Class 9 Hindi Chapter 12: घर की याद
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भवानीप्रसाद मिश्र, जेल की बरसात और माँ की याद
भवानीप्रसाद मिश्र ने 1942 के आंदोलन में जेल में रहते हुए यह कविता लिखी। रात-भर की बारिश कवि के मन को घेर लेती है और आँखों के सामने घर तैरने लगता है: चार भाई, चार बहनें, मायके आई बहन और बिन-पढ़ी माँ।
What you will be able to do
- भवानीप्रसाद मिश्र के जीवन, रचनाओं और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका के बारे में बता सकेंगे।
- यह समझा सकेंगे कि कविता जेल में किन परिस्थितियों में लिखी गई और इसका केंद्रीय भाव क्या है।
- कविता के आरंभ में बरसात, अँधेरे और आवाज़ों से बने वातावरण का वर्णन कर सकेंगे।
- बाहर की बारिश और कवि के मन की बेचैनी के आपसी संबंध को उदाहरण सहित समझा सकेंगे।
- कविता में घर, भाई-बहनों और माँ की छवि को अपने शब्दों में लिख सकेंगे।
Key points
भवानीप्रसाद मिश्र सन् 1913 में होशंगाबाद में जन्मे, जो मध्य प्रदेश में है और अब नर्मदापुरम कहलाता है; सन् 1985 में उनका देहांत हुआ।
उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं: गीत-फ़रोश, चकित है दुख, बुनी हुई रस्सी, खुशबू के शिलालेख, गांधी-पंचशती और त्रिकाल संध्या।
बुनी हुई रस्सी कविता-संग्रह के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
उन्होंने हैदराबाद से निकलने वाली पत्रिका कल्पना का संपादन किया, आकाशवाणी में काम किया और संपूर्ण गांधी वाङ्मय का संपादन किया।
भारत छोड़ो आंदोलन, 1942, में भाग लेने पर उन्हें तीन वर्ष की क़ैद हुई; जेल में ही उन्होंने घर की याद लिखी।
कविता की शुरुआत रात-भर की लगातार बारिश से होती है; सुबह होने पर भी बादलों का अँधेरा बना है और सब कुछ चुप है।
झरा-झर, हरा-हर, सर-सर और थर-थर जैसे शब्दों से बारिश, पत्तों, हवा और काँपते मन की आवाज़ सुनाई देती है।
बारिश के बीच कवि की आँखों में घर तैरने लगता है: चार भाई, चार बहनें और मायके आई बहन, पर कवि के बिना वह घर दुख से भरा है।
कवि की माँ पढ़ी-लिखी नहीं हैं, इसलिए पत्र नहीं लिख सकतीं; फिर भी उनका स्नेह जेल तक पहुँचता है।
Full explanation
भवानीप्रसाद मिश्र: सीधी-सादी भाषा के बड़े कवि
भवानीप्रसाद मिश्र सन् 1913 में होशंगाबाद में जन्मे। मध्य प्रदेश का यह शहर आज नर्मदापुरम कहलाता है। वे उन कवियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने कविता लिखने के साथ देश की आज़ादी की लड़ाई में भी सीधा हिस्सा लिया। उनके लिए कविता और देश-सेवा, दोनों एक ही जीवन के दो हिस्से थे।
उनकी कविता की सबसे बड़ी पहचान उसकी बोलचाल जैसी भाषा है। उनकी एक प्रसिद्ध कविता यही सीख देती है कि कवि को वैसे ही लिखना चाहिए, जैसे लोग आपस में बोलते हैं। इसीलिए उनकी कविताएँ पढ़ते समय लगता है, जैसे कोई अपना आदमी सामने बैठकर बात कर रहा हो। कठिन शब्दों के बजाय वे घर-परिवार और गाँव की भाषा से भाव पैदा करते हैं।
उनकी प्रमुख रचनाओं में बुनी हुई रस्सी, गीत-फ़रोश, खुशबू के शिलालेख, त्रिकाल संध्या, चकित है दुख, शतदल, गांधी-पंचशती और अँधेरी कविताएँ शामिल हैं। बुनी हुई रस्सी कविता-संग्रह के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। गांधीजी के विचारों का उन पर गहरा असर था, और गांधी-पंचशती में उन्होंने गांधीजी पर पाँच सौ कविताएँ लिखीं।
कविता के अलावा उन्होंने कई बड़े काम किए। वे राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से जुड़े रहे। सन् 1952 से 1955 तक उन्होंने हैदराबाद से निकलने वाली हिंदी पत्रिका कल्पना का संपादन किया। फिर कुछ वर्ष आकाशवाणी के हिंदी कार्यक्रमों से जुड़े रहे। गांधीजी के पूरे लेखन को संपूर्ण गांधी वाङ्मय के रूप में सँवारने के काम में भी उनका बड़ा हाथ था। सन् 1985 में उनका देहांत हुआ।
जेल की कोठरी में जन्मी कविता
सन् 1942 में गांधीजी ने अंग्रेज़ों से भारत छोड़ने को कहा और पूरे देश में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हो गया। भवानीप्रसाद मिश्र भी इस आंदोलन में कूद पड़े। अंग्रेज़ी सरकार ने उन्हें तीन साल के लिए जेल भेज दिया। वहीं, जेल की एक कोठरी में, उन्होंने घर की याद कविता लिखी।
ज़रा सोचिए, एक जवान आदमी अपने भरे-पूरे घर से दूर बंद है। बाहर सावन की झड़ी लगी है। ऐसे मौसम में घर में सब साथ बैठते, हँसते और पकौड़े खाते होंगे। पर कवि अकेला है। इसी अकेलेपन में उसे एक-एक करके घर का हर सदस्य याद आने लगता है। कविता इसी याद की लंबी यात्रा है।
इस कविता को समझने के लिए एक बात ध्यान रखनी ज़रूरी है। कवि ने देश के लिए जेल जाना ख़ुद चुना है; उसे इसका पछतावा नहीं है। पर देश-प्रेम के साथ उसके भीतर परिवार का प्रेम भी उतना ही गहरा है। कविता इन दोनों भावों के बीच की खींचतान को बहुत ईमानदारी से दिखाती है। सेनानी भी आख़िर एक बेटा और भाई होता है।
रात-भर की बारिश और उलझी हुई सुबह
कविता बारिश से शुरू होती है। कवि कहता है कि आज बहुत पानी गिर रहा है, और रात-भर गिरता रहा है। इस पानी के साथ उसका मन और प्राण भी घिरते रहे हैं। यहाँ बारिश सिर्फ़ मौसम नहीं है; वह कवि के भारी मन का चित्र भी है। जैसे बादल आसमान को ढक लेते हैं, वैसे ही उदासी कवि के मन को ढक लेती है।
सुबह हो गई है, पर कवि को ठीक से पता नहीं चला कि कब हुई। उसे बस इतना लगा कि बहुत देर सोने के बाद सुबह हो गई होगी। ऐसा इसलिए, क्योंकि बादलों का अँधेरा अब भी घना है। सब कुछ चुपचाप है, जैसे रात की छाप अब भी हर चीज़ पर पड़ी हो। जेल की कोठरी में समय का अंदाज़ा लगाना वैसे भी कठिन होता है।
यह उलझन हमें कवि की हालत बताती है। जब मन दुखी हो, तो रात और दिन का फ़र्क़ धुँधला हो जाता है। बाहर का अँधेरा कवि के भीतर के अँधेरे से मेल खाता है। कवि सीधे नहीं कहता कि वह उदास है, पर बादल, चुप्पी और रात की छाप के सहारे हम उसकी उदासी को महसूस कर लेते हैं।
आवाज़ों से बना चित्र: झरा-झर, हरा-हर, सर-सर, थर-थर
कविता की एक पंक्ति में पानी झरा-झर गिर रहा है। अगली पंक्तियों में पत्ते हरा-हर हिल रहे हैं, हवा सर-सर बह रही है और कवि के प्राण थर-थर काँप रहे हैं। ये चारों शब्द ध्वनि पर टिके हैं। इन्हें ज़ोर से पढ़िए, तो कानों में बारिश की आवाज़ सचमुच गूँजने लगती है।
इसे कविता में ध्वन्यात्मकता या नाद-सौंदर्य कहते हैं। शब्दों की आवाज़ ही अर्थ का अनुभव करा देती है। ध्यान दीजिए कि पहली तीन आवाज़ें बाहर की हैं: पानी, पत्ते और हवा। पर चौथी आवाज़ भीतर की है: काँपते प्राण। कवि बाहर की आवाज़ों से धीरे-धीरे अपने मन की आवाज़ तक पहुँच जाता है।
यह बहुत सुंदर कलात्मक चाल है। बाहर का तूफ़ान और भीतर का तूफ़ान, दोनों एक ही लय में बँध जाते हैं। इसके बाद ही कवि की आँखों में घर तैरने लगता है। यानी आवाज़ों वाला यह हिस्सा, कविता को प्रकृति से भावना की ओर ले जाने वाला पुल है।
आँखों में तैरता घर, चार भाई और मायके आई बहन
कवि कहता है कि घर उसकी नज़र में तिर रहा है, यानी तैर रहा है। यह वह घर है, जो उससे दूर है, पर ख़ुशियों से भरा हुआ है। जैसे पानी पर कोई चीज़ तैरती है, वैसे ही आँसुओं और यादों के बीच घर की तस्वीर कवि की आँखों में तैरती है। यहाँ तिरना शब्द बारिश के पानी से भी मेल खाता है।
इस घर में चार भाई हैं, और मायके में बहन भी आई हुई है। सावन में बेटियों का मायके आना हमारे यहाँ पुरानी परंपरा है। बहन पिता के घर आई है, पर कवि को लगता है कि वह घर इस बार परिताप, यानी गहरे दुख का घर बन गया है। सब मौजूद हैं, बस पाँचवाँ भाई नहीं है।
फिर कवि कहता है कि आज का दिन दिन नहीं है। उसका एक-एक छिन, यानी क्षण, सौ बरस जैसा लंबा है। जेल का अकेलापन समय को खींचकर बहुत लंबा कर देता है। यहाँ छिन लोकभाषा का शब्द है, जो क्षण से बना है। घर में आज सब एक साथ जुड़े हैं, और ऐसा मौक़ा बहुत कम आता है; इसलिए कवि का दुख और भी बढ़ जाता है।
