Class 6 Hindi Chapter 10: परीक्षा
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- Hindi
दीवान की खोज और वह अनोखा विज्ञापन
देवगढ़ के बूढ़े दीवान पद छोड़ना चाहते हैं, महाराज उन्हीं पर उत्तराधिकारी चुनने का काम डाल देते हैं, और अख़बार में छपा विज्ञापन पूरे देश को हिला देता है।
What you will be able to do
- बता सकेंगे कि सुजानसिंह ने पद छोड़ने की विनती किस कारण की और उन्हें किस बात का डर था।
- महाराज की रखी हुई शर्त और उसके पीछे की सोच को अपने शब्दों में समझा सकेंगे।
- विज्ञापन की शर्तों को गिना सकेंगे और बता सकेंगे कि उनमें अनोखा क्या था।
- उम्मीदवारों के बदले हुए व्यवहार से दिखावे और असल स्वभाव का अंतर पहचान सकेंगे।
Key points
सुजानसिंह देवगढ़ रियासत के दीवान थे और चालीस बरस तक इस पद पर रहे।
उन्होंने बुढ़ापे में पद छोड़ना चाहा, क्योंकि अब राज-काज सँभालने की ताक़त नहीं बची थी।
उनका असली डर यह था कि अंत में हुई कोई भूल पूरे जीवन की नेकनामी मिटा देगी।
महाराज ने विनती मानी, पर शर्त रखी कि नया दीवान वे स्वयं खोजेंगे।
विज्ञापन में डिग्री की शर्त नहीं थी, पर शरीर का मज़बूत होना ज़रूरी बताया गया।
उम्मीदवारों को एक महीने देवगढ़ में रहना था, जहाँ उनका रहन-सहन देखा जाना था।
चुनाव में पढ़ाई से अधिक वज़न कर्तव्य को दिया जाने वाला था।
एक महीने तक हर उम्मीदवार अपने को अच्छा दिखाने में लगा रहा, और सुजानसिंह चुपचाप देखते रहे।
Full explanation
कहानी कहाँ से खुलती है
कहानी की शुरुआत किसी लड़ाई या अनहोनी से नहीं होती। वह एक बूढ़े आदमी के थक जाने से होती है। देवगढ़ रियासत के दीवान सरदार सुजानसिंह अब बूढ़े हो चुके हैं, और उनका मन काम से हटकर परमात्मा की ओर जाने लगा है।
उन्होंने क्या माँगा
वे महाराज के पास जाते हैं और पद छोड़ने की विनती करते हैं। वे बताते हैं कि चालीस बरस उन्होंने यह सेवा की है। अब उम्र ढल चुकी है और राज-काज सँभालने की ताक़त पहले जैसी नहीं रही।
असली डर कुछ और था
ध्यान देने की बात यह है कि वे थकान का रोना नहीं रोते। उनका डर आगे का है। उन्हें लगता है कि कहीं कोई भूल हो गई तो बुढ़ापे में नाम पर दाग लग जाएगा। चालीस बरस में कमाई हुई साख एक ही चूक से मिट सकती है, और यह उन्हें मंज़ूर नहीं।
महाराज क्या चाहते थे
महाराज अपने दीवान को बहुत मानते थे, क्योंकि वे अनुभवी भी थे और नीति के जानकार भी। इसीलिए उन्होंने बहुत समझाया। पर जब दीवान टस से मस न हुए, तो उन्होंने हार मानकर विनती स्वीकार कर ली।
पर एक शर्त के साथ
स्वीकार करते समय उन्होंने एक शर्त जोड़ दी — नया दीवान भी सुजानसिंह को ही खोजना होगा। यह शर्त दंड नहीं थी। इसमें भरोसा छिपा था। राजा जानते थे कि आदमी को परखने की जो नज़र इस बूढ़े के पास है, वह किसी और के पास नहीं।
अगले दिन अख़बार में
दूसरे ही दिन देश के बड़े अख़बारों में सूचना छप गई कि देवगढ़ को एक योग्य दीवान चाहिए। जो अपने को इस काम लायक समझे, वह सुजानसिंह के पास पहुँच जाए। इतनी बड़ी जगह के लिए इतना खुला बुलावा अपने आप में अनोखा था।
शर्तें उलटी-सी लगीं
विज्ञापन की शर्तें पढ़कर किसी को भी अचरज होता। पहली बात यह कि डिग्री होना ज़रूरी नहीं था। दूसरी बात इससे भी अजीब थी — शरीर का मज़बूत होना ज़रूरी बताया गया। यहाँ तक लिखा गया कि कमज़ोर पाचन वाले लोग आने का कष्ट न करें।
एक महीने की निगरानी
तीसरी शर्त सबसे भारी थी। उम्मीदवारों को एक महीना देवगढ़ में रहना था। इस बीच उनका रहन-सहन और उनका आचार-विचार देखा जाना था। यानी कोई एक दिन का इम्तिहान नहीं, बल्कि पूरे तीस दिन की देखभाल।
किस बात का वज़न ज़्यादा
अंत में साफ़ लिख दिया गया कि पढ़ाई का विचार कम होगा और कर्तव्य का अधिक। यही वाक्य पूरी कहानी की कुंजी है। जो इस कसौटी पर खरा उतरेगा, वही ऊँचे पद पर बैठेगा।
पूरे देश में हलचल
इस सूचना ने सारे मुल्क में हलचल मचा दी। लोगों को लगा कि इतना ऊँचा पद है और कोई बंधन भी नहीं। बस किस्मत का खेल है। सैकड़ों लोग अपना भाग्य आज़माने निकल पड़े।
देवगढ़ का नज़ारा
अब देवगढ़ की सूरत ही बदल गई। हर रेलगाड़ी से उम्मीदवारों का मेला-सा उतरता। कोई पंजाब से आ रहा था, कोई मद्रास से। किसी को नया फ़ैशन प्यारा था, किसी को पुरानी सादगी। रंगीन पगड़ियाँ, चोगे और तरह-तरह के अंगरखे शहर में अपनी चमक दिखाने लगे।
सनदवाले सबसे ज़्यादा
भीड़ में सबसे बड़ी संख्या डिग्रीवालों की थी। यह बात मज़ेदार है, क्योंकि डिग्री की शर्त तो थी ही नहीं। लेखक इसका कारण भी बता देता है — कागज़ हाथ में हो तो कमी ढकी रहती है। यानी लोग अपनी कमज़ोरी छिपाने के लिए सनद साथ लाए थे।
सबने अपना रूप बदल लिया
सुजानसिंह ने सब मेहमानों के ठहरने का अच्छा प्रबंध किया। और उसी दिन से एक अजीब खेल शुरू हो गया। हर आदमी अपनी अक़्ल भर कोशिश करने लगा कि वह अच्छा दिखाई दे।
तीन नमूने
लेखक तीन उदाहरण गिनाता है। एक सज्जन दिन के नौ बजे तक सोते थे, अब वे सवेरे बग़ीचे में टहलते मिलते। कुछ लोग घर पर नौकरों को डाँटते रहते थे, अब वे उन्हीं से ‘आप’ और ‘जनाब’ कहकर बात करने लगे। एक महाशय को किताब से चिढ़ थी, अब वे मोटे ग्रंथों में डूबे रहते।
उनकी सोच क्या थी
इन लोगों का हिसाब सीधा था। एक महीने की ही तो झंझट है, किसी तरह काट लो। काम बन गया तो बाद में कौन पूछता है। यानी उन्होंने बदलना नहीं चाहा, केवल एक महीने के लिए बदला हुआ दिखना चाहा।
पर देखने वाला बैठा था
यहाँ लेखक एक सुंदर बात कहता है। आदमियों का वह बूढ़ा पारखी आड़ में बैठा चुपचाप देख रहा था कि इन बगुलों के बीच हंस कहाँ छिपा है। यानी परीक्षा शुरू हो चुकी थी, पर किसी उम्मीदवार को पता ही नहीं था।
Concepts and terms
पुराने समय की एक छोटी राजसी इकाई, जिसका अपना राजा और अपना कामकाज होता था। कहानी की रियासत देवगढ़ है, और उसका सारा दैनिक प्रबंध दीवान के हाथ में रहता था।
रियासत का सबसे बड़ा अधिकारी, जो हिसाब, न्याय और रोज़ का प्रबंध देखता था। राजा के बाद सबसे भारी ज़िम्मेदारी इसी पद पर होती थी, इसीलिए इसके लिए योग्य आदमी ढूँढ़ना आसान नहीं था।
लंबे समय तक ईमानदारी से काम करके कमाया गया अच्छा नाम। सुजानसिंह को डर था कि अंत में हुई एक चूक चालीस बरस की इस कमाई पर पानी फेर देगी।
पढ़ाई पूरी होने पर मिलने वाला प्रमाण-पत्र, यानी डिग्री। विज्ञापन में इसकी शर्त न होने पर भी सबसे ज़्यादा भीड़ सनदवालों की ही जुटी, क्योंकि कागज़ हाथ में हो तो कमज़ोरी ढकी रहती है।
सावधान!
