत में गहरा व्यंग्य है। गोपालप्रसाद अपने बीते ज़माने को महान बताते हैं, पर उनका अपना बेटा कमज़ोर, बीमार और पढ़ाई में ढीला है। लेखक बिना कुछ कहे यह विरोधाभास दर्शकों के सामने रख देते हैं।
विवाह या बिज़नेस?
अचानक गोपालप्रसाद अपनी आवाज़ और ढंग दोनों बदलते हुए कहते हैं कि अब बिज़नेस की बातचीत हो जाए। रामस्वरूप पहले चौंकते हैं, फिर समझ जाते हैं कि बात विवाह की है। यह एक शब्द पूरी एकांकी का सार खोल देता है। गोपालप्रसाद के लिए विवाह दो परिवारों और दो व्यक्तियों का पवित्र रिश्ता नहीं, बल्कि लेन-देन का एक सौदा है। जैसे व्यापार में माल की क़ीमत और गुणवत्ता देखी जाती है, वैसे ही वे लड़की को परखने आए हैं।
रामस्वरूप पहले नाश्ता कराने अंदर जाते हैं। उनके जाते ही गोपालप्रसाद धीमी आवाज़ में बेटे से कहते हैं कि आदमी तो भला लगता है, और मकान देखकर हैसियत भी बुरी नहीं लगती; अब देखना है कि लड़की कैसी है। यह वाक्य उनकी सोच की पोल खोल देता है। वे पहले घर की आर्थिक स्थिति आँक रहे हैं, फिर लड़की को। फिर वे शंकर को टोकते हैं कि रिश्ता पक्का करने आए हो, तो झुककर नहीं, तनकर बैठो। वे यह भी कहने लगते हैं कि दोस्त भी उसकी बैकबोन को लेकर ठीक ही बोलते हैं। वाक्य अधूरा रह जाता है, क्योंकि रामस्वरूप आ जाते हैं। पर दर्शक समझ जाते हैं कि शंकर की रीढ़ की कमज़ोरी उसके दोस्तों में भी मज़ाक़ का विषय है। यही अधूरा वाक्य अंत में उमा के मुँह से पूरा होगा।
चाय, चीनी और सुंदरता पर टैक्स
रामस्वरूप चाय लाते हैं। गोपालप्रसाद आधा दूध और आधी चाय माँगते हैं, साथ ही ज़्यादा चीनी भी। उन्हें नया फ़ैशन पसंद नहीं, जिसमें चाय में पानी ज़्यादा और चीनी नाम भर की होती है। यह छोटी-सी बात भी उनकी पुरानी आदतों और अपनी पसंद पर अड़े रहने वाले स्वभाव को दिखाती है। शंकर खँखारकर कहता है कि सुना है सरकार ज़्यादा चीनी लेने वालों पर टैक्स लगाएगी।
इस पर गोपालप्रसाद अपनी सबसे चौंकाने वाली बात कहते हैं। उनके अनुसार सरकार को कमाई करनी है तो बस एक टैक्स लगाना चाहिए: सुंदरता पर टैक्स। वे कहते हैं कि यह ऐसा टैक्स होगा जिसे देने वाली औरतें चूँ भी नहीं करेंगी, बस हर औरत को अपनी सुंदरता के स्तर के हिसाब से ख़ुद टैक्स तय करने की छूट हो। रामस्वरूप और शंकर ठहाका लगाते हैं। यह मज़ाक़ असल में स्त्रियों का अपमान है, क्योंकि इसमें स्त्री को केवल उसकी सुंदरता से तौला गया है। रामस्वरूप जब शंकर से पूछते हैं कि शादी में सुंदरता का कितना हिस्सा होना चाहिए। जवाब शंकर नहीं देता, गोपालप्रसाद बीच में ही बोल पड़ते हैं। उनके अनुसार लड़की का सुंदर होना बहुत ज़रूरी है, चाहे पाउडर लगाकर हो या वैसे ही। बेटा अपनी राय तक नहीं रख पाता, जो उसकी कमज़ोर रीढ़ का एक और संकेत है।
जायचा, अफ़वाह और मैट्रिक की शर्त
गोपालप्रसाद पूछते हैं कि जायचा, यानी जन्मपत्री, तो मिल ही गया होगा। रामस्वरूप चतुराई से कहते हैं कि कुंडली को भगवान के आगे रख दिया है, अब मिली हुई ही मानिए। गोपालप्रसाद इसे सही मान लेते हैं। फिर वे असली बात पर आते हैं: उनके कानों में एक भनक पड़ी है कि लड़की ज़्यादा पढ़ी-लिखी है, क्या यह ग़लत है। वे साफ़ कहते हैं कि उन्हें ज़्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए, क्योंकि उन्हें घर में मेम साहब नहीं रखनी, जिसके नख़रे कौन सहे। बहू हद से हद मैट्रिक पास होनी चाहिए।
शंकर भी हाँ में हाँ मिलाता है कि कोई नौकरी तो करानी नहीं। इस छोटे-से संवाद से पता चलता है कि उनके लिए स्त्री-शिक्षा का एक ही अर्थ था: नौकरी, और नौकरी स्त्री के लिए नहीं थी। ऊँची शिक्षा से आने वाली सोच, आत्मविश्वास और अपनी राय रखने की क्षमता उन्हें डराती है। वे चाहते हैं कि बहू घर में रहे, सवाल न पूछे और उनकी हर बात माने। रामस्वरूप यहाँ भी झूठ के साथ खड़े हैं, क्योंकि वे पहले ही उमा को मैट्रिक तक पढ़ी बता चुके हैं।
मोर और मोरनी वाला तर्क
गोपालप्रसाद अपनी सोच को सही ठहराने के लिए तर्क भी देते हैं। वे कहते हैं कि कुछ लोग उनसे पूछते हैं कि जब बेटों को बी.ए., एम.ए. तक पढ़ाया, तो बहुएँ भी ग्रेजुएट क्यों नहीं लेते। वे ऐसे लोगों को अक्ल का ठेकेदार कहकर उनका मज़ाक़ उड़ाते हैं। उनके अनुसार बेटों और बेटियों की शिक्षा को एक तराज़ू पर नहीं तौला जा सकता। मर्दों का काम पढ़ना और क़ाबिल बनना है; अगर औरतें भी अंग्रेज़ी अख़बार पढ़ने और राजनीति पर बहस करने लगीं, तो गृहस्थी चौपट हो जाएगी।
फिर वे प्रकृति का उदाहरण देते हैं: सुंदर पंख केवल नर मोर को मिलते हैं, और घने अयाल केवल नर शेर को। रामस्वरूप मज़ाक़ में दाढ़ी का उदाहरण जोड़ देते हैं कि वह भी केवल पुरुषों को आती है। पर गोपालप्रसाद गंभीर ही रहते हैं। वे कहते हैं कि कुछ चीज़ें दुनिया में सिर्फ़ मर्दों के लिए हैं, और ऊँची तालीम भी उनमें से एक है। यह तर्क पूरी तरह खोखला है। पंख या अयाल शरीर की बनावट हैं, जबकि शिक्षा मन और बुद्धि का विकास है, जिस पर हर इंसान का बराबर हक़ है। रामस्वरूप का दाढ़ी वाला मज़ाक़ भी अनजाने में इस तर्क की बेतुकी सच्चाई खोल देता है। लेखक दिखाते हैं कि पढ़ा-लिखा होना और समझदार होना हमेशा एक बात नहीं होती।
चश्मा!!!: एक झूठ और
नाश्ते के बाद रामस्वरूप पान भिजवाने को कहते हैं। उमा सादे कपड़ों में, गर्दन झुकाए, पान की तश्तरी लेकर आती है। गोपालप्रसाद आँखें गड़ाकर और शंकर आँखें चुराकर उसे देखते हैं। जब उमा तश्तरी पिता को देती है, तो उसका चेहरा ऊपर उठता है और नाक पर सोने के रिम वाला चश्मा दिखता है। बाप-बेटे दोनों एक साथ चौंककर बोल पड़ते हैं: चश्मा! लेखक ने यहाँ तीन विस्मयादिबोधक चिह्न लगाए हैं, जो उनके भारी झटके को दिखाते हैं।
