Class 9 Hindi Chapter 3: संवादहीन
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ताई, सूना घर और मिट्ठू
कभी भरे-पूरे रहे बड़े घर में अब अकेली ताई रह गई हैं। गनपत का लाया तोता मिट्ठू उनके सूनेपन का सहारा बनता है, और दोनों के बीच प्यार, बातचीत और कभी-कभी नोंक-झोंक का एक अनोखा रिश्ता बन जाता है।
What you will be able to do
- शेखर जोशी के जीवन और प्रमुख रचनाओं का परिचय दे सकूँगा।
- ताई के बड़े घर के अतीत और वर्तमान की तुलना कर सकूँगा।
- गाँव से शहर की ओर पलायन और उससे बढ़े अकेलेपन को समझा सकूँगा।
- मिट्ठू के आने से ताई की दिनचर्या में आए बदलाव बता सकूँगा।
- ताई और मिट्ठू के संवादों में छिपी ममता और नोंक-झोंक को पहचान सकूँगा।
Key points
शेखर जोशी (1932-2022) अल्मोड़ा के थे, जो आज उत्तराखंड में है; उनका पहला कहानी-संग्रह कोसी का घटवार था।
उन्होंने गाँव-शहर के मध्यवर्ग और कारख़ानों के मज़दूरों के जीवन-संघर्ष को अपनी कहानियों में उभारा; सन् 2022 में उनका निधन हुआ।
संवादहीन एक ग्रामीण वृद्ध स्त्री, ताई, के अकेलेपन की कहानी है।
ताई के बड़े घर में कभी बेटे-बहुएँ, नौकर-चाकर और गाय-ढोर थे; अब वह सूना खंडहर जैसा है।
बहू-बेटे शहर चले गए, बेटियाँ ब्याह के बाद अपने घर की हो गईं, और कारोबार पराए हाथों में चला गया।
गनपत एक पहाड़ी तोता ले आया, और ताई की सारी ममता उस मिट्ठू पर बरस पड़ी।
जो ताई अपने लिए चूल्हा जलाने में आलस करती थीं, वे मिट्ठू के लिए नियम से दाल-भात बनाने लगीं।
मिट्ठू ताई के सिखाए राम-राम, सीताराम और हर हर गंगे बोलता, और अब कैसे कटेगी पूछने पर कटेगी कहकर दिलासा देता।
दोनों में कभी नोंक-झोंक भी होती, पर फिर मान-मनौवल से रिश्ता पहले जैसा प्यारा हो जाता।
Full explanation
शेखर जोशी और कहानी का परिचय
शेखर जोशी अल्मोड़ा की धरती से आए, जो आज उत्तराखंड का हिस्सा है, और उनका जन्म-वर्ष 1932 था। 1958 में कोसी का घटवार नाम से उनकी कहानियों की पहली किताब आई। इसके बाद भी कई संग्रह आए, जिनमें दाज्यू, हलवाहा, मेरा पहाड़, साथ के लोग और नौरंगी बीमार है जैसे नाम गिने जाते हैं। एक पेड़ की याद उनका शब्दचित्र-संग्रह है और मेरा ओलिया गाँव उनका आत्मवृत्त। उन्होंने गाँव और शहर के मध्यवर्गीय लोगों के जीवन-मूल्यों और कारख़ानों में काम करने वाले मज़दूरों के संघर्ष को अपनी कहानियों में उतारा। उन्हें महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार और मैथिलीशरण गुप्त सम्मान जैसे कई सम्मान मिले। सन् 2022 में उनका निधन हुआ।
संवादहीन एक ग्रामीण बुज़ुर्ग स्त्री के अकेलेपन की कहानी है। इसके दो मुख्य पात्र हैं, ताई और उनका तोता मिट्ठू। कहानी मनुष्य और पक्षी के रिश्ते के बहाने आज के समाज की कुछ कड़वी सच्चाइयाँ दिखाती है: गाँवों से पलायन, बुज़ुर्गों का अकेलापन, और आदर्श व यथार्थ के बीच का टकराव।
भरा-पूरा घर, जो सूना हो गया
कहानी एक छोटे से संवाद से शुरू होती है। ताई लंबी साँस लेकर भगवान से पूछती हैं कि नैया कैसे पार लगेगी, और पिंजरे में फुदकता मिट्ठू जवाब देता है कि राम-राम कहो, सीताराम कहो। ताई भी उसके साथ सीताराम दोहराने लगती हैं। इसी से पता चल जाता है कि अब ये दोनों ही एक-दूसरे का सहारा हैं।
ताई ने अच्छे दिन भी देखे थे। गाँव के बीच का बड़ा घर कभी बेटे-बहुओं, बेटियों, नौकर-चाकरों और गाय-ढोरों से भरा रहता था। फिर धीरे-धीरे सब बदल गया। बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहरों में बस गए। बेटियाँ ब्याह के बाद अपनी-अपनी गृहस्थी में रम गईं। जब घर सँभालने वाला कोई न रहा, तो खेती और कारोबार भी धीरे-धीरे पराए हाथों में चला गया। खेती-बाड़ी और कारबार न रहे, तो नौकर-चाकर भी कब तक टिकते।
अब वह बड़ा घर एक सूने खंडहर जैसा था। लेखक इसे खंडहर इसलिए कहता है क्योंकि इमारत तो खड़ी है, पर उसमें जीवन, रौनक और आवाज़ें नहीं बचीं। यह केवल एक घर की कहानी नहीं; यह उन अनगिनत गाँवों की कहानी है जहाँ से युवा पीढ़ी रोज़गार के लिए शहर चली गई और बुज़ुर्ग अकेले रह गए।
अकेलापन, भूख से बड़ा दुख
ताई अपनी अकेली जान के लिए दो बार की जगह एक ही बार चूल्हा जलातीं। व्रत-उपवास के बहाने कई बार चूल्हा-चौका टाल भी जातीं। लेखक कहता है कि पेट की चिंता उन्हें कभी सताती ही न थी। असली दुख था सूने घर की भाँय-भाँय, जो उन्हें काटने को दौड़ती थी।
यह वाक्य कहानी का केंद्र है। बुढ़ापे में खाने-पहनने से बड़ा दुख होता है बात करने वाले का न होना। ताई के पास छत है, खाना है, पर संवाद नहीं। इस भाव को समझना ज़रूरी है, क्योंकि आगे कहानी का शीर्षक संवादहीन इसी से जुड़ता है।
गनपत का तोता और ताई की ममता
इसी सूनेपन में गनपत नाम का एक भला आदमी न जाने कहाँ से एक प्यारा पहाड़ी तोता ले आया। ताई की सारी ममता, जो बच्चों के दूर जाने से जैसे जमा पड़ी थी, उस तोते पर बरस पड़ी। अब वे दिन-रात मिट्ठू को लेकर ही बेचैन रहतीं।
मिट्ठू के आने से ताई की दिनचर्या ही बदल गई। जो ताई अपने लिए चूल्हा जलाने में आलस कर जाती थीं, वही अब नियम से मिट्ठू के लिए दाल-भात बनातीं। उसके कभी भी माँगने के लिए रोटी बचाकर रखतीं। अब उन्हें यह भी पता रहने लगा कि किसके खेत में हरी मिर्च तैयार है और किस पेड़ पर आख़िरी अमरूद बचे हैं, क्योंकि ये मिट्ठू की पसंद की चीज़ें थीं। एक छोटे से पक्षी ने ताई को फिर से गृहस्थी, ज़िम्मेदारी और जीने का कारण दे दिया। इसी को कहानी ताई की नई गृहस्थी कहती है।
होशियार मिट्ठू और गुलज़ार घर
मिट्ठू किसी तेज़ बुद्धि वाले विद्यार्थी की तरह था। ताई जो पाठ पढ़ातीं, वह उसे ज्यों का त्यों दोहरा देता, एक-दो बार सुनकर याद कर लेता, और मौक़े पर ताई के सवालों का ठीक उत्तर दे देता। उसकी बातों से बड़े घर का सूनापन धीरे-धीरे रौनक में बदल गया। पड़ोस की बहुएँ-बेटियाँ बच्चों को गोद में लेकर आतीं, ताकि मिट्ठू से उनका मन बहले। घर फिर से गुलज़ार हो गया।
सुबह जब चिड़ियाँ चहचहातीं, तो मिट्ठू भी अपना पाठ शुरू कर देता: हर हर गंगे, सीताराम बोल, मिट्ठू राम राम। ताई चौंककर उठतीं और प्यार से आशीर्वाद देतीं कि जीते रहो बेटा, जुग-जुग जिओ। बदले में मिट्ठू भी किसी बड़े-बूढ़े की तरह कह देता, ख़ुश रहो, ख़ुश रहो। यह दृश्य हँसाता भी है और छूता भी है। यहाँ रिश्ते उलट गए हैं: छोटा-सा तोता ताई का बुज़ुर्ग बनकर उन्हें आशीर्वाद दे रहा है।
कटेगी, कटेगी: बुढ़ापे का सहारा
बुढ़ापे का शरीर और ऊपर से नई गृहस्थी का भार। काम से थककर जब ताई पिंजरा पास रखकर सुस्तातीं, तो अपने-आप पूछ बैठतीं कि मिट्ठू, अब कैसे कटेगी? और जवान मिट्ठू पूरे दम-ख़म से जवाब देता: कटेगी! कटेगी!! कटेगी!!!