कवि भाई-बहनों के रिश्ते को भी सुंदर ढंग से बताता है। चार भाई और चार बहनें हैं। भाई भुजाओं की तरह हैं, यानी ताक़त और सहारा; बहनें प्यार हैं। यह छोटा-सा वर्णन बताता है कि यह परिवार प्रेम और एकता से बँधा हुआ है।
बिन-पढ़ी माँ और उनकी स्नेह-धारा
अब कवि को माँ याद आती हैं। वह कहता है कि उसकी माँ बिन-पढ़ी हैं, यानी पढ़ना-लिखना नहीं जानतीं। पर वे दुख में गढ़ी हुई हैं, यानी जीवन के दुखों ने उन्हें मज़बूत बनाया है। कवि के लिए माँ की गोद सबसे बड़ा सहारा है। उस गोद में सिर रख दो, तो फिर कोई दुख बाक़ी नहीं रहता।
माँ के स्नेह की धारा इतनी बड़ी है कि वह जेल की कोठरी तक फैली हुई है। कवि को लगता है कि माँ का प्यार दूर रहकर भी उसे छू रहा है। यह स्नेह-धारा शब्द भी बारिश की धारा से मेल खाता है। बाहर पानी की धारा है, भीतर माँ के प्यार की धारा।
पर यहाँ एक कसक भी है। माँ लिखना नहीं जानतीं, इसलिए वे बेटे को पत्र नहीं भेज सकतीं। जेल में क़ैदियों के लिए घर से आया पत्र सबसे बड़ी ख़ुशी होता है। कवि को वह ख़ुशी नहीं मिल सकती। फिर भी उसे माँ से कोई शिकायत नहीं; बल्कि वह मानता है कि माँ का प्यार किसी काग़ज़ का मोहताज नहीं।
Concepts and terms
जेल में बंद रहने की सज़ा। अंग्रेज़ी सरकार ने आंदोलन में भाग लेने वाले हज़ारों सेनानियों को कारावास दिया।
ऐसे शब्द, जिनकी आवाज़ से ही अर्थ का अनुभव हो जाए। जैसे बारिश का झरा-झर या काँपने का थर-थर।
याद के सहारे मन में बनने वाला चित्र। कवि जेल में बैठे-बैठे घर के लोगों को आँखों के सामने देखने लगता है।
कविता में दृश्य, आवाज़ और रंग से ऐसा माहौल बनाना, जो पाठक को उस जगह पहुँचा दे। यहाँ बरसात का अँधेरा और चुप्पी वातावरण बनाते हैं।
गहरा दुख और मन की जलन। कवि को लगता है कि उसके बिना घर परिताप से भर गया है।
सावधान
भ्रम और सच
करके देखो
Title:
मेरा परिवार-वृक्ष
Safety:
तस्वीरें चिपकाने से पहले घर के बड़ों से पूछ लीजिए।
What You Notice:
परिवार-वृक्ष बनाते समय समझ आता है कि कवि के लिए घर ईंट-पत्थर नहीं, रिश्तों का पेड़ था।
Did you know
भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा 8 अगस्त 1942 को बंबई में हुई थी। उसी दिन गांधीजी ने करो या मरो का नारा दिया और अगली सुबह से बड़े नेता गिरफ़्तार होने लगे।
भवानीप्रसाद मिश्र उन कवियों में थे, जिनकी कविताएँ अज्ञेय ने दूसरा सप्तक नाम के प्रसिद्ध संकलन में शामिल कीं। यह संकलन सन् 1951 में छपा।
उनकी कविता गीत-फ़रोश में कवि व्यंग्य से ख़ुद को गीत बेचने वाला दुकानदार बताता है। यह कविता बाज़ार के पीछे भागते साहित्य पर करारी चोट है।
Memory tricks
बारिश की चार आवाज़ें: झ-ह-स-थ — झरा-झर पानी, हरा-हर पत्ते, सर-सर हवा, थर-थर प्राण। झट से हवा सरकी, थरथराया मन।
Practice MCQs with answers (25)
- A नर्मदापुरम
- B जबलपुर
- C होशंगपुर
- D नर्मदानगर
Show answer
Why:
नदी के नाम पर।
- A गीत-फ़रोश
- B चकित है दुख
- C बुनी हुई रस्सी
- D गांधी-पंचशती संग्रह
Show answer
Why:
कविता-संग्रह।
- A यह दिल्ली से निकलती थी और केवल बच्चों के लिए थी
- B यह हैदराबाद से निकलती थी और कवि ने इसका संपादन किया
- C यह अंग्रेज़ी पत्रिका थी, जिसमें कवि ने लेख लिखे
- D यह आकाशवाणी का एक रेडियो कार्यक्रम था जो रोज़ आता था
Show answer
Why:
संपादन।
- A कठिन संस्कृत शब्दों की भरमार
- B अंग्रेज़ी शब्दों का बहुत अधिक प्रयोग
- C केवल ब्रजभाषा
- D बोलचाल जैसी सहजता
Show answer
Why:
जैसे बोलो, वैसे लिखो।
- A 1857 के संग्राम में कवि के घायल होने पर
- B कवि के विदेश में पढ़ाई करने जाने पर
- C भारत छोड़ो आंदोलन में कवि के जेल जाने पर
- D कवि के आकाशवाणी में काम करते समय
Show answer
Why:
1942।
- A इससे समझ आता है कि उसका दुख पछतावा नहीं, परिवार का प्रेम है
- B इससे पता चलता है कि कवि जेल में बहुत आराम से था
- C इससे साबित होता है कि कवि को घर की बिल्कुल याद नहीं थी
- D इससे पता चलता है कि कवि घर से नाराज़ था
Show answer
Why:
देश-प्रेम और परिवार-प्रेम।
- A बारिश से कवि का मन बहुत प्रसन्न और हल्का हो गया
- B कवि को बारिश में भीगने का डर लग रहा था
- C कवि रात-भर बारिश की गिनती करता रहा
- D बाहर की बारिश के साथ कवि की उदासी भी बढ़ती गई
Show answer
Why:
मन का चित्र।
- A कोठरी में घड़ी नहीं थी और पहरेदार सो गए थे
- B बादलों का घना अँधेरा अब भी छाया हुआ था
- C कवि रात-भर पढ़ता रहा और थक गया
- D उस दिन सूरज निकला ही नहीं था
Show answer
Why:
रात की छाप।
- A चुप, अँधेरा और भारी
- B चहल-पहल और उत्सव से भरा
- C तेज़ धूप और गर्मी से भरा
- D हँसी-ठिठोली वाला
Show answer
Why:
चुप्पी।
- A अतिशयोक्ति
- B व्यंग्यात्मकता
- C ध्वन्यात्मकता
- D प्रश्नात्मकता
Show answer
Why:
नाद-सौंदर्य।
- A वह बादलों के गरजने की तेज़ आवाज़ है
- B वह कवि के भीतर की आवाज़ है
- C वह किसी पक्षी के बोलने की आवाज़ है
- D वह जेल के दरवाज़े की आवाज़ है
Show answer
Why:
काँपते प्राण।
- A कविता को यहीं ख़त्म कर देता है
- B कविता में हँसी-मज़ाक़ भर देता है और उदासी पूरी तरह मिटा देता है
- C कविता को गद्य बना देता है
- D प्रकृति के वर्णन से घर की याद तक जाने वाला पुल बनता है
Show answer
Why:
बाहर से भीतर।
- A बारिश और आँसुओं के बीच यादें पानी पर तैरती-सी लगती हैं
- B घर सचमुच बाढ़ के पानी में बह रहा था
- C कवि तैरकर घर जाना चाहता था और उसका रास्ता बना रहा था
- D घर नदी के बीच बना हुआ था
Show answer
Why:
पानी से मेल।
- A बहन अपने ससुराल से झगड़ा करके आई है
- B सब इकट्ठा हैं, पर पाँचवें भाई के न होने से दुख है
- C घर में किसी की बीमारी के कारण इलाज चल रहा है
- D घर बहुत छोटा है
Show answer
Why:
अधूरा घर।
- A कवि की उम्र सौ बरस की हो चुकी है
- B जेल की सज़ा सौ बरस की है
- C हर पल कवि को ख़ुशी देता है
- D अकेलेपन में एक पल भी बहुत लंबा लगता है
Show answer
Why:
समय का खिंचाव।
- A अंग्रेज़ी से आया हुआ
- B फ़ारसी का, समय के लिए
- C लोकभाषा का, क्षण से बना
- D संस्कृत का तत्सम
Show answer
Why:
तद्भव रूप।
- A घर के लोग रोज़ इकट्ठा होते हैं, इसलिए कवि को ऊब है
- B कवि को भीड़ पसंद नहीं, इसलिए वह घर नहीं जाना चाहता
- C घर के लोग आपस में झगड़ रहे हैं
- D ऐसा मौक़ा कम आता है, और कवि उसी में शामिल नहीं
Show answer
Why:
दुर्लभ मिलन।
- A भाई लड़ाकू हैं और बहनें कमज़ोर हैं
- B भाइयों की भुजाएँ बहुत लंबी हैं, बहनों की छोटी
- C भाई ताक़त और सहारा हैं, बहनें स्नेह
- D भाई-बहन आपस में बात नहीं करते
Show answer
Why:
रिश्तों का अर्थ।
- A वे हर समय दुखी और रोती रहती हैं
- B जीवन के दुखों ने उन्हें मज़बूत बनाया है
- C उन्हें बचपन से मिट्टी के खिलौने गढ़ने का शौक़ था
- D वे दूसरों को दुख देती हैं
Show answer
Why:
दृढ़ता।
- A माँ का प्यार जेल तक कवि को छूता है
- B माँ रोज़ जेल आकर कवि से मिलती हैं
- C माँ ने जेल तक पानी की नहर बनवाई है
- D माँ कवि को पत्र लिखती हैं
Show answer
Why:
धारा का बिंब।
- A माँ के प्रति गहरी नाराज़गी और शिकायत का भाव
- B एक कसक, पर माँ के प्रति कोई शिकायत नहीं
- C पढ़ाई न करने पर माँ का मज़ाक़
- D पत्र न आने से कवि की ख़ुशी
Show answer
Why:
प्यार काग़ज़ से बड़ा।
- A पाँच नदियों की यात्रा पर
- B सौ सालों के इतिहास पर
- C गांधीजी पर लिखी कविताओं पर
- D पंचतंत्र की कहानियों पर
Show answer
Why:
पाँच सौ कविताएँ।
- A बाहर अँधेरा है, पर कवि का मन पूरी तरह उजला और प्रसन्न है
- B दोनों का कविता में कोई संबंध नहीं है
- C भीतर का अँधेरा बाहर के उजाले को मिटा देता है
- D दोनों एक-दूसरे से मेल खाकर उदासी को गहरा करते हैं
Show answer
Why:
प्रकृति और मन।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
बारिश का दूसरा अर्थ।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C केवल I और III
- D I, II और III तीनों