उनके लिए चश्मा पढ़ाई का संकेत है, और पढ़ाई ख़तरे की घंटी। रामस्वरूप फिर झूठ गढ़ते हैं कि पिछले महीने उमा की आँखें दुखने लगी थीं, और थोड़े समय के लिए उसे ऐनक पहननी पड़ रही है। गोपालप्रसाद पूछते हैं कि कहीं पढ़ाई की वजह से तो नहीं, और रामस्वरूप साफ़ मना कर देते हैं। तब जाकर गोपालप्रसाद संतुष्ट होकर कोमल स्वर में उमा से बैठने को कहते हैं। यह प्रसंग दिखाता है कि एक झूठ को बचाने के लिए कितने और झूठ बोलने पड़ते हैं, और कैसे एक छोटी-सी चीज़ भी लड़की के लिए ऐब बना दी जाती है।
परख: सामान की तरह लड़की
अब उमा की परख शुरू होती है। गोपालप्रसाद पहले उसकी चाल और चेहरा देखकर कहते हैं कि चाल में कोई ख़राबी नहीं और चेहरे पर भी छवि है। फिर पूछते हैं कि कुछ गाना-बजाना सीखा है या नहीं। रामस्वरूप के कहने पर उमा सितार उठाकर मीरा का प्रसिद्ध पद गाने लगती है। उसके सुर से पता चलता है कि उसे संगीत का अच्छा ज्ञान है। वह गाने में इतनी डूब जाती है कि उसका सिर ऊपर उठ जाता है। तभी उसकी आँखें शंकर की झेंपती आँखों से मिलती हैं और वह गाते-गाते रुक जाती है। गोपालप्रसाद कहते हैं कि बस काफ़ी है, लड़की अच्छा गाती है।
इसके बाद चित्रकारी के बारे में पूछा जाता है। उमा चुप रहती है, तो रामस्वरूप बताते हैं कि दीवार पर टँगी कुत्ते वाली तसवीर उसी ने बनाई है। सिलाई के बारे में वे बताते हैं कि पूरे घर की सिलाई, यहाँ तक कि उनकी कमीज़ें भी, उमा ही सीती है। अंत में गोपालप्रसाद पूछते हैं कि क्या उसने कोई इनाम भी जीते हैं। उमा फिर चुप रहती है। रामस्वरूप इशारे से खाँसते हैं, गोपालप्रसाद अधीर हो उठते हैं और रूखी आवाज़ में कहते हैं कि ज़रा मुँह तो खोलना चाहिए। इस पूरी परख में किसी ने उमा से उसकी पसंद, उसके विचार या उसके सपनों के बारे में नहीं पूछा। उसे एक सामान की तरह ऊपर से नीचे तक जाँचा गया। उमा की लंबी चुप्पी आने वाले तूफ़ान का संकेत है, जो अगले हिस्से में फूटता है।
Concepts and terms
किसी व्यक्ति को इंसान की जगह सामान की तरह देखना और परखना। उमा से प्रश्न पूछने का ढंग इसी सोच को दिखाता है।
किसी को ख़ुश करने के लिए बार-बार उसकी हाँ में हाँ मिलाना। रामस्वरूप की हँ-हँ और जी हाँ इसी का उदाहरण हैं।
लड़के और लड़की के लिए अलग-अलग नियम और अवसर तय करना। गोपालप्रसाद ऊँची शिक्षा को केवल पुरुषों का हक़ मानते हैं।
अपने बीते ज़माने को हर हाल में बेहतर बताना। गोपालप्रसाद कचौड़ियों, बालाई और बारह घंटे की पढ़ाई की शेखी बघारते हैं।
एक ही व्यक्ति में दो उलटी बातें। गोपालप्रसाद ख़ुद पढ़े-लिखे वकील हैं, पर पढ़ी-लिखी बहू नहीं चाहते।
सावधान
भ्रम और सच
Did you know
उमा जो गीत गाती है, वह मीराबाई का प्रसिद्ध पद है, जिसमें वे कृष्ण को ही अपना सब कुछ मानती हैं। गीत का भाव भी किसी और के आगे न झुकने का है।
एकांकी के समय मैट्रिक का अर्थ था दसवीं के बराबर की पढ़ाई, और इंट्रेंस भी लगभग उसी स्तर की परीक्षा मानी जाती थी।
उस दौर में विवाह से पहले कुंडली, यानी जायचा या जन्मपत्री, मिलाने का चलन बहुत आम था। रामस्वरूप इसे भी मज़ाक़ में टाल देते हैं।
Memory tricks
गोपालप्रसाद के चार रंग: शे–बि–सुं–मै — शेखी अपने ज़माने की, बिज़नेस वाली बात, सुंदरता पर ज़ोर, मैट्रिक तक की बहू।
Practice MCQs with answers (25)
- A सीधा और भोला-भाला
- B अनुभवी और चालबाज़
- C डरपोक और चुप रहने वाला
- D बीमार और कमज़ोर
Show answer
Why:
फितरती।
- A उसके चरित्र और मन की कमज़ोरी का
- B उसकी लंबी बीमारी और बुढ़ापे का
- C उसकी बहुत ज़्यादा पढ़ाई और मेहनत का
- D उसकी विनम्रता और बड़ों के आदर का
Show answer
Why:
शीर्षक से जुड़ाव।
- A मेहमानों से बचपन की गहरी पुरानी दोस्ती
- B अपनी अमीरी और ऊँचे पद का खुला घमंड
- C लड़की के पिता की लाचारी और चाटुकारिता
- D मेहमानों पर दबा हुआ तेज़ ग़ुस्सा
Show answer
Why:
कमज़ोर स्थिति।
- A घंटों मैदान में क्रिकेट खेलते थे
- B बस्ता फेंककर सीधे सो जाते थे
- C खेतों में जाकर काम करते थे
- D दर्जनों कचौड़ियाँ खा जाते थे
Show answer
Why:
फिर भी भूख।
- A वे अपने ज़माने को महान बताते हैं, पर उनका अपना बेटा कमज़ोर और ढीला है
- B वे अपने ज़माने की बुराई करते हैं, पर उनका बेटा सबसे तेज़ और ताक़तवर है
- C वे केवल खेलों और कुश्ती की बात करते हैं, पढ़ाई का ज़िक्र तक नहीं करते
- D वे बीते ज़माने को पूरी तरह भूल चुके हैं और उन्हें कुछ याद नहीं
Show answer
Why:
बीमार शंकर।
- A विवाह उनके लिए पूजा का पवित्र काम है
- B उन्हें विवाह में कोई रुचि ही नहीं
- C विवाह उनके लिए लेन-देन का सौदा है
- D वे अंग्रेज़ी शब्द सीख रहे हैं
Show answer
Why:
माल की परख।
- A उमा की पढ़ाई और कॉलेज के बारे में
- B मकान देखकर परिवार की हैसियत के बारे में
- C रास्ते में मिले ताँगेवाले के बारे में
- D शंकर की बीमारी और दवाइयों के बारे में
Show answer
Why:
पहले घर, फिर लड़की।
- A शंकर की बहुत मज़बूत पीठ और शरीर की ताक़त
- B शंकर के दोस्तों की पढ़ाई और अच्छी नौकरी
- C शंकर के मेडिकल कॉलेज की नई इमारत
- D शंकर की रीढ़ की कमज़ोरी पर दोस्तों का मज़ाक़
Show answer
Why:
अंत में उमा पूरा करती है।
- A केवल काली चाय, बिना दूध-चीनी
- B नींबू वाली चाय, थोड़ा शहद
- C आधा दूध, आधी चाय और ज़्यादा चीनी
- D ठंडी चाय, बर्फ़ डालकर
Show answer
Why:
नया फ़ैशन नापसंद।
- A स्त्री की बुद्धि का सम्मान करने वाली
- B स्त्री को बराबरी देने वाली
- C स्त्री की शिक्षा बढ़ाने वाली
- D स्त्री को केवल रूप से तौलने वाली