मिट्ठू तो बस सीखा हुआ शब्द दोहरा रहा है, पर ताई के लिए यह सबसे बड़ा दिलासा है। उनके थके शरीर में जैसे प्राण लौट आते। यहाँ लेखक दिखाता है कि अकेले इंसान के लिए एक छोटा-सा जवाब भी कितना बड़ा सहारा बन सकता है। शब्द चाहे सिखाए हुए हों, पर उनसे मिलने वाली हिम्मत असली है।
राम-कहानी और नोंक-झोंक
दोपहर में ताई मिट्ठू को अपनी राम-कहानी सुनातीं, यानी बीते वैभव के दिनों की गाथा। ज़मींदार साहब का रौबदार चेहरा, उनके एहसानों के नीचे झुकी रैयत, हाथी-घोड़े, खेल-तमाशे, ब्याह-शादियाँ, तीज-त्योहार, भोज और दावतें, दरबार की रौनक, ज़मींदार साहब का गुण पहचानना और उनका ग़ुस्सा। ताई घंटों सुनातीं, और मिट्ठू गर्दन टेढ़ी करके कभी धैर्य से सुनता, तो कभी बीच में अपनी समझ से कुछ बोल देता। ताई को सुनने वाला मिल गया था, और यही उनके लिए सबसे बड़ी बात थी।
पर यह रिश्ता हमेशा मीठा ही नहीं रहता था। कभी ताई थककर लेटी होतीं और मिट्ठू अपनी कोई ज़िद मनवाने के लिए पिंजरे में तूफ़ान खड़ा कर देता, पानी और दाने की कटोरियाँ जान-बूझकर उलट देता। खीझकर ताई कहतीं कि मेरी जान खाने आ गया है, मर जा! और मिट्ठू भी उतनी ही खीझ से दोहरा देता, मर जा! मर जा! फिर मान-मनौवल होता और दोनों की दुनिया पहले जैसी प्यार से चलने लगती। यह नोंक-झोंक इस रिश्ते को और सच्चा बनाती है, ठीक वैसे ही जैसे किसी परिवार में होता है।
Concepts and terms
अकेलेपन से उपजा ख़ालीपन, जब घर में बात करने वाला कोई न हो। ताई को भूख की चिंता नहीं, पर घर की भाँय-भाँय काटने को दौड़ती थी।
रोज़गार या सुविधा के लिए गाँव छोड़कर शहर चले जाना। ताई के बहू-बेटे भी गाँव का मोह छोड़कर शहर के हो गए।
जिस पर किसी का सारा प्रेम और देखभाल टिक जाए। मिट्ठू ताई के लिए तोता भर नहीं, बल्कि बातचीत का साथी और ममता का केंद्र बन गया।
अपनी लंबी आपबीती सुनाना। ताई दोपहर में मिट्ठू को ज़मींदार साहब के दिनों, उत्सवों और रौनक की कहानियाँ सुनाती थीं।
रूठने के बाद एक-दूसरे को मनाने का क्रम। ताई और मिट्ठू की नोंक-झोंक के बाद यही होता और रिश्ता फिर प्यारा हो जाता।
सावधान
भ्रम और सच
करके देखो
Title:
मेरे घर के बुज़ुर्ग
Safety:
बात उनकी सहमति से ही करें और कोई निजी बात सबके सामने न बताएँ।
What You Notice:
ताई को मिट्ठू जैसा श्रोता मिला तो उनमें जान लौट आई; सुनने वाला होना किसी भी बुज़ुर्ग के लिए बड़ा उपहार है।
Did you know
शेखर जोशी की कहानी कोसी का घटवार हिंदी की सबसे प्रसिद्ध प्रेम-कहानियों में गिनी जाती है। घटवार यानी पनचक्की चलाने वाला।
तोते आवाज़ों की नक़ल इसलिए कर पाते हैं क्योंकि उनकी जीभ मोटी और घूमने वाली होती है और वे सुनी हुई ध्वनियाँ याद रखते हैं।
आज भारत के कई पहाड़ी गाँवों में लोग रोज़गार के लिए शहर चले गए हैं, और वहाँ के कई घरों में अकेले बुज़ुर्ग ही रह गए हैं।
Memory tricks
ताई की कहानी: भ–सू–ग–म–क — भरा घर, सूना घर, गनपत, मिट्ठू, कटेगी। पहले भरा, फिर सूना, फिर गनपत का तोता, मिट्ठू का साथ, और कटेगी का दिलासा।
Practice MCQs with answers (25)
- A ग्रामीण वृद्ध स्त्री का अकेलापन
- B पहाड़ी तोतों को पालने की पूरी विधि
- C कुंभ मेले का विस्तृत वर्णन
- D ज़मींदारी प्रथा का इतिहास
Show answer
Why:
ताई का सूनापन कहानी का केंद्र है।
- A खैरागढ़
- B अल्मोड़ा
- C प्रयागराज
- D वाराणसी
Show answer
Why:
आज यह उत्तराखंड में है।
- A पंच-पात्र
- B मानसरोवर
- C झलमला
- D दाज्यू
Show answer
Why:
साथ के लोग और हलवाहा भी।
- A हमेशा से सूना, टूटा-फूटा और वीरान पड़ा हुआ
- B केवल ताई और मिट्ठू का छोटा-सा ठिकाना
- C बेटे-बहुओं, नौकरों और गाय-ढोरों से भरा
- D गाँव से बहुत दूर घने जंगल के बीच बसा
Show answer
Why:
ताई ने अच्छे दिन भी देखे थे।
- A ताई ने अपनी मर्ज़ी से सब कुछ गाँव के मंदिर को दान कर दिया
- B चोरों ने रातों-रात ताई का सारा सामान लूट लिया था
- C सरकार ने ताई का घर और खेत अपने क़ब्ज़े में ले लिए
- D घर सँभालने वाला न रहा, तो खेती-कारोबार दूसरों का हो गया
Show answer
Why:
बेटे शहर गए, बेटियाँ ब्याह गईं।
- A उसकी दीवारें सचमुच ढह चुकी थीं और छत गिर गई थी
- B इमारत तो है, पर उसमें जीवन और रौनक नहीं
- C वह गाँव का सबसे पुराना और टूटा हुआ मंदिर था
- D उसमें कोई भी रहना नहीं चाहता था, ताई भी नहीं
Show answer
Why:
खंडहर यहाँ सूनेपन का प्रतीक है।
- A पैसों की भारी कमी, क़र्ज़ और गहरी ग़रीबी का बोझ
- B गाँव वालों का उनसे पुराना झगड़ा और गहरा बैर
- C परिवार का दूर होना और बात करने वाला न रहना
- D उनका बीमार रहना और बिस्तर से उठ न पाना
Show answer
Why:
संवाद का अभाव।
- A ताई के लिए भोजन से बड़ा दुख अकेलापन था
- B ताई के पास खाने का बहुत बड़ा भंडार था
- C ताई को कभी भूख ही नहीं लगती थी
- D ताई रोज़ पड़ोसियों के घर खाना खाती थीं
Show answer
Why:
सूने घर की भाँय-भाँय काटती थी।
- A जून के महीने में खाना बनाना
- B दो चूल्हों पर एक साथ पकाना
- C चूल्हा जलाकर उसे बुझा देना
- D दिन में एक ही बार खाना बनाना
Show answer
Why:
जून यानी बेला या समय।
- A गनपत ने
- B जगन ने
- C बेटे ने
- D बहू ने
Show answer
Why:
भला हो गनपत का।
- A मिट्ठू गाँव का सबसे महँगा, सुंदर और दुर्लभ तोता था
- B गनपत ने ताई को तोते की देखभाल करने का सख़्त आदेश दिया था
- C बच्चों के दूर होने से उनका प्रेम किसी साथी को खोज रहा था
- D ताई को पक्षियों के बारे में किताबें पढ़ना बहुत अच्छा लगता था
Show answer
Why:
अकेले मन को सहारा मिल गया।
- A वे गाँव छोड़कर शहर चली गईं
- B वे नियम से उसके लिए खाना बनाने लगीं
- C वे दिन भर सोती रहने लगीं
- D वे पड़ोसियों से बात करना छोड़ बैठीं
Show answer
Why:
दाल-भात, रोटी बचाकर रखना।
- A वे गाँव में सब्ज़ियाँ बेचने लगी थीं
- B उन्हें खेती का नया काम मिल गया था
- C वे गाँव की पंचायत की सदस्य बन गई थीं
- D वे मिट्ठू की पसंद की चीज़ें जुटाती थीं
Show answer
Why:
मिट्ठू के लिए उनकी गृहस्थी।
- A तेज़ बुद्धि वाले विद्यार्थी से
- B मंदिर के किसी बूढ़े पुजारी से
- C गाँव के किसी लोकगायक से
- D सीमा पर खड़े किसी सैनिक से
Show answer
Why:
पाठ ज्यों का त्यों दोहरा देता।
- A घर और ज़्यादा सूना हो गया
- B घर में झगड़े बढ़ गए
- C सूनापन रौनक में बदल गया
- D घर बेच दिया गया
Show answer
Why:
पड़ोस की बहुएँ बच्चों को लेकर आने लगीं।
- A ताई तोते से नाराज़ होकर उसे डाँट रही हैं
- B छोटा तोता बड़े-बूढ़े की तरह आशीर्वाद देता है
- C मिट्ठू ताई की कोई बात बिलकुल नहीं समझता
- D ताई उस दिन पहली बार मिट्ठू से मिलती हैं
Show answer
Why:
रिश्ता हास्य और ममता से उलट गया है।
- A मिट्ठू से जल्दी छुटकारा पाने की इच्छा
- B किसी लंबी यात्रा पर जाने की ख़ुशी
- C बुढ़ापे की थकान और भविष्य की चिंता
- D पड़ोसियों के प्रति भरा हुआ ग़ुस्सा
Show answer
Why:
नई गृहस्थी का भार भी था।
- A थके मन का सबसे बड़ा दिलासा
- B एक डरावनी और अशुभ चेतावनी
- C एक बेकार और कानफोड़ू शोर
- D एक नया, उलझा हुआ प्रश्न
Show answer
Why:
ताई के शरीर में प्राण लौट आते।
- A क्योंकि मिट्ठू सचमुच भविष्य की सारी बातें पहले से जानता था
- B अकेले व्यक्ति के लिए किसी का जवाब देना ही बहुत बड़ी बात है
- C क्योंकि गाँव वाले मिट्ठू को देवता मानकर पूजते थे
- D क्योंकि ताई को मिट्ठू की भाषा बिलकुल समझ नहीं आती थी
Show answer
Why:
शब्द सिखाए हुए, हिम्मत असली।
- A शहर के नए बाज़ारों, दुकानों और मेलों का
- B अपने बेटों की नौकरी और तरक़्क़ी की बातों का
- C कुंभ मेले की यात्रा की तैयारी और ख़र्च का
- D ज़मींदार साहब के समय के वैभव और उत्सवों का
Show answer
Why:
हाथी-घोड़े, भोज-दावतें।
- A उसमें हर समय केवल झगड़ा और कड़वाहट होती थी
- B उसमें प्यार के साथ कभी-कभी नोंक-झोंक भी थी
- C ताई मिट्ठू से कभी एक शब्द नहीं बोलती थीं
- D मिट्ठू ताई को पहचानता ही नहीं था
Show answer
Why:
मर जा, मर जा और फिर मान-मनौवल।
- A बहुत डरावना, जैसे कोई रहस्य भरी जासूसी कहानी
- B पूरी तरह उबाऊ, लंबा और बिना किसी रस का
- C अधिक सच्चा, जैसे घर के किसी सदस्य से नोंक-झोंक
- D केवल पशु-पक्षियों की जानकारी देने वाला लेख
Show answer
Why:
रिश्ता परिवार जैसा है।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
मिट्ठू संवाद का माध्यम था।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C I, II और III तीनों
- D केवल I और III
Show answer
Why:
मिट्ठू गनपत लाया था।
- A वे बिल्ली को कोई नई भाषा सिखा रहे हैं
- B वे पड़ोसियों को चिढ़ाना चाहते हैं
- C अकेलेपन में वे किसी साथी से संवाद खोज रहे हैं
- D वे बिल्ली को बेचने की तैयारी में हैं
Show answer
Why:
ताई और मिट्ठू जैसा रिश्ता।
Important short questions (7)