Show answer
Why:
माँ लिख नहीं सकतीं।
Important short questions (7)
उनका जन्म सन् 1913 में होशंगाबाद, अब नर्मदापुरम, में हुआ। वे स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए और 1942 में जेल गए। बुनी हुई रस्सी के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। सन् 1985 में उनका देहांत हुआ।
उन्होंने हैदराबाद से निकलने वाली कल्पना पत्रिका का संपादन किया। वे आकाशवाणी के हिंदी कार्यक्रमों से जुड़े रहे। उन्होंने संपूर्ण गांधी वाङ्मय के संपादन में भी काम किया।
सन् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने पर कवि को तीन वर्ष की क़ैद हुई। जेल में सावन की बारिश के बीच उन्हें घर की बहुत याद आई। उसी याद से यह कविता बनी।
रात-भर की बारिश के साथ कवि का मन भी उदासी से घिरता गया। बादलों का अँधेरा और चुप्पी उसके भीतर के अकेलेपन जैसे हैं। इस तरह बारिश उसकी बेचैनी का चित्र बन जाती है।
झरा-झर, हरा-हर, सर-सर और थर-थर ध्वन्यात्मक शब्द हैं। इनसे पानी, पत्तों, हवा और काँपते मन की आवाज़ सुनाई देने लगती है। कविता जीवंत बनती है और पाठक दृश्य के भीतर पहुँच जाता है।
सावन में बहन मायके आई है और पूरा परिवार इकट्ठा है। पर पाँचवाँ भाई, यानी कवि, जेल में है। उसकी कमी के कारण ख़ुशी का यह मौक़ा भी दुख से भर गया है।
माँ पढ़ी-लिखी नहीं हैं, पर दुखों ने उन्हें मज़बूत बनाया है। उनकी गोद में हर दुख मिट जाता है। उनका स्नेह इतना बड़ा है कि वह जेल तक पहुँचता है। माँ प्यार से भरी भी हैं और मज़बूत भी।
Long answer questions (3)
भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म सन् 1913 में होशंगाबाद में हुआ। वे बोलचाल जैसी सहज भाषा के कवि थे। गीत-फ़रोश, चकित है दुख और बुनी हुई रस्सी उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं; बुनी हुई रस्सी पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। वे गांधीजी के विचारों से प्रभावित थे और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए। इस कारण उन्हें तीन साल की जेल हुई। यही जीवन कविता की कुंजी है। जेल में बंद कवि को सावन की बारिश में घर याद आता है। हम समझ पाते हैं कि उसका दुख पछतावे का नहीं, परिवार से बिछड़ने का है। देश-प्रेम और घर का प्रेम, दोनों साथ चलते हैं।
कविता की शुरुआत भारी बारिश से होती है, जो रात-भर से जारी है। इस बारिश के साथ कवि का मन भी घिरता जाता है। सुबह हो गई है, पर बादलों का अँधेरा अब भी है और सब ओर चुप्पी है, जैसे रात की छाप बची हो। यह अँधेरा और चुप्पी कवि के अकेलेपन जैसे हैं। फिर झरा-झर पानी, हरा-हर पत्ते और सर-सर हवा की आवाज़ें आती हैं। चौथी आवाज़ में कवि के प्राण थर-थर काँपते हैं। इस तरह प्रकृति का बाहर का तूफ़ान कवि के भीतर के तूफ़ान से जुड़ जाता है। इसी बेचैनी में उसकी आँखों में घर तैरने लगता है। प्रकृति यहाँ भावनाओं का आईना बन गई है।
जेल में सेनानी के पास न कोई अपना होता है, न घर की कोई ख़बर। कविता में कवि कहता है कि वहाँ एक पल भी सौ साल जैसा लगता है। सावन जैसे मौसम में, जब घर में सब इकट्ठा होते हैं, यह अकेलापन और चुभता है। कवि को माँ की गोद, भाई-बहनों की हँसी और मायके आई बहन याद आती है। माँ पत्र भी नहीं लिख सकतीं, इसलिए कोई ख़बर भी नहीं आती। मेरी कल्पना में ऐसा सेनानी रोज़ रात आँखें बंद करके अपने आँगन को देखता होगा। फिर भी वह देश के लिए डटा रहता है। यही उसका सबसे बड़ा त्याग है, जिसकी क़ीमत पर हमें आज़ादी मिली।
Flashcards (17)
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- शब्द और अर्थ
- बाहर की आवाज़ या भीतर की
- सही या भ्रम
- कविता के आरंभ का क्रम
- झटपट उत्तर
वज्र-भुज पिता, धीरज वाली माँ और रोता घर
कवि कल्पना करता है कि पाँचवें बेटे को याद करके घर में क्या हुआ होगा। बाहर से कठोर पर भीतर मक्खन जैसे पिता रो पड़े होंगे, माँ ने धीरज बँधाया होगा, और भाई, बहनें, भाभी और सरला मन ही मन छटपटाए होंगे।
What you will be able to do
- कविता के आधार पर पिता के व्यक्तित्व की कठोर और कोमल, दोनों विशेषताएँ बता सकेंगे।
- वज्र-भुज नवनीत-सा उर जैसे विरोधी बिंबों का अर्थ और सौंदर्य समझा सकेंगे।
- माँ के धीरज बँधाने वाले शब्दों से उनकी भावनात्मक मज़बूती पहचान सकेंगे।
- सोने पर सुहागा मुहावरे का अर्थ और कविता में उसका उलटा प्रयोग समझा सकेंगे।
- कवि की कल्पना में घर के हर सदस्य की प्रतिक्रिया को क्रम से लिख सकेंगे।
Key points
पिताजी भोले और बहादुर हैं; उनकी भुजाएँ वज्र जैसी कठोर हैं, पर हृदय ताज़े मक्खन जैसा कोमल है।
बुढ़ापा उन्हें एक पल के लिए भी नहीं छू पाया; वे अब भी दौड़ते और खिलखिलाते हैं, मौत और शेर से भी नहीं डरते।
उनकी बोली में बादल की गरज है और काम में आँधी की तेज़ी; वे रोज़ गीता-पाठ करते हैं, दो सौ साठ दंड लगाते हैं और मुगदर घुमाते हैं।
कवि कल्पना करता है कि व्यायाम के बाद नीचे आकर बच्चों को देखते ही पिता की आँखें भर आई होंगी और वे पाँचवें का नाम लेकर रो पड़े होंगे।
पिता कवि को सोने पर सुहागा कहते थे, यानी सबसे अच्छा; पर आज वही सुहागा बँधा बैठा है, इसलिए कवि ख़ुद को अभागा कहता है।
माँ धीरज बँधाती हैं: भवानी वहाँ अच्छा है, वह अपने मन से गया है; पीछे हटने वाला बेटा माँ की कोख को लजाता है।
पिता कहते हैं कि वे रो नहीं रहे, फिर याद करते हैं कि भवानी को बरसात प्यारी थी, वह भीगता घूमता था, लौकी के बीज बोता था और बेला के फूल दिखाता था।
कवि की कल्पना में भाई और बहन पागल-से हैं, अम्मा बादल-सी बरस रही हैं, और भौजी व सरला शर्म के कारण खुलकर रो भी नहीं पातीं।
इस हिस्से में सबका मन चुआ होगा; चुआ लोकभाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है टपक पड़ना या भीग जाना।
Full explanation
पिताजी: भोले भी, बहादुर भी
माँ के बाद कवि को पिताजी याद आते हैं, और यह कविता का सबसे लंबा और सबसे जीवंत चित्र है। कवि कहता है कि बाहर अब भी पानी गिर रहा है और घर चारों दिशाओं से घिर रहा है। इसी माहौल में पिता की छवि उभरती है। कवि उन्हें भोले बहादुर कहता है, यानी मन से सीधे-सादे, पर हिम्मत में बेजोड़।
इसके बाद कविता का सबसे प्रसिद्ध बिंब आता है: वज्र-भुज नवनीत-सा उर। वज्र का अर्थ है बहुत कठोर, जैसे इंद्र का हथियार; नवनीत का अर्थ है ताज़ा मक्खन; और उर का अर्थ है हृदय। यानी पिता की भुजाएँ वज्र जैसी मज़बूत हैं, पर उनका दिल मक्खन जैसा मुलायम। एक ही व्यक्ति में कठोरता और कोमलता का यह मेल बहुत सुंदर है।
यह मेल हमारे आस-पास के कई पिताओं में दिखता है। वे बाहर से सख़्त लगते हैं, डाँटते हैं, कम बोलते हैं, पर बच्चों की ज़रा-सी तकलीफ़ पर भीतर से पिघल जाते हैं। कवि ने बस चार शब्दों में ऐसे पिता का पूरा व्यक्तित्व खींच दिया है। इसीलिए परीक्षा में इस अंश का भाव बार-बार पूछा जाता है।
जिन्हें बुढ़ापा छू न सका
कवि कहता है कि पिताजी को बुढ़ापा एक क्षण के लिए भी नहीं व्यापा, यानी नहीं घेर पाया। उम्र भले बढ़ गई हो, पर वे अब भी दौड़ पड़ते हैं और खुलकर खिलखिलाते हैं। उनके भीतर बच्चे जैसा उत्साह और जवान जैसी ताक़त दोनों बचे हुए हैं।
उनकी निडरता के लिए कवि दो बड़े उदाहरण देता है। वे मौत के सामने भी नहीं हिचकते और शेर के सामने भी नहीं बिचकते, यानी डरकर पीछे नहीं हटते। हिचकना और बिचकना, ये दोनों लोकभाषा के मिलते-जुलते शब्द हैं, जो पढ़ने में लय भी बनाते हैं।
कवि उनकी आवाज़ और काम को भी प्रकृति से जोड़ता है। उनकी बोली में बादल गरजता है, यानी उनकी आवाज़ बुलंद और रौबदार है। उनके काम में झंझा लरजती है, यानी उनकी फुर्ती आँधी जैसी है, जिससे सब कुछ हिल उठता है। बादल और आँधी, दोनों बरसात वाली कविता के माहौल से मेल खाते हैं।
गीता, दंड और मुगदर: पिता की दिनचर्या
अब कवि कल्पना करता है कि आज सुबह पिताजी ने क्या किया होगा। उन्होंने रोज़ की तरह गीता का पाठ किया होगा। फिर दो सौ साठ दंड लगाए होंगे। उसके बाद मुगदर को ख़ूब घुमाया होगा और उसकी मूठ, यानी पकड़ने वाली जगह, को ठीक से पकड़कर कसरत पूरी की होगी।