Show answer
Why:
मज़ाक़ में अपमान।
- A शंकर ने ख़ुद थोड़ा सोचकर
- B गोपालप्रसाद ने बीच में ही
- C उमा ने अंदर के कमरे से
- D प्रेमा ने रसोई से ही
Show answer
Why:
बेटे की अपनी राय नहीं।
- A ठाकुर जी के चरणों में रखकर उसे अपने आप मिला बताते हैं
- B किसी बड़े ज्योतिषी से मिलवाने का पक्का वादा करते हैं
- C जायचा खो जाने की झूठी कहानी सुनाते हैं
- D जायचा होने से ही साफ़ इनकार कर देते हैं
Show answer
Why:
चतुर उत्तर।
- A उन्हें लगता है कि पढ़ाई से आँखें ख़राब होती हैं
- B उनके घर में किताबें रखने की जगह नहीं है
- C पढ़ी-लिखी लड़कियाँ खाना बनाना भूल जाती हैं
- D उन्हें डर है कि वह मेम साहब बनकर नख़रे करेगी
Show answer
Why:
मैट्रिक तक।
- A वह स्त्री-शिक्षा का बड़ा समर्थक है
- B वह ख़ुद नौकरी छोड़ना चाहता है
- C वह शिक्षा को केवल नौकरी से जोड़ता है
- D वह उमा से पहले से परिचित है
Show answer
Why:
सोच की संकीर्णता।
- A अक्ल के ठेकेदार
- B समझदार दोस्त
- C नए ज़माने के लोग
- D सच्चे सलाहकार
Show answer
Why:
व्यंग्यपूर्ण संबोधन।
- A मोर और शेर भारत में बिलकुल नहीं पाए जाते, इसलिए पूरा उदाहरण ग़लत है
- B शरीर की बनावट का उदाहरण देकर बुद्धि और शिक्षा का हक़ छीना गया है
- C यह तर्क बहुत लंबा है और सुनने में बहुत उबाऊ और बेकार लगता है
- D इस तर्क में अंग्रेज़ी के कठिन शब्दों का बहुत ज़्यादा प्रयोग हुआ है
Show answer
Why:
शिक्षा पर सबका हक़।
- A गोपालप्रसाद की बात को और भी ज़्यादा मज़बूत कर देता है
- B उमा की पढ़ाई का छिपा भेद सबके सामने खोल देता है
- C शंकर को बहुत ग़ुस्सा दिलाकर चुप करा देता है
- D अनजाने में गोपालप्रसाद के तर्क का बेतुकापन खोल देता है
Show answer
Why:
गोपालप्रसाद गंभीर रहते हैं।
- A सादे कपड़ों में, गर्दन झुकाए
- B भारी गहनों में, मुस्कुराते हुए
- C पाउडर लगाकर, सजी-धजी
- D नाटक की पोशाक में, गाते हुए
Show answer
Why:
दिखावे से दूर।
- A उमा की गहरी ख़ुशी और गर्व
- B बाप-बेटे को लगा भारी झटका
- C रामस्वरूप की गहरी नींद
- D रतन का अचानक तेज़ ग़ुस्सा
Show answer
Why:
चश्मा = पढ़ाई का संकेत।
- A ताकि उमा को डॉक्टर के पास ले जा सकें
- B ताकि शंकर को भी चश्मा दिलवा सकें
- C ताकि मेहमान उसे ऊँची पढ़ाई से न जोड़ें
- D ताकि उमा को सज़ा मिल सके
Show answer
Why:
एक झूठ, फिर दूसरा।
- A उसकी आँखें शंकर की झेंपती आँखों से मिल जाती हैं
- B सितार का एक पुराना तार अचानक टूट जाता है
- C रतन बाहर से ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाता है
- D उसे गीत के आगे के बोल याद नहीं रहते
Show answer
Why:
तल्लीनता टूटती है।
- A पहाड़ वाली तसवीर
- B नदी वाली तसवीर
- C मंदिर वाली तसवीर
- D कुत्ते वाली तसवीर
Show answer
Why:
रामस्वरूप बताते हैं।
- A उससे बहुत ज़्यादा और बहुत कठिन प्रश्न पूछे गए
- B किसी ने उसकी राय, पसंद या सपने नहीं पूछे
- C उसे बैठने के लिए अच्छी कुर्सी नहीं दी गई
- D उसका गाना अंत तक पूरा नहीं सुना गया
Show answer
Why:
वस्तुकरण।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- B अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- C दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
मेम साहब का डर।
- A केवल I और II
- B केवल I और III
- C केवल II और III
- D I, II और III तीनों
Show answer
Why:
उत्तर गोपालप्रसाद ने दिया।
Important short questions (7)
गोपालप्रसाद की आँखों से दुनियादारी वाली चतुराई झलकती है; वे अनुभवी और चालबाज़ हैं। शंकर बात-बात पर बेढंगी हँसी हँसता है, उसकी आवाज़ पतली और खिसियाई हुई है, और झुकी कमर उसकी पहचान है। पिता चतुर हैं, बेटा कमज़ोर और झेंपू।
वे बताते हैं कि उनके समय में लड़के दर्जनों कचौड़ियाँ खा जाते और चार पैसे की बालाई अकेले हज़म कर लेते थे। आज जैसे खेल न होने पर भी कोई कमज़ोर नहीं था। पढ़ाई में बारह घंटे बैठते थे और उस समय का मैट्रिक भी फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी लिखता था।
इससे पता चलता है कि गोपालप्रसाद के लिए विवाह दो परिवारों का पवित्र रिश्ता नहीं, बल्कि लेन-देन का सौदा है। जैसे व्यापार में माल परखा जाता है, वैसे ही वे लड़की और उसके घर की हैसियत परखने आए हैं।
यह प्रसंग स्त्रियों को केवल उनकी सुंदरता से तौलने वाली सोच पर व्यंग्य करता है। गोपालप्रसाद इसे मज़ाक़ में कहते हैं और बाक़ी लोग हँसते हैं, पर इसमें स्त्री के गुणों, बुद्धि और सम्मान की पूरी उपेक्षा है।
उनके अनुसार बेटों और बेटियों की शिक्षा को एक तराज़ू पर नहीं तौला जा सकता। पढ़ना और क़ाबिल बनना मर्दों का काम है। औरतें अख़बार पढ़ने और राजनीति पर बहस करने लगीं तो गृहस्थी बिगड़ जाएगी। ऊँची शिक्षा को वे केवल पुरुषों का हक़ मानते हैं।
उमा का चश्मा देखकर मेहमान चौंकते हैं, तो रामस्वरूप तुरंत कहते हैं कि आँखों की तकलीफ़ के कारण थोड़े दिन ऐनक लगी है। यह झूठ है। इससे पता चलता है कि रिश्ते के लिए वे एक झूठ को बचाने को दूसरा झूठ बोलने से भी नहीं हिचकते।
उससे गाना-बजाना, चित्रकारी, सिलाई और इनामों के बारे में पूछा गया, और उसकी चाल तथा चेहरे पर भी टिप्पणी हुई। इस परख की सबसे बड़ी कमी यह थी कि किसी ने उसकी राय, पसंद या सपने नहीं पूछे। उसे सामान की तरह जाँचा गया।
Long answer questions (3)
गोपालप्रसाद अनुभवी, चतुर और चालबाज़ व्यक्ति हैं। रंग-निर्देश बताता है कि उनकी आँखों से दुनियादारी की चतुराई झलकती है। वे अतीत-मोह से भरे हैं; अपने ज़माने की कचौड़ियों, बालाई और बारह घंटे की पढ़ाई का बखान करते हैं, जबकि उनका अपना बेटा कमज़ोर है। वे विवाह को बिज़नेस कहते हैं और रामस्वरूप के अंदर जाते ही मकान देखकर हैसियत आँकते हैं।