शेखर जोशी का जन्म 1932 में अल्मोड़ा में हुआ। कोसी का घटवार उनका पहला कहानी-संग्रह है। उन्होंने मध्यवर्ग और मज़दूरों के जीवन पर कहानियाँ लिखीं। 2022 में उनका निधन हुआ।
अतीत में घर बेटे-बहुओं, नौकर-चाकरों और गाय-ढोरों से भरा था और खेती-कारोबार चलता था। अब बेटे शहर चले गए, कारोबार पराया हो गया और घर सूने खंडहर जैसा रह गया।
बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहर चले गए और बेटियाँ ब्याहकर अपने घर चली गईं। सँभालने वाला न रहा, तो खेती-कारोबार पराए हाथों में गया और नौकर-चाकर भी चले गए।
ताई नियम से उसके लिए दाल-भात बनाने लगीं और रोटी बचाकर रखने लगीं। वे मिर्च और अमरूदों की ख़बर रखने लगीं, और घर में फिर से रौनक आ गई।
थकी हुई ताई जब भविष्य की चिंता में पूछतीं कि अब कैसे कटेगी, तो मिट्ठू का यह उत्तर उन्हें दिलासा देता। उनके थके शरीर में जैसे प्राण लौट आते।
ताई के पास अपनी बातें सुनाने वाला कोई और नहीं था। मिट्ठू गर्दन टेढ़ी करके सुनता और कभी कुछ बोल देता, इसलिए उन्हें एक श्रोता मिल गया था।
ताई थककर लेटी होतीं तो मिट्ठू ज़िद में कटोरियाँ उलट देता। ताई खीझकर मर जा कहतीं, और मिट्ठू भी मर जा दोहराता। फिर मान-मनौवल से सब ठीक हो जाता।
Long answer questions (3)
ताई का अकेलापन समय और समाज के बदलाव से पैदा हुआ। कभी उनका बड़ा घर परिवार, नौकर-चाकर और पशुओं से भरा था। फिर बहू-बेटे रोज़गार और सुविधा के लिए गाँव छोड़कर शहर चले गए। बेटियाँ ब्याह के बाद अपनी गृहस्थी में रम गईं। घर सँभालने वाला कोई न रहा, तो खेती और कारोबार पराए हाथों में चला गया और नौकर भी चले गए। अब ताई के पास खाने-रहने की कमी नहीं थी, पर बात करने वाला कोई नहीं था। सूने घर की भाँय-भाँय उन्हें काटने दौड़ती थी। इस तरह गाँवों से पलायन, बिखरता संयुक्त परिवार और संवाद का अभाव, तीनों मिलकर ताई के अकेलेपन के कारण बने।
मिट्ठू के आने से पहले ताई के पास बात करने वाला कोई नहीं था। मिट्ठू ने यह कमी पूरी की। सुबह वह हर हर गंगे बोलकर उन्हें जगाता, ताई आशीर्वाद देतीं और वह ख़ुश रहो कहता। थकी ताई पूछतीं कि अब कैसे कटेगी, तो वह कटेगी कहकर दिलासा देता। ताई दोपहर में उसे अपनी राम-कहानी सुनातीं और वह धैर्य से सुनता। यह संवाद का माध्यम था। दूसरी ओर ताई की सारी ममता उस पर बरस पड़ी; वे उसके लिए दाल-भात बनातीं, रोटी बचातीं, मिर्च और अमरूद खोजतीं, और कहीं जातीं तो उसे कंजूस के धन की तरह छिपाकर रखतीं। नोंक-झोंक और मान-मनौवल भी परिवार जैसे रिश्ते का प्रमाण है।
कहानी बुज़ुर्गों के अकेलेपन की समस्या की ओर संकेत करती है। आज बहुत से युवा पढ़ाई और नौकरी के लिए गाँव या शहर छोड़कर दूर चले जाते हैं। घर में माता-पिता या दादा-दादी अकेले रह जाते हैं। उनके पास पैसे या सुविधाएँ हो सकती हैं, पर बात करने वाला, उनकी पुरानी कहानियाँ सुनने वाला कोई नहीं होता। ताई की तरह वे किसी पालतू जानवर, टीवी या पड़ोसी में साथी खोजते हैं। मेरे विचार से हमें दूर रहकर भी रोज़ फ़ोन या वीडियो से बात करनी चाहिए, छुट्टियों में उनके पास जाना चाहिए, और उनकी बातें धैर्य से सुननी चाहिए। मोहल्ले में बुज़ुर्गों के मिलने-बैठने की जगहें भी बननी चाहिए।
Flashcards (17)
Play this topic
- कौन क्या करता है
- पहले का घर या अब का घर
- सही या भ्रम
- कहानी का आरंभिक क्रम
- झटपट उत्तर
कुंभ यात्रा और मिट्ठू की उड़ान
ताई कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जाती हैं और मिट्ठू मास्टराइन के पास छूट जाता है। आज़ादी के पक्षधर जगन मास्टर रोज़ उसे पिंजरे से बाहर निकालते हैं, और एक दिन मिट्ठू रोशनदान से उड़ जाता है। एवजी तोता ताई का सूनापन नहीं भर पाता।
What you will be able to do
- कुंभ-यात्रा के समय ताई की दुविधा और उसके समाधान को समझा सकूँगा।
- जगन मास्टर के स्वभाव, सिद्धांतों और उनके प्रयोग का मूल्यांकन कर सकूँगा।
- मिट्ठू के उड़ने की घटना और उसके बाद गाँव की चिंता का वर्णन कर सकूँगा।
- एवजी तोते वाले उपाय और ताई की वापसी के दृश्य का अर्थ बता सकूँगा।
- संवादहीन शीर्षक की सार्थकता और कहानी के अंत के प्रकार पर तर्क दे सकूँगा।
Key points
प्रयागराज में कुंभ लगा था और गाँव से भी बहुत-से लोग वहाँ स्नान को निकल रहे थे; ताई का मन तीर्थ और मिट्ठू की चिंता के बीच बँट गया।
किसी ने हँसी में कहा कि रेल में मिट्ठू का भी टिकट लगेगा, क्योंकि वह भी बोलने-बतियाने वाला प्राणी है।
मेले की भीड़ में मिट्ठू की सुरक्षा का भरोसा न होने से ताई ने उसे जगन मास्टर की घरवाली के पास छोड़ा।
जगन मास्टर स्वतंत्र विचारों के आदमी थे; पिंजरे में बंद पक्षी देखकर उन्हें बेचैनी और अपराध-बोध होता था।
वे रोज़ कमरा बंद करके पिंजरा खोलते, दाने बिखेरकर मिट्ठू को बाहर बुलाते और फिर उसे वापस बंद कर देते।
तीन-चार दिन बाद मिट्ठू की नज़र खुले रोशनदान पर पड़ी और वह बाहर की दुनिया में उड़ गया।
ताई के तेज़ स्वभाव और ममता को जानने वाले गाँव ने डरकर गनपत के सुझाव पर एक हमशक्ल तोता मँगाया।
जगन मास्टर खाना-पीना भूलकर नए तोते को रटाते रहे, पर एवजी तोता ताई को देखकर कुछ नहीं बोला।
अंत में ताई पुकारती रह जाती हैं; उनका साथी न जाने कहाँ है, और शीर्षक संवादहीन पूरी तरह सार्थक हो उठता है।
Full explanation
कुंभ का बुलावा और ताई की दुविधा
कहानी का दूसरा भाग एक बड़े धार्मिक अवसर से शुरू होता है। गाँव के बहुत-से लोग कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जाने की तैयारी में थे। ताई जैसी धर्म-प्राण स्त्री के लिए संगम में डुबकी लगाना जीवन भर की साध जैसा था, और साथ के लोग भी अच्छे मिल रहे थे। पर अब ताई अकेली नहीं थीं। उनके साथ मिट्ठू था, जिसकी हर ज़रूरत वे ख़ुद पूरी करती थीं। इसलिए उनका मन दो ओर खिंचने लगा। एक ओर तीर्थ का पुण्य था, तो दूसरी ओर उस साथी की चिंता जिसने उनके सूने घर को फिर से बोलना सिखाया था।
गाँव वालों ने इस उलझन पर हँसी-मज़ाक़ भी किया। किसी ने सुझाया कि तोते को भी संग ले लो, गंगा में वह भी नहा लेगा। दूसरे ने चुटकी ली कि रेल में तो उसका भी टिकट कटेगा, आख़िर वह भी बातें करने वाला जीव है। यह बात मज़ाक़ में कही गई थी, पर इसमें एक सच भी छिपा है। गाँव के लोग भी मिट्ठू को सिर्फ़ पक्षी नहीं, ताई के घर का सदस्य मानने लगे थे। ताई टिकट के पैसे तो ख़र्च कर देतीं, पर मेले की धक्का-मुक्की में उसकी हिफ़ाज़त का भरोसा उन्हें नहीं था। यही उनका पशोपेश था, यानी मन की ऐसी खींचतान जिसमें कोई भी रास्ता पूरी तरह ठीक न लगे।
मास्टराइन का सहारा और विदा का दृश्य
ताई की यह चिंता आख़िरकार जगन मास्टर की पत्नी ने दूर की। जब तक ताई तीर्थ से वापस न आएँ, तब तक तोते को सँभालने की हामी उन्होंने भर दी। ध्यान देने की बात है कि कहानी में इस स्त्री का कोई नाम नहीं आता। उसे कहीं मास्टराइन कहा गया है, तो कहीं जगन मास्टर की घरवाली। हमारे गाँवों में अक्सर स्त्रियों को उनके पति के नाम या पद से ही पहचाना जाता रहा है। लेखक ने शायद इसी सच्चाई को बिना कुछ कहे दिखा दिया है। फिर भी कहानी में इसी अनाम स्त्री की भलमनसाहत सबसे पहले काम आती है।
विदा का दिन ताई के लिए बहुत भारी था। उनकी आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। वे बार-बार मिट्ठू को पुचकारतीं और जल्दी लौट आने का वादा करतीं। मिट्ठू भी अपने सीखे हुए शब्द, हर हर गंगे और सीताराम, दोहराता रहा, मानो ताई को भरोसा दिला रहा हो कि वह मास्टराइन के पास प्यार से रह लेगा। यह दृश्य दिखाता है कि ताई के लिए यह विदाई किसी अपने बच्चे से अलग होने जैसी थी। जो स्त्री कभी अपने बेटों के शहर जाने का दुख चुपचाप सह गई थी, वही अब एक तोते से कुछ दिनों के बिछोह पर रो पड़ती है। इससे पता चलता है कि अकेलेपन ने उनके मन को कितना कोमल और कितना आश्रित बना दिया था।
जगन मास्टर: सिद्धांतों वाला आदमी
ताई के जाते ही कहानी का ध्यान जगन मास्टर पर आ जाता है। लेखक बताता है कि वे दूसरे ही स्वभाव के आदमी थे। उन्होंने अपने लिए कुछ नियम तय कर रखे थे, और उनका सबसे बड़ा ध्यान यही रहता था कि उनकी वजह से कोई दुखी न हो। वे स्वतंत्र सोच के व्यक्ति थे और किसी की आज़ादी में रुकावट डालना उन्हें ठीक नहीं लगता था। ऐसे आदमी के घर में जब एक पक्षी पिंजरे में बंद होकर आया, तो उनका मन बेचैन हो उठा। हर बार मिट्ठू को देखकर वे अपनी पत्नी के फ़ैसले पर मन ही मन खीझते और ख़ुद को भी इस बंधन का भागीदार मानकर दोषी महसूस करते।
यहाँ एक रोचक बात है। मास्टराइन ने पति से पूछे बिना ताई की ज़िम्मेदारी ले ली थी। यानी घर में दो अलग सोच साथ रह रही थीं। पत्नी के लिए यह पड़ोसिन की मदद का सीधा-सादा काम था, जबकि पति के लिए यह एक नैतिक सवाल बन गया। जगन मास्टर को भगवद्गीता पढ़ते हुए दिखाया गया है, जिससे पता चलता है कि वे धर्म और कर्तव्य पर गहराई से सोचने वाले आदमी थे। उनकी आदर्शवादिता सच्ची थी, पर आगे की घटना बताती है कि अच्छे इरादे भी कभी-कभी अनचाहा नतीजा दे देते हैं। लेखक उनका मज़ाक़ नहीं उड़ाता, बल्कि हल्की मुस्कान के साथ उनकी उलझन दिखाता है।