यह दिनचर्या पिता के व्यक्तित्व के दो पहलू दिखाती है। गीता-पाठ उनका आध्यात्मिक और शांत पक्ष है। दंड और मुगदर उनका शारीरिक और बलवान पक्ष है। यानी वे मन से भी मज़बूत हैं और शरीर से भी। ऐसा अनुशासित व्यक्ति आसानी से नहीं टूटता।
पर कवि आगे कहता है कि जब यह सब करके वे नीचे आए होंगे, तो उनकी आँखें आँसुओं से भर गई होंगी। ध्यान दीजिए कि यह पूरा दृश्य होगा, आए होंगे, छाए होंगे जैसे शब्दों में है। कवि यह सब देख नहीं रहा; वह जेल में बैठा कल्पना कर रहा है। यह कल्पना उसके मन के डर और प्रेम, दोनों से बनी है।
पाँचवाँ अभागा और सोने पर सुहागा
नीचे आकर पिता ने चार बेटों और चार बेटियों को खेलते या खड़े देखा होगा। उन्हें देखते ही उन्हें पाँचवें की याद आई होगी, और जिन्हें बुढ़ापा कभी नहीं घेर पाया, वे पाँचवें का नाम लेकर रो पड़े होंगे। यहाँ कवि पिता की मज़बूती और उनके आँसुओं को एक साथ रख देता है, जिससे दुख और गहरा हो जाता है।
कवि कहता है कि पाँचवाँ मैं ही हूँ, अभागा। पिता उसे सोने पर सुहागा कहते रहे हैं। सोने पर सुहागा का अर्थ है किसी अच्छी चीज़ का और भी अच्छा हो जाना। यानी बाक़ी बेटे सोना हैं, तो यह बेटा उन पर सुहागा है, सबसे प्यारा और सबसे चमकदार।
पर आज स्थिति उलट गई है। आज पिता को अपने सोने जैसे बेटे भी हेटे, यानी कम या फीके लग रहे होंगे, क्योंकि उन पर चमक लाने वाला सुहागा जेल में बँधा बैठा है। मुहावरे का यह उलटा प्रयोग बहुत मार्मिक है। जो बेटा घर की शोभा बढ़ाता था, उसकी ग़ैरहाज़िरी ही आज घर की शोभा घटा रही है। इसीलिए कवि ख़ुद को अभागा कहता है।
माँ का धीरज: भवानी वहाँ अच्छा है
अब कवि सोचता है कि पिता को रोते देख माँ ने क्या कहा होगा। माँ ने अपने मन का दुख भीतर बहा लिया होगा और पति से पूछा होगा कि आँखों में पानी किसलिए? भवानी वहाँ अच्छा है। यहाँ कविता में कवि का अपना नाम आता है, जो इसे और भी निजी बना देता है।
माँ आगे समझाती हैं कि वह तुम्हारा मन और अपनापन समझकर गया है, इसलिए जो हुआ, ठीक ही हुआ। यही तुम्हारी लीक है, यानी तुम्हारे घर की परंपरा और रास्ता। माँ मानती हैं कि बेटा अपने पिता के दिखाए साहस के रास्ते पर ही चला है। इसमें गर्व है, दुख नहीं।
फिर माँ की सबसे दृढ़ बात आती है। जो बेटा पाँव पीछे हटाए, वह माँ की कोख को लजाता है, यानी माँ को शर्मिंदा करता है। माँ पति से कहती हैं कि इस तरह कच्चे मत बनो, वरना बच्चे भी रो पड़ेंगे। यह माँ की भावनात्मक ताक़त है। उनका अपना दिल भी टूट रहा है, पर वे परिवार को सँभाले हुए हैं। पहले हिस्से की दुख में गढ़ी माँ यहाँ सचमुच दिखाई देती हैं।
पिता की याद: बरसात, लौकी और बेला
माँ की बात पर पिता कहते होंगे कि मैं रोता कहाँ हूँ, मैं धीरज कहाँ खो रहा हूँ। पर अगले ही पल उनकी बातों से साफ़ हो जाता है कि वे भीतर से कितने भीगे हुए हैं। वे कहते हैं कि आज पानी गिर रहा है, इसलिए भवानी याद आ रहा है। उसे बरसात बहुत प्यारी थी।
पिता बेटे के बचपन की तस्वीरें याद करते हैं। रात-दिन की झड़ी लगी हो, तो वह खुले सिर, नंगे बदन मगन होकर घूमता था। बड़े बाड़े में जाकर लौकी के बीज बोता था। वह आकर बताता था कि फलानी बेला में फूल आ गया है, और माँ भी उसके साथ देखने चली जाती थीं। फलानी यानी कोई ख़ास, अमुक।
इन छोटी-छोटी यादों में बहुत बड़ा भाव है। बरसात ही बेटे की याद दिला रही है, ठीक वैसे, जैसे जेल में बरसात कवि को घर की याद दिला रही है। दोनों ओर एक ही बादल बरस रहा है। पिता अंत में कहते होंगे कि मैं नहीं रोऊँगा, और फिर भी उनकी आँखों से पानी बह निकला होगा। मज़बूत आदमी का यह टूटना पाठक को भीतर तक छू जाता है।
पूरे घर का दृश्य: सबका मन चुआ होगा
अब कवि पूरे घर का दृश्य बनाता है, जो पाँचवें की याद के बाद का है। भाई पागल-से हो गए हैं, बहन पागल-सी है, और अम्मा ठीक बादल की तरह बरस रही हैं। यानी माँ ने पिता को धीरज बँधाया, पर ख़ुद भी बादल की तरह भीतर-भीतर बरस रही हैं। अम्मा को बादल कहना बरसात वाली कविता में बहुत सटीक उपमा है।
घर में भौजी, यानी भाभी, और सरला भी हैं। उनका मन पानी की तरह सहज और तरल, यानी जल्दी पिघलने वाला, है। पर वे शर्म और संकोच के कारण सबके सामने खुलकर रो भी नहीं पातीं, और भीतर ही भीतर छटपटाती हैं। यह उस समय के घरों की एक सच्ची झलक है, जहाँ बहुएँ अपने भाव खुलकर नहीं दिखाती थीं।
कवि कहता है कि आज घर में यही हुआ होगा और सबका मन चुआ होगा। चुआ लोकभाषा का शब्द है; जैसे छत से पानी चूता है, वैसे ही सबके मन से दुख टपक पड़ा होगा। इस एक शब्द में पूरे परिवार के आँसू समा गए हैं। ध्यान रहे कि यह सब कवि की कल्पना है; पर यह कल्पना इतनी सच्ची है कि पढ़ने वाले को अपना घर याद आ जाता है।
Concepts and terms
एक ही व्यक्ति या चीज़ के लिए दो उलटे गुणों वाले चित्र रखना। वज्र-भुज नवनीत-सा उर में कठोरता और कोमलता एक साथ हैं।
जब किसी चीज़ की तुलना किसी दूसरी चीज़ से सा, सी, जैसा जैसे शब्दों से की जाए। नवनीत-सा उर इसका उदाहरण है।
ऐसा वाक्यांश, जिसका अर्थ उसके शब्दों से अलग और ख़ास हो। सोने पर सुहागा यानी अच्छी चीज़ का और अच्छा हो जाना।
जो घटना कवि ने देखी नहीं, पर मन में सोचकर उसका चित्र बनाया। होगा, होंगे जैसी क्रियाएँ बताती हैं कि यह कवि की कल्पना है।
गाँव-घर की बोलचाल की भाषा। भौजी, चुआ, फलानी और हेटे जैसे शब्द कविता को अपनापन देते हैं।
सावधान
भ्रम और सच
मिलाकर देखो
Scenario:
कक्षा नौ में घर की याद पढ़ाने के बाद शिक्षिका ने बच्चों से पूछा कि उन्होंने कभी अपने पिता या दादा को रोते देखा है क्या। कक्षा एकदम चुप हो गई।
फिर अरमान ने बताया कि उसके बड़े भाई फ़ौज में भर्ती होकर पहली बार घर से गए। उस दिन पिता स्टेशन पर कुछ नहीं बोले, पर घर लौटकर देर तक छत पर अकेले बैठे रहे। मोनिका ने कहा कि उसकी दादी हर बात पर हँसती हैं, पर बुआ के विदा होने पर रात-भर जागती रहीं।
शिक्षिका ने कहा कि कविता के पिता भी ऐसे ही हैं, जो कहते हैं कि वे रो नहीं रहे। फिर उन्होंने बच्चों से पूछा कि लोग अपने आँसू छिपाते क्यों हैं।
Activity:
घर के किसी बड़े से पूछिए कि उन्हें कभी किसी अपने से दूर रहना पड़ा, तो कैसा लगा। उनकी बात छह-सात वाक्यों में लिखिए।
Analysis:
बच्चों ने समझा कि कविता का घर किताब का घर नहीं, हमारे अपने घरों जैसा है, जहाँ प्रेम अक्सर चुप रहकर बोलता है।
Did you know
सुहागा एक सफ़ेद खनिज है, जिसे अंग्रेज़ी में बोरैक्स कहते हैं। सुनार सोना पिघलाते समय उसमें सुहागा डालते हैं, जिससे सोना और साफ़ होकर चमक उठता है। इसी से मुहावरा बना: सोने पर सुहागा।
मुगदर लकड़ी का भारी गदा जैसा औज़ार है, जिसे पहलवान कंधों के ऊपर घुमाकर कसरत करते हैं। अंग्रेज़ों ने इसे भारत से सीखा और दुनिया में यह इंडियन क्लब नाम से प्रसिद्ध हुआ।
बेला या मोगरा गर्मी और बरसात में खिलने वाला सफ़ेद, बहुत सुगंधित फूल है। इसके गजरे बनाए जाते हैं और इससे इत्र भी तैयार होता है।
Memory tricks
पिता के चार काम: गी-दं-मु-रो — गीता-पाठ, दंड, मुगदर, फिर रोना। गीत गाए, दंड लगाए, मुगदर घुमाए, फिर बेटे की याद में रो जाए।
Practice MCQs with answers (25)
- A बाहर से मज़बूत, भीतर से कोमल
- B बाहर से कमज़ोर और भीतर से बहुत कठोर
- C हर समय हँसने वाले और कभी न सोचने वाले
- D केवल दिखने में बलवान व्यक्ति
Show answer
Why:
दो उलटे गुण।
- A यमक
- B श्लेष
- C अतिशयोक्ति
- D उपमा
Show answer
Why:
सा शब्द।
- A वे बहुत चालाक हैं और लड़ाई से दूर भागते हैं
- B वे भोले हैं, इसलिए हर बात से डर जाते हैं
- C वे स्वभाव से सरल, पर साहस में बेजोड़ हैं
- D वे केवल बच्चों से बहादुरी दिखाते हैं
Show answer
Why:
सरल और निडर।
- A वे अभी बहुत छोटे बच्चे हैं
- B उम्र बढ़ी, पर जोश और ताक़त बनी है
- C वे बुढ़ापे से हर पल बहुत डरते रहते हैं