वे स्त्री-शिक्षा के घोर विरोधी हैं। ख़ुद वकील होकर भी उन्हें मैट्रिक से ज़्यादा पढ़ी बहू नहीं चाहिए, और वे मोर-मोरनी जैसे खोखले तर्क देते हैं। सुंदरता पर टैक्स वाला मज़ाक़ उनकी स्त्री-विरोधी दृष्टि दिखाता है। वे बेटे की जगह ख़ुद उत्तर देते हैं, जिससे उनका हावी स्वभाव पता चलता है। अंत में उमा की बात सुनकर उनका ग़ुस्से में चले जाना दिखाता है कि वे अपनी आलोचना सह नहीं सकते।
एकांकी में कई जगह यह भिन्नता दिखती है। गोपालप्रसाद ने बेटों को बी.ए., एम.ए. तक पढ़ाया, पर बहू मैट्रिक तक ही चाहते हैं। वे कहते हैं कि पढ़ना और क़ाबिल बनना मर्दों का काम है। शंकर कहता है कि बहू से नौकरी तो करानी नहीं। लड़की से गाना, चित्रकारी और सिलाई पूछी जाती है, जबकि लड़के की कमज़ोर पढ़ाई और ढीलेपन पर कोई प्रश्न नहीं उठता। लड़की का सुंदर होना ज़रूरी है, लड़के का नहीं।
यह भिन्नता पूरी तरह अन्यायपूर्ण है। शिक्षा, आत्मसम्मान और अपनी राय रखने का हक़ हर व्यक्ति का है, चाहे वह लड़का हो या लड़की। जब समाज केवल लड़की से गुण माँगता है और लड़के की कमियों पर चुप रहता है, तो बराबरी ख़त्म हो जाती है। आज संविधान दोनों को बराबर अधिकार देता है, और हमें घर-परिवार में भी इसी बराबरी को अपनाना चाहिए।
इस प्रसंग को पढ़कर मन में दुख और ग़ुस्सा दोनों उठते हैं। एक पढ़ी-लिखी, गुणी लड़की को सामान की तरह ऊपर से नीचे तक देखा जा रहा है। उसकी चाल, चेहरा, गाना, चित्र, सिलाई और इनाम सब पूछे जाते हैं, पर उसकी राय, सपने या पसंद कोई नहीं पूछता। जब वह चुप रहती है, तो उससे रूखी आवाज़ में मुँह खोलने को कहा जाता है, मानो वह कोई बोलने वाली मशीन हो।
लेखक ने यहाँ विवाह से पहले लड़की देखने की उस रस्म पर चोट की है, जिसमें स्त्री को इंसान नहीं, एक वस्तु माना जाता है। इसके साथ स्त्री-शिक्षा के विरोध, रूप पर ज़ोर और लड़की वालों की लाचारी पर भी व्यंग्य है। यह प्रसंग हमें सोचने को मजबूर करता है कि विवाह बराबरी और सम्मान पर टिका होना चाहिए, परख और सौदे पर नहीं।
Flashcards (17)
Play this topic
- किसने क्या कहा
- पिता या पुत्र
- सही या भ्रम
- मेहमानों के आने के बाद
- झटपट उत्तर
उमा की आवाज़, शीर्षक का अर्थ और भाषा की बात
अपमान से भरी परख के बाद उमा पहली बार बोलती है: लड़कियाँ कुर्सी-मेज़ नहीं हैं, उनके भी दिल होते हैं। वह शंकर की करतूत खोलती है, अपनी बी.ए. की पढ़ाई पर गर्व करती है और रीढ़ की हड्डी वाली टिप्पणी से एकांकी को उसके चरम पर पहुँचाती है।
What you will be able to do
- उमा के संवादों के आधार पर उसके व्यक्तित्व की विशेषताएँ बता सकूँगा।
- रीढ़ की हड्डी शीर्षक के शाब्दिक और प्रतीकात्मक अर्थ को दो पात्रों के संदर्भ में समझा सकूँगा।
- एकांकी के अंत, विशेषकर रतन के मक्खन वाले संवाद, की सार्थकता पर विचार कर सकूँगा।
- एकांकी में आए मुहावरों और कहावतों का अर्थ बताकर उनका वाक्य में प्रयोग कर सकूँगा।
- किसी पात्र या कथन पर संक्षिप्त और तर्कपूर्ण टिप्पणी लिख सकूँगा।
Key points
उमा कहती है कि बिकती कुर्सी-मेज़ से कुछ नहीं पूछा जाता, बस ख़रीदार को दिखा दिया जाता है; यह परख पर सीधी चोट है।
वह पूछती है कि क्या लड़कियों के मन नहीं होता, क्या उन्हें दुख नहीं पहुँचता, क्या वे लाचार पशु हैं।
गोपालप्रसाद अपनी बेइज़्ज़ती की बात करते हैं, तो उमा पलटकर कहती है कि इतनी देर की नाप-तोल में उसकी बेइज़्ज़ती नहीं हुई क्या।
उमा बताती है कि शंकर पिछली फ़रवरी में लड़कियों के होस्टल के आस-पास घूमता पकड़ा गया था और वहाँ से भगाया गया था।
उमा गर्व से मानती है कि उसने बी.ए. पास किया है, यह कोई पाप या चोरी नहीं है।
गोपालप्रसाद रामस्वरूप पर धोखे का आरोप लगाकर ग़ुस्से में बेटे के साथ चले जाते हैं।
जाते समय उमा कहती है कि घर जाकर पता लगाइए कि आपके बेटे के रीढ़ की हड्डी है भी या नहीं।
शीर्षक का अर्थ है आत्मसम्मान और नैतिक साहस; यह उमा के पास है और शंकर के पास नहीं।
अंत में उमा रो पड़ती है, प्रेमा घबराकर आती हैं और रतन मक्खन लेकर लौटता है; परदा गिर जाता है।
Full explanation
कुर्सी-मेज़ से कोई कुछ नहीं पूछता
इनाम वाले प्रश्न पर उमा चुप है। रामस्वरूप उसे जवाब देने को कहते हैं और गोपालप्रसाद रूखी आवाज़ में कहते हैं कि ज़रा मुँह तो खोलना चाहिए। तब उमा हल्की, पर मज़बूत आवाज़ में बोलती है। वह कहती है कि जवाब क्या दे, जब कुर्सी-मेज़ बिकती है, तो दुकानदार कुर्सी-मेज़ से कुछ नहीं पूछता, बस ख़रीदार को दिखा देता है; पसंद आ गई तो ठीक, वरना कुछ नहीं। इस एक वाक्य में पूरी परख का अपमान उघड़ जाता है। अब तक उमा से जो कुछ पूछा गया, वह सामान की जाँच जैसा था, और उमा इसी सच्चाई को सबके सामने रख देती है।
रामस्वरूप चौंककर खड़े हो जाते हैं और उसे रोकना चाहते हैं, पर उमा कहती है कि अब उसे कह लेने दिया जाए। वह मेहमानों को ख़रीदार कहती है। फिर पूछती है कि क्या लड़कियों के मन नहीं होता और क्या उन्हें दुख नहीं पहुँचता। क्या वे उन लाचार पशुओं जैसी हैं, जिन्हें कसाई ठोक-बजाकर मोल लेता है? ये प्रश्न केवल गोपालप्रसाद से नहीं, पूरे समाज से हैं। उमा यहाँ अपनी नहीं, हर उस लड़की की आवाज़ बनती है जिसे विवाह से पहले इस तरह परखा जाता है। भेड़-बकरियों और कसाई की तुलना बहुत कठोर है, पर उतनी ही सच्ची भी, क्योंकि ख़रीदने वाले की नज़र में वस्तु की भावनाओं का कोई मूल्य नहीं होता।
बेइज़्ज़ती किसकी हुई?