भ्रम और सच
Case Study
Scenario:
कक्षा में प्रश्न उठा कि वह विज्ञापन इतना अनोखा क्यों था। उसमें पद के लिए कोई उपाधि नहीं माँगी गई थी। मीरा ने कहा कि यही बात सबको हैरान कर गई। रोहित ने पूछा कि फिर चुना किस आधार पर जाएगा। अध्यापिका ने कक्षा से एक काम कराया। हर बच्चे ने कक्षा-नायक चुनने के लिए तीन शर्तें लिखीं। अधिकतर ने अंक और पद लिखे। कुछ ने ईमानदारी और मदद करने की आदत लिखी। फिर उन्होंने पूछा कि इनमें किन शर्तों की परीक्षा कागज़ पर हो सकती है। यहीं से कहानी की असली परीक्षा समझ में आई।
Analysis:
जो गुण चाहिए थे, उनकी परीक्षा कागज़ पर होती ही नहीं। इसीलिए विज्ञापन ने उपाधि नहीं माँगी और परीक्षा बिना बताए ली गई।
Activity:
अपनी कक्षा के नायक के लिए तीन शर्तें लिखो। बताओ कि उनमें से किसकी परीक्षा कागज़ पर हो सकती है।
करके देखिए
Safety:
कैंची या किसी नुकीली चीज़ की ज़रूरत नहीं है; कागज़ हाथ से ही मोड़िए।
What You Notice:
आप देखेंगे कि जिन शर्तों को एक दिन निभाना आसान है, उन्हीं को महीने भर निभाना कठिन हो जाता है।
Title:
करके देखिए
Did you know
कहानी में उम्मीदवार पंजाब से भी आए और मद्रास से भी, यानी देश के दोनों छोरों से — उस ज़माने में यह यात्रा कई दिन की होती थी।
विज्ञापन में साफ़ लिखा था कि कमज़ोर पाचन वाले लोग यहाँ तक आने का कष्ट न करें, जिससे पहले ही पता चल जाता है कि परीक्षा में शरीर का काम पड़ेगा।
पूरी कहानी में परीक्षा शब्द एक बार भी किसी कागज़ या सवाल-जवाब के लिए नहीं आता, फिर भी कहानी का नाम यही है।
Memory tricks
विज्ञापन की तीन शर्तें — तन – समय – काम — तन यानी शरीर मज़बूत हो, समय यानी एक महीना यहीं बिताना होगा, और काम यानी कर्तव्य को पढ़ाई से ऊपर रखा जाएगा।
सुजानसिंह का डर — चालीस बरस, एक चूक — चालीस बरस की कमाई हुई साख को अंत की एक भूल मिटा सकती है — यही सोचकर उन्होंने पद छोड़ना चाहा।
Practice MCQs with answers (20)
- A सरदार सुजानसिंह के पास
- B पंडित जानकीनाथ के पास
- C रियासत के किसी युवा अधिकारी के पास
- D महाराज के छोटे भाई के पास
Show answer
Why:
कहानी की शुरुआत में वही दीवान हैं।
- A उन्हें और अधिक अधिकार दिए जाएँ
- B उन्हें पद से मुक्त कर दिया जाए
- C उनका वेतन बढ़ाकर दुगुना किया जाए
- D उनके बेटे को यही पद सौंप दिया जाए
Show answer
Why:
वे बुढ़ापे में पद छोड़ना चाहते थे।
- A लगभग बीस बरस की सेवा का
- B लगभग तीस बरस की सेवा का
- C चालीस बरस की सेवा का
- D पूरे पचास बरस की सेवा का
Show answer
Why:
चालीस बरस की सेवा उन्होंने गिनाई।
- A महाराज उनसे नाराज़ हो जाएँगे
- B रियासत का खज़ाना खाली हो जाएगा
- C उम्र के कारण उन्हें यात्रा में बहुत बड़ा कष्ट होगा
- D अंत की कोई भूल जीवन भर का नाम मिटा देगी
Show answer
Why:
नेकनामी मिटने का डर ही असली कारण था।
- A वे उनके अनुभव और नीति-कौशल का बड़ा आदर करते थे
- B उन्हें दीवान की ईमानदारी पर संदेह हो गया था
- C रियासत के नियम में ऐसी छूट का कोई प्रावधान न था
- D वे चाहते थे कि दीवान पहले खज़ाने का हिसाब दें
Show answer
Why:
इसीलिए उन्होंने बहुत समझाया।
- A दीवान अगले दो बरस और काम करते रहेंगे
- B नया दीवान दीवान साहब को स्वयं खोजना होगा
- C नया दीवान रियासत के भीतर से ही लिया जाएगा
- D नया दीवान चुनने का काम दरबारियों को सौंपा जाएगा
Show answer
Why:
उत्तराधिकारी खोजने का काम उन्हीं पर आया।
- A राजा उन्हें पद छोड़ने की सज़ा देना चाहते थे
- B राजा के पास इस काम के लिए बिल्कुल समय नहीं था
- C आदमी परखने की जो नज़र उनके पास थी, वह किसी और के पास न थी
- D रियासत के पुराने नियम में यह काम दीवान का ही बताया गया था
Show answer
Why:
शर्त में भरोसा छिपा था, दंड नहीं।
- A केवल देवगढ़ की दीवारों पर
- B पड़ोस की रियासतों को भेजे पत्रों में
- C दरबार के बाहर लगे सूचना-पट पर
- D देश के प्रसिद्ध अख़बारों में
Show answer
Why:
इसी कारण ख़बर पूरे देश में फैली।
- A डिग्री होना ज़रूरी नहीं है
- B डिग्री के बिना आवेदन नहीं होगा
- C केवल क़ानून की डिग्री मानी जाएगी
- D डिग्री के साथ अनुभव भी देना होगा
Show answer
Why:
शर्त सनद की नहीं रखी गई थी।
- A उम्मीदवार की लंबाई एक तय सीमा से अधिक हो
- B उम्मीदवार का हृष्ट-पुष्ट होना आवश्यक है
- C उम्मीदवार को घुड़सवारी और तैरना दोनों आते हों
- D उम्मीदवार की आयु तीस बरस से कम होनी चाहिए
Show answer
Why:
कमज़ोर पाचन वालों को आने से मना ही कर दिया गया था।
- A केवल चुनाव वाले दिन
- B पूरे तीन महीने
- C एक महीने तक
- D जब तक राजा चाहें
Show answer
Why:
एक महीने का समय विज्ञापन में ही तय था।
- A उनके हिसाब-किताब और लिखावट पर
- B उनकी पढ़ाई और परीक्षा के अंकों पर
- C उनके परिवार और पुराने पद पर
- D उनके रहन-सहन और आचार-विचार पर
Show answer
Why:
रोज़ का व्यवहार ही देखा जाना था।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C केवल I और III
- D I, II और III
Show answer
Why:
I और III सही हैं। II उल्टा है: सूचना में कर्तव्य को अधिक और विद्या को कम तौलने की बात कही गई थी।
- A लोगों ने इसे मज़ाक समझकर छोड़ दिया
- B केवल आसपास के कुछ लोग ही पहुँचे
- C सारे मुल्क में हलचल मच गई
- D अख़बारों ने इसकी आलोचना शुरू कर दी
Show answer
Why:
सैकड़ों लोग भाग्य आज़माने निकल पड़े।
- A गुजरात और बंगाल से
- B काश्मीर और असम से
- C उड़ीसा और मालवा से
- D पंजाब और मद्रास से
Show answer
Why:
देश के दोनों छोरों से लोग पहुँचे।
- A हाथ में प्रमाण-पत्र हो तो कमज़ोरी ढकी रहती है
- B उन्हें रियासत की ओर से विशेष बुलावा भेजा गया था
- C बाकी लोगों को विज्ञापन की ख़बर मिली ही नहीं थी
- D उनके लिए यात्रा का खर्च रियासत उठाने वाली थी
Show answer
Why:
सनद परदे का काम करती है, यह लेखक ने स्वयं बताया।
- A दरबार में देर तक बैठे रहते थे
