Class 8 Hindi Chapter 5: कबीर के दोहे
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साँच, गुरु और बड़प्पन
कबीर के पहले तीन दोहे सच को तप के बराबर रखते हैं, गुरु और ईश्वर के क्रम का कारण बताते हैं, और ऊँचे खजूर के उदाहरण से यह कसौटी देते हैं कि बड़े होने के साथ किसी के काम आना भी चाहिए।
What you will be able to do
- दोहे की बनावट बता सकूँगा — दो पंक्तियाँ और चार टुकड़े।
- साँच, तप, हिरदे, बलिहारी और पंथी शब्दों का अर्थ लिख सकूँगा।
- पहले दोहे की दोनों तुलनाएँ अपने शब्दों में समझा सकूँगा।
- गुरु को पहले प्रणाम करने का कारण दोहे से निकालकर बता सकूँगा।
- खजूर के उदाहरण से बड़प्पन की कसौटी अपने जीवन पर लगा सकूँगा।
Key points
दोहा दो पंक्तियों का छंद है, और बीच का विराम हर पंक्ति को दो टुकड़ों में बाँट देता है।
पहला दोहा सच को तप के बराबर और झूठ को पाप के बराबर रखता है।
तप वह कठिन अभ्यास है जो मन को साधने के लिए किया जाता है।
जिसके हृदय में सच बसा हो, उसके भीतर गुरु स्वयं बसे हैं।
दूसरा दोहा एक सवाल से शुरू होता है और अगली पंक्ति में उत्तर देता है।
कबीर गुरु को पहले चुनते हैं, क्योंकि ईश्वर का पता गुरु ने बताया था।
खजूर ऊँचा है, पर उसके नीचे छाया नहीं बनती और फल हाथ नहीं आता।
बड़े होने का मूल्य इससे तय होता है कि उससे किसी का काम बनता है।
कबीर की भाषा में कई इलाक़ों के शब्द मिले हैं, इसलिए वह सधुक्कड़ी कहलाती है।
Full explanation
दोहा किस आकार का होता है
कबीर की बात दोहों में आई है, और दोहा बहुत छोटा छंद है — केवल दो पंक्तियाँ। हर पंक्ति बीच में एक जगह रुकती है, इसलिए पढ़ते समय चार टुकड़े सुनाई देते हैं। इतनी छोटी जगह में पूरी बात कहनी पड़ती है, तो एक भी शब्द बेकार नहीं रखा जा सकता। यही कारण है कि दोहे याद रह जाते हैं और बातचीत में कहावत की तरह निकल आते हैं। इस पाठ में आठ दोहे हैं, और हर दोहा अपने आप में पूरा है — किसी को समझने के लिए पिछले को पढ़ना ज़रूरी नहीं।
पहला दोहा — सच और तपस्या
पहला दोहा कहता है — साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। यहाँ साँच का अर्थ सच है और तप का अर्थ कठिन साधना। कबीर कह रहे हैं कि सच बोलने से बड़ी कोई साधना नहीं है। ध्यान दीजिए, उन्होंने यह नहीं कहा कि सच बोलना अच्छी बात है। उन्होंने सच को तप के बराबर रख दिया — यानी उतना ही कठिन और उतना ही मूल्यवान। और उसी वाक्य में झूठ को पाप के बराबर रख दिया। एक ही पंक्ति में दो तुलनाएँ, आमने-सामने।
तप शब्द का वज़न
तप वह कठिन अभ्यास है जो कोई व्यक्ति अपने मन को साधने के लिए करता है — उपवास, मौन, एक जगह बैठकर ध्यान। लोग उसे बहुत बड़ी बात मानते हैं। कबीर कहते हैं कि रोज़ के जीवन में सच पर टिके रहना उससे कम नहीं है। यह बात आसान लगती है, पर करके देखिए — जिस दिन सच बोलने से नुक़सान होता दिखे, उस दिन पता चलता है कि यह भी एक तपस्या ही है।
दूसरी पंक्ति — हृदय और गुरु
दूसरी पंक्ति कहती है — जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप। हिरदे यानी हृदय। कबीर कहते हैं कि जिसके भीतर सच बसा हो, उसके भीतर गुरु स्वयं बसे हैं। यह बहुत बड़ी बात है। गुरु को ढूँढ़ने कहीं दूर जाने की बात नहीं हो रही; कहा जा रहा है कि सच को भीतर रख लो तो मार्गदर्शन भीतर से ही मिलने लगेगा। सच यहाँ केवल एक अच्छी आदत नहीं, एक दिशा दिखाने वाली चीज़ बन जाता है।