उमा की बात सुनकर गोपालप्रसाद भड़क उठते हैं। वे रामस्वरूप से पूछते हैं कि क्या उन्हें उनकी इज़्ज़त उतारने के लिए बुलाया गया था। इज़्ज़त उतारना मुहावरा है, जिसका अर्थ है अपमान करना। पर उमा तेज़ आवाज़ में पलटकर कहती है कि और जो इतनी देर से उसकी नाप-तोल हो रही है, उसमें उसकी बेइज़्ज़ती नहीं होती क्या। यह प्रश्न पूरी स्थिति को उलट देता है। जो व्यक्ति अब तक दूसरों को परख रहा था, उसे पहली बार दिखाया जाता है कि सम्मान का हक़ लड़की को भी उतना ही है।
फिर उमा एक और भेद खोलती है। वह कहती है कि अपने बेटे से पूछिए, पिछली फ़रवरी में वह छात्राओं के छात्रावास के आस-पास किसलिए मँडरा रहा था, और वहाँ से उसे कैसे खदेड़ा गया। शंकर घबराकर पिता से चलने को कहता है। इस भेद से साफ़ होता है कि जिस लड़के के लिए एक गुणी और चरित्रवान बहू खोजी जा रही है, उसका अपना आचरण ठीक नहीं। समाज लड़की के हर गुण की जाँच करता है, पर लड़के की कमियों पर पर्दा डाल देता है। उमा इसी दोहरेपन को उजागर करती है।
बी.ए. की डिग्री: अपराध नहीं, गर्व
होस्टल वाली बात सुनकर गोपालप्रसाद चौंकते हैं और पूछते हैं कि क्या उमा कॉलेज में पढ़ी है। रामस्वरूप चुप रह जाते हैं, पर उमा पूरे आत्मविश्वास से कहती है कि हाँ, वह कॉलेज में पढ़ी है और उसने बी.ए. पास किया है। वह कहती है कि पढ़ना न पाप है, न चोरी, और उसने शंकर की तरह छिप-छिपकर ताकने की कायरता भी नहीं दिखाई। उसे अपनी इज़्ज़त और अपने मान का ख़याल है। साथ ही वह कहती है कि ज़रा इनसे पूछिए कि ये किस तरह मुँह छिपाकर भागे थे।
ये पंक्तियाँ उमा के व्यक्तित्व का सबसे उजला पक्ष दिखाती हैं। वह अपनी शिक्षा पर शर्मिंदा नहीं, बल्कि गर्व करती है। उसके लिए पढ़ाई केवल डिग्री नहीं, आत्मबल और स्वतंत्र विचार का साधन है। वह शिक्षा और चरित्र दोनों में शंकर से आगे है। मुँह छिपाकर भागना मुहावरा है, जिसका अर्थ है शर्म या डर से बचकर भाग जाना। उमा की ये बातें बताती हैं कि सच्ची इज़्ज़त अपने सही काम में है, दूसरों को ख़ुश करने के लिए झूठ बोलने में नहीं। उसके व्यक्तित्व में ये गुण उसकी शिक्षा, पिता के दिए अवसर और अपने अनुभवों से आए होंगे।
रीढ़ की हड्डी है या नहीं?
अब गोपालप्रसाद खड़े होकर ग़ुस्से में रामस्वरूप पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने उनके साथ दग़ा किया। लड़की बी.ए. पास है और उन्हें सिर्फ़ मैट्रिक बताया गया। वे अपनी छड़ी ढूँढ़ते हैं और कहते हैं कि झूठ का भी कोई ठिकाना है, ग़ज़ब हो जाता। फिर बेटे के साथ दरवाज़े की ओर बढ़ते हैं। यहाँ एक और व्यंग्य है: उन्हें झूठ से ज़्यादा इस बात का ग़म है कि लड़की बहुत पढ़ी-लिखी है।
उनके जाते-जाते उमा एकांकी का सबसे प्रसिद्ध संवाद बोलती है। वह कहती है कि आप शौक़ से जाइए, पर घर पहुँचकर ज़रा जाँच लीजिए कि आपके दुलारे बेटे की पीठ में रीढ़ है भी या नहीं। अंग्रेज़ी में दोहराकर वह कहती है: बैकबोन। यह वही बात है जो गोपालप्रसाद ने ख़ुद शंकर से अधूरी कही थी, जब उसके दोस्तों के मज़ाक़ का ज़िक्र किया था। उमा उस अधूरे वाक्य को पूरा करती है। रंग-निर्देश बताता है कि गोपालप्रसाद के चेहरे पर बेबस ग़ुस्सा है और शंकर के चेहरे पर रुलाई। दोनों बाहर चले जाते हैं। रामस्वरूप धम से कुर्सी पर बैठ जाते हैं। उमा अचानक चुप हो जाती है, और उसकी चुप्पी सिसकियों में बदल जाती है। इतना साहस दिखाने के बाद भी वह भीतर से आहत है, और यही उसे एक जीवित, सच्चा पात्र बनाता है।
शीर्षक की सार्थकता: दो पात्र, दो अर्थ
रीढ़ की हड्डी शरीर को सीधा खड़ा रखती है। इसी कारण यह शब्द हिंदी में साहस, आत्मसम्मान और चरित्र की दृढ़ता का प्रतीक बन गया है। एकांकी में यह शब्द दो पात्रों के लिए दो अलग अर्थों में आता है। पहला, शंकर के लिए। उसकी झुकी कमर उसके शरीर की कमज़ोरी है, और उसकी अपनी राय न होना, पिता के आगे हर बात में झुक जाना और होस्टल के पास ताक-झाँक करना उसके चरित्र की कमज़ोरी है। उसके दोस्त भी उसकी बैकबोन का मज़ाक़ उड़ाते हैं। उमा की चोट इसी कमज़ोरी पर है।
दूसरा, उमा के लिए। उसके पास वह रीढ़ है जो शंकर में नहीं। वह अपमान सहने से इनकार करती है, सच बोलती है और अपनी शिक्षा पर गर्व करती है। एक तरह से रामस्वरूप के लिए भी यह प्रश्न है, क्योंकि उन्होंने बेटी को पढ़ाया पर समाज के डर से उसके साथ खड़े न हो सके। इसलिए शीर्षक पूरी एकांकी का केंद्र है। यह शारीरिक अंग से बढ़कर नैतिक साहस की बात करता है। अगर इसका दूसरा शीर्षक रखना हो, तो आत्मसम्मान, कुर्सी-मेज़ नहीं या बैकबोन जैसे शीर्षक भी सोचे जा सकते हैं, पर मूल शीर्षक जितनी तीखी चोट कोई नहीं करता।
बाबूजी, मक्खन: अंत का व्यंग्य
उमा के रोने की आवाज़ सुनकर प्रेमा घबराकर आती हैं और पूछती हैं कि क्या वह रो रही है। रामस्वरूप खड़े हो जाते हैं। तभी रतन आता है और कहता है: बाबूजी, मक्खन। सब उसकी ओर देखते हैं और परदा गिर जाता है। लेखक ने एकांकी का अंत इसी संवाद से क्यों किया? पहला कारण हास्य है। इतने गंभीर क्षण में मक्खन की बात अचानक हँसी पैदा करती है, जिससे दर्शक तनाव से बाहर आते हैं।
दूसरा और गहरा कारण व्यंग्य है। जिस मक्खन के लिए पूरा घर परेशान था, वह तब आया जब उसकी ज़रूरत ही ख़त्म हो चुकी थी। मेहमान जा चुके हैं, रिश्ता टूट चुका है और सारी तैयारी, सजावट और झूठ बेकार हो गए हैं। मक्खन उसी दिखावे का प्रतीक बन जाता है, जो इस रस्म में किया जाता है। तीसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि ज़िंदगी चलती रहती है; बड़े टकराव के बाद भी घर की छोटी-छोटी बातें लौट आती हैं। अगर परदा फिर उठे, तो शायद रामस्वरूप बेटी के पास बैठकर उसे गले लगाएँ और मानें कि उसकी बात सही थी, और प्रेमा भी पहली बार बेटी के साहस को समझें।