- B सवेरे बग़ीचे में टहलते हुए
- C रातभर ग्रंथ पढ़ते हुए
- D नौकरों से हिसाब लिखवाते हुए
Show answer
Why:
आदत नहीं बदली थी, केवल दिखावा बदला था।
- A पहले से भी अधिक कड़ी आवाज़ में
- B ‘आप’ और ‘जनाब’ कहकर
- C बिल्कुल चुप रहकर, इशारों में
- D केवल लिखित आदेश भेजकर
Show answer
Why:
यह भी एक महीने का ओढ़ा हुआ रूप था।
- A वे सचमुच अपना स्वभाव सुधार लेना चाहते थे
- B वे रियासत की सेवा करने के लिए उतावले थे
- C वे दीवान साहब के पास रहकर काम सीखना चाहते थे
- D वे एक महीना काट लेना चाहते थे, बदलना नहीं
Show answer
Why:
उनका हिसाब था कि काम बन गया तो बाद में कौन पूछेगा।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
दोनों सही हैं, और कारण ही उनकी परीक्षा का ढंग बताता है। कोई लिखित प्रश्न नहीं पूछा गया, केवल आचरण देखा गया।
Important short questions (6)
उम्र ढल चुकी थी और राज-काज सँभालने की ताक़त नहीं बची थी। साथ ही उन्हें डर था कि अंत में हुई कोई भूल उनके चालीस बरस के अच्छे नाम पर दाग लगा देगी।
उन्होंने पहले बहुत समझाया, क्योंकि वे अपने अनुभवी और नीति-कुशल दीवान का बड़ा आदर करते थे। जब दीवान नहीं माने, तब हारकर उन्होंने विनती स्वीकार की।
पहली यह कि इतने ऊँचे पद के लिए डिग्री ज़रूरी नहीं मानी गई। दूसरी यह कि शरीर का मज़बूत होना ज़रूरी बताया गया, जो दफ़्तर के काम से जुड़ी शर्त नहीं लगती।
एक दिन में कोई भी अच्छा बन सकता है, पर तीस दिन तक ओढ़ा हुआ रूप निभाना कठिन है। इतने समय में असली स्वभाव कहीं न कहीं झलक ही जाता है।
लोग मानते थे कि हाथ में प्रमाण-पत्र हो तो कमज़ोरी ढकी रहती है। इसलिए बंधन न होने पर भी वे अपनी डिग्री साथ ले आए।
देर तक सोने वाले सवेरे टहलने लगे। नौकरों को डाँटने वाले उन्हें ‘आप’ कहकर बुलाने लगे। किताब से चिढ़ने वाले मोटे ग्रंथ खोलकर बैठ गए।
Long answer questions (3)
कहानी की शुरुआत में देवगढ़ के दीवान सुजानसिंह बूढ़े हो चुके हैं। वे महाराज के पास जाकर पद छोड़ने की विनती करते हैं और चालीस बरस की सेवा का हवाला देते हैं। महाराज उन्हें बहुत समझाते हैं, पर वे नहीं मानते। तब महाराज एक शर्त के साथ उनकी बात मान लेते हैं कि नया दीवान वे स्वयं खोजें। अगले ही दिन देश के बड़े अख़बारों में सूचना छपती है। उसमें डिग्री की शर्त नहीं है, पर शरीर का मज़बूत होना ज़रूरी बताया गया है। साथ ही एक महीने तक देवगढ़ में रहकर परखे जाने की बात भी लिखी है। इस सूचना से पूरे देश में हलचल मच जाती है और सैकड़ों लोग देवगढ़ पहुँच जाते हैं।
शर्तें देखने में अजीब लगती हैं, पर उनके पीछे एक साफ़ सोच है। डिग्री को ज़रूरी न मानकर उन्होंने बता दिया कि कागज़ से आदमी की परख नहीं होती। शरीर की मज़बूती माँगकर उन्होंने संकेत दिया कि यहाँ बैठकर हुक्म चलाने का नहीं, बल्कि आगे बढ़कर काम करने का अवसर आएगा। एक महीने की अवधि रखकर उन्होंने सबसे बड़ी चाल चली, क्योंकि इतने दिन तक ओढ़ा हुआ रूप निभाना किसी के बस की बात नहीं। और अंत में यह लिखकर कि विद्या से बड़ा वज़न कर्तव्य का होगा, उन्होंने अपनी पूरी कसौटी पहले ही खोल दी। फिर भी किसी उम्मीदवार ने उसे पढ़कर समझा नहीं।
उस एक महीने में हर उम्मीदवार अपनी अक़्ल भर कोशिश करता रहा कि वह अच्छा दिखाई दे। देर तक सोने वाले सवेरे बग़ीचे में टहलने लगे। नौकरों पर रोब जमाने वाले उन्हीं से आदर के साथ बात करने लगे। किताब से चिढ़ने वाले मोटे ग्रंथों में डूबे रहने लगे। पर ध्यान देने की बात यह है कि इनमें से किसी ने अपनी आदत बदली नहीं थी। उन्होंने केवल एक महीने के लिए एक और चेहरा ओढ़ लिया था। उनका हिसाब भी यही था कि तीस दिन जैसे-तैसे कट जाएँ, आगे कौन पूछता है। यहीं से समझ आता है कि अच्छा दिखना और अच्छा होना दो अलग बातें हैं।
Flashcards (15)
Play this topic
- पात्र और उनकी पहचान
- विनती से भीड़ तक
- विज्ञापन की शर्त या सिर्फ़ अफ़वाह?
- सच या भ्रम
- झटपट उत्तर
नाले पर हुई असली परीक्षा
हॉकी के खेल के बाद अँधेरे में एक किसान की गाड़ी कीचड़ में फँस जाती है, बाकी खिलाड़ी आगे बढ़ जाते हैं, और चोट खाया एक युवक कोट उतारकर पहिया ढकेलने लगता है।
What you will be able to do
- हॉकी के खेल वाले प्रसंग को क्रम से सुना सकेंगे और बता सकेंगे कि वह देवगढ़ में नई बात क्यों थी।
- किसान की कठिनाई और उसके पीछे के कारण अपने शब्दों में बता सकेंगे।
- खिलाड़ियों और उस एक युवक के व्यवहार की तुलना करके अंतर बता सकेंगे।
- किसान ने चलते-चलते जो कहावत कही, उसका अर्थ प्रसंग के साथ जोड़ सकेंगे।
Key points
नए फ़ैशनवालों के सुझाव पर उम्मीदवारों के बीच हॉकी का खेल तय हुआ।
देवगढ़ में दौड़-कूद के खेल बच्चों के खेल माने जाते थे, इसलिए यह दृश्य वहाँ नया था।
खेल संध्या तक चलता रहा, पर हार-जीत का फ़ैसला नहीं हो सका।
मैदान से कुछ दूर एक नाला था, जिस पर कोई पुल नहीं बना था।
अनाज से लदी गाड़ी लेकर आया किसान कीचड़ और ऊँची चढ़ाई के कारण फँस गया।
डंडे लिए लौटते खिलाड़ियों ने उसे देखा, पर किसी ने मदद का हाथ नहीं बढ़ाया।
एक युवक, जिसके पैर में उसी दिन चोट लगी थी, कोट उतारकर पहिया ढकेलने लगा।
गाड़ी निकलने पर किसान ने कहा कि दीवानी उसी को मिलेगी, और एक कहावत कहकर चल दिया।
Full explanation
खेल का प्रस्ताव
दिन कट नहीं रहे थे, इसलिए एक दिन नए फ़ैशनवालों के मन में आया कि आपस में हॉकी हो जाए। यह प्रस्ताव उन्हीं लोगों ने रखा जो खेल के मँजे हुए खिलाड़ी थे। उनका सोचना था कि खेल भी तो एक हुनर है, फिर इसे छिपाकर क्यों रखा जाए।
उनकी असली उम्मीद
उनके मन में एक और बात थी। शायद हाथ की यही सफ़ाई काम कर जाए और चुनाव में उनका नाम ऊपर आ जाए। यानी खेल भी उनके लिए दिखाने की एक और चीज़ था।
देवगढ़ के लिए नई बात
रियासत में यह दृश्य बिल्कुल निराला था। वहाँ पढ़े-लिखे भले लोग शतरंज और ताश जैसे ठहरे हुए खेल खेलते थे। दौड़ने-कूदने वाले खेल बच्चों के खेल समझे जाते थे, इसलिए मैदान का यह शोर सबको नया लगा।