बराबरी से बात कहने का ढंग
इस दोहे की पूरी ताक़त एक शब्द में है — बराबर। कबीर किसी बात को लंबा करके नहीं समझाते; वे एक चीज़ को दूसरी चीज़ के बराबर रख देते हैं और छोड़ देते हैं। सच के बराबर तप, झूठ के बराबर पाप। पाठक के मन में तुलना अपने आप बन जाती है, और बनी हुई तुलना सुनाई हुई बात से अधिक देर टिकती है। आगे के दोहों में भी यही ढंग बार-बार दिखेगा।
दूसरा दोहा — एक कठिन सवाल
दूसरा दोहा एक सवाल से शुरू होता है — गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय। दोऊ यानी दोनों, और पाँय लागना यानी चरण छूना। कल्पना कीजिए कि गुरु और ईश्वर, दोनों सामने खड़े हैं। पहले किसे प्रणाम किया जाए? सवाल कठिन है, क्योंकि दोनों में से किसी को भी छोटा नहीं कहा जा सकता। कबीर इस सवाल को टालते नहीं; वे उसे सीधे सामने रख देते हैं और अगली पंक्ति में अपना उत्तर देते हैं।
उत्तर और उसका कारण
अगली पंक्ति है — बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय। बलिहारी का अर्थ है न्योछावर होना, सब कुछ अर्पित कर देना। कबीर गुरु को चुनते हैं, और कारण भी साथ ही देते हैं — गोविंद का पता गुरु ने ही बताया था। यह चुनाव भक्ति को छोटा नहीं करता; यह केवल क्रम बताता है। जिसने रास्ता दिखाया, उसका नंबर पहले आता है। कबीर का उत्तर मानने के लिए नहीं, समझने के लिए दिया गया है।
कारण के साथ कही गई बात
इस दोहे की सीख केवल यह नहीं है कि गुरु बड़े हैं। सीख यह भी है कि कोई भी बात कारण के साथ कही जाए तो उसका वज़न बढ़ जाता है। कबीर पहले सवाल रखते हैं, फिर उत्तर, और उत्तर के पीछे कारण। तीन क़दम, दो पंक्तियों में। कक्षा में भी यही काम आता है — उत्तर लिखिए, और उसके साथ एक वाक्य में कारण दीजिए।
तीसरा दोहा — ऊँचा खजूर
तीसरा दोहा कहता है — बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। खजूर बहुत ऊँचा पेड़ है, और कबीर उसी ऊँचाई पर सवाल उठा देते हैं। बड़ा होने से क्या हुआ? यहाँ बड़ा होना कई अर्थ ले लेता है — आकार में बड़ा, पद में बड़ा, धन में बड़ा। दोहा किसी एक का नाम नहीं लेता, इसलिए वह हर तरह के बड़प्पन पर लागू हो जाता है।
पंथी, छाया और दूर का फल
दूसरी पंक्ति कारण बताती है — पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर। पंथी वह है जो रास्ता चल रहा है, थका हुआ है और छाया चाहता है। खजूर के पत्ते ऊपर ही रहते हैं, इसलिए नीचे छाया नहीं बनती। फल भी इतनी ऊँचाई पर लगते हैं कि हाथ नहीं पहुँचता। यानी पेड़ है, बड़ा भी है, पर राहगीर के किसी काम नहीं आ रहा।
कसौटी आकार नहीं, उपयोग है
इन दो पंक्तियों से एक कसौटी निकलती है — किसी के बड़े होने का मूल्य इससे तय होता है कि उससे किसी का काम बनता है या नहीं। कबीर खजूर को बुरा नहीं कहते; वे केवल यह दिखाते हैं कि अकेली ऊँचाई काफ़ी नहीं। साथ में उदारता चाहिए, पहुँच चाहिए, और झुकने की तैयारी चाहिए। एक छोटा छायादार पेड़ इस कसौटी पर खजूर से आगे निकल जाता है।
तीनों दोहों का एक सूत्र
तीनों दोहे अलग-अलग विषयों पर हैं, फिर भी एक बात साझा है। हर दोहा किसी बड़ी मानी जाने वाली चीज़ को लेता है और उसके सामने एक रोज़ की चीज़ रख देता है — तप के सामने सच, ईश्वर के सामने गुरु, ऊँचाई के सामने छाया। और हर बार रोज़ की चीज़ जीत जाती है। कबीर की यही पहचान है: वे बड़ी बात को ज़मीन पर उतार लाते हैं।