भाषा की बात: मुहावरे और कहावत
इस एकांकी की भाषा बोलचाल की, सहज और व्यंग्य से भरी है। इसमें हिंदी के साथ उर्दू और अंग्रेज़ी के शब्द भी स्वाभाविक रूप से आते हैं, जैसे तशरीफ़, तकल्लुफ़, बिज़नेस, मार्जिन और बैकबोन। कई मुहावरे पात्रों के भाव को तीखा बनाते हैं। भीगी बिल्ली बनना यानी डरकर सहम जाना; रतन ख़ाली हाथ इसी तरह लौटता है। मुँह फुलाना यानी नाराज़ होना। किस मर्ज़ की दवा होना यानी किसी काम का न होना। सिर चढ़ाना यानी ज़रूरत से ज़्यादा लाड़ देकर बिगाड़ना। सब कुछ उगल देना यानी भेद खोल देना। काँटों में घसीटना यानी किसी को ज़रूरत से ज़्यादा मान देकर संकोच में डालना। इज़्ज़त उतारना यानी अपमान करना, और मुँह छिपाकर भागना यानी शर्म से बचकर भाग जाना।
कहावत बाप सेर तो बेटा सवा सेर का अर्थ है बेटा पिता से भी एक क़दम आगे। एकांकी में यह नकारात्मक अर्थ में आई है, पर इसका प्रयोग अच्छे अर्थ में भी हो सकता है, जैसे पिता अच्छे गायक थे, पर बेटी तो बाप सेर तो बेटी सवा सेर निकली। टिप्पणी लिखते समय याद रखिए कि वह संक्षिप्त, स्पष्ट और तर्कपूर्ण हो, और उसमें अपनी राय हो। जैसे उमा की रीढ़ वाली बात पर टिप्पणी लिखी जा सकती है कि यह शंकर की शारीरिक नहीं, नैतिक कमज़ोरी पर करारा व्यंग्य है। भाषा संगम में मक्खन के अनेक रूप दिए गए हैं: संस्कृत में नवनीतम्, पंजाबी में मक्खण, मराठी और कोंकणी में लोणी, गुजराती में माखण, बांग्ला में माखन या ननी।
Concepts and terms
अपने मान और गरिमा की रक्षा का भाव। उमा अपमान सहने के बजाय विनम्र पर दृढ़ आवाज़ में अपनी बात कहती है।
सही बात के लिए खड़े होने की हिम्मत, चाहे सामने बड़ा या ताक़तवर व्यक्ति हो। यही एकांकी की असली रीढ़ है।
कोई शब्द या वस्तु जो अपने सीधे अर्थ से बड़ा अर्थ दे। रीढ़ की हड्डी यहाँ साहस और चरित्र की दृढ़ता का प्रतीक है।
नाटक का वह क्षण जहाँ तनाव सबसे ऊँचा होता है। उमा का बोलना और मेहमानों का जाना इस एकांकी का चरम है।
किसी व्यक्ति, घटना या कथन पर कम शब्दों में दी गई स्पष्ट और तर्कपूर्ण राय। इसमें संक्षिप्तता, स्पष्टता और अपनी दृष्टि होती है।
सावधान
भ्रम और सच
मिलाकर देखो
Scenario:
अनन्या बारहवीं में विज्ञान पढ़ती है और इंजीनियर बनना चाहती है। उसकी बुआ ने एक रिश्ते की बात चलाई। लड़के वालों ने फ़ोन पर पूछा कि लड़की कितनी पढ़ी है, खाना बनाना आता है या नहीं, और शादी के बाद नौकरी तो नहीं करेगी। अनन्या के पिता ने कहा कि बेटी पहले अपनी पढ़ाई पूरी करेगी और अपने फ़ैसले ख़ुद लेगी। बुआ नाराज़ हो गईं कि आजकल अच्छे रिश्ते मुश्किल से मिलते हैं। उसी शाम अनन्या ने पिता से कहा कि वह उनकी बात से बहुत ख़ुश है। स्कूल में उसने अपनी सहेलियों के साथ मिलकर कानूनी विवाह-आयु और दहेज-निषेध पर एक पोस्टर भी बनाया।
Activity:
अपनी कक्षा में स्त्री-शिक्षा के महत्व पर एक छोटी परिचर्चा आयोजित कीजिए और उसके मुख्य बिंदु लिखिए।
Analysis:
एकांकी 1939 की है, पर उसका प्रश्न आज भी जीवित है। फ़र्क़ यह है कि आज क़ानून और जागरूकता बेटियों के साथ हैं, बस परिवारों को साहस दिखाना है।
Did you know
भारत के संविधान का अनुच्छेद 14 सबको क़ानून के सामने बराबरी देता है, और शिक्षा का अधिकार अब 6 से 14 वर्ष के हर बच्चे का मौलिक अधिकार है।
दहेज लेना और देना भारत में सन् 1961 के दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत अपराध है। एकांकी में बिज़नेस वाली बात इसी लेन-देन की ओर इशारा करती है।
रीढ़ की हड्डी, यानी मेरुदंड, शरीर को सीधा खड़ा रखती है। इसीलिए हिंदी में रीढ़ न होना मुहावरे की तरह साहस न होने के अर्थ में आता है।
Memory tricks
उमा के तीन वार: कु–भे–री — कुर्सी-मेज़ की तुलना, भेड़-बकरी वाला प्रश्न, रीढ़ की हड्डी की चोट।
Practice MCQs with answers (25)
- A वह अपने घर की पुरानी कुर्सी-मेज़ जल्दी बेचना चाहती है
- B उसे फ़र्नीचर की दुकान खोलने का बहुत पुराना शौक़ है
- C उसे इंसान नहीं, बिकाऊ सामान की तरह परखा जा रहा है
- D मेहमानों के बैठने के लिए कुर्सियाँ कम पड़ रही हैं
Show answer
Why:
वस्तुकरण पर चोट।
- A रिश्तेदार
- B ख़रीदार
- C अतिथि
- D शिक्षक
Show answer
Why:
सौदे की भाषा।
- A पशुओं के साथ होने वाली क्रूरता और मारपीट पर
- B गाँवों में हर साल चलने वाले पशु-मेलों पर
- C मांस बेचने वाली शहर की दुकानों पर
- D लड़कियों को भावनाहीन वस्तु मानने वाली सोच पर
Show answer
Why:
दिल और चोट।
- A वह बताती है कि अपमान तो उसका हुआ है, जिसकी इतनी देर नाप-तोल हुई
- B वह तुरंत माफ़ी माँगकर रोते हुए अपने कमरे में अंदर चली जाती है
- C वह गोपालप्रसाद की हर बात चुपचाप मानकर सिर झुकाए खड़ी हो जाती है
- D वह पिता से कहती है कि मेहमानों को और मिठाई तथा चाय दें
Show answer
Why:
सम्मान दोनों का।
- A वह मेडिकल की परीक्षा में लगातार दो बार फ़ेल हुआ था
- B वह लड़कियों के होस्टल के पास घूमता पकड़ा गया था
- C उसने कॉलेज की फ़ीस चुराकर ख़र्च कर दी थी
- D वह पिता से छिपकर रोज़ फ़िल्में देखने जाता था
Show answer
Why:
पिछली फ़रवरी।
- A लड़कों की पढ़ाई पर ज़्यादा और लड़कियों पर कम ख़र्च
- B शहर और गाँव के स्कूलों में अलग-अलग नियम
- C अमीर और ग़रीब घरों की शादियों में अंतर
- D लड़की के हर गुण की जाँच, पर लड़के की कमियों पर चुप्पी
Show answer
Why:
शंकर का आचरण।