खेल का दृश्य
खेल बड़े जोश से चला। जब एक ओर के खिलाड़ी गेंद लेकर तेज़ी से बढ़ते तो लगता कोई लहर चली आ रही है। दूसरी ओर के खिलाड़ी उस लहर को ऐसे रोक लेते मानो सामने लोहे की दीवार खड़ी हो।
शाम तक कोई नतीजा नहीं
यही धूमधाम संध्या तक चलती रही। लोग पसीने से भीग गए और हाँफते-हाँफते बेदम हो गए। फिर भी हार-जीत का फ़ैसला नहीं हो सका, और अँधेरा उतर आया।
मैदान के पास वाला नाला
मैदान से कुछ हटकर एक नाला बहता था। उस पर कोई पुल नहीं बना था, इसलिए आने-जाने वालों को उसी के भीतर से होकर निकलना पड़ता था। दिन में यह मुश्किल कम होती, पर अँधेरे में बात और भारी हो जाती।
किसान की गाड़ी फँसी
खेल अभी-अभी रुका था और खिलाड़ी बैठे साँस ले रहे थे। तभी उसी नाले में एक किसान अनाज से लदी गाड़ी लेकर आ पहुँचा। नाले में कीचड़ भरा था और उसकी चढ़ाई ऊँची थी। गाड़ी ऊपर चढ़ ही नहीं पा रही थी।
उसने क्या-क्या किया
वह कभी बैलों को ललकारता और कभी अपने हाथ से पहियों को धक्का देता। पर बोझ भारी था और बैल कमज़ोर। गाड़ी कुछ दूर चढ़ती और फिर खिसककर नीचे आ जाती। वह झुँझलाकर बैलों को मारता, पर बात नहीं बनती।
वह अकेला क्यों था
उसने चारों ओर निराश होकर देखा, पर कोई मदद करने वाला नहीं दिखा। गाड़ी को अकेला छोड़कर वह कहीं जा भी नहीं सकता था, क्योंकि उस पर अनाज लदा था। यही उसकी सबसे बड़ी लाचारी थी।
खिलाड़ी उधर से निकले
इसी बीच खिलाड़ी हाथ में डंडे लिए घूमते हुए उधर से निकले। किसान ने डरी हुई आँखों से उनकी ओर देखा, पर मदद माँगने की हिम्मत नहीं जुटा सका।
उन्होंने देखा, पर देखा नहीं
खिलाड़ियों ने भी उसे देखा, मगर ऐसी आँखों से जिनमें उसके लिए कुछ था ही नहीं। लेखक साफ़ कहता है कि उनमें स्वार्थ था, घमंड था, पर उदारता और वात्सल्य का नाम भी नहीं था। यही पंक्ति पूरे दृश्य का फ़ैसला सुना देती है।
भीड़ में एक अलग आदमी
पर उसी समूह में एक ऐसा आदमी भी था जिसके मन में दया थी और साहस भी। उसी दिन हॉकी खेलते हुए उसके पैर में चोट लग गई थी, इसलिए वह लँगड़ाता हुआ धीरे-धीरे चल रहा था।
उसने कैसे शुरू किया
अचानक उसकी नज़र गाड़ी पर पड़ी और वह ठिठक गया। किसान का चेहरा देखते ही उसे सारी बात समझ आ गई। उसने डंडा एक किनारे रखा, कोट उतार दिया और पास जाकर बस इतना पूछा कि गाड़ी निकाल दूँ?
दोनों ने मिलकर ज़ोर लगाया
किसान को उसने गाड़ी पर बिठाकर बैल सँभालने को कहा और खुद पहिया ढकेलने लगा। कीचड़ इतना था कि वह घुटनों तक धँस गया, फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने दोबारा ज़ोर लगाया, किसान ने बैलों को ललकारा, और गाड़ी नाले के ऊपर आ गई।
किसान का आशीर्वाद
किसान हाथ जोड़कर सामने खड़ा हो गया और बोला कि आज आपने बचा लिया, वरना उसे सारी रात वहीं बैठना पड़ता। युवक ने हँसकर पूछा कि अब कुछ इनाम भी दोगे। किसान ने गंभीर होकर कहा कि भगवान चाहेंगे तो दीवानी आपको ही मिलेगी।
एक संदेह और एक कहावत
यह सुनकर युवक ने उसे ध्यान से देखा। मन में शक हुआ कि कहीं यह सुजानसिंह तो नहीं — आवाज़ भी मिलती है और चेहरा भी। किसान शायद उसका शक भाँप गया। वह मुस्कराकर बोला, “गहरे पानी में पैठने से ही मोती मिलता है।” इसका अर्थ यही है कि जो जोखिम उठाकर भीतर उतरता है, पाता भी वही है।
Concepts and terms
पानी बहने का एक छोटा रास्ता, जो बरसात में कीचड़ भर देता है। मैदान के पास वाले नाले पर कोई पुल नहीं था, इसलिए राहगीरों को उसी के भीतर से होकर निकलना पड़ता था।
दूसरे की तकलीफ़ को अपने मन पर लेना। खिलाड़ियों ने किसान को देखा ज़रूर, पर उनकी आँखों में यह भाव नहीं था, इसीलिए देखकर भी वे आगे निकल गए।
छोटे या कमज़ोर के प्रति उमड़ने वाला स्नेह, जैसा बड़े अपने से छोटों पर रखते हैं। लेखक कहता है कि उस भीड़ में यह भाव था ही नहीं, केवल स्वार्थ और घमंड था।
थोड़े शब्दों का ऐसा जमा-जमाया वाक्य, जिससे बात अधिक असरदार हो जाती है। किसान ने चलते-चलते जो पंक्ति कही, वह ऐसी ही एक कहावत है।
सावधान!
भ्रम और सच
असल जीवन: बस्ता और बारिश
Scenario:
कक्षा छह की छुट्टी के समय तेज़ बारिश आ गई। स्कूल के गेट के पास सड़क पर पानी भर गया था। एक छोटी बच्ची का बस्ता खुल गया और उसकी कॉपियाँ पानी में बिखर गईं। वह रोने लगी। गेट पर खड़े बहुत-से बच्चों ने यह देखा। कुछ ने रुककर देखा और फिर अपनी छतरी सँभालकर आगे बढ़ गए। दो लड़के, जिनके पास छतरी थी ही नहीं और जो पहले से भीग चुके थे, पानी में बैठकर कॉपियाँ उठाने लगे।
Analysis:
शिक्षिका ने अगले दिन कक्षा में यही घटना रखी और पूछा कि आगे बढ़ जाने वालों ने बुरा क्या किया। बच्चों ने पहले कहा कि उन्होंने कुछ बुरा नहीं किया, वे बस अपने रास्ते गए। फिर एक बच्चे ने कहा कि उनके पास छतरी थी, यानी मदद करना उनके लिए आसान था। जिन दो लड़कों ने मदद की, उनके पास बचाने को कुछ था ही नहीं। तब कक्षा को पाठ वाली बात दिखाई दी। नाले पर भी सबने देखा था, पर रुका वही जिसके पैर में चोट थी। यहाँ भी रुके वही जो पहले से भीग चुके थे।
Activity:
अपनी लेखन-पुस्तिका में ऐसी दो घटनाएँ लिखिए जो आपने अपने आसपास देखी हों, जहाँ किसी ने बिना कहे मदद की हो। हर घटना के आगे यह भी लिखिए कि उस समय मदद करने वाले के पास अपनी कौन-सी कठिनाई थी।
करके देखिए
Safety:
यह काम केवल लिखने का है; कहीं कीचड़ या पानी में उतरने की ज़रूरत नहीं।
What You Notice:
आप देखेंगे कि गाड़ी अटकाने वाले कारण चार थे, पर उन्हें दूर करने के लिए एक ही चीज़ चाहिए थी — किसी का साथ।
Title:
करके देखिए
Did you know
उस समय देवगढ़ में शतरंज और ताश को गंभीर खेल माना जाता था, इसलिए मैदान में दौड़ता-भागता खेल देखना लोगों के लिए बिल्कुल नई बात थी।
गाड़ी बार-बार कुछ दूर चढ़कर फिर नीचे खिसक जाती थी, इसीलिए किसान अकेले कितना भी ज़ोर लगाता, बात नहीं बनती थी।
युवक ने मदद करने से पहले किसान से पूछा नहीं कि तुम कौन हो — उसने केवल इतना कहा कि गाड़ी निकाल दूँ?