दाने का प्रयोग और रोशनदान से उड़ान
जब मिट्ठू की क़ैद जगन मास्टर से सहन न हुई, तो उन्होंने एक उपाय निकाला। उन्होंने कमरा बंद किया, पिंजरा ज़मीन पर रखा और उसका दरवाज़ा खोल दिया। वे चाहते थे कि मिट्ठू कुछ देर खुली हवा का सुख ले और इस तरह उनके मन का बोझ हल्का हो। पर मिट्ठू पिंजरे का इतना आदी हो चुका था कि उसने बाहर आने में कोई रुचि नहीं दिखाई। यह छोटा-सा वाक्य बड़ी बात कहता है। लंबी क़ैद प्राणी की आज़ादी की इच्छा तक को सुला देती है। जगन मास्टर भी हार मानने वालों में नहीं थे। उन्होंने पास पड़े थैले से मुट्ठी भर दाने लेकर पिंजरे के दरवाज़े से बाहर तक बिखेर दिए और ख़ुद दूर हट गए। मिट्ठू धीरे-धीरे दाने चुगता बाहर आया और पिंजरे की छत पर जा बैठा। कुछ घंटे बाद मास्टर ने उसे फिर पिंजरे में रख दिया।
यह क्रम रोज़ चलने लगा। मज़े की बात यह है कि लेखक कहता है, मिट्ठू को आज़ादी देकर उसका सुख मानो ख़ुद जगन मास्टर ले रहे थे। तीन-चार दिन ही बीते थे कि मिट्ठू की नज़र ऊपर खुले रोशनदान पर पड़ गई। जिज्ञासा में वह पिंजरे की छत से तिरछी नज़र से उसे देखता रहा और फिर उड़कर वहाँ जा बैठा। मास्टर का ध्यान अपनी किताब से हटकर पंखों की फड़फड़ाहट पर गया। वे हाथ में दाना लेकर उसे बुलाते ही रहे, और मिट्ठू ने बाहर की दुनिया पर एक नज़र डाली और फुर्र हो गया। फिर मास्टर ढीली धोती सँभालते हुए बाग़ में पेड़-पेड़ उसे पुकारते फिरे, और मिट्ठू डाल-डाल अपने पंख आज़माने में मगन रहा। यह दृश्य हँसाता भी है और सोचने पर मजबूर भी करता है।
हाथों के तोते उड़ गए: भाषा का चमत्कार
मिट्ठू के उड़ने वाले प्रसंग में लेखक ने एक बहुत चतुर वाक्य रचा है। एक तोता उड़ा, पर आदर्शवादी मास्टर के हाथों के सारे तोते उड़ गए। हाथों के तोते उड़ना एक प्रचलित मुहावरा है, जिसका अर्थ है अचानक बहुत घबरा जाना या होश उड़ जाना। सामान्यतः इस मुहावरे में तोता केवल प्रतीक होता है, पर यहाँ असली तोता भी उड़ा है। इसलिए एक ही वाक्य में शब्द का सामान्य अर्थ और मुहावरे वाला अर्थ दोनों एक साथ चमक उठते हैं। इसे भाषा का खेल या श्लेष जैसा प्रयोग कह सकते हैं।
इसी प्रसंग में लेखक ने ये गए, वो गए जैसे छोटे और विस्मय से भरे वाक्य लिखे हैं। इन वाक्यों के आगे लगे विस्मयादिबोधक चिह्न पढ़ने वाले को भी उसी हड़बड़ी में डाल देते हैं जिसमें मास्टर थे। फड़फड़ाहट जैसा ध्वनि वाला शब्द पंखों की आवाज़ कानों तक पहुँचा देता है। परीक्षा में जब इस घटना पर प्रश्न आए, तो केवल घटना न लिखें। यह भी बताइए कि लेखक ने मुहावरे, छोटे वाक्यों और ध्वनि-शब्दों से इसे कितना जीवंत बना दिया है। आप अपनी भाषा में भी पशु-पक्षियों वाले मुहावरे खोजिए, जैसे अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना, जिसका अर्थ है अपनी ही तारीफ़ करना।
गाँव की आशंका और एवजी तोता
ताई के लौटने के दिन पास आते जा रहे थे और गाँव भर में चिंता फैल गई। सब जानते थे कि ताई का स्वभाव तेज़ है और मिट्ठू से उनका लगाव कितना गहरा है। लौटकर मिट्ठू को न पाकर उनका क्या हाल होगा, यह सोचकर सब डर रहे थे। बहुत सोचने के बाद वही गनपत आगे आया जो पहले मिट्ठू को लाया था। उसने सुझाया कि मिट्ठू जैसी शक्ल-सूरत का दूसरा तोता ले आया जाए, ताकि ताई को सच का पता न चले। अगले ही दिन वह ऐसा एक तोता ले भी आया। यह उपाय नेक इरादे से था, पर उसमें धोखा भी छिपा था। इस पर बहस हो सकती है कि ताई को भ्रम में रखना ठीक था या नहीं।
अब जगन मास्टर का एक नया दौर शुरू हुआ। वे नए तोते को ताई के सिखाए शब्द रटाने लगे, ताकि ताई के लौटने तक वह कुछ बोल सके। लेखक एक चुभती हुई विडंबना भी बताता है। मास्टर की योजना थी कि आख़िरी दिन वे मिट्ठू को गीता के कुछ श्लोक सिखाएँगे। तब तीर्थ से लौटी ताई अपने तोते के मुँह से गीता सुनतीं। पर वह सपना तो उड़ गया और अब वे भूख-प्यास भूलकर पिंजरे के सामने बैठे राम-राम, सीताराम दोहराते रहते। गला सूख जाता, मास्टराइन ठंडे खाने की शिकायत करतीं, तो वे उन्हें ग़ुस्से भरी नज़र से देखते और पानी पीकर फिर शुरू हो जाते। अंत में झुँझलाकर वही कह बैठते जो कभी ताई कहती थीं, मर जा! मर जा! और तोता बस टुकुर-टुकुर ताकता रहता।
ताई की वापसी और संवादहीन अंत
कुंभ से लौटकर बाक़ी यात्री अपने घर गए, पर ताई सीधे अपने घर न जाकर मास्टर के दरवाज़े पहुँचीं। उन्होंने कल्पना की थी कि उन्हें देखते ही मिट्ठू शोर मचा देगा, पिंजरे में उछल-कूद करेगा और राम-राम की रट से आसमान गुँजा देगा। पर एवजी तोते ने उन्हें देखकर कोई हलचल नहीं की। वह बस इधर-उधर देखता रहा। ताई अपने मिट्ठू को पुकारते-पुकारते थक गईं, और उनके सूनेपन का साथी न जाने किन आम के बग़ीचों में घूम रहा होगा। कहानी यहीं थम जाती है।
यही अंत शीर्षक को उसका पूरा अर्थ देता है। संवादहीन का अर्थ है जहाँ बातचीत न हो। कहानी की शुरुआत में ताई का घर संवादहीन था, बीच में मिट्ठू ने उसे बोलना सिखाया, और अंत में ताई फिर उसी ख़ामोशी के सामने खड़ी हैं। नया तोता शक्ल में मिट्ठू जैसा है, पर उसके और ताई के बीच कोई रिश्ता, कोई साझी भाषा नहीं है। इसलिए यह शीर्षक सबसे अधिक ताई पर सटीक बैठता है। कहानी का अंत दुख भरा भी है और खुला भी। लेखक यह नहीं बताता कि आगे ताई का क्या हुआ, सच खुला या नहीं, मिट्ठू लौटा या नहीं। पाठक को ख़ुद सोचना पड़ता है। इस तरह इसे दुखांत, यथार्थवादी या मुक्त अंत, तीनों में रखा जा सकता है, बशर्ते आप उत्तर के साथ उचित कारण दें। एक ओर आज़ादी पाकर मिट्ठू ख़ुश है, दूसरी ओर ताई फिर अकेली हैं। एक की मुक्ति दूसरे का सूनापन बन गई, और यही इस कहानी की गहरी करुणा है।
Concepts and terms
ऐसी दुविधा जिसमें मन दो ओर खिंचे। ताई को कुंभ का पुण्य बुलाता था, और मिट्ठू का मोह रोकता था।
हर प्राणी को खुली हवा और अपनी मर्ज़ी से जीने का हक़। जगन मास्टर इसी विचार के कारण पिंजरे में बंद मिट्ठू को देख बेचैन होते थे।
किसी ग़लती का बोझ हल्का करने के लिए किया गया काम। जगन मास्टर मानते थे कि मिट्ठू को कुछ देर आज़ाद करके वे अपने पाप का बोझ कम कर रहे हैं।
किसी की जगह रखा गया दूसरा, यानी स्थानापन्न। गनपत का लाया हमशक्ल तोता असली मिट्ठू का एवजी था, पर उसकी जगह नहीं भर सका।
ऐसा अंत जिसमें कहानी पूरी तरह बंद न होकर पाठक को सोचने के लिए छोड़ दे। ताई पुकारती हैं और मिट्ठू न जाने कहाँ है।
सावधान
भ्रम और सच
मिलाकर देखो
Scenario:
राहुल के दादाजी ने बरसों से एक तोता पाल रखा है, जो उनके साथ बातें करता है। राहुल ने स्कूल में पढ़ा कि देसी तोतों को पिंजरे में रखना क़ानून के ख़िलाफ़ है और पक्षियों को आज़ाद रहना चाहिए। वह दादाजी से तोते को छोड़ने को कहता है। दादाजी उदास हो जाते हैं और कहते हैं कि यह तोता ही दिन भर उनसे बात करता है। राहुल की माँ सुझाव देती हैं कि वन विभाग से पूछकर तोते को सुरक्षित ढंग से आज़ाद किया जाए, और राहुल रोज़ शाम दादाजी के साथ पार्क में पक्षी देखने जाए।
Activity:
अपने आस-पास किसी पालतू पशु या पक्षी वाले परिवार से बात कीजिए और लिखिए कि वह उनके जीवन में क्या जगह रखता है।
Analysis:
संवादहीन कहानी आज़ादी और अपनेपन के टकराव को दिखाती है। आज के जीवन में भी यह टकराव मिलता है, और इसका हल दोनों पक्षों की भावना समझकर निकलता है।
Did you know
कुंभ मेला हर बारह साल में बारी-बारी से प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में लगता है। यूनेस्को ने इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर माना है।
प्रयागराज का महाकुंभ 2025 में लगा था, जिसमें करोड़ों श्रद्धालुओं ने संगम में स्नान किया। संगम पर गंगा, यमुना और मानी गई सरस्वती मिलती हैं।
भारत में वन्यजीव संरक्षण क़ानून के तहत देसी तोतों को पकड़ना, बेचना या पिंजरे में रखना अपराध माना जाता है।
Memory tricks
घटनाक्रम: कु–मा–ज–रो–ए–ता — कुंभ, मास्टराइन, जगन मास्टर का प्रयोग, रोशनदान से उड़ान, एवजी तोता, ताई की वापसी।
जगन मास्टर के तीन रंग — सिद्धांत, प्रयोग, पछतावा। पहले आज़ादी का सिद्धांत, फिर दाने का प्रयोग, अंत में रटाने की बेचैनी।
Practice MCQs with answers (25)
- A हरिद्वार
- B प्रयागराज
- C उज्जैन
- D नासिक
Show answer
Why:
संगम-तट पर कुंभ।
- A तीर्थ का लोभ और मिट्ठू की चिंता दोनों खींच रहे थे
- B उनके पास रेल के टिकट के लिए बिलकुल भी पैसे नहीं थे
- C बेटे उन्हें शहर बुलाकर साथ ले जाना चाह रहे थे
- D गाँव के लोग उन्हें अपने साथ ले जाने से मना कर रहे थे
Show answer
Why:
मन दो ओर बँटा था।
- A गहरे ग़ुस्से में, ताकि ताई यात्रा का विचार छोड़ दें
- B रेलवे के किसी सख़्त नियम की सूचना देने के लिए