- A केवल बड़ी डिग्री पाना
- B केवल अच्छी नौकरी पाना
- C आत्मबल और स्वतंत्र विचार
- D केवल सबको ख़ुश रखना
Show answer
Why:
अपने मान का ख़याल।
- A उन्हें उमा को केवल मैट्रिक पास बताया गया था
- B रामस्वरूप ने उन्हें बहुत ठंडी और फीकी चाय पिलाई थी
- C रामस्वरूप ने नाश्ते में कोई मिठाई नहीं दी थी
- D रामस्वरूप ने उन्हें बहुत देर से बुलाया था
Show answer
Why:
बी.ए. पास निकली।
- A उन्हें रामस्वरूप के घर का रास्ता भूलने का ग़म है
- B उन्हें अपनी छड़ी खो जाने का गहरा ग़म है
- C उन्हें चाय में कम चीनी होने का ग़म है
- D उन्हें झूठ से ज़्यादा लड़की के बहुत पढ़े होने का ग़म है
Show answer
Why:
असली डर पढ़ाई का।
- A प्रेमा का स्त्री-सुबोधिनी पढ़ने के बारे में अधूरा कथन
- B गोपालप्रसाद का दोस्तों वाली बैकबोन का अधूरा ज़िक्र
- C रामस्वरूप का ग्रामोफ़ोन वाला पुराना मज़ाक़
- D रतन का धोती और मक्खन वाला अधूरा प्रश्न
Show answer
Why:
पहले हिस्से से जोड़।
- A बेबसी भरा ग़ुस्सा
- B गहरी शांत ख़ुशी
- C हल्की मुस्कान
- D भारी नींद और थकान
Show answer
Why:
शंकर के चेहरे पर रुलाई।
- A उसे अपनी कही हर बात पर पूरा पछतावा है
- B वह शंकर से विवाह न होने पर दुखी है
- C वह दृढ़ होते हुए भी भीतर से गहराई से आहत है
- D उसे पिता का डाँटना सबसे बुरा लगा
Show answer
Why:
सच्चा मानवीय पात्र।
- A आत्मसम्मान और नैतिक दृढ़ता का
- B शरीर के एक बहुत ज़रूरी अंग का
- C लंबाई और ऊँचे क़द का
- D खेल-कूद की शारीरिक ताक़त का
Show answer
Why:
प्रतीकात्मक अर्थ।
- A उसकी पीठ में सचमुच कोई गंभीर चोट लगी है
- B उसमें अपनी राय, साहस और अच्छे चरित्र की कमी
- C वह डॉक्टर बनकर हड्डियों का इलाज नहीं कर पाएगा
- D वह बहुत तेज़ दौड़ता है, इसलिए झुक जाता है
Show answer
Why:
झुकी कमर का प्रतीक।
- A मीठा गाना गाने की कला
- B घर की सिलाई करने का गुण
- C अन्याय के आगे न झुकने का साहस
- D चुपचाप सब सह लेने का धैर्य
Show answer
Why:
उमा की रीढ़।
- A उमा का
- B गोपालप्रसाद का
- C प्रेमा का
- D घरेलू सहायक रतन का
Show answer
Why:
बाबूजी, मक्खन।
- A मेहमान थोड़ी देर में फिर से लौटकर आने वाले हैं
- B प्रेमा अब मेहमानों के लिए नया नाश्ता बनाएँगी
- C दिखावे की पूरी तैयारी अब बेकार हो चुकी है
- D रतन घर का सबसे समझदार पात्र है
Show answer
Why:
व्यंग्यपूर्ण अंत।
- A स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण
- B औपचारिक, शुष्क और कठिन
- C काव्यात्मक और गेय
- D भावुक और बहुत लंबी
Show answer
Why:
बोलचाल की भाषा।
- A बहुत ख़ुश होना
- B डरा-सहमा होना
- C पानी में भीगना
- D ज़ोर से हँसना
Show answer
Why:
ख़ाली हाथ लौटा।
- A तुम बहुत दिनों से बीमार हो
- B तुम पढ़कर डॉक्टर बन जाओ
- C तुम दवा ले आओ
- D तुम किसी काम की नहीं हो
Show answer
Why:
ताना।
- A जब रतन जल्दी में उनके पैर पर भारी तख्त गिरा देता है
- B जब उमा मेहमानों के सामने खुलकर बोलना शुरू करती है
- C जब गोपालप्रसाद ख़ुद को परेशानी का कारण बताकर विनम्रता दिखाते हैं
- D जब प्रेमा रसोई से आकर उन्हें मक्खन न मिलने की बात धीरे से बताती हैं
Show answer
Why:
संकोच में डालना।
- A पिता झगड़ालू थे और बेटा उनसे भी ज़्यादा झगड़ा करके पूरे मोहल्ले में बदनाम हुआ
- B पिता अच्छे धावक थे, पर बेटी ने राष्ट्रीय पदक जीतकर सबको पीछे छोड़ दिया
- C पिता आलसी थे और बेटा उनसे भी देर तक रोज़ सुबह सोता रहा
- D पिता कंजूस थे और बेटा उनसे भी कम पैसा ख़र्च करता रहा
Show answer
Why:
पिता से आगे, अच्छे अर्थ में।
- A लोणी
- B माखण
- C मक्खण
- D नवनीतम्
Show answer
Why:
नवनीत।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
दो पात्र, दो अर्थ।
- A केवल I और II
- B केवल I और III
- C केवल II और III
- D I, II और III तीनों
Show answer
Why:
उमा सिसकने लगी।
Important short questions (7)
उमा कहती है कि बिकने वाली कुर्सी-मेज़ से कोई कुछ नहीं पूछता, बस ख़रीदार को दिखा दिया जाता है। उसके साथ भी यही हो रहा है। उसकी चाल, चेहरा और गुण जाँचे गए, पर उसकी राय किसी ने नहीं पूछी। वह इस परख को अपमानजनक मानती है।
वह पूछती है कि क्या लड़कियों के मन नहीं होता, क्या उन्हें दुख नहीं पहुँचता, और क्या वे कसाई के हाथ बिकने वाले लाचार पशु हैं। इनका अर्थ है कि लड़कियाँ भी भावनाओं वाली इंसान हैं, सामान नहीं।
शंकर पिछली फ़रवरी में लड़कियों के होस्टल के आस-पास घूमता पकड़ा गया और वहाँ से भगाया गया। इससे पता चलता है कि उसका आचरण ठीक नहीं है। वह ताक-झाँक करने वाला और कायर है, जो पकड़े जाने पर मुँह छिपाकर भाग गया।
पहली, वह स्वाभिमानी है; अपमान सहने के बजाय विनम्र पर मज़बूत आवाज़ में अपनी बात कहती है। दूसरी, वह शिक्षित और आत्मविश्वासी है; अपनी बी.ए. की पढ़ाई पर गर्व करती है और कहती है कि उसने कोई पाप या चोरी नहीं की।
शंकर के लिए इसका अर्थ है साहस और चरित्र की कमी। उसकी झुकी कमर, पिता के आगे झुकना और होस्टल वाली करतूत इसके प्रमाण हैं। उमा के लिए यह आत्मसम्मान और दृढ़ता का प्रतीक है, क्योंकि वह अन्याय के आगे नहीं झुकती।
इस संवाद से गंभीर क्षण में अचानक हल्का हास्य पैदा होता है। साथ ही इसमें व्यंग्य है। पूरा घर मक्खन के लिए परेशान था, पर वह तब आया जब मेहमान जा चुके थे। इससे दिखावे और पूरी तैयारी की व्यर्थता सामने आती है।
मुँह फुलाना यानी नाराज़ होना; खिलौना न मिलने पर छोटा भाई मुँह फुलाकर बैठ गया। सिर चढ़ाना यानी ज़्यादा लाड़ से बिगाड़ देना; दादी ने पोते को इतना सिर चढ़ा रखा है कि वह किसी की नहीं सुनता।