Memory tricks
युवक के तीन काम — रुका – उतारा – ढकेला — पहले वह ठिठककर रुका, फिर डंडा और कोट एक ओर रखे, और फिर कीचड़ में उतरकर पहिया ढकेला।
किसान के फँसने के दो कारण — कीचड़ और चढ़ाई — नाले में कीचड़ भरा था और उसकी चढ़ाई ऊँची थी, ऊपर से बोझ भारी और बैल कमज़ोर।
Practice MCQs with answers (20)
- A नए फ़ैशन के प्रेमी उम्मीदवारों ने
- B रियासत के पुराने कर्मचारियों ने
- C देवगढ़ के आसपास रहने वाले किसानों ने
- D दीवान साहब के साथ आए नौकरों ने
Show answer
Why:
वे स्वयं मँजे हुए खिलाड़ी थे।
- A उन्हें खेल के लिए अलग से इनाम मिलेगा
- B हाथ की सफ़ाई देखकर उनका नाम ऊपर आ जाएगा
- C खेल के बहाने वे रियासत घूम सकेंगे
- D इससे बाकी सब उम्मीदवार थककर अपने घर लौट जाएँगे
Show answer
Why:
उनके लिए खेल भी दिखाने की एक चीज़ था।
- A कुश्ती और कबड्डी जैसे खेल
- B घुड़सवारी और तीरंदाज़ी जैसे खेल
- C शतरंज और ताश जैसे खेल
- D हॉकी और फुटबॉल जैसे खेल
Show answer
Why:
दौड़-कूद के खेल वहाँ बच्चों के खेल समझे जाते थे।
- A एक पक्ष बड़े अंतर से जीत गया
- B बारिश आने से खेल बीच में रोकना पड़ा
- C खिलाड़ियों के झगड़े से खेल टूट गया
- D संध्या तक चलकर भी फ़ैसला नहीं हो सका
Show answer
Why:
दोनों ओर के खिलाड़ी बराबर टक्कर के थे।
- A उस पर कोई पुल नहीं था
- B उसमें बहुत तेज़ धारा बहती थी
- C उसके किनारे घना जंगल था
- D उसमें पानी बिल्कुल सूख चुका था
Show answer
Why:
इसीलिए राहगीरों को उसी के भीतर से निकलना पड़ता था।
- A गन्ने के भारी गट्ठर
- B अनाज
- C मिट्टी के बरतन और घड़े
- D बाज़ार से लाया हुआ सामान
Show answer
Why:
बोझ भारी होने से ही गाड़ी नहीं चढ़ रही थी।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C केवल I और III
- D I, II और III
Show answer
Why:
I और III सही हैं। II सही नहीं है: गाड़ी पर अनाज लदा था, और इसी से किसान उसे छोड़कर मदद ढूँढ़ने भी नहीं जा सकता था।
- A एक ओर को झुककर रुक जाती थी
- B पहिया टूटने के कारण अटक जाती थी
- C बैलों के बैठ जाने से रुक जाती थी
- D कुछ दूर चढ़कर फिर नीचे खिसक आती थी
Show answer
Why:
इसी से किसान की मेहनत बेकार जाती रही।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
दोनों सही हैं, और कारण ही उसकी असहायता पूरी कर देता है। वह न गाड़ी निकाल सकता था और न उसे छोड़ सकता था।
- A गुस्से से भरी हुई आँखों से
- B सहमी हुई आँखों से
- C बिल्कुल बेपरवाह होकर
- D हाथ हिलाकर बुलाते हुए
Show answer
Why:
मदद माँगने का साहस उसे नहीं हुआ।
- A उनमें थकान के कारण नींद भरी थी
- B उनमें किसान के लिए गहरी दया थी
- C उनमें स्वार्थ और घमंड था, उदारता नहीं
- D उनमें खेल हार जाने का दुख झलक रहा था
Show answer
Why:
वात्सल्य का नाम भी वहाँ नहीं था।
- A वह सबसे आगे दौड़ता हुआ आ रहा था
- B वह गाड़ी पर सवार होकर निकला था
- C वह उस खेल में भाग ही नहीं ले पाया था, बैठा रहा
- D उसके पैर में चोट थी और वह लँगड़ाकर चल रहा था
Show answer
Why:
सबसे कम ताक़त उसी के पास बची थी।
- A ठिठककर रुक गया और बात समझ गया
- B साथियों को पुकारकर बुलाने लगा
- C किसान से उसका नाम और गाँव पूछा
- D बैलों की रस्सी अपने हाथ में ले ली
Show answer
Why:
किसान का चेहरा देखते ही उसे सब समझ आ गया।
- A अपनी पगड़ी और जूते
- B अपना डंडा और कोट
- C गाड़ी पर लदी कुछ बोरियाँ
- D बैलों के गले की घंटियाँ
Show answer
Why:
इससे पता चलता है कि वह काम करने के लिए तैयार था।
- A दोनों मिलकर पहिया ढकेलते रहे
- B किसान ने रास्ता दिखाया, युवक ने गाड़ी हाँकी
- C किसान ने बैल सँभाले और युवक ने पहिया ढकेला
- D युवक ने बैल हाँके और किसान पीछे धक्का देता रहा
Show answer
Why:
दोनों के ज़ोर एक साथ लगे, तभी गाड़ी ऊपर आई।
- A केवल टखनों तक
- B आधी कमर तक
- C एड़ी भर भी नहीं
- D घुटनों तक
Show answer
Why:
फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी।
- A कि आज आपने बचा लिया, वरना सारी रात यहीं बैठना पड़ता
- B कि अब वह इसी रास्ते से कभी नहीं निकलेगा
- C कि उसे पहले ही किसी ने इस रास्ते के बारे में चेता रखा था, सो वह सँभला
- D कि वह अगले दिन इनाम लेकर आएगा
Show answer
Why:
वह हाथ जोड़कर सामने खड़ा हो गया था।
- A कि उसके पास देने को कुछ भी नहीं है
- B कि भगवान चाहेंगे तो दीवानी आपको ही मिलेगी
- C कि वह अनाज में से कुछ बोरियाँ दे देगा
- D कि किसी से इनाम माँगना अच्छी बात नहीं होती
Show answer
Why:
इसी उत्तर से युवक के मन में शक जागा।
- A कि किसान उससे कुछ छिपा रहा है
- B कि गाड़ी में अनाज नहीं, कुछ और है
- C कि यह किसान कहीं सुजानसिंह तो नहीं
- D कि किसान उसे रास्ता भटका रहा है
Show answer
Why:
आवाज़ और चेहरा दोनों मिलते लगे।
- A गहरे पानी में उतरना तो हमेशा ही बहुत ख़तरनाक होता है
- B मोती केवल समुद्र के भीतर ही पाए जाते हैं
- C तैरना सीखे बिना कोई काम पूरा नहीं होता
- D जो जोखिम उठाकर मेहनत करता है, पाता भी वही है
Show answer
Why:
किसान इसी कहावत से अपनी बात कहकर चल दिया।
Important short questions (6)
उन्हें लगा कि खेल भी एक हुनर है और इसे छिपाने से क्या लाभ। भीतर यह उम्मीद भी थी कि हाथ की सफ़ाई देखकर चुनाव में उनका नाम ऊपर आ जाएगा।
वहाँ पढ़े-लिखे लोग शतरंज और ताश जैसे ठहरे हुए खेल खेलते थे। दौड़ने-कूदने वाले खेल बच्चों के खेल माने जाते थे, इसलिए मैदान का यह शोर सबको अनोखा लगा।
नाले में कीचड़ भरा था और उसकी चढ़ाई ऊँची थी। साथ ही गाड़ी पर बोझ अधिक था और बैल कमज़ोर, इसलिए गाड़ी कुछ दूर चढ़कर फिर नीचे खिसक आती थी।
उसने कहा कि खिलाड़ियों ने किसान को देखा तो, पर ऐसी आँखों से जिनमें उसके लिए कुछ था ही नहीं। उनमें स्वार्थ और घमंड थे, उदारता और वात्सल्य नहीं।
उसने न नाम पूछा, न मोल-भाव किया। चोट लगी होने पर भी उसने डंडा और कोट रखकर कीचड़ में उतरना चुना, जबकि बाकी लोग देखकर आगे निकल गए।
इसका अर्थ है कि जो जोखिम उठाकर भीतर उतरता है, कुछ पाता भी वही है। ऊपर-ऊपर तैरते रहने से हाथ कुछ नहीं आता।
Long answer questions (3)
खेल संध्या तक चलता रहा और अँधेरा उतर आया, पर हार-जीत तय नहीं हो सकी। खिलाड़ी बैठकर दम ले रहे थे कि पास वाले नाले में एक किसान अनाज से लदी गाड़ी लेकर आ पहुँचा। नाले में कीचड़ था, चढ़ाई ऊँची थी और बैल कमज़ोर, इसलिए गाड़ी बार-बार चढ़कर नीचे खिसक आती। तभी डंडे लिए खिलाड़ी उधर से निकले। किसान ने डरी आँखों से उन्हें देखा, पर कुछ कह न सका, और वे आगे बढ़ गए। उसी भीड़ में से एक युवक ठिठक गया। उसने डंडा और कोट एक ओर रखा, किसान को बैल सँभालने को कहा और स्वयं पहिया ढकेलने लगा। दोनों के ज़ोर से गाड़ी ऊपर आ गई।
दोनों ने एक ही दृश्य देखा था। फँसी गाड़ी, हाँफते बैल और घबराया हुआ किसान बाकी खिलाड़ियों के सामने भी थे। अंतर देखने में नहीं, रुकने में था। खिलाड़ियों के मन में उस समय अपनी चिंता थी और अपने चुने जाने का ध्यान, इसलिए वे बात को अनदेखा करके निकल गए। युवक की हालत उनसे भी कमज़ोर थी, क्योंकि उसी दिन उसके पैर में चोट लगी थी और वह लँगड़ाकर चल रहा था। फिर भी उसने बिना पूछे, बिना मोल-भाव किए काम शुरू कर दिया। इससे यह बात खुलकर सामने आती है कि मदद करना ताक़त का नहीं, मन का काम है।
गाड़ी ऊपर आते ही किसान हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला कि आज आपने बचा लिया, वरना उसे सारी रात वहीं बैठना पड़ता। युवक ने हँसकर पूछा कि अब कुछ इनाम भी दोगे। इस पर किसान गंभीर होकर बोला कि भगवान चाहेंगे तो दीवानी आपको ही मिलेगी। यह उत्तर किसी साधारण किसान के मुँह से निकलने वाला नहीं था। इसीलिए युवक ने उसे ध्यान से देखा और उसके मन में शक जागा कि कहीं यह सुजानसिंह तो नहीं, क्योंकि आवाज़ भी मिलती थी और चेहरा भी। किसान शायद यह शक भाँप गया और मुस्कराकर एक कहावत कहकर चल दिया।
Flashcards (15)
Play this topic
- गाड़ी बाहर आने तक का क्रम
- किसने किया — खिलाड़ी या युवक?