- D वे बीमार और कमज़ोर हैं
Show answer
Why:
दौड़ना, खिलखिलाना।
- A पिता शिकारी हैं
- B पिता बहुत डरपोक हैं
- C पिता बहुत निडर हैं
- D पिता जंगल में रहते हैं
Show answer
Why:
निडरता।
- A उनकी आवाज़ बुलंद और रौबदार है
- B वे बात करते समय छाता लेकर रखते हैं
- C वे बहुत धीरे और डरकर बोलते हैं
- D उन्हें बादलों से डर लगता है
Show answer
Why:
गरज।
- A हल्की धूप
- B तेज़ आँधी
- C मीठा फल
- D छोटा तालाब
Show answer
Why:
फुर्ती।
- A पिता को पूजा और कसरत, दोनों से चिढ़ है
- B ये दोनों काम पिता जेल में करते थे
- C पिता इन्हें केवल दिखावे के लिए करते हैं
- D पिता मन और शरीर, दोनों से मज़बूत हैं
Show answer
Why:
संतुलित व्यक्तित्व।
- A कवि उस समय घर में बैठकर सब देख रहा था
- B यह दृश्य कवि की कल्पना है, आँखों देखा नहीं
- C ये घटनाएँ सौ साल बाद होने वाली हैं और सबको पता है
- D कवि घर के किसी पत्र से यह पढ़ रहा था
Show answer
Why:
होगा, होंगे।
- A पिता को बच्चों का खेलना बिल्कुल पसंद नहीं
- B पिता बच्चों से नाराज़ होकर उन्हें डाँटने लगे
- C पिता को कसरत से चोट लग गई
- D सबके बीच भी उन्हें पाँचवें की कमी खलती है
Show answer
Why:
एक की कमी।
- A अच्छी चीज़ का और अच्छा हो जाना
- B सोने की चोरी हो जाना
- C किसी अच्छी चीज़ का बिगड़ जाना
- D सोने से गहने बनाना
Show answer
Why:
सुनार का सुहागा।
- A कवि को सोने के गहने पसंद नहीं थे
- B पिता ने कवि का सारा सोना बेचकर जेल भेज दिया
- C घर की चमक वाला बेटा ही जेल में बँधा है
- D घर में सुहागा ख़त्म हो गया था
Show answer
Why:
उलटा प्रयोग।
- A कम या फीके
- B बहुत ऊँचे
- C बहुत भारी
- D नए-नए
Show answer
Why:
लोकभाषा।
- A बेटे से पूरी तरह मुँह मोड़ लेना
- B अपने दुख को छिपाकर परिवार को धीरज देना
- C जेल को घर से बेहतर समझना और ख़ुश होना
- D पिता का मज़ाक़ उड़ाना
Show answer
Why:
ढाढ़स।
- A बेटे ने पिता के रास्ते को पूरी तरह छोड़ दिया है
- B पिता ने बेटे को जेल भेजने के लिए कहा था
- C बेटा पिता के दिखाए साहस के रास्ते पर ही चला है
- D लीक का अर्थ है घर की छत टपकना
Show answer
Why:
घर की परंपरा।
- A वे बेटे को लेकर हर समय डरी-सहमी रहती हैं
- B वे बेटे से कभी प्यार नहीं करती थीं
- C वे केवल पिता की बात दोहराती हैं
- D वे भावनात्मक रूप से दृढ़ और स्वाभिमानी हैं
Show answer
Why:
स्वाभिमान।
- A ताकि पिता के रोने से बच्चे भी न टूटें
- B ताकि पिता घर छोड़कर बाहर चले जाएँ और लौटें नहीं
- C ताकि पिता बेटे को भूल जाएँ
- D ताकि पिता कच्चा खाना न खाएँ
Show answer
Why:
परिवार को सँभालना।
- A पिता सचमुच बिल्कुल दुखी नहीं थे
- B पिता झूठ बोलने के आदी थे और सबको चिढ़ाते थे
- C मज़बूत आदमी भी भीतर से टूट रहा है
- D बाहर बारिश हो रही थी, इसलिए पानी बहा
Show answer
Why:
छिपा हुआ दुख।
- A कवि बरसात में ही जेल गया था और लौटा नहीं
- B बचपन में कवि को बरसात बहुत प्यारी थी
- C बरसात में पिता हमेशा बीमार पड़ते थे
- D कवि को बरसात से डर लगता था
Show answer
Why:
भीगी यादें।
- A एक छोटी नदी का नाम
- B कवि की बहन का नाम
- C घर का एक कमरा
- D एक सुगंधित फूल का पौधा
Show answer
Why:
मोगरा।
- A वे बहुत ऊँचाई पर चढ़ गई हैं
- B वे गुस्से से गरज रही हैं और सबको डाँट रही हैं
- C वे भीतर-भीतर लगातार बरस रही हैं
- D वे कहीं चली गई हैं
Show answer
Why:
बरसती आँखें।
- A बहुएँ घर में सबसे ज़्यादा ज़ोर से रोती थीं
- B बहुएँ अपने भाव खुलकर नहीं दिखा पाती थीं
- C बहुओं को कवि से कोई लगाव नहीं था
- D घर में कोई बहू थी ही नहीं
Show answer
Why:
संकोच।
- A लोकभाषा का, टपकने के अर्थ में
- B संस्कृत का, सोने के अर्थ में
- C अंग्रेज़ी का, चलने के अर्थ में
- D फ़ारसी का, हँसने के अर्थ में
Show answer
Why:
छत का चूना।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- B अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- C अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
- D दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
Show answer
Why:
विरोध से असर।
- A केवल I और III
- B केवल I और II
- C केवल II और III
- D I, II और III तीनों
Show answer
Why:
माँ धीरज देती हैं।
Important short questions (7)
वज्र बहुत कठोर होता है और नवनीत ताज़ा मक्खन है। पिता की भुजाएँ वज्र जैसी मज़बूत हैं, पर उनका हृदय मक्खन जैसा कोमल है। यानी वे बाहर से कठोर, पर भीतर से बहुत संवेदनशील हैं।
पिता रोज़ सुबह गीता का पाठ करते हैं। फिर दो सौ साठ दंड लगाते हैं और मुगदर घुमाकर कसरत करते हैं। इससे पता चलता है कि वे मन और शरीर, दोनों से मज़बूत और अनुशासित हैं।
पिता कवि को सोने पर सुहागा, यानी सबसे प्यारा बेटा कहते थे। पर आज वह जेल में बँधा बैठा है और पिता को दुख दे रहा है। जिसके कारण घर चमकता था, वही आज घर के आँसुओं का कारण है।
माँ ने कहा होगा कि भवानी वहाँ अच्छा है, आँखों में पानी क्यों? वह तुम्हारा मन समझकर गया है और यही तुम्हारी लीक है। पीछे हटने वाला बेटा माँ को लजाता है, इसलिए कच्चे मत बनो।
कवि को बरसात बहुत प्यारी थी। वह खुले सिर, नंगे बदन मगन होकर घूमता था। वह बाड़े में लौकी के बीज बोता था और बेला में फूल आने की ख़बर देता था।
इसका अर्थ है किसी अच्छी चीज़ का और भी अच्छा हो जाना। वाक्य: मीरा परीक्षा में प्रथम आई और उसे छात्रवृत्ति भी मिल गई; यह तो सोने पर सुहागा हो गया।
भाई और बहन पागल-से हो गए हैं और अम्मा बादल की तरह बरस रही हैं। भौजी और सरला का मन भी पिघला है, पर वे शर्म के कारण रो नहीं पातीं और भीतर छटपटाती हैं। सबका मन दुख से भीग गया है।
Long answer questions (3)
कविता में पिता का व्यक्तित्व बहुआयामी है। वे भोले भी हैं और बहादुर भी। उनकी भुजाएँ वज्र जैसी मज़बूत हैं, पर हृदय मक्खन जैसा कोमल। बुढ़ापा उन्हें छू नहीं सका; वे अब भी दौड़ते और खिलखिलाते हैं। वे इतने निडर हैं कि मौत और शेर के सामने भी नहीं डरते। उनकी आवाज़ बादल की तरह गरजती है और काम में आँधी जैसी फुर्ती है। वे रोज़ गीता-पाठ करते हैं और दंड-मुगदर से कसरत करते हैं, यानी मन और शरीर, दोनों से मज़बूत हैं। पर इतने मज़बूत पिता भी पाँचवें बेटे की याद में रो पड़ते हैं। वे कहते हैं कि वे रो नहीं रहे, फिर भी बेटे की भीगी यादों में आँखें बह निकलती हैं। यही विरोध उनके व्यक्तित्व को सबसे सुंदर बनाता है।
कविता में माँ पढ़ी-लिखी नहीं हैं, पर दुखों ने उन्हें मज़बूत बनाया है। जब बलवान पिता बेटे की याद में रो पड़ते हैं, तब माँ अपने आँसू भीतर बहा लेती हैं और पति को धीरज बँधाती हैं। वे कहती हैं कि भवानी वहाँ अच्छा है, वह तुम्हारा मन समझकर गया है और यही घर की लीक है। वे यहाँ तक कहती हैं कि पीछे हटने वाला बेटा माँ की कोख को लजाता है। वे पति से कहती हैं कि कच्चे मत बनो, वरना बच्चे भी रो पड़ेंगे। इस तरह वे पूरे परिवार को सँभालती हैं। पर कवि यह भी बताता है कि अम्मा भीतर-भीतर बादल की तरह बरस रही हैं। माँ का दुख गहरा है, पर उनका धीरज उससे भी बड़ा है।
कवि जेल में है, इसलिए वह घर का कोई दृश्य देख नहीं सकता। फिर भी वह पिता के व्यायाम, उनके आँसू, माँ के ढाढ़स, पिता की यादों और पूरे घर के दुख का ऐसा चित्र बनाता है, जैसे सब आँखों के सामने हो। होगा, होंगे जैसे शब्द बताते हैं कि यह कल्पना है। यह कल्पना कवि के गहरे प्रेम से बनी है। वह अपने परिवार के हर सदस्य का स्वभाव इतनी अच्छी तरह जानता है कि उसे पता है, कौन कैसे रोएगा और कौन कैसे सँभालेगा। इस कल्पना से कविता में नाटक जैसी जीवंतता आती है। पाठक भी उस घर में पहुँच जाता है। साथ ही यह कल्पना कवि के अपने दुख को भी दिखाती है, क्योंकि जो वह सोच रहा है, वही उसके मन का डर और उसकी चाहत है।
Flashcards (17)
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- शब्द और अर्थ