- C मिट्ठू को बेचकर पैसे जुटाने का सुझाव देने के लिए
- D हँसी-मज़ाक़ में, जिसमें मिट्ठू के सदस्य होने का भाव था
Show answer
Why:
वह भी बोलने-बतियाने वाला जीव है।
- A मिट्ठू को गंगा-स्नान से बहुत डर लगता था
- B मेले में पक्षियों को ले जाना पूरी तरह मना था
- C भीड़-भाड़ में उसकी सुरक्षा का भरोसा नहीं था
- D मिट्ठू लंबी रेल-यात्रा में बहुत शोर करता था
Show answer
Why:
मेला-ठेला और धक्का-मुक्की।
- A सरला देवी, जो गाँव की पुरानी शिक्षिका थीं
- B पार्वती, जो ताई की दूर की ममेरी बहन थीं
- C गौरी, जो गनपत की बड़ी बहन थीं
- D कोई नाम नहीं, केवल मास्टराइन या घरवाली
Show answer
Why:
पति के नाम से पहचान।
- A वे मिट्ठू से पीछा छुड़ाकर मन ही मन बहुत ख़ुश थीं
- B अकेलेपन ने उन्हें मिट्ठू से बच्चे की तरह जोड़ दिया था
- C वे कुंभ-यात्रा से डरकर बहाने से रोना रो रही थीं
- D वे मास्टराइन पर ज़रा भी भरोसा नहीं कर पा रही थीं
Show answer
Why:
बार-बार पुचकारना, आँसू।
- A अपने नियमों और स्वतंत्र विचारों पर चलने वाले थे
- B बहुत ग़ुस्सैल और झगड़ालू स्वभाव वाले थे
- C गाँव के सबसे लालची और कंजूस आदमी थे
- D पशु-पक्षियों से नफ़रत करने वाले कठोर आदमी थे
Show answer
Why:
किसी को कष्ट न पहुँचे, यही नियम।
- A क्योंकि उन्होंने ही मिट्ठू को जंगल से पकड़ा था
- B क्योंकि ताई ने उन्हें मिट्ठू का मालिक बना दिया था
- C क्योंकि पक्षी की क़ैद उनके अपने घर में हो रही थी
- D क्योंकि वे मिट्ठू को रोज़ भूखा रखते थे
Show answer
Why:
आज़ादी के समर्थक के घर बंधन।
- A वह मास्टर से बहुत डरकर काँप रहा था
- B उसके पंख कटे थे, वह उड़ नहीं सकता था
- C वह बीमार था, खाना-पीना छोड़ चुका था
- D वह पिंजरे में रहने का आदी हो चुका था
Show answer
Why:
लंबी क़ैद का असर।
- A दरवाज़े से बाहर तक दाने बिखेर दिए
- B पिंजरे को ज़ोर-ज़ोर से हिलाया
- C मिट्ठू को हाथ से पकड़कर निकाला
- D ताई की आवाज़ की नक़ल करके पुकारा
Show answer
Why:
अनाज का थैला पास पड़ा था।
- A मास्टर ख़ुद पिंजरे में बैठकर दिन भर आराम करने लगे थे
- B मास्टर मिट्ठू का सारा खाना ख़ुद ही खा जाते थे
- C पक्षी को खुला देखकर मास्टर के मन को संतोष मिलता था
- D मास्टर मिट्ठू को बेचकर अच्छे पैसे कमाने लगे थे
Show answer
Why:
संतोष की साँस।
- A भोजन की कमी से पैदा हुई तेज़ भूख की तड़प
- B हर प्राणी में छिपी स्वतंत्रता की चाह
- C ताई से पुराना बदला लेने की इच्छा
- D मास्टर के प्रति मन में भरी नफ़रत
Show answer
Why:
बाहर की दुनिया की ओर तिरछी नज़र।
- A तुकबंदी से बनी एक लंबी और गेय लोक-कविता
- B संख्या शब्दों की बार-बार गिनती का खेल
- C असली तोते और मुहावरे के तोते का दोहरा अर्थ
- D अंग्रेज़ी के कठिन शब्दों का भरपूर प्रयोग
Show answer
Why:
मुहावरा: बहुत घबरा जाना।
- A बहुत अमीर हो जाना
- B अचानक बहुत घबरा जाना
- C तोते पालना शुरू करना
- D किसी को धोखा देना
Show answer
Why:
होश उड़ जाना।
- A उन्हें डर था कि मिट्ठू लौटकर खेतों की सारी फ़सल चट कर जाएगा
- B उन्हें लगता था कि पुलिस आकर मास्टर को पकड़ ले जाएगी
- C वे सोचते थे कि मिट्ठू की चोरी का इल्ज़ाम उन्हीं पर लगेगा
- D वे ताई के तेज़ स्वभाव और ममता से उनके दुख का अनुमान लगा रहे थे
Show answer
Why:
ताई को सदमा लगेगा।
- A गनपत ने
- B मास्टर ने
- C मुखिया ने
- D बेटे ने
Show answer
Why:
वही, जो पहले मिट्ठू लाया था।
- A अंग्रेज़ी की कुछ कविताएँ
- B गाँव वालों के पूरे नाम
- C गीता के दो-चार श्लोक
- D दो-चार नए फ़िल्मी गीत
Show answer
Why:
ताई तोते से गीता सुनें।
- A मास्टर तोते को सचमुच मार डालने की बात सोच रहे थे
- B आदर्शवादी मास्टर भी बेबसी में ताई जैसी खीझ पर उतर आए
- C मास्टर ताई से पुराना बदला लेने की गुप्त योजना बना रहे थे
- D मास्टर को तोतों की भाषा बहुत अच्छी तरह आती थी
Show answer
Why:
विडंबना और हास्य।
- A वह उन्हें देखते ही पिंजरे में चुपचाप सो जाएगा
- B वह उन्हें पहचानने से साफ़ मना कर देगा
- C वह पिंजरा छोड़कर तुरंत उड़ जाएगा
- D वह शोर और उछल-कूद से घर सिर पर उठा लेगा
Show answer
Why:
राम-राम की रट।
- A शक्ल मिलने से रिश्ता और संवाद नहीं बनता
- B नया तोता असली मिट्ठू से ज़्यादा समझदार था
- C ताई की आँखें कमज़ोर हो चुकी थीं
- D मास्टर ने तोते को चुप रहना सिखाया था
Show answer
Why:
साझी भाषा का अभाव।
- A जगन मास्टर, जो हर समय गीता पढ़ते थे
- B ताई, जो अंत में फिर अकेली रह जाती हैं
- C असली मिट्ठू, जो डाल-डाल उड़ता रहा
- D गनपत, जो हर बार नया तोता लाता था
Show answer
Why:
शुरू और अंत दोनों में ख़ामोशी।
- A पूरी तरह सुखांत अंत
- B केवल प्रेरणात्मक अंत
- C हँसी-भरा व्यंग्य अंत
- D मुक्त और दुख भरा अंत
Show answer
Why:
आगे क्या हुआ, लेखक नहीं बताता।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
आज़ादी का सिद्धांत ही प्रयोग की जड़।
- A केवल I और II
- B केवल I और III
- C केवल II और III
- D I, II और III तीनों
Show answer
Why:
मास्टराइन ने बिना पूछे भार लिया।
- A दूसरा कुत्ता हमेशा पहले वाले से बहुत महँगा पड़ता है
- B पड़ोसी को कुत्ते कभी पसंद ही नहीं होते
- C कुत्तों को नए घर में रहना नहीं आता
- D रिश्ता शक्ल से नहीं, साथ बिताए समय से बनता है
Show answer
Why:
एवजी तोते जैसी स्थिति।
Important short questions (7)
ताई प्रयागराज जाकर कुंभ में नहाना चाहती थीं। पर मिट्ठू की चिंता उन्हें रोक रही थी। मेले की भीड़ में उसे ले जाना ठीक न था, और अकेला छोड़ना भी संभव न था। अंत में मास्टराइन ने मिट्ठू की देखरेख का ज़िम्मा लिया। तब ताई निश्चिंत होकर यात्रा पर गईं।
यह बात हँसी में कही गई, पर इससे पता चलता है कि गाँव वाले भी मिट्ठू को ताई के घर का सदस्य मानने लगे थे। उनके लिए वह केवल पक्षी नहीं, बल्कि बोलने-बतियाने वाला प्राणी था। साथ ही यह गाँव के आपसी अपनेपन और हल्के-फुल्के हास्य को भी दिखाता है।
जगन मास्टर स्वतंत्र विचारों वाले आदर्शवादी व्यक्ति थे। वे चाहते थे कि उनसे किसी को कष्ट न हो। बंद मिट्ठू को देखकर वे बेचैन होते थे, इसलिए रोज़ कमरा बंद करके उसे बाहर आने देते। उड़ान के बाद वे भूख-प्यास भूलकर नए तोते को रटाते रहे। इससे उनकी ज़िम्मेदारी की भावना दिखती है।
लंबे समय तक बंद रहने से मिट्ठू पिंजरे का आदी हो चुका था, इसलिए खुला दरवाज़ा देखकर भी उसने बाहर आने की इच्छा नहीं दिखाई। इससे संकेत मिलता है कि लंबी क़ैद किसी भी प्राणी की आज़ादी की इच्छा को दबा देती है। दाने बिखेरने पर ही वह धीरे-धीरे बाहर आया।
इस मुहावरे का अर्थ है अचानक बहुत घबरा जाना। कहानी में असली तोता भी उड़ा है और मास्टर घबरा भी गए हैं। इस तरह एक ही वाक्य में शब्द का सीधा अर्थ और मुहावरे का अर्थ दोनों साथ जुड़ जाते हैं, जिससे वाक्य में हास्य और चमत्कार आ जाता है।
गनपत और गाँव वाले ताई के तेज़ स्वभाव और मिट्ठू से उनके गहरे लगाव को जानते थे। उन्हें डर था कि सच जानकर ताई को गहरा सदमा लगेगा, इसलिए गनपत ने मिट्ठू जैसा दूसरा तोता लाने का सुझाव दिया। इरादा नेक था, पर इसमें धोखा भी था; सच्चाई प्यार से बता देना शायद अधिक उचित होता।
ताई कुंभ से लौटकर सीधे जगन मास्टर के घर पहुँचीं, यह सोचकर कि मिट्ठू उन्हें देखकर शोर मचा देगा। पर एवजी तोता चुप रहा और इधर-उधर ताकता रहा। ताई पुकार-पुकारकर थक गईं। वे फिर उसी ख़ामोशी और अकेलेपन में लौट आईं जिससे मिट्ठू ने उन्हें निकाला था।
Long answer questions (3)
जगन मास्टर स्वतंत्रता को हर प्राणी का अधिकार मानते थे। पिंजरे में बंद मिट्ठू उन्हें अपने सिद्धांतों के ख़िलाफ़ लगता था, इसलिए वे रोज़ कमरा बंद करके पिंजरा खोलते, दाने बिखेरते और मिट्ठू को खुली हवा का सुख देते। उनका इरादा पूरी तरह नैतिक था और वे इसे अपने पाप का प्रायश्चित मानते थे।
पर उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि मिट्ठू किसी और की अमानत था और ताई के जीवन का एकमात्र सहारा था। रोशनदान खुला रह गया और मिट्ठू उड़ गया। मास्टर की आदर्शवादिता का परिणाम यह हुआ कि ताई का साथी छिन गया और वे फिर संवादहीन हो गईं। इससे सीख मिलती है कि सिद्धांतों के साथ दूसरों की भावनाओं और ज़िम्मेदारी का ध्यान रखना भी ज़रूरी है। एक ओर पक्षी की मुक्ति सही लगती है, तो दूसरी ओर एक अकेली स्त्री का दुख भी उतना ही सच है।
संवादहीन का अर्थ है जहाँ आपसी बातचीत न हो। कहानी के आरंभ में ताई का बड़ा घर ऐसा ही था; बेटे शहर चले गए थे और बात करने वाला कोई नहीं था। मिट्ठू के आने से यह सूनापन टूटा, घर में फिर से बोल-चाल और रौनक आई।