- भाव और उनका अर्थ
- सच या भ्रम
- झटपट उत्तर
दरबार का फ़ैसला, भावों के नाम और उलटे अर्थ वाले शब्द
चुनाव के दिन दीवान साहब बताते हैं कि उन्हें दया और आत्मबल वाला आदमी चाहिए था और वह मिल गया; साथ में प्रेमचंद का परिचय, भाव बताने वाले शब्द, विपरीतार्थक जोड़े और कुछ कहावतें।
What you will be able to do
- चुनाव वाले दिन के दृश्य और घोषणा को क्रम से बता सकेंगे।
- दीवान साहब ने जिन दो गुणों को कसौटी बनाया, उन्हें उदाहरण सहित समझा सकेंगे।
- कहानी से भाव बताने वाले शब्द छाँटकर उन्हें वस्तु या व्यक्ति के नामों से अलग कर सकेंगे।
- विपरीतार्थक शब्दों के जोड़े बना सकेंगे और दी गई कहावतों को प्रसंग से जोड़ सकेंगे।
Key points
महीना पूरा होने पर चुनाव का दिन आया और उम्मीदवारों के लिए वह दिन काटना पहाड़ हो गया।
संध्या को राजा का दरबार सजा, जिसमें रईस, कर्मचारी, दरबारी और सब उम्मीदवार जुटे।
सुजानसिंह ने पहले उम्मीदवारों से हुई तकलीफ़ के लिए क्षमा माँगी।
उन्होंने बताया कि इस पद के लिए दो चीज़ें चाहिए थीं — हृदय में दया और साथ में आत्मबल।
उदार हृदय और आपत्ति का वीरता से सामना करने वाला बल — यही उनकी पूरी कसौटी थी।
पद पंडित जानकीनाथ को मिला, यानी वही युवक जिसने नाले पर गाड़ी निकाली थी।
बाकी लोगों की आँखों में आदर था, पर उम्मीदवारों की आँखों में ईर्ष्या।
कहानी के लेखक प्रेमचंद हैं, जिनका असली नाम धनपतराय था और जिन्हें कथा-सम्राट कहा जाता है।
Full explanation
वह दिन आ गया
महीना पूरा हुआ और चुनाव का दिन आ पहुँचा। उम्मीदवार सवेरे से ही अपनी किस्मत का फ़ैसला सुनने को बेचैन थे। लेखक कहता है कि उस दिन को काटना उनके लिए पहाड़ हो गया।
चेहरों पर दो रंग
हर चेहरे पर बारी-बारी से आशा और निराशा के रंग आते-जाते थे। किसी को पता नहीं था कि आज किसका भाग्य खुलेगा। यह बेचैनी ही उस दिन की सबसे बड़ी सच्चाई थी।
दरबार सजा
संध्या होते ही दरबार सज गया। शहर के धनी और प्रतिष्ठित लोग, रियासत के कर्मचारी और दरबारी, तथा दीवानी के सब उम्मीदवार — सब सज-धजकर आ बैठे। उम्मीदवारों के दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहे थे।
भाषण की शुरुआत
सरदार सुजानसिंह खड़े हुए। उन्होंने पहला वाक्य बधाई का नहीं कहा। उन्होंने उम्मीदवारों से इस बात की क्षमा माँगी कि उन्हें एक महीने तक कष्ट उठाना पड़ा।
उन्हें चाहिए क्या था
फिर उन्होंने अपनी कसौटी खोल दी। इस पद के लिए ऐसा आदमी चाहिए था जिसके मन में दया भी हो और भीतर आत्मबल भी। दोनों में से एक भी अकेला काफ़ी नहीं था।
दोनों शब्दों का अर्थ
उन्होंने दोनों शब्द समझा भी दिए। हृदय वही है जो उदार हो, यानी दूसरे का दुख अपने ऊपर ले सके। और आत्मबल वही है जो मुसीबत का सामना वीरता के साथ करे। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे गुणवाले संसार में कम मिलते हैं।
नाम की घोषणा
इसके बाद उन्होंने रियासत के पंडित जानकीनाथ को दीवानी मिलने पर बधाई दी। यही वह युवक था जिसने अँधेरे में, चोट खाए पैर के साथ, किसान की गाड़ी नाले से बाहर निकाली थी।
दो तरह की नज़रें
सबकी निगाहें उसी ओर उठीं। लेखक यहाँ एक बारीक बात कहता है — रईसों और कर्मचारियों की आँखों में आदर था, पर उम्मीदवारों की आँखों में ईर्ष्या। एक ही आदमी को दो तरह की आँखें देख रही थीं।
दूसरा भाषण
सरदार साहब ने आगे कहा कि किसी को यह मानने में आपत्ति नहीं होगी। जो आदमी खुद चोट खाकर भी एक गरीब किसान की लदी हुई गाड़ी को दलदल से बाहर चढ़ा दे, उसके भीतर साहस भी है, आत्मबल भी और उदारता भी।
आगे की भविष्यवाणी
उन्होंने यह भी जोड़ा कि ऐसा आदमी कभी गरीबों को नहीं सताएगा। उसका संकल्प मज़बूत है, इसलिए उसका मन डाँवाडोल नहीं होगा। वह धोखा भले खा जाए, पर दया और धर्म से कभी नहीं हटेगा।
कहानी के लेखक
यह कहानी प्रेमचंद ने लिखी है। उनका असली नाम धनपतराय था और उन्हें कथा-सम्राट कहा जाता है। उन्होंने समाज-सुधार और देशप्रेम की भावना से भरी बहुत-सी कहानियाँ और उपन्यास लिखे।
उनकी और रचनाएँ
उनकी ईदगाह, बड़े भाई साहब, गुल्ली डंडा और दो बैलों की कथा जैसी कहानियाँ आज भी बड़े और बच्चे दोनों चाव से पढ़ते हैं। उनका जीवनकाल उन्नीसवीं सदी के अंत से बीसवीं सदी के पूर्वार्ध तक रहा।
भावों के नाम
अब भाषा की एक बात। कहानी में कुछ ऐसे शब्द आते हैं जो किसी वस्तु, व्यक्ति या जगह का नाम नहीं हैं। वे मन के भावों के नाम हैं — जैसे स्वार्थ, उदारता, दया, साहस, ईर्ष्या और आशा। इन्हें छूकर या दिखाकर नहीं बताया जा सकता, फिर भी ये नाम ही हैं।
उलटे अर्थ वाले शब्द
दूसरी बात विपरीतार्थक शब्दों की है। कहानी की एक पंक्ति में कम और अधिक साथ आए हैं, और इनके अर्थ एक-दूसरे के उलटे हैं। ऐसे ही जोड़े हैं आना और जाना, गुण और अवगुण, आदर और अनादर, हार और जीत, तथा आशा और निराशा।
कहावतें और यह कहानी
तीसरी बात कहावतों की है। कहावत थोड़े शब्दों का ऐसा वाक्य है जिससे बात अधिक असरदार हो जाती है। एक जगह के लिए हज़ारों उम्मीदवार आ गए — इसे कहते हैं एक अनार सौ बीमार। और जिसने ठान लिया कि गाड़ी निकालनी है, उसे रास्ता मिल ही गया — यही है जहाँ चाह, वहाँ राह।
नाम क्यों ‘परीक्षा’ रखा
अंत में यह सोचिए कि कहानी का नाम परीक्षा क्यों है। पूरी कहानी में न कोई प्रश्नपत्र है, न कोई कमरा। फिर भी परीक्षा पूरे एक महीने चलती रही, और उसका सबसे बड़ा सवाल एक अँधेरी शाम को नाले के किनारे पूछा गया।
Concepts and terms
भीतर का वह बल जो मुसीबत देखकर पीछे नहीं हटने देता। दीवान साहब के अनुसार यह वही बल है जो आपत्ति का सामना वीरता से करता है, और अकेली दया से काम नहीं चलता।
दिल का बड़ा होना, यानी अपना नुक़सान उठाकर भी दूसरे के काम आ जाना। नाले वाले दृश्य में यही गुण युवक को बाकी सब खिलाड़ियों से अलग कर देता है।
ऐसे शब्द जो किसी दिखाई देने वाली वस्तु, व्यक्ति या जगह का नहीं, बल्कि मन के किसी भाव का नाम होते हैं। दया, ईर्ष्या, स्वार्थ और साहस इसी तरह के शब्द हैं।
वे शब्द जो एक-दूसरे के उलटे अर्थ देते हैं, जैसे कम और अधिक। कहानी की एक पंक्ति में ये दोनों साथ आए हैं, जहाँ विद्या का विचार कम और कर्तव्य का अधिक कहा गया है।
सावधान!