- कठोर पक्ष या कोमल पक्ष
- सही या भ्रम
- कवि की कल्पना का क्रम
- झटपट उत्तर
सावन से संदेश और कविता का सौंदर्य
बारिश थमती है, पर मन भीगा रहता है। कवि सावन को दूत बनाकर कहता है कि घरवालों से मेरा दुख मत कहना, कहना कि मैं मस्त हूँ। साथ में कविता की ध्वनि, बिंब, लोकभाषा, दोहराव, अलंकार, मेघदूत की परंपरा और घर शब्द की भाषाएँ।
What you will be able to do
- बारिश थमने के बाद आकाश, पेड़ों और पंछी के दृश्य का भाव कवि के मन से जोड़ सकेंगे।
- पिता के लिए पहाड़ और बरगद वाले बिंबों का अर्थ समझा सकेंगे।
- सावन को संदेशवाहक बनाने के कारण और संदेश में छिपे त्याग को समझा सकेंगे।
- कविता से ध्वन्यात्मकता, बिंब, लोकभाषा, दोहराव, अलंकार और संबोधन के उदाहरण ढूँढ़ सकेंगे।
- प्रकृति को दूत बनाने की साहित्यिक परंपरा और घर शब्द के भारतीय भाषाओं वाले रूप बता सकेंगे।
Key points
बारिश थम गई है, पर कवि का मन बहुत नम है; एक जैसे बादल पूरे आकाश में फैले हैं, किरणों को झाँकने की जगह नहीं।
कवि को बादल ऐसे लगते हैं, जैसे माँ ने आँगन लीप दिया हो; दिशाएँ चुप हैं और पेड़ आँखें बंद करके साँस थामे खड़े हैं।
एक पंछी के बोलने से कवि के हृदय के घाव खुल जाते हैं; वह अपने मन से कहता है कि तू ज़रा-से दुख में भी टूट जाता है।
पिता का शरीर पहाड़ जैसा और मन बरगद के पेड़ जैसा है; एक पत्ता टूटे, तो धारा फूट पड़ती है; जितनी डालें, उतनी जड़ें।
कवि हवा से कहता है कि पिता को धीरज देना, उनका दिल मत चीरना; फिर सावन से विनती करता है कि तुम बरस लो, पर वे न बरसें।
संदेश में कवि कहलवाता है कि मैं मज़े में हूँ, लिखता-पढ़ता हूँ, काम करता हूँ, सूत कातता हूँ, वज़न सत्तर सेर है, खाता-खेलता हूँ।
कवि मना करता है कि सावन यह न बताए कि वह रात को जागता है, लोगों से कतराता है, चुप रहता है; घरवालों को कोई शक न हो।
कविता में ध्वनि-शब्द, स्मृति-बिंब, लोकभाषा के शब्द, पंक्तियों का दोहराव, उपमा और मानवीकरण जैसे अलंकार और संबोधन की शैली है।
प्रकृति को दूत बनाने की परंपरा पुरानी है; कालिदास के मेघदूत में यक्ष बादल से अपनी पत्नी तक संदेश भिजवाता है।
Full explanation
बारिश थमी, पर मन भीगा रहा
कविता के आख़िरी हिस्से की शुरुआत एक बदलाव से होती है। अब पानी थम गया है। पर कवि कहता है कि उसका मन बहुत ज़्यादा नम हो गया है। बाहर की बारिश रुक गई है, पर भीतर की बारिश, यानी आँसुओं और यादों की झड़ी, अब भी जारी है। निहायत लोकभाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है बहुत ज़्यादा।
आकाश में एक जैसे बादल जमे हुए हैं, जो पूरे गगन में फैलकर रम गए हैं। उनका ढेर इतना घना है कि बीच में कोई फाँक, यानी दरार, नहीं है, जहाँ से सूरज की किरणें झुककर झाँक सकें। यह भी कवि के मन जैसा है, जहाँ उदासी इतनी घनी है कि ख़ुशी की कोई किरण अंदर नहीं आ पाती।
फिर कवि एक बहुत घरेलू और सुंदर उपमा देता है। उसे ये बादल ऐसे लगते हैं, जैसे माँ ने आँगन लीप दिया हो। गाँवों में मिट्टी या गोबर से आँगन लीपकर उसे चिकना और एक-सा बनाया जाता है। आकाश का एक-सा फैला सलेटी रंग कवि को वैसा ही लगता है। ध्यान दीजिए, इस समय भी कवि को माँ और आँगन ही याद आ रहे हैं; उसकी हर सोच घर की ओर लौटती है।
चुप दिशाएँ, ध्यान में खड़े पेड़ और एक पंछी
कवि कहता है कि आकाश रूपी आँगन की लुनाई, यानी सुंदरता, दिशाओं के मन में समा गई है। दसों दिशाएँ चुपचाप हैं। यह चुप्पी स्वस्थ लय की छाप जैसी है, यानी तूफ़ान के बाद की शांत, ठहरी हुई साँस। बारिश के बाद की यह शांति हम सबने महसूस की है, जब हवा भी जैसे रुक जाती है।
पेड़ों का चित्र और भी अनोखा है। झाड़ आँखें बंद करके, साँस को स्थिर और धीमा करके, बिना हिले चुपचाप खड़े हैं। ऐसा लगता है, जैसे वे क्षितिज पर जड़ दिए गए हों। यहाँ पेड़ों को इंसानों की तरह ध्यान लगाते दिखाया गया है। यह मानवीकरण अलंकार का सुंदर उदाहरण है।
इसी गहरी चुप्पी में एक पंछी बोलता है। उसकी आवाज़ कवि के हृदय के घाव खोल देती है। शांति में एक छोटी-सी आवाज़ भी बहुत तेज़ लगती है, और दुखी मन में वह पुराने दर्द जगा देती है। शायद पंछी अपने साथियों को पुकार रहा है, और उसे सुनकर कवि को अपने बिछड़े लोग और याद आने लगते हैं।
मन से बातचीत: तू ज़रा-से दुख में टूट जाता है
अब कवि अपने ही मन से बात करता है, और यह कविता का बहुत दार्शनिक हिस्सा है। वह कहता है कि आदमी का हृदय बेचारा है; उसमें इतनी तृषा, यानी चाहत या प्यास, क्यों है? फिर वह अपने मन से पूछता है कि तू ज़रा-सा दुख भी कितना सह पाएगा। यहाँ कवि ख़ुद को समझाने और डाँटने, दोनों का काम कर रहा है।
कवि मन की कमज़ोरी के कई चित्र देता है। हवा आई, तो तू उड़ चला; लहर आई, तो मुड़ चला। ज़रा-सा झटका लगा, तो टूट गया और नीचे गिरकर फूट गया। यानी मन छोटी-छोटी बातों से हिल जाता है। प्रिय लोगों से दूर होकर तू बाढ़ की तरह बह चला है। तेरे पास दुख के सिवा क्या है; तेरी हँसी भी आँसुओं से सिंची हुई है।
यह हिस्सा बताता है कि कवि का संघर्ष केवल अंग्रेज़ों से नहीं, अपने मन से भी है। वह चाहता है कि उसका मन मज़बूत रहे, पर यादें उसे बार-बार कमज़ोर कर देती हैं। यह बहुत ईमानदार स्वीकार है। बड़े-बड़े वीर भी भीतर से इंसान होते हैं, और कवि इस सच को छिपाता नहीं।
पिता का वेश: पहाड़ जैसी देह, बरगद जैसा मन
मन से बात करते-करते कवि को फिर पिता याद आते हैं। उनका वेश, यानी रूप, उसे क्लेश, यानी पीड़ा, दे रहा है। कवि कहता है कि पिता की देह एक पहाड़ जैसी है, और मन बड़, यानी बरगद, के पेड़ जैसा। पहाड़ अटल और मज़बूत होता है, और बरगद फैला हुआ, छायादार और सबको सहारा देने वाला।
पर इस बरगद की एक ख़ासियत है। अगर उसका एक पत्ता भी टूट जाए, तो धारा फूट पड़ती है। एक हल्की चोट लगे, तो दूध की नदी उमड़ पड़ती है। बरगद की डाली या पत्ता तोड़ने पर सचमुच सफ़ेद दूध जैसा रस निकलता है। कवि इस सच्चाई को पिता के प्रेम से जोड़ देता है: परिवार के किसी एक सदस्य को भी चोट लगे, तो पिता का दिल बह निकलता है।
कवि आगे कहता है कि एक टहनी भी कम न हो, वरना पेड़ झुक जाए; उसमें ख़म आ जाए। पिता को हर सदस्य का इतना ध्यान और इतनी फ़िक्र है, जितनी बरगद की डालें, उतनी ही उसकी जड़ें। बरगद की डालों से जड़ें लटककर ज़मीन में जाती हैं और पेड़ को थामती हैं। यानी पिता का प्रेम ही परिवार की जड़ें है। आज पाँचवीं टहनी दूर है, इसलिए यह बरगद झुक गया होगा।
सावन से विनती: तुम बरस लो, वे न बरसें
अब कवि हवा से कहता है कि पिता को धीरज देना, उनका जी मत चीरना। फिर वह सावन को पुकारता है: हे सजीले हरे सावन, हे मेरे पुण्य पावन। सावन को सजीला और पवित्र कहकर कवि उसे अपना सबसे भरोसेमंद साथी बना लेता है। यही सावन अब कवि और घर के बीच संदेशवाहक बनेगा।
कवि की विनती बहुत मार्मिक है। वह कहता है कि सावन, तुम चाहे जितना बरस लो, पर मेरे माता-पिता न बरसें, यानी न रोएँ। पाँचवें के लिए वे न तरसें। बरसना शब्द यहाँ दो अर्थों में है: बादल का बरसना पानी है, और माता-पिता का बरसना आँसू। एक ही शब्द से कवि ने बाहर और भीतर की बारिश को जोड़ दिया है।
कवि सच भी बताता है और झूठ भी। वह मानता है कि वह मज़े में है, बस घर पर नहीं है। फिर कहता है कि यह बस बहुत बड़ा बस है; इसी एक कमी से सारा जीवन विरस, यानी फीका हो गया है। फिर भी वह सावन से कहता है कि यह बात उनसे मत कहना। उन्हें धीरज देते रहना। कवि का अपना दुख उसके लिए छोटा है, घरवालों का दुख बड़ा।
मीठा झूठ: कहना मस्त हूँ मैं
अब कवि सावन को बताता है कि घर जाकर क्या-क्या कहना है। कहना कि मैं लिख रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ, काम करता हूँ और नाम कमा रहा हूँ। कहना कि लोग चाहते हैं कि तुम कोई शोक मत करो। कहना कि मैं मस्त हूँ और कातने में व्यस्त हूँ। कातना यानी चरखे पर सूत बनाना, जो गांधीजी के आंदोलन से जुड़ा काम था।