मिट्ठू के उड़ जाने और एवजी तोते के आने के बाद ताई फिर ख़ामोशी के सामने खड़ी हैं। नया तोता उनसे कोई रिश्ता नहीं रखता, इसलिए वह चुप रहता है। जगन मास्टर बोलते तो हैं, पर तोता उनकी बात का उत्तर नहीं देता; असली मिट्ठू आज़ाद है और उसे किसी से संवाद की ज़रूरत नहीं। इसलिए यह शीर्षक सबसे अधिक ताई पर सटीक बैठता है, जिनका जीवन आरंभ में भी संवादहीन था और अंत में फिर वैसा ही हो गया।
गाँव वालों ने यह उपाय ताई के प्रति चिंता और प्रेम के कारण किया। वे जानते थे कि मिट्ठू के बिना ताई टूट जाएँगी, इसलिए उन्हें कुछ समय तक दुख से बचाना चाहते थे। इस दृष्टि से उनका इरादा भला था।
फिर भी यह उपाय टिक नहीं सका। ताई ने पहली ही मुलाक़ात में महसूस कर लिया कि यह उनका मिट्ठू नहीं है, क्योंकि रिश्ता शक्ल से नहीं, बरसों के साथ और साझी बोली से बनता है। झूठ से दुख टलता नहीं, बस कुछ देर के लिए छिप जाता है और बाद में और चुभता है। मेरे विचार से सच्चाई धीरे और प्यार से बताकर ताई का साथ देना अधिक उचित होता, जैसे कोई उनके पास बैठकर बातें करे या कोई नया साथी मिलकर पाले।
Flashcards (17)
Play this topic
- किसकी क्या भूमिका
- प्रयोग या परिणाम
- सही या भ्रम
- कहानी का उत्तर भाग
- झटपट उत्तर
कहानी का सौंदर्य और भाषा की बात
संवादहीन को प्रभावशाली बनाने वाली विशेषताएँ, जैसे चित्रात्मकता, संवाद, पुनरुक्ति, अतिशयोक्ति और लोकधर्मी भाषा, के साथ कहानी के अंत के प्रकार, पशु-पक्षियों वाले मुहावरे, ध्वनि-शब्द, शब्द-युग्म और अर्थ के आधार पर वाक्य के आठ भेद।
What you will be able to do
- कहानी की छह शैलीगत विशेषताएँ पहचानकर उनके उदाहरण दे सकूँगा।
- कहानी के अंत के सात प्रकारों में अंतर करके संवादहीन के अंत की श्रेणी तय कर सकूँगा।
- पशु-पक्षियों वाले मुहावरों और ध्वन्यात्मक शब्दों का वाक्य में प्रयोग कर सकूँगा।
- शब्द-युग्म के चार प्रकार पहचानकर नए उदाहरण बना सकूँगा।
- अर्थ के आधार पर वाक्य के आठ भेद पहचान सकूँगा और एक भेद को दूसरे में बदल सकूँगा।
Key points
चित्रात्मकता में शब्द पाठक के मन में दृश्य खड़ा कर देते हैं, जैसे मिट्ठू का डाल-डाल पंख तौलना।
संवादात्मकता से कथा आगे बढ़ती है और पात्रों के भाव खुलते हैं; पुनरुक्ति, जैसे कटेगी! कटेगी!!, भाव को तेज़ करती है।
अतिशयोक्ति में बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाता है, जैसे तोते का भी रेल-टिकट लगना।
लोकधर्मी भाषा गाँव की सहज बोलचाल की भाषा है, और प्रश्नोत्तर शैली में पात्र स्वयं प्रश्न पूछते हैं।
कहानी का अंत सुखांत, दुखांत, मुक्त, अप्रत्याशित, यथार्थवादी, प्रेरणात्मक या व्यंग्यात्मक हो सकता है।
हाथों के तोते उड़ना और अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना पशु-पक्षियों से जुड़े मुहावरे हैं।
फड़फड़ाहट जैसे ध्वन्यात्मक शब्द ध्वनि का आभास कराते हैं; टुकुर-टुकुर देखने का ढंग दिखाता है।
शब्द-युग्म चार प्रकार के होते हैं: पुनरुक्त, सजातीय, समानार्थक और विपरीतार्थक।
अर्थ के आधार पर वाक्य आठ प्रकार के हैं: विधान, निषेध, प्रश्न, विस्मयादिबोधक, आज्ञा, इच्छा, संदेह और संकेत।
Full explanation
कहानी को जीवंत बनाने वाली शैली
किसी कहानी की ताक़त केवल उसकी घटनाओं में नहीं होती, बल्कि इस बात में भी होती है कि लेखक उन्हें किस ढंग से कहता है। संवादहीन की घटनाएँ बहुत सीधी हैं: एक बूढ़ी स्त्री, एक तोता, एक तीर्थ-यात्रा और एक उड़ान। फिर भी कहानी पढ़कर मन भीग जाता है और कई जगह हँसी भी आती है। इसका कारण है शेखर जोशी की शैली, यानी लिखने का उनका अपना तरीक़ा। पाठ्यपुस्तक इस शैली की छह विशेषताएँ गिनाती है: चित्रात्मकता, संवादात्मकता, पुनरुक्ति, अतिशयोक्ति, लोकधर्मी भाषा और प्रश्नोत्तर शैली।
सबसे पहले चित्रात्मकता को लीजिए। इसमें शब्द पाठक के मन में एक दृश्य बना देते हैं, जैसे किसी फ़िल्म का दृश्य हो। मिट्ठू के उड़ने के बाद मास्टर ढीली धोती को दोनों हाथों से थामे बाग़ में दौड़ते हैं और ऊपर मिट्ठू शाख़-शाख़ फुदकता अपने पंख आज़माता है। यह पढ़ते ही पूरा दृश्य आँखों में उतर आता है: पसीने से तर मास्टर, ऊपर बेफ़िक्र तोता और बीच में फैला बाग़। इसी तरह ताई का सूना बड़ा घर, ठंडा चूल्हा और खिड़की-दरवाज़ों की साँकलें बार-बार टटोलती ताई भी चित्र की तरह सामने आती हैं। परीक्षा में चित्रात्मकता का उदाहरण देते समय ऐसा वाक्य चुनिए जिसमें दृश्य, रंग, गति या आवाज़ हो।
संवाद, पुनरुक्ति और प्रश्नोत्तर
संवादात्मकता का अर्थ है बातचीत के ज़रिये कथा को आगे बढ़ाना। संवादहीन नाम की कहानी में सबसे ज़्यादा जान संवादों में ही है, और यह अपने-आप में एक सुंदर विरोधाभास है। ताई भगवान से पूछती हैं कि नैया कैसे पार लगेगी, और मिट्ठू जवाब देता है कि राम-राम कहो। ताई आशीर्वाद देती हैं, तो मिट्ठू बड़े-बूढ़े की तरह ख़ुश रहो कहता है। इन छोटे संवादों से हमें पता चलता है कि दोनों का रिश्ता कैसा है, और लेखक को अलग से समझाना नहीं पड़ता।
पुनरुक्ति में किसी शब्द या वाक्य को बार-बार दोहराया जाता है, ताकि भाव तेज़ हो। जब ताई थककर पूछती हैं कि अब कैसे कटेगी, तो मिट्ठू कहता है कटेगी! कटेगी!! कटेगी!!! ध्यान दीजिए, हर बार विस्मयादिबोधक चिह्न बढ़ता जाता है, मानो आवाज़ और हिम्मत दोनों बढ़ रही हों। इसी तरह मर जा! मर जा!! और मिट्ठू आ! मिट्ठू आ!! में भी पुनरुक्ति है। पहले में खीझ है, दूसरे में घबराहट भरी पुकार।
प्रश्नोत्तर शैली में पात्र या लेखक ख़ुद प्रश्न उठाते हैं। ताई के दो प्रश्न, भगवान! कैसे नैया पार लगेगी? और मिट्ठू! अब कैसे कटेगी?, कहानी की धुरी हैं। इनमें ताई की चिंता, बुढ़ापे की थकान और भविष्य का डर सब छिपा है। ये प्रश्न किसी जवाब की उम्मीद से कम और मन का बोझ उतारने के लिए ज़्यादा पूछे गए हैं। मज़े की बात है कि इन प्रश्नों का उत्तर कोई इंसान नहीं, एक तोता देता है।
अतिशयोक्ति और लोकधर्मी भाषा
अतिशयोक्ति का अर्थ है किसी बात को इतना बढ़ाकर कहना कि वह असंभव या अविश्वसनीय लगे। कहानी में जब गाँव का कोई आदमी कहता है कि रेल में मिट्ठू का भी टिकट लगेगा, क्योंकि वह भी बातें करने वाला प्राणी है, तो यह अतिशयोक्ति है। किसी पक्षी का टिकट सचमुच नहीं लगता, पर यह बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात हँसाती है और मिट्ठू की ख़ास जगह भी बता देती है। ताई कुंभ गईं और मास्टर के घर महाकुंभ हो गया, यह भी बढ़ाकर कहा गया व्यंग्य है।
लोकधर्मी भाषा वह है जो गाँव-घर में सहज रूप से बोली जाती है। इसमें किताबी शब्दों के बजाय मुहावरे, कहावतें और देसी शब्द ज़्यादा आते हैं। नैया पार लगना, दो जून का एक जून चूल्हा फूँकना, जान खाना, गाय-ढोर, कारबार, मेले-ठेले, ये सब इसी भाषा के रंग हैं। शेखर जोशी पहाड़ और गाँव के जीवन को जानते थे, इसलिए उनकी भाषा में वह मिट्टी की ख़ुशबू है जो पात्रों को सच्चा बना देती है। अगर ताई शुद्ध किताबी हिंदी बोलतीं, तो वे इतनी अपनी नहीं लगतीं। लोकधर्मी भाषा पाठक और पात्र के बीच की दूरी मिटा देती है।
कहानी के अंत के सात प्रकार
किसी कहानी का अंत कई तरह से हो सकता है, और अंत का प्रकार पूरी कहानी का स्वाद बदल देता है। सुखांत में कहानी प्रसन्नता या सफलता पर ख़त्म होती है। दुखांत में अंत दुख, बिछोह, मृत्यु या हानि पर होता है। मुक्त अंत में कहानी साफ़-साफ़ ख़त्म नहीं होती, बल्कि पाठक को सोचने के लिए छोड़ देती है। अप्रत्याशित अंत अचानक ऐसा मोड़ लाता है जिसकी उम्मीद नहीं थी। यथार्थवादी अंत जीवन की सच्चाई जैसा लगता है। प्रेरणात्मक अंत कोई सीख या सकारात्मक सोच देता है, और व्यंग्यात्मक अंत कटाक्ष के ज़रिये कोई सच उजागर करता है।
संवादहीन का अंत किस श्रेणी में है, इस पर एक से ज़्यादा उत्तर सही हो सकते हैं, बशर्ते तर्क ठीक हो। ताई का साथी छिन जाता है, इसलिए यह दुखांत है। लेखक यह नहीं बताता कि ताई ने सच जाना या नहीं, या मिट्ठू लौटा या नहीं, इसलिए यह मुक्त अंत भी है। गाँवों में अकेले बुज़ुर्गों का सूनापन सचमुच ऐसा ही होता है, इसलिए यह यथार्थवादी भी कहा जा सकता है। उत्तर लिखते समय पहले श्रेणी का नाम लिखिए, फिर उसकी परिभाषा दीजिए, और अंत में कहानी की घटना से उसे जोड़िए। पाठ्यपुस्तक यह भी पूछती है कि आप कहानी का नया अंत कैसे लिखेंगे। ऐसे प्रश्न में अपनी कल्पना खुलकर चलाइए, पर पात्रों का स्वभाव वही रखिए।
मुहावरे और ध्वनि वाले शब्द
मिट्ठू शब्द का अर्थ है मीठा बोलने वाला, और इसी से तोते को यह नाम मिला। यह शब्द इतना प्रचलित है कि एक मुहावरा भी इससे बना है: अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना, यानी अपनी तारीफ़ आप करना। जैसे, परीक्षा में अच्छे अंक आते ही रवि अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने लगा। कहानी में ऐसा ही एक और मुहावरा है, हाथों के तोते उड़ जाना, जिसका अर्थ है अचानक घबरा जाना। हिंदी में पशु-पक्षियों वाले मुहावरों की लंबी सूची है। भीगी बिल्ली बनना यानी डरकर चुप हो जाना। गिरगिट की तरह रंग बदलना यानी बार-बार राय बदलना। ऊँट के मुँह में जीरा यानी ज़रूरत से बहुत कम मिलना। भैंस के आगे बीन बजाना यानी नासमझ को समझाने की कोशिश करना।