भ्रम और सच
असल जीवन: मॉनिटर कैसे चुना जाए
Scenario:
कक्षा छह में नया मॉनिटर चुनना था। शिक्षिका ने कहा कि इस बार वे किसी का नाम नहीं बताएँगी। उन्होंने बस इतना किया कि दो हफ़्ते तक रोज़ एक छोटा काम कक्षा के सामने अधूरा छोड़ दिया। कभी वह गिरी हुई किताबें होतीं, कभी खुला हुआ नल, और कभी अकेला बैठा कोई नया बच्चा। किसी से यह नहीं कहा गया कि यह काम कौन करे। कुछ बच्चे बार-बार हाथ उठाकर कहते कि मुझे मॉनिटर बना दीजिए। वे अपने अंक भी गिनाते और अपनी लिखावट भी दिखाते। दो बच्चे इस बीच कुछ कहते नहीं थे। वे चुपचाप वह काम निपटा देते और अपनी जगह पर जा बैठते।
Analysis:
दो हफ़्ते बाद शिक्षिका ने कक्षा से ही पूछा कि चुनाव कैसे हो। पहले बच्चों ने कहा कि जो सबसे अच्छे अंक लाता है उसे बना दीजिए। फिर एक बच्चे ने कहा कि मॉनिटर का काम अंक लाना नहीं, कक्षा सँभालना है। तब सबका ध्यान उन दो बच्चों पर गया जो चुपचाप काम कर रहे थे। शिक्षिका ने बताया कि उन्होंने यही दो हफ़्ते परीक्षा के रूप में रखे थे, और किसी को इसकी ख़बर नहीं दी थी। कक्षा को तब पाठ की बात समझ आई कि माँगने से नहीं, करने से पहचान बनती है।
Activity:
अपनी कक्षा के लिए मॉनिटर चुनने का एक तरीक़ा सोचिए, जिसमें कोई लिखित परीक्षा न हो। उसमें तीन ऐसे काम लिखिए जिन्हें देखकर पता चल जाए कि किसमें ज़िम्मेदारी है, और हर काम के आगे लिखिए कि वह कौन-सा गुण जाँचता है।
करके देखिए
Safety:
यह पूरा काम लेखन-पुस्तिका में ही होगा, इसमें कोई सामग्री नहीं चाहिए।
What You Notice:
आप देखेंगे कि भाव बताने वाले शब्द गिनती में कम नहीं हैं, और कहानी की सबसे बड़ी बातें उन्हीं से कही गई हैं।
Title:
करके देखिए
Did you know
प्रेमचंद का असली नाम धनपतराय था, और उन्हें कथा-सम्राट के नाम से जाना जाता है।
उनकी लिखी ईदगाह, बड़े भाई साहब, गुल्ली डंडा और दो बैलों की कथा बड़ों और बच्चों, दोनों में समान रूप से पढ़ी जाती हैं।
‘एक अनार सौ बीमार’ कहावत इस कहानी पर ठीक बैठती है, क्योंकि जगह एक थी और उम्मीदवार हज़ारों आ गए।
Memory tricks
दीवानी की कसौटी — दिल और दम — दिल यानी दया और उदारता, दम यानी आत्मबल। दोनों साथ हों तभी आदमी इस पद के लायक माना गया।
दो तरह की आँखें — आदर बनाम ईर्ष्या — रईसों और कर्मचारियों की आँखों में आदर था, जबकि हारे हुए उम्मीदवारों की आँखों में जलन।
Practice MCQs with answers (20)
- A वे सवेरे से बेचैन थे और दिन काटना कठिन हो गया
- B वे आराम से सोते रहे और शाम को ही उठकर तैयार हुए
- C वे आपस में फिर से खेल खेलने लगे
- D वे अपना सामान बाँधकर लौटने लगे
Show answer
Why:
हर चेहरे पर आशा और निराशा बारी-बारी से आती रही।
- A भोर के समय
- B संध्या के समय
- C ठीक दोपहर में
- D आधी रात के बाद
Show answer
Why:
उसी दरबार में फ़ैसला सुनाया गया।
- A जानकीनाथ का नाम पुकारा
- B महाराज की प्रशंसा की
- C उम्मीदवारों से क्षमा माँगी
- D हारने वालों को इनाम बाँटे
Show answer
Why:
उन्हें महीने भर की तकलीफ़ का ध्यान था।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C केवल I और III
- D I, II और III
Show answer
Why:
I और III सही हैं। II सही नहीं है: पद पंडित जानकीनाथ को मिला, जिन्होंने किसान की गाड़ी कीचड़ से निकाली थी।
- A जो मुसीबत का सामना वीरता से करे
- B जो दूसरों से अपनी बात मनवा ले
- C जो कभी किसी से सहायता न माँगे
- D जो शरीर से सबसे अधिक बलवान हो
Show answer
Why:
यह भीतर का बल है, बाहर की ताक़त नहीं।
- A जो किसी से कभी नाराज़ न हो
- B जो दूसरे का दुख अपने ऊपर ले सके
- C जो सबसे मीठी बोली में बात करे
- D जो अपने धन से सबकी मदद कर सके
Show answer
Why:
उदारता का अर्थ दिल का बड़ा होना है।
- A हॉकी के सबसे अच्छे खिलाड़ी को
- B सबसे अधिक पढ़े-लिखे उम्मीदवार को
- C पंडित जानकीनाथ को
- D रियासत के पुराने कर्मचारी को
Show answer
Why:
यही वह युवक था जिसने गाड़ी निकाली थी।
- A गहरा आदर
- B पूरी बेपरवाही
- C खुशी और उत्साह
- D ईर्ष्या
Show answer
Why:
जबकि बाकी लोगों की आँखों में आदर था।
- A कि वह गरीबों को कभी नहीं सताएगा
- B कि वह जल्दी ही और ऊँचा पद पा लेगा
- C कि वह रियासत का खज़ाना भर देगा
- D कि वह सबसे कड़े नियम लागू करेगा
Show answer
Why:
उसका संकल्प दृढ़ बताया गया।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
दोनों सही हैं, और कारण ही उनके विश्वास का आधार है। जिसे कोई देख नहीं रहा, वही काम चरित्र बताता है।
- A जयशंकर प्रसाद
- B सूरदास
- C प्रेमचंद
- D रामधारी सिंह दिनकर
Show answer
Why:
उन्हें कथा-सम्राट कहा जाता है।
- A सूर्यकांत त्रिपाठी
- B हरिवंश राय
- C रामधारी सिंह
- D धनपतराय
Show answer
Why:
प्रेमचंद उनका लेखन-नाम था।
- A ईदगाह
- B कामायनी
- C रश्मिरथी
- D मधुशाला
Show answer
Why:
बड़े भाई साहब और गुल्ली डंडा भी उन्हीं की हैं।
- A गाड़ी
- B उदारता
- C नाला
- D दरबार
Show answer
Why:
बाकी तीनों दिखाई देने वाली चीज़ों के नाम हैं।
- A वह हमेशा किसी व्यक्ति का नाम होता है
- B वह वाक्य के अंत में ही आता है
- C उसे छूकर या दिखाकर नहीं बताया जा सकता
- D वह सदा दो शब्दों को जोड़कर बनता है
Show answer
Why:
फिर भी वह नाम ही होता है।
- A सुगुण
- B निर्गुण
- C दुर्गुणी
- D अवगुण
Show answer
Why:
‘अव’ जुड़ने से अर्थ उलट जाता है।
- A प्रतीक्षा
- B अभिलाषा
- C कामना