Long answer questions (3)
उमा एकांकी की सबसे सशक्त पात्र है। वह स्वाभिमानी है; पाउडर लगाकर सजने से इनकार करती है और परख के अपमान पर चुप नहीं रहती। वह साहसी है; बड़े और ताक़तवर मेहमानों के सामने भी सच कहती है। वह शिक्षित और आत्मविश्वासी है; अपनी बी.ए. की पढ़ाई पर गर्व करती है। वह स्पष्टवादी है; शंकर का भेद खोलती है और उसकी रीढ़ पर करारा व्यंग्य करती है। साथ ही वह संवेदनशील भी है; सब कहने के बाद सिसकने लगती है।
ये गुण उसमें कई कारणों से आए होंगे। पहला, उसकी शिक्षा ने उसे सोचने, सवाल करने और अपनी राय रखने का आत्मबल दिया। दूसरा, पिता ने उसे कॉलेज तक पढ़ने का अवसर दिया, जो उस समय बड़ी बात थी। तीसरा, कॉलेज के माहौल और संगीत-चित्रकला जैसी कलाओं ने उसके व्यक्तित्व को निखारा। चौथा, बार-बार ऐसी परख के अपमान ने उसके भीतर विरोध की भावना जगाई होगी।
रीढ़ की हड्डी शरीर को सीधा खड़ा रखती है, इसलिए यह साहस, आत्मसम्मान और चरित्र की दृढ़ता का प्रतीक है। एकांकी में शंकर की झुकी कमर, पिता के आगे हर बात में झुक जाना, अपनी कोई राय न होना और होस्टल के पास की ताक-झाँक उसकी रीढ़हीनता दिखाते हैं। दूसरी ओर उमा अन्याय के आगे न झुककर बताती है कि सच्ची रीढ़ किसमें है।
इस प्रकार शीर्षक एकांकी के केंद्र में है और शारीरिक अंग से बढ़कर नैतिक साहस की बात करता है। यदि दूसरा शीर्षक रखना हो, तो कुर्सी-मेज़ नहीं हूँ उचित होगा। यह उमा की उस बात से निकला है, जिसमें वह ख़ुद को बिकाऊ सामान मानने से इनकार करती है। यह शीर्षक एकांकी के मुख्य संदेश, यानी स्त्री के सम्मान और बराबरी, को सीधे सामने रखता है।
परदा उठता है। वही कमरा है, पर अब सजावट अस्त-व्यस्त है। तख्त पर सितार पड़ा है, और मेज़ पर मक्खन की टिकिया रखी है। उमा एक कोने में बैठी आँसू पोंछ रही है। रामस्वरूप धीरे-धीरे उसके पास जाते हैं और उसके सिर पर हाथ रखते हैं। वे कहते हैं कि बेटी, आज तुमने वह कह दिया जो मुझे बहुत पहले कहना चाहिए था; मैंने तुम्हें पढ़ाया, पर तुम्हारे साथ खड़ा होने का साहस नहीं दिखाया।
प्रेमा भी पास आकर बैठती हैं और पहली बार मानती हैं कि पढ़ाई ने उनकी बेटी को कमज़ोर नहीं, मज़बूत बनाया है। उमा कहती है कि उसे ऐसा घर चाहिए जहाँ उसकी पढ़ाई और राय का सम्मान हो। रामस्वरूप वादा करते हैं कि अब वे कभी उसकी पढ़ाई नहीं छिपाएँगे। तभी रतन डरते-डरते मक्खन की बात पूछता है, और सब हँस पड़ते हैं। परदा गिरता है।
Flashcards (17)
Play this topic
- मुहावरा और अर्थ
- उमा या शंकर
- सही या भ्रम
- अंतिम दृश्य का क्रम
- झटपट उत्तर
Class 9 Hindi Chapter 6 — frequently asked questions
एक अंक में पूरा होने वाले छोटे नाटक को एकांकी कहते हैं। इस एकांकी की पहली विशेषता है एक मुख्य घटना, यानी लड़की देखने की रस्म। दूसरी विशेषता है सीमित पात्र और कसे हुए संवाद, जिनसे कहानी जल्दी चरम बिंदु तक पहुँचती है।
जगदीशचंद्र माथुर सन् 1917 में शाहजहाँपुर में जन्मे। वे आई.सी.एस. अधिकारी थे और आकाशवाणी के महानिदेशक भी रहे। कोणार्क, भोर का तारा और ओ मेरे सपने उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। सन् 1978 में उनका निधन हुआ।
कोष्ठक में लिखी मंच, वेशभूषा, चाल और भावों की सूचनाएँ रंग-निर्देश कहलाती हैं। पहले रंग-निर्देश से पता चलता है कि एक साधारण कमरे में अधेड़ उम्र के रामस्वरूप और रतन तख्त ला रहे हैं। इससे लगता है कि किसी ख़ास मेहमान के आने की तैयारी है।
गोपालप्रसाद की आँखों से दुनियादारी वाली चतुराई झलकती है; वे अनुभवी और चालबाज़ हैं। शंकर बात-बात पर बेढंगी हँसी हँसता है, उसकी आवाज़ पतली और खिसियाई हुई है, और झुकी कमर उसकी पहचान है। पिता चतुर हैं, बेटा कमज़ोर और झेंपू।
वे बताते हैं कि उनके समय में लड़के दर्जनों कचौड़ियाँ खा जाते और चार पैसे की बालाई अकेले हज़म कर लेते थे। आज जैसे खेल न होने पर भी कोई कमज़ोर नहीं था। पढ़ाई में बारह घंटे बैठते थे और उस समय का मैट्रिक भी फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी लिखता था।
इससे पता चलता है कि गोपालप्रसाद के लिए विवाह दो परिवारों का पवित्र रिश्ता नहीं, बल्कि लेन-देन का सौदा है। जैसे व्यापार में माल परखा जाता है, वैसे ही वे लड़की और उसके घर की हैसियत परखने आए हैं।
उमा कहती है कि बिकने वाली कुर्सी-मेज़ से कोई कुछ नहीं पूछता, बस ख़रीदार को दिखा दिया जाता है। उसके साथ भी यही हो रहा है। उसकी चाल, चेहरा और गुण जाँचे गए, पर उसकी राय किसी ने नहीं पूछी। वह इस परख को अपमानजनक मानती है।
वह पूछती है कि क्या लड़कियों के मन नहीं होता, क्या उन्हें दुख नहीं पहुँचता, और क्या वे कसाई के हाथ बिकने वाले लाचार पशु हैं। इनका अर्थ है कि लड़कियाँ भी भावनाओं वाली इंसान हैं, सामान नहीं।
शंकर पिछली फ़रवरी में लड़कियों के होस्टल के आस-पास घूमता पकड़ा गया और वहाँ से भगाया गया। इससे पता चलता है कि उसका आचरण ठीक नहीं है। वह ताक-झाँक करने वाला और कायर है, जो पकड़े जाने पर मुँह छिपाकर भाग गया।
All Class 9 Hindi chapters
All Hindi chapters · Every Class 9 subject · The whole NCERT library
Study this chapter properly, free
Everything above is on this page to read. In the Veda app the same chapter becomes spaced-repetition flashcards, timed tests that mark themselves, Veda Bites you can swipe, and games — with your progress tracked topic by topic.
Get Veda free