ध्वन्यात्मक शब्द वे हैं जो किसी ध्वनि का आभास कराते हैं। मिट्ठू के उड़ने से पहले मास्टर का ध्यान पंखों की फड़फड़ाहट पर गया। यह शब्द पढ़ते ही पंख फड़फड़ाने की आवाज़ कानों में गूँजती है। इसी तरह दरवाज़े की खटखट, घुँघरुओं की छमछम, पत्तों की सरसराहट, बादलों की गड़गड़ाहट और मक्खियों की भिनभिन ध्वनि-शब्द हैं। कहानी में तोते का टुकुर-टुकुर देखना भी एक रोचक शब्द है; यह ध्वनि नहीं, देखने के ढंग का आभास कराता है। ऐसे शब्द वर्णन को जीवंत बनाते हैं, इसलिए अपने लेखन में भी इनका प्रयोग कीजिए।
शब्द-युग्म के चार प्रकार
जो शब्द जोड़े में प्रयोग होते हैं, उन्हें शब्द-युग्म कहते हैं। कहानी में ऐसे बहुत-से जोड़े हैं: व्रत-उपवास, चौका-चूल्हा, नौकर-चाकर, गाय-ढोर, बहू-बेटे, मेले-ठेले, भीड़-भाड़, नियम-सिद्धांत, शादी-ब्याह और तीज-त्योहार। शब्द-युग्म मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं।
पहला है पुनरुक्त शब्द-युग्म, जिसमें एक ही शब्द दोहराया जाता है, जैसे बार-बार, धीरे-धीरे, पसीना-पसीना। दूसरा है सजातीय शब्द-युग्म, जिसमें एक जैसे स्वभाव या क्षेत्र के दो शब्द साथ आते हैं, जैसे उठना-बैठना, खाना-पीना, शादी-ब्याह। तीसरा है समानार्थक शब्द-युग्म, जिसमें दोनों शब्दों का अर्थ लगभग एक होता है, जैसे दिन-प्रतिदिन, व्रत-उपवास, धन-दौलत। चौथा है विपरीतार्थक शब्द-युग्म, जिसमें दोनों शब्द उलटे अर्थ वाले होते हैं, जैसे दिन-रात, सुख-दुख, आना-जाना। वक्त-बेवक्त भी एक रोचक जोड़ा है; इसका अर्थ है समय-असमय, यानी किसी भी घड़ी। कुछ जोड़ों में दूसरा शब्द केवल तुक मिलाने के लिए आता है, जैसे मेले-ठेले या चाय-वाय; इन्हें अनुकरणवाचक या निरर्थक जोड़ा भी कहा जाता है। प्रश्न में पूछा जाए तो पहले जोड़ा लिखिए, फिर उसका प्रकार बताइए और एक वाक्य बनाइए।
अर्थ के आधार पर वाक्य के आठ भेद
अर्थ के आधार पर वाक्य आठ प्रकार के होते हैं। विधानवाचक वाक्य किसी बात की सीधी सूचना देता है, जैसे मास्टर ने पिंजरा खोल दिया। निषेधवाचक वाक्य बताता है कि कोई काम नहीं हुआ, या उसमें किसी बात की मनाही होती है, जैसे नया तोता कुछ नहीं बोला। प्रश्नवाचक वाक्य कुछ पूछता है, जैसे मिट्ठू! अब कैसे कटेगी? विस्मयादिबोधक वाक्य आश्चर्य, ख़ुशी या दुख को सीधे प्रकट करता है, जैसे अरे! मिट्ठू तो उड़ गया!
आज्ञावाचक या विधिवाचक वाक्य में आदेश, आग्रह या अनुमति होती है, जैसे राम-राम कहो, सीताराम कहो। इच्छावाचक वाक्य शुभकामना, आशा या इच्छा जताता है, जैसे जुग-जुग जिओ। संदेहवाचक वाक्य में शंका या अनिश्चितता होती है; इनमें शायद, संभवतः, होगा, न जाने जैसे शब्द आते हैं, जैसे मिट्ठू न जाने कहाँ घूम रहा होगा। संकेतवाचक वाक्य में एक बात का होना दूसरी बात पर टिका होता है, जैसे अगर रोशनदान बंद होता तो मिट्ठू न उड़ता। कहानी में भी ऐसा वाक्य है कि जब खेती और कारबार ही न रहे, तो नौकर किस भरोसे टिकते।
वाक्य का भेद पहचानने का आसान तरीक़ा है उसके भाव को पकड़ना, केवल चिह्न को नहीं। प्रश्नवाचक चिह्न हर बार प्रश्न ही नहीं बताता, और विस्मय का चिह्न इच्छावाचक वाक्य में भी लग सकता है, जैसे जुग-जुग जिओ! परीक्षा में अक्सर एक वाक्य को दूसरे भेद में बदलने को कहा जाता है। जैसे, विधानवाचक वाक्य मिट्ठू उड़ गया को निषेधवाचक में बदलें, तो बनेगा मिट्ठू पिंजरे में नहीं रहा; प्रश्नवाचक में बदलें, तो बनेगा क्या मिट्ठू उड़ गया?; और संदेहवाचक में, तो शायद मिट्ठू उड़ गया हो।
Concepts and terms
शब्दों से ऐसा वर्णन कि पाठक की आँखों के सामने दृश्य बन जाए। पेड़-पेड़ भागते मास्टर और डाल-डाल उड़ता मिट्ठू इसका सुंदर उदाहरण हैं।
भाव को गहरा करने के लिए शब्द को बार-बार दोहराना। कटेगी! कटेगी!! कटेगी!!! में हर बार दिलासा और ज़ोरदार होता जाता है।
गाँव-घर की सहज, बोलचाल वाली भाषा, जिसमें लोकोक्तियाँ, मुहावरे और देसी शब्द आते हैं, जैसे नैया पार लगना, चूल्हा फूँकना।
जोड़े में आने वाले शब्द, जिनके बीच प्रायः योजक-चिह्न लगता है। ये पुनरुक्त, सजातीय, समानार्थक या विपरीतार्थक हो सकते हैं।
ऐसा वाक्य जिसमें एक काम का होना दूसरे काम के होने पर टिका हो। जैसे, अगर बारिश हुई तो मेला नहीं लगेगा।
सावधान
भ्रम और सच
करके देखो
Title:
ध्वनि-शब्दों की खोज
Safety:
बाहर बैठते समय किसी बड़े को बताकर जाएँ और सड़क के पास न बैठें।
What You Notice:
ध्वनि-शब्द किसी भी वर्णन को जीवंत बना देते हैं, जैसे कहानी में पंखों की फड़फड़ाहट।
Did you know
तोते के लिए मराठी, गुजराती और कोंकणी में पोपट, तमिल में किळि, तेलुगु में चिलुक और कन्नड़ में गिळि शब्द चलते हैं। संस्कृत में इसे शुक कहते हैं।
शिक्षा मंत्रालय का शब्द नाम का ऑनलाइन कोश भारतीय भाषाओं के शब्दों को एक जगह खोजने की सुविधा देता है।
ध्वनि की नक़ल से बने शब्दों को अंग्रेज़ी में ओनोमेटोपिया कहा जाता है। खटखट, छमछम और भिनभिन इसी तरह के शब्द हैं।
Memory tricks
शैली के छह रंग: चि–सं–पु–अ–लो–प्र — चित्र, संवाद, पुनरुक्ति, अतिशयोक्ति, लोकभाषा, प्रश्नोत्तर।
वाक्य के आठ भेद: वि–नि–प्र–वि–आ–इ–सं–सं — विधान, निषेध, प्रश्न, विस्मय, आज्ञा, इच्छा, संदेह, संकेत। दो वि और दो सं याद रखिए।
Practice MCQs with answers (25)
- A पुनरुक्ति
- B संवादात्मकता
- C चित्रात्मकता
- D अतिशयोक्ति
Show answer
Why:
दृश्य बिंब।
- A चित्रात्मकता
- B लोकोक्ति
- C प्रश्नोत्तर शैली
- D निषेधात्मकता
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Why:
पूरा दृश्य आँखों में।
- A लेखक की भूल, क्योंकि शीर्षक और कहानी मेल नहीं खाते
- B कि कहानी असल में एक नाटक है, जिसका मंचन होता है
- C कि ताई बहुत बातूनी थीं और गाँव भर से बात करती थीं
- D एक सुंदर विरोधाभास, जहाँ ख़ामोशी संवाद से टूटती है
Show answer
Why:
मिट्ठू ने ही सूनापन तोड़ा।
- A मिट्ठू हर बार ताई से और ज़्यादा नाराज़ हो रहा है
- B दिलासे की तीव्रता लगातार बढ़ती जा रही है
- C छापने वाले से भूल से चिह्न ज़्यादा लग गए हैं
- D ताई मिट्ठू की बात पर बिलकुल भरोसा नहीं कर रहीं
Show answer
Why:
पुनरुक्ति से भाव गहरा।
- A पुनरुक्ति
- B चित्रात्मकता
- C निषेध
- D अतिशयोक्ति
Show answer
Why:
बढ़ा-चढ़ाकर कही बात।
- A प्रश्नोत्तर शैली
- B लोकधर्मी भाषा
- C विदेशी शब्दावली
- D वैज्ञानिक भाषा
Show answer
Why:
गाँव की सहज बोली।
- A जीवन, जिसे बुढ़ापे में अकेले पार करना है
- B नदी में चलने वाली गाँव की असली नाव
- C कुंभ मेले में जाने वाली कोई नाव
- D मिट्ठू का पिंजरा, जो बहुत भारी था
Show answer
Why:
प्रतीकात्मक प्रयोग।
- A सुखांत अंत
- B प्रेरणात्मक अंत
- C मुक्त अंत
- D व्यंग्यात्मक अंत
Show answer
Why:
आगे क्या हुआ, अनकहा।
- A यथार्थवादी अंत
- B अप्रत्याशित अंत
- C प्रेरणात्मक अंत
- D सुखांत समापन
Show answer
Why:
चौंकाने वाला मोड़।
- A कहानी के अंत में सब पात्र मिलकर ख़ुशी से नाचते-गाते हैं
- B कहानी के अंत में कोई जादुई घटना घटती है और तोता लौटता है
- C गाँवों में अकेले बुज़ुर्गों का सूनापन सचमुच ऐसा ही होता है
- D अंत में लेखक ताई को उपदेश देकर एक सीधी सीख देता है
Show answer
Why:
जीवन की सच्चाई जैसा।
- A तोते की तरह रटना
- B मीठा खाना पसंद करना
- C दूसरों की नक़ल करना
- D अपनी प्रशंसा स्वयं करना
Show answer
Why:
आत्मप्रशंसा।
- A आँखों का तारा होना
- B भीगी बिल्ली बनना
- C ऊँट के मुँह में जीरा
- D भैंस के आगे बीन बजाना
Show answer
Why:
बाक़ी तीनों में पशु हैं।
- A भीगी बिल्ली बन जाना
- B हाथों के तोते उड़ जाना
- C गिरगिट की तरह रंग बदलना
- D अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना
Show answer
Why:
रंग बदलने वाला जीव।
- A सरसराहट
- B हरियाली
- C मिठास
- D चतुराई
Show answer
Why:
पत्तों की आवाज़।
- A भिनभिन
- B छमछम
- C टिमटिम
- D खटखट
Show answer
Why:
दरवाज़े की दस्तक।
- A विपरीतार्थक
- B समानार्थक
- C पुनरुक्त
- D केवल तुकांत
Show answer
Why:
दोनों का अर्थ लगभग एक।
- A धीरे-धीरे
- B धन-दौलत
- C खाना-पीना
- D सुख-दुख
Show answer
Why:
उलटे अर्थ वाले शब्द।
- A केवल सुबह के समय
- B समय-असमय, किसी भी घड़ी
- C घड़ी की सुई ठीक करना
- D बहुत देर से पहुँचना
Show answer
Why:
बे उपसर्ग: बिना।
- A संकेतवाचक
- B आज्ञावाचक
- C संदेहवाचक
- D विधानवाचक
Show answer
Why:
न जाने, होगा: शंका।
- A संकेतवाचक
- B संदेहवाचक
- C निषेधवाचक
- D इच्छावाचक
Show answer
Why:
एक बात दूसरी पर टिकी।
- A विस्मयादिबोधक
- B प्रश्नवाचक
- C आज्ञावाचक
- D इच्छावाचक
Show answer
Why:
भाव शुभकामना का है।
- A मिट्ठू नहीं उड़ा।
- B शायद मिट्ठू उड़ा हो।
- C क्या मिट्ठू उड़ गया?