कवि अपनी तंदुरुस्ती का भी बढ़ा-चढ़ाकर बखान करवाता है। कहना कि मेरा वज़न सत्तर सेर है, खाना ढेर सारा खाता हूँ, कूदता हूँ, खेलता हूँ और दुख को डटकर ठेलता हूँ। यह सब इसलिए, ताकि माता-पिता को लगे कि बेटा जेल में भी ख़ुश और स्वस्थ है। दुख डटकर ठेलना कवि के संघर्षशील स्वभाव का भी सच है।
फिर कवि बताता है कि क्या नहीं कहना है। यह मत कहना कि मैं अस्त हूँ, यानी डूबा हुआ या हारा हुआ। जो जैसा है, वैसा मत कहना। मत कहना कि मैं रात को जागता हूँ और आदमियों से भागता हूँ। मत कहना कि मैं मौन रहता हूँ और ख़ुद नहीं समझ पाता कि मैं कौन हूँ। ध्यान रखना कि कोई उल्टी-सीधी बात मुँह से न निकले और घरवालों को ज़रा भी शक न हो। कविता इसी विनती की वापसी पर ख़त्म होती है कि सावन बरसे, वे न बरसें।
यह मीठा झूठ कविता का सबसे बड़ा त्याग है। कवि अपने अकेलेपन, अनिद्रा और चुप्पी को छिपाकर परिवार को सुख देना चाहता है। सच्चा प्रेम कभी-कभी अपने दुख को चुपचाप ढो लेने का नाम है। यही बात इस कविता को केवल याद की कविता नहीं, प्रेम और त्याग की कविता बना देती है।
कविता का सौंदर्य: ध्वनि, बिंब, लोकभाषा और दोहराव
इस कविता की पहली ख़ूबी ध्वन्यात्मकता है। झरा-झर, हरा-हर, सर-सर और थर-थर जैसे शब्द आवाज़ से अर्थ जगाते हैं। दूसरी ख़ूबी बिंब हैं। स्मृति-बिंब में घर का हर सदस्य आँखों के सामने आता है: व्यायाम करते पिता, धीरज देती माँ, शर्म से चुप भौजी। दृश्य-बिंब में लिपे आँगन जैसे बादल और ध्यान लगाए पेड़ दिखते हैं।
तीसरी ख़ूबी लोकभाषा की सहजता है। छिन, फलानी, भौजी, चुआ, हेटे, बड़, निहायत और बिचकना जैसे शब्द कविता को घर की बोली का अपनापन देते हैं। चौथी ख़ूबी दोहराव है। पानी गिर रहा है, आँखों में घर का तैरना, चार भाई चार बहिनें, और कहना जैसे अंश बार-बार लौटकर भाव को गहरा करते हैं और लय बनाते हैं।
पाँचवीं ख़ूबी अलंकार हैं। नवनीत-सा उर, पहाड़ जैसी देह और अम्मा ठीक बादल में उपमा है। सावन का संदेश ले जाना और पेड़ों का आँखें बंद करना मानवीकरण है। झरा-झर जैसे शब्दों में अनुप्रास की झंकार है। छठी ख़ूबी संबोधन है; कवि सावन, हवा और अपने मन को सीधे पुकारकर बात करता है। और पूरी कविता में प्रकृति और भाव साथ-साथ चलते हैं: बारिश बढ़ती है, तो दुख बढ़ता है; बारिश थमती है, तो मन भीगा रह जाता है।
प्रकृति के दूत और घर शब्द की भाषाएँ
प्रकृति को संदेशवाहक बनाने की परंपरा भारतीय साहित्य में बहुत पुरानी है। कालिदास के मेघदूत में यक्ष बादल को दूत बनाकर दूर बैठी पत्नी तक संदेश भेजता है। लोकगीतों में कोयल, कौआ, तोता और हवा भी संदेश ले जाते हैं। भवानीप्रसाद मिश्र ने इसी परंपरा को जेल की कोठरी में नया जीवन दे दिया।
आज संदेश भेजने के माध्यम बहुत बदल गए हैं। पहले चिट्ठी, फिर तार, टेलीफ़ोन, और अब मोबाइल संदेश और वीडियो कॉल। पर जेल में बंद कवि के पास इनमें से कुछ नहीं था, इसलिए उसने आसमान के बादल को ही अपना डाकिया बना लिया। सोचिए, अगर आपको किसी प्रिय को प्रकृति के ज़रिए संदेश भेजना हो, तो आप किसे चुनेंगे: चाँद, नदी, हवा या कोई पक्षी?
कविता का केंद्र घर है, और घर के लिए हर भारतीय भाषा का अपना शब्द है। संस्कृत में गृहम्, तेलुगु में इल्लु, तमिल और मलयालम में वीडु, कन्नड़ में मने, मणिपुरी में युम, कश्मीरी में गॅरु, सिंधी में घरु और बांग्ला में बाड़ी भी कहते हैं। पंजाबी, मराठी, गुजराती, असमिया और कोंकणी में यह घर ही है। शब्द अलग हैं, पर घर से जुड़ी याद हर भाषा में एक जैसी मीठी और भीगी होती है।
Concepts and terms
जो एक की बात दूसरे तक पहुँचाए। इस कविता में कवि सावन के बादल को अपना संदेशवाहक बनाता है।
जब प्रकृति की चीज़ों को इंसानों की तरह सोचते, बोलते या काम करते दिखाया जाए। जैसे पेड़ आँखें बंद करके खड़े हैं या सावन संदेश ले जाता है।
कविता में किसी को सीधे पुकारकर बात करना। कवि हे सजीले हरे सावन कहकर बादल से सीधे बात करता है।
किसी शब्द या पंक्ति को बार-बार लाना, जिससे भाव गहरा हो और लय बने। पानी गिर रहा है और कहना जैसे शब्द कई बार लौटते हैं।
शब्दों से आँखों के सामने बनने वाला चित्र। बादलों का आँगन की तरह लिपा होना एक दृश्य-बिंब है।
सावधान
भ्रम और सच
करके देखो
Title:
ध्वनि-शब्दों की रिकॉर्डिंग
Safety:
पानी गिराते समय बिजली के सामान और मोबाइल को दूर रखिए।
What You Notice:
आवाज़ों के साथ पढ़ने पर समझ आता है कि कवि ने बारिश को केवल दिखाया नहीं, सुनाया भी है।
Did you know
कालिदास के मेघदूत में एक यक्ष को एक साल के लिए रामगिरि पर्वत पर रहने का दंड मिलता है। वह आषाढ़ के पहले बादल को दूत बनाकर अलकापुरी में अपनी पत्नी तक संदेश भेजता है।
आज़ादी की लड़ाई के दिनों में बहुत से सेनानी जेल में भी चरखा चलाकर सूत कातते थे। गांधीजी के लिए चरखा स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक था।
घर के लिए तेलुगु में इल्लु, तमिल में वीडु, कन्नड़ में मने, मणिपुरी में युम, कश्मीरी में गॅरु और बांग्ला में बाड़ी शब्द भी चलता है।
Memory tricks
सावन से कहना: ल-प-का-ना — लिख रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ, कातता हूँ, नाम करता हूँ। लपककर नाम कमाओ।
मत कहना: जा-भा-मौ — जागता हूँ, भागता हूँ, मौन हूँ। जो छिपाना है, वह जाभामौ।
Practice MCQs with answers (25)
- A बारिश रुकते ही कवि पूरी तरह ख़ुश हो गया
- B बाहर बारिश रुकी, पर भीतर यादों की झड़ी जारी
- C कवि को ठंड लग गई और वह बीमार हो गया
- D कवि ने तुरंत घर जाने की पूरी तैयारी शुरू कर दी
Show answer
Why:
भीतर की बारिश।
- A कवि को सूरज की रोशनी बिल्कुल भी पसंद नहीं है
- B आकाश में बहुत तेज़ धूप निकल आई है
- C उदासी इतनी घनी है कि ख़ुशी की किरण नहीं आती
- D कवि अब बादलों से डरने लगा है
Show answer
Why:
घना अँधेरा।
- A कवि की हर सोच घूम-फिरकर घर पर लौटती है
- B कवि को आँगन लीपने का काम बहुत आता था
- C जेल में भी एक बड़ा आँगन था जिसे माँ लीपती थीं
- D माँ बादलों पर रहती थीं
Show answer
Why:
घरेलू उपमा।
- A यमक अलंकार
- B श्लेष
- C उत्प्रेक्षा अलंकार
- D मानवीकरण
Show answer
Why:
इंसान जैसा व्यवहार।
- A शांत दुखी मन में छोटी आवाज़ भी दर्द जगाती है
- B पंछी ने कवि को चोंच मारकर सचमुच घायल कर दिया
- C कवि को पंछियों की आवाज़ से चिढ़ है
- D पंछी जेल का पहरेदार था
Show answer
Why:
अकेलापन।
- A पंछी से
- B सावन से
- C पिता से
- D अपने मन से
Show answer
Why:
मन का संबोधन।
- A उसका मन सचमुच काँच का बना हुआ है
- B यादें उसके मन को बार-बार कमज़ोर कर देती हैं
- C उसे किसी बात का कोई दुख नहीं है
- D वह अपने मन को हमेशा के लिए किसी डिब्बे में बंद करना चाहता है
Show answer
Why:
भीतर का संघर्ष।
- A बहुत ज़ोर की हँसी
- B पानी में खिलने वाला फूल
- C आँसुओं में भीगी हुई हँसी
- D बिना कारण का रोना
Show answer
Why:
दुख में मुस्कान।
- A वे बहुत लंबे हैं और जंगल में रहते हैं
- B वे तन से अटल हैं और मन से सबका सहारा
- C वे रोज़ पहाड़ पर चढ़ते और जंगल में पेड़ काटते हैं
- D वे बहुत पुराने और थके हुए हैं
Show answer
Why:
अटल और छायादार।
- A उन्हें बाग़ के पेड़ों से बहुत गहरा और पुराना लगाव है
- B वे जल्दी गुस्सा होकर सब तोड़ देते हैं
- C बरसात में उनके पेड़ों के पत्ते गिरते हैं
- D परिवार की ज़रा-सी चोट पर उनका प्रेम उमड़ पड़ता है
Show answer
Why:
ज़रा-सी चोट पर प्रेम बह निकलना।
- A उन्हें परिवार के हर सदस्य का गहरा ध्यान है
- B उन्हें केवल पेड़ों की गिनती करना पसंद है
- C वे परिवार में केवल घर के बड़ों का ही ध्यान रखते हैं
- D उनके पास बहुत ज़मीन है
Show answer
Why:
बरगद की जड़ें।
- A बादल की गरज और बिजली की चमक
- B फूलों की बरसात और फलों की बरसात
- C बादल का पानी और माता-पिता के आँसू
- D धूप और छाँव
Show answer
Why:
दोहरा अर्थ।
- A सावन ने कवि को जेल से छुड़ा दिया था
- B कवि सावन से बहुत नाराज़ है और उसे ज़ोर से डाँट रहा है
- C सावन कवि का भाई है