कबीर की भाषा
कबीर की भाषा पाठ्यपुस्तक की हिंदी नहीं है। साँच, हिरदे, दोऊ, लागौं, पाँय, लागै — ये रूप आज बोलचाल में नहीं मिलते। कबीर घूम-घूमकर बोलते थे और उनकी भाषा में कई इलाक़ों के शब्द मिल गए, इसलिए विद्वान उसे सधुक्कड़ी कहते हैं। पढ़ते समय शब्द अटकाते हैं, पर अर्थ अटकता नहीं, क्योंकि चित्र साफ़ है — तराज़ू, दो खड़े व्यक्ति, एक ऊँचा पेड़।
आज के जीवन में
इन तीनों दोहों की जाँच आज भी हो सकती है। किसी परीक्षा में ग़लती से बढ़े हुए अंक लौटा देना पहले दोहे की परीक्षा है। जिस शिक्षक ने विषय समझाया, उसका नाम याद रखना दूसरे दोहे की बात है। और कक्षा का मॉनीटर चुनते समय यह देखना कि कौन साथियों के काम आता है — यह तीसरे दोहे की कसौटी है। दोहे पाँच सौ साल पुराने हैं, कसौटी नई है।
Concepts and terms
दो पंक्तियों वाला छंद, जिसमें हर पंक्ति बीच में एक जगह रुकती है और इस तरह चार टुकड़े बन जाते हैं। इतनी छोटी जगह में पूरी बात कहनी पड़ती है, इसलिए दोहे याद रह जाते हैं।
मन को साधने के लिए किया जाने वाला कठिन अभ्यास, जैसे उपवास, मौन या एक जगह बैठकर ध्यान। कबीर सच पर टिके रहने को इसी के बराबर मानते हैं।
न्योछावर होना, सब कुछ अर्पित कर देना। कबीर यह भारी शब्द गुरु के लिए लगाते हैं, और उसी के साथ अपना कारण भी दे देते हैं।
रास्ता चलने वाला यात्री, जो थका हुआ है और छाया चाहता है। तीसरे दोहे में वही कसौटी बन जाता है, क्योंकि पेड़ का मूल्य उसी के काम आने से तय होता है।
कबीर की भाषा का नाम, जिसमें कई इलाक़ों के शब्द मिल गए हैं। इसका कारण यह है कि कबीर घूम-घूमकर बोलते थे और सुनने वाले हर जगह अलग थे।
सावधान
भ्रम और सच
मिलाकर देखो
Scenario:
आठवीं कक्षा में एक अंतर-विद्यालय मैच हो रहा है। अंतिम गेंद बची है और दोनों टीमों के अंक बराबर हैं। उस गेंद पर आपकी टीम का एक खिलाड़ी सीमा-रेखा पार कर जाता है, पर निर्णायक की नज़र उस ओर नहीं थी। टीम जीत जाती है और सब तालियाँ बजाने लगते हैं। लौटते समय आपके कप्तान कहते हैं कि अब बात करने से क्या लाभ होगा। एक साथी कहता है कि देखना निर्णायक का काम था, हमारा नहीं। तीसरा साथी चुप रहता है, पर उसका चेहरा बता देता है कि वह इस जीत से ख़ुश नहीं है।
Analysis:
ध्यान दीजिए कि दोहा कोई दंड नहीं बताता। वह केवल दो पलड़े रख देता है और चुनाव पढ़ने वाले पर छोड़ देता है। यही कारण है कि पाँच सौ साल बाद भी यह दोहा किसी मैच पर लागू हो जाता है।
Activity:
ऐसी तीन परिस्थितियाँ लिखिए जिनमें सच बोलने पर आपका कुछ नुक़सान हो सकता है, और हर एक के आगे लिखिए कि आप क्या करेंगे।
करके देखो
Title:
दो पेड़, एक कसौटी
Safety:
किसी नुकीली वस्तु की आवश्यकता नहीं है।
What You Notice:
ऊँचे पेड़ की छाया पतली और दूर पड़ती है, और फैले पेड़ की छाया ठीक उसके नीचे बनती है। दोहे की कसौटी इसी चित्र में दिख जाती है।
Did you know
कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे। उनकी बातें सुनने वालों ने याद रखीं और बाद में लिखी गईं, इसलिए एक ही दोहे के कई पाठ मिलते हैं।
दोहा केवल कबीर का छंद नहीं है। रहीम, तुलसीदास और बिहारी ने भी इसी दो-पंक्ति वाले छंद में अपनी बड़ी-बड़ी बातें कही हैं।
Memory tricks
तीन दोहे याद रखने का सूत्र — स–गु–ख — सच, गुरु, खजूर। पहला दोहा सच का, दूसरा गुरु का, तीसरा खजूर का