- D मिट्ठू, उड़ जाओ।
Show answer
Why:
क्या जोड़कर प्रश्न।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
लोकधर्मी भाषा का प्रभाव।
- A केवल I और III
- B केवल I और II
- C केवल II और III
- D I, II और III तीनों
Show answer
Why:
उठना-बैठना सजातीय है।
- A लेखक उनका नाम लिखना भूल गया था और बाद में उसका ध्यान ही नहीं गया
- B गाँवों में स्त्रियों को प्रायः पति के नाम या पद से पहचाना जाता रहा है
- C उनका असली नाम बहुत लंबा और बोलने में बहुत कठिन था
- D वे ख़ुद भी गाँव के स्कूल में बच्चों को पढ़ाने वाली मास्टरनी थीं
Show answer
Why:
समाज की एक सच्चाई।
Important short questions (7)
चित्रात्मकता में शब्द पाठक के मन में दृश्य बना देते हैं। मिट्ठू के उड़ने के बाद मास्टर ढीली धोती थामे बाग़ में पेड़-पेड़ उसे पुकारते हैं। उधर मिट्ठू डाल-डाल अपने पंख आज़माता है। यह पढ़ते ही पूरा दृश्य आँखों के सामने आ जाता है।
पुनरुक्ति में शब्द दोहराकर भाव को तेज़ किया जाता है। जब ताई पूछती हैं कि अब कैसे कटेगी, तो मिट्ठू कटेगी! कटेगी!! कटेगी!!! कहता है। हर दोहराव के साथ दिलासा और ज़ोरदार हो जाता है। इसी तरह मिट्ठू आ! मिट्ठू आ!! में घबराहट गहरी होती है।
गाँव-घर में सहज रूप से बोली जाने वाली भाषा लोकधर्मी भाषा कहलाती है। इसमें मुहावरे, कहावतें और देसी शब्द ज़्यादा आते हैं। कहानी में नैया पार लगना और दो जून का एक जून चूल्हा फूँकना ऐसे ही प्रयोग हैं।
इसे मुक्त और दुखांत अंत मानना उचित है। ताई का साथी छिन जाता है और वे फिर अकेली रह जाती हैं, इसलिए यह दुखांत है। लेखक यह नहीं बताता कि आगे क्या हुआ, इसलिए यह मुक्त भी है।
भीगी बिल्ली बनना, यानी डरकर चुप हो जाना: पिताजी को देखते ही शरारती राजू भीगी बिल्ली बन गया। अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना, यानी अपनी तारीफ़ आप करना: इनाम मिलते ही वह अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने लगा।
पुनरुक्त शब्द-युग्म में एक शब्द दोहराया जाता है, जैसे बार-बार। सजातीय में एक जैसे स्वभाव के शब्द आते हैं, जैसे उठना-बैठना। समानार्थक में दोनों का अर्थ लगभग एक होता है, जैसे दिन-प्रतिदिन। विपरीतार्थक में उलटे अर्थ होते हैं, जैसे दिन-रात।
संदेहवाचक वाक्य में किसी बात को लेकर शंका होती है, जैसे शायद ताई कल लौट आएँ। संकेतवाचक वाक्य में एक काम का होना दूसरे काम पर टिका होता है, जैसे अगर मास्टर ध्यान रखते तो मिट्ठू न उड़ता।
Long answer questions (3)
शेखर जोशी की इस कहानी में शैली की कई विशेषताएँ हैं। पहली है चित्रात्मकता, जैसे धोती थामे दौड़ते मास्टर और डाल-डाल उड़ता मिट्ठू का दृश्य। दूसरी है संवादात्मकता; ताई और मिट्ठू के छोटे संवाद, जैसे राम-राम कहो और ख़ुश रहो, उनके रिश्ते को बिना समझाए दिखा देते हैं।
तीसरी विशेषता पुनरुक्ति है, जैसे कटेगी! कटेगी!! कटेगी!!!, जिससे भाव की तीव्रता बढ़ती है। चौथी अतिशयोक्ति है, जैसे तोते का रेल-टिकट लगना, जो हँसाती भी है। पाँचवीं लोकधर्मी भाषा है, जिसमें नैया पार लगना और चूल्हा फूँकना जैसे देसी प्रयोग आते हैं। छठी प्रश्नोत्तर शैली है, जैसे ताई का पूछना कि अब कैसे कटेगी। इन सबके मेल से कहानी भावुक, हँसमुख और सच्ची बन जाती है।
कहानी का अंत सुखांत, दुखांत, मुक्त, अप्रत्याशित, यथार्थवादी, प्रेरणात्मक या व्यंग्यात्मक हो सकता है। सुखांत ख़ुशी पर, दुखांत हानि या बिछोह पर ख़त्म होता है। मुक्त अंत पाठक को सोचने के लिए छोड़ता है, अप्रत्याशित अंत चौंकाता है, यथार्थवादी अंत जीवन की सच्चाई जैसा लगता है, प्रेरणात्मक अंत सीख देता है और व्यंग्यात्मक अंत कटाक्ष करता है।
इस कहानी को एक प्रेरणात्मक अंत दिया जा सकता है। ताई को जब सच पता चले, तो पड़ोस के बच्चे रोज़ उनके पास आकर पढ़ने लगें। ताई उन्हें अपनी राम-कहानी सुनाएँ और बच्चे उन्हें नई बातें बताएँ। इस तरह उनका घर फिर से बोलने लगे और अकेलेपन की जगह नया अपनापन आ जाए।
विधानवाचक वाक्य सूचना देता है, जैसे मास्टर ने पिंजरा खोल दिया। निषेधवाचक में मना या न होने का भाव है, जैसे नया तोता कुछ नहीं बोला। प्रश्नवाचक कुछ पूछता है, जैसे मिट्ठू! अब कैसे कटेगी? विस्मयादिबोधक आश्चर्य या दुख दिखाता है, जैसे अरे! मिट्ठू उड़ गया!
आज्ञावाचक में आदेश या आग्रह होता है, जैसे राम-राम कहो। इच्छावाचक में शुभकामना होती है, जैसे जुग-जुग जिओ। संदेहवाचक में शंका होती है, जैसे मिट्ठू न जाने कहाँ होगा। संकेतवाचक में एक बात दूसरी पर टिकी होती है, जैसे अगर रोशनदान बंद होता तो मिट्ठू न उड़ता।
Flashcards (17)
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- वाक्य और उसका भेद
- शब्द-युग्म छाँटो
- सही या भ्रम
- विधानवाचक से संदेहवाचक तक
- झटपट उत्तर
Class 9 Hindi Chapter 3 — frequently asked questions
शेखर जोशी का जन्म 1932 में अल्मोड़ा में हुआ। कोसी का घटवार उनका पहला कहानी-संग्रह है। उन्होंने मध्यवर्ग और मज़दूरों के जीवन पर कहानियाँ लिखीं। 2022 में उनका निधन हुआ।
अतीत में घर बेटे-बहुओं, नौकर-चाकरों और गाय-ढोरों से भरा था और खेती-कारोबार चलता था। अब बेटे शहर चले गए, कारोबार पराया हो गया और घर सूने खंडहर जैसा रह गया।
बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहर चले गए और बेटियाँ ब्याहकर अपने घर चली गईं। सँभालने वाला न रहा, तो खेती-कारोबार पराए हाथों में गया और नौकर-चाकर भी चले गए।
ताई प्रयागराज जाकर कुंभ में नहाना चाहती थीं। पर मिट्ठू की चिंता उन्हें रोक रही थी। मेले की भीड़ में उसे ले जाना ठीक न था, और अकेला छोड़ना भी संभव न था। अंत में मास्टराइन ने मिट्ठू की देखरेख का ज़िम्मा लिया। तब ताई निश्चिंत होकर यात्रा पर गईं।
यह बात हँसी में कही गई, पर इससे पता चलता है कि गाँव वाले भी मिट्ठू को ताई के घर का सदस्य मानने लगे थे। उनके लिए वह केवल पक्षी नहीं, बल्कि बोलने-बतियाने वाला प्राणी था। साथ ही यह गाँव के आपसी अपनेपन और हल्के-फुल्के हास्य को भी दिखाता है।
जगन मास्टर स्वतंत्र विचारों वाले आदर्शवादी व्यक्ति थे। वे चाहते थे कि उनसे किसी को कष्ट न हो। बंद मिट्ठू को देखकर वे बेचैन होते थे, इसलिए रोज़ कमरा बंद करके उसे बाहर आने देते। उड़ान के बाद वे भूख-प्यास भूलकर नए तोते को रटाते रहे। इससे उनकी ज़िम्मेदारी की भावना दिखती है।
चित्रात्मकता में शब्द पाठक के मन में दृश्य बना देते हैं। मिट्ठू के उड़ने के बाद मास्टर ढीली धोती थामे बाग़ में पेड़-पेड़ उसे पुकारते हैं। उधर मिट्ठू डाल-डाल अपने पंख आज़माता है। यह पढ़ते ही पूरा दृश्य आँखों के सामने आ जाता है।
पुनरुक्ति में शब्द दोहराकर भाव को तेज़ किया जाता है। जब ताई पूछती हैं कि अब कैसे कटेगी, तो मिट्ठू कटेगी! कटेगी!! कटेगी!!! कहता है। हर दोहराव के साथ दिलासा और ज़ोरदार हो जाता है। इसी तरह मिट्ठू आ! मिट्ठू आ!! में घबराहट गहरी होती है।
गाँव-घर में सहज रूप से बोली जाने वाली भाषा लोकधर्मी भाषा कहलाती है। इसमें मुहावरे, कहावतें और देसी शब्द ज़्यादा आते हैं। कहानी में नैया पार लगना और दो जून का एक जून चूल्हा फूँकना ऐसे ही प्रयोग हैं।
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