- D निराशा
Show answer
Why:
चुनाव के दिन दोनों भाव साथ-साथ आ रहे थे।
- A कृपालु
- B निर्दयी
- C उदार
- D सहनशील
Show answer
Why:
नाले पर बाकी खिलाड़ी इसी श्रेणी में आते हैं।
- A जब खेल में दोनों टीमें बराबर रहीं
- B जब किसान की गाड़ी कीचड़ में फँसी
- C जब दीवान साहब ने पद छोड़ने की विनती की
- D जब एक पद के लिए हज़ारों उम्मीदवार आ गए
Show answer
Why:
चाहने वाले बहुत और चीज़ एक ही थी।
- A जिसके पास पहले से साधन हों, वही कोई काम कर पाता है
- B काम करने की इच्छा हो तो उसका साधन मिल जाता है
- C रास्ता पूछकर चलने से भटकाव नहीं होता
- D चाहत पूरी होने में सदा देर लग जाती है
Show answer
Why:
युवक ने ठान लिया, इसलिए गाड़ी निकल भी गई।
Important short questions (6)
उम्मीदवार सवेरे से फ़ैसला सुनने को बेचैन थे और दिन काटना उनके लिए कठिन हो गया। हर चेहरे पर बारी-बारी से आशा और निराशा के रंग आते-जाते रहे।
उन्हें पता था कि उम्मीदवारों ने महीने भर घर से दूर रहकर कष्ट उठाया है और उनमें से केवल एक को ही पद मिलना है। इसी कारण उन्होंने पहले खेद जताया।
अकेली दया से आदमी दुख देख तो लेगा, पर आगे बढ़कर कुछ कर नहीं पाएगा। अकेले बल से वह काम तो करेगा, पर दूसरों का दुख उसे छुएगा नहीं। इसीलिए दोनों साथ चाहिए थे।
रईसों और कर्मचारियों की आँखों में जानकीनाथ के लिए आदर था। हारे हुए उम्मीदवारों की आँखों में उसी आदमी के लिए ईर्ष्या थी।
वे शब्द जो किसी दिखाई देने वाली वस्तु, व्यक्ति या जगह का नहीं, बल्कि मन के किसी भाव का नाम होते हैं। जैसे दया और ईर्ष्या।
कहावत थोड़े शब्दों का ऐसा जमा-जमाया वाक्य है जिससे बात अधिक असरदार हो जाती है। एक पद के लिए हज़ारों लोग आए, इसे कहते हैं एक अनार सौ बीमार।
Long answer questions (3)
महीना पूरा होते ही चुनाव का दिन आया और उम्मीदवार सवेरे से बेचैन रहे। संध्या को राजा साहब का दरबार सजा, जिसमें शहर के रईस, रियासत के कर्मचारी, दरबारी और सब उम्मीदवार आ बैठे। सुजानसिंह खड़े हुए और पहले उम्मीदवारों से महीने भर की तकलीफ़ के लिए क्षमा माँगी। फिर उन्होंने बताया कि इस पद के लिए दया और आत्मबल दोनों वाला आदमी चाहिए था, और रियासत के भाग्य से ऐसा आदमी मिल भी गया। इसके बाद उन्होंने पंडित जानकीनाथ को बधाई दी। सबकी नज़रें उधर उठीं, पर उनमें दो अलग भाव थे — कुछ आँखों में आदर और उम्मीदवारों की आँखों में ईर्ष्या।
उन्होंने पहले वह प्रमाण सामने रखा जिस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती थी। जो आदमी खुद चोट खाकर भी एक गरीब किसान की लदी गाड़ी को दलदल से बाहर चढ़ा दे, उसके भीतर साहस भी है, आत्मबल भी और उदारता भी। इसके बाद उन्होंने आगे की बात कही। ऐसा आदमी गरीबों को कभी नहीं सताएगा, क्योंकि उसने कमज़ोर की मदद बिना कहे की है। उसका संकल्प मज़बूत है, इसलिए उसका मन डाँवाडोल नहीं होगा। अंत में उन्होंने जोड़ा कि वह धोखा भले खा जाए, पर दया और धर्म का रास्ता कभी नहीं छोड़ेगा।
नाम पढ़कर पहले लगता है कि कहीं प्रश्नपत्र और कमरा आएगा। पर पूरी कहानी में ऐसा कुछ नहीं है। फिर भी नाम बिल्कुल ठीक है। यहाँ परीक्षा एक दिन की नहीं, पूरे महीने की थी, और वह चुपचाप चल रही थी। उम्मीदवार समझ रहे थे कि फ़ैसला आख़िरी दिन होगा, इसलिए वे महीना भर अच्छा दिखने में लगे रहे। असल सवाल किसी ने पूछा ही नहीं। वह एक अँधेरी शाम को नाले के किनारे अपने आप सामने आ गया, और उत्तर उसी ने दिया जिसे पता ही नहीं था कि वह परखा जा रहा है। इसीलिए यह नाम कहानी की सबसे बड़ी बात पकड़ लेता है।
Flashcards (15)
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- शब्द और उसका उलटा
- भाव का नाम या वस्तु का नाम?
- दरबार से घोषणा तक
- सच या भ्रम
- झटपट उत्तर
Class 6 Hindi Chapter 10 — frequently asked questions
उम्र ढल चुकी थी और राज-काज सँभालने की ताक़त नहीं बची थी। साथ ही उन्हें डर था कि अंत में हुई कोई भूल उनके चालीस बरस के अच्छे नाम पर दाग लगा देगी।
उन्होंने पहले बहुत समझाया, क्योंकि वे अपने अनुभवी और नीति-कुशल दीवान का बड़ा आदर करते थे। जब दीवान नहीं माने, तब हारकर उन्होंने विनती स्वीकार की।
पहली यह कि इतने ऊँचे पद के लिए डिग्री ज़रूरी नहीं मानी गई। दूसरी यह कि शरीर का मज़बूत होना ज़रूरी बताया गया, जो दफ़्तर के काम से जुड़ी शर्त नहीं लगती।
उन्हें लगा कि खेल भी एक हुनर है और इसे छिपाने से क्या लाभ। भीतर यह उम्मीद भी थी कि हाथ की सफ़ाई देखकर चुनाव में उनका नाम ऊपर आ जाएगा।
वहाँ पढ़े-लिखे लोग शतरंज और ताश जैसे ठहरे हुए खेल खेलते थे। दौड़ने-कूदने वाले खेल बच्चों के खेल माने जाते थे, इसलिए मैदान का यह शोर सबको अनोखा लगा।
नाले में कीचड़ भरा था और उसकी चढ़ाई ऊँची थी। साथ ही गाड़ी पर बोझ अधिक था और बैल कमज़ोर, इसलिए गाड़ी कुछ दूर चढ़कर फिर नीचे खिसक आती थी।
उम्मीदवार सवेरे से फ़ैसला सुनने को बेचैन थे और दिन काटना उनके लिए कठिन हो गया। हर चेहरे पर बारी-बारी से आशा और निराशा के रंग आते-जाते रहे।
उन्हें पता था कि उम्मीदवारों ने महीने भर घर से दूर रहकर कष्ट उठाया है और उनमें से केवल एक को ही पद मिलना है। इसी कारण उन्होंने पहले खेद जताया।
अकेली दया से आदमी दुख देख तो लेगा, पर आगे बढ़कर कुछ कर नहीं पाएगा। अकेले बल से वह काम तो करेगा, पर दूसरों का दुख उसे छुएगा नहीं। इसीलिए दोनों साथ चाहिए थे।
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