- D उसे भरोसेमंद, पवित्र साथी मानकर संदेश सौंपना
Show answer
Why:
संदेशवाहक।
- A घर से दूर होना ही उसका सारा सुख फीका करता है
- B कवि जेल में बहुत ख़ुश है और कभी घर नहीं जाना चाहता
- C कवि को बस से सफ़र करना पसंद है
- D कवि को कोई कमी महसूस नहीं होती
Show answer
Why:
विरस जीवन।
- A जेल के आराम का सच्चा हाल बताकर सबके सामने घमंड करना
- B घरवाले उसकी चिंता में न घुलें, इसलिए दुख ढक लेना
- C घरवालों को भूलकर नई ज़िंदगी में रम जाना
- D बादलों की सुंदरता पर रीझ जाना
Show answer
Why:
मीठा झूठ।
- A कपड़े बेचकर जेल में पैसा कमाना ज़रूरी था
- B अंग्रेज़ सभी क़ैदियों को दिन-भर कातने की सज़ा देते थे
- C चरखे पर सूत कातना गांधीजी के आंदोलन का प्रतीक
- D कातना केवल समय काटने का खेल था
Show answer
Why:
स्वदेशी।
- A ताकि जेल वाले उसे और खाना दें
- B ताकि सब उसे पहलवान कहें
- C ताकि वह अपनी मोटापे की शिकायत करे
- D ताकि घरवाले मानें कि बेटा तंदुरुस्त है
Show answer
Why:
चिंता मिटाना।
- A जेल में जागना और लोगों से मिलना मना था
- B घरवालों को उसके अकेलेपन पर कोई शक न हो
- C कवि को अपनी नींद पर बहुत गर्व था
- D सावन को यह बात मालूम ही नहीं थी
Show answer
Why:
शक न देना।
- A आलसी और डरपोक
- B बेपरवाह और लापरवाह
- C संघर्षशील और हिम्मती
- D घमंडी और रूखा
Show answer
Why:
धैर्य और साहस।
- A अनुप्रास
- B उपमा
- C रूपक
- D मानवीकरण
Show answer
Why:
वर्णों की झंकार।
- A क्षितिज, नवनीत, अश्रु, तृषा
- B छिन, भौजी, फलानी, चुआ
- C जनरल, बाज़ार, अख़बार, फ़ौज
- D हिमालय, गंगा, यमुना, सागर
Show answer
Why:
बोलचाल की बोली।
- A दोनों में नायक जेल में बंद है
- B दोनों एक ही समय में लिखी गईं
- C दोनों में बादल संदेशवाहक बनता है
- D दोनों में युद्ध का वर्णन है
Show answer
Why:
प्रकृति का दूत।
- A मने
- B युम
- C बाड़ी
- D इल्लु
Show answer
Why:
भाषा संगम।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
मीठा झूठ।
- A केवल I और II
- B केवल I और III
- C केवल II और III
- D I, II और III तीनों
Show answer
Why:
कष्ट छिपाने को कहता है।
Important short questions (7)
आकाश में एक जैसे बादल पूरे गगन में फैले हैं। उनमें कोई दरार नहीं, जहाँ से किरणें झाँकें। कवि को वे ऐसे लगते हैं, जैसे माँ ने आँगन लीप दिया हो।
बारिश के बाद चारों ओर गहरी चुप्पी है। ऐसे में पंछी की आवाज़ कवि के दुखी मन को झकझोर देती है। उसे अपने बिछड़े परिवार की याद और तेज़ हो जाती है।
पिता का शरीर पहाड़ की तरह मज़बूत और अटल है। उनका मन बरगद की तरह फैला और छायादार है, जो पूरे परिवार को सहारा देता है। जैसे बरगद की डालें उतनी ही जड़ों से थमी रहती हैं, वैसे ही पिता का प्रेम परिवार को थामता है।
कवि जेल में बंद था और माँ पत्र नहीं लिख सकती थीं। संदेश भेजने का कोई साधन नहीं था। बाहर बरसता सावन ही घर तक जा सकता था, इसलिए कवि ने उसे अपना दूत बना लिया।
कवि कहता है कि घर पर कहना, मैं लिख-पढ़ रहा हूँ। कहना कि मैं काम करता हूँ और नाम कमा रहा हूँ। मैं मस्त हूँ और सूत कातता हूँ। मेरा वज़न सत्तर सेर है और मैं दुख को डटकर ठेलता हूँ।
कवि नहीं चाहता कि सावन उसका रात को जागना बताए। लोगों से भागना और मौन रहना भी वह छिपाना चाहता है। घरवालों को उसकी उदासी का शक हुआ, तो वे और दुखी होंगे।
मानवीकरण: पेड़ आँखें बंद करके, साँस थामे खड़े हैं, या सावन संदेश ले जाता है। उपमा: नवनीत-सा उर, यानी मक्खन जैसा हृदय, या अम्मा ठीक बादल।
Long answer questions (3)
कवि सावन को सजीला और पवित्र कहकर अपना संदेशवाहक बनाता है। वह सबसे पहले विनती करता है कि सावन चाहे जितना बरसे, पर उसके माता-पिता न रोएँ और पाँचवें के लिए न तरसें। फिर वह संदेश देता है कि घर पर कहना कि मैं मस्त हूँ, पढ़-लिख रहा हूँ, सूत कात रहा हूँ, मेरा वज़न सत्तर सेर है और मैं दुख को डटकर ठेलता हूँ। पर यह मत कहना कि मैं रात को जागता हूँ, लोगों से भागता हूँ और चुप रहता हूँ। असल में कवि का मन बहुत दुखी है; घर से दूर होने का एक बस उसके पूरे जीवन को फीका कर रहा है। फिर भी वह यह दुख छिपाता है, ताकि घरवालों को सुख मिले। अपना दर्द ख़ुद ढोकर अपनों को चैन देना ही इस संदेश का प्रेम और त्याग है।
इस कविता में ध्वन्यात्मकता है; झरा-झर, हरा-हर, सर-सर और थर-थर जैसे शब्द बारिश और काँपते मन की आवाज़ सुनाते हैं। इसमें स्मृति-बिंब हैं; व्यायाम करते पिता, धीरज देती माँ और शर्म से चुप भौजी आँखों के सामने आ जाते हैं। लोकभाषा के शब्द, जैसे छिन, फलानी, भौजी, चुआ और हेटे, कविता को अपनापन देते हैं। पानी गिर रहा है और कहना जैसे अंशों का दोहराव भाव को गहरा करता है और लय बनाता है। नवनीत-सा उर में उपमा, पेड़ों के ध्यान लगाने में मानवीकरण और ध्वनि-शब्दों में अनुप्रास है। कवि सावन, हवा और अपने मन को सीधे संबोधित करता है। और पूरी कविता में प्रकृति और भाव साथ चलते हैं; बारिश के साथ दुख बढ़ता है और बारिश थमने पर भी मन भीगा रहता है।
मैं चाँद को अपना दूत चुनूँगा या चुनूँगी, क्योंकि वह हर रात मेरी नानी के गाँव के आँगन में भी उतना ही चमकता है, जितना मेरे शहर की छत पर। नानी अकेली रहती हैं और हम उनसे दूर हैं। मैं चाँद से कहूँगा या कहूँगी कि नानी को बताना, हम सब ठीक हैं, पढ़ाई अच्छी चल रही है, और छुट्टियों में हम ज़रूर आएँगे। उनसे कहना कि वे दवाई समय पर लें और रात को अकेले उदास न हों। कविता में कवि ने सावन को दूत बनाकर अपना दुख छिपाया था। मैं भी नानी से यह नहीं कहूँगा या कहूँगी कि हमें उनकी कितनी याद आती है, ताकि वे परेशान न हों। इस तरह मेरा संदेश भी कवि की तरह प्रेम और चिंता से भरा होगा।
Flashcards (17)
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- शब्द और अर्थ
- सावन से कहना या मत कहना
- सही या भ्रम
- अंतिम हिस्से का क्रम
- झटपट उत्तर
Class 9 Hindi Chapter 12 — frequently asked questions
उनका जन्म सन् 1913 में होशंगाबाद, अब नर्मदापुरम, में हुआ। वे स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए और 1942 में जेल गए। बुनी हुई रस्सी के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। सन् 1985 में उनका देहांत हुआ।
उन्होंने हैदराबाद से निकलने वाली कल्पना पत्रिका का संपादन किया। वे आकाशवाणी के हिंदी कार्यक्रमों से जुड़े रहे। उन्होंने संपूर्ण गांधी वाङ्मय के संपादन में भी काम किया।
सन् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने पर कवि को तीन वर्ष की क़ैद हुई। जेल में सावन की बारिश के बीच उन्हें घर की बहुत याद आई। उसी याद से यह कविता बनी।
वज्र बहुत कठोर होता है और नवनीत ताज़ा मक्खन है। पिता की भुजाएँ वज्र जैसी मज़बूत हैं, पर उनका हृदय मक्खन जैसा कोमल है। यानी वे बाहर से कठोर, पर भीतर से बहुत संवेदनशील हैं।
पिता रोज़ सुबह गीता का पाठ करते हैं। फिर दो सौ साठ दंड लगाते हैं और मुगदर घुमाकर कसरत करते हैं। इससे पता चलता है कि वे मन और शरीर, दोनों से मज़बूत और अनुशासित हैं।
पिता कवि को सोने पर सुहागा, यानी सबसे प्यारा बेटा कहते थे। पर आज वह जेल में बँधा बैठा है और पिता को दुख दे रहा है। जिसके कारण घर चमकता था, वही आज घर के आँसुओं का कारण है।
आकाश में एक जैसे बादल पूरे गगन में फैले हैं। उनमें कोई दरार नहीं, जहाँ से किरणें झाँकें। कवि को वे ऐसे लगते हैं, जैसे माँ ने आँगन लीप दिया हो।
बारिश के बाद चारों ओर गहरी चुप्पी है। ऐसे में पंछी की आवाज़ कवि के दुखी मन को झकझोर देती है। उसे अपने बिछड़े परिवार की याद और तेज़ हो जाती है।
पिता का शरीर पहाड़ की तरह मज़बूत और अटल है। उनका मन बरगद की तरह फैला और छायादार है, जो पूरे परिवार को सहारा देता है। जैसे बरगद की डालें उतनी ही जड़ों से थमी रहती हैं, वैसे ही पिता का प्रेम परिवार को थामता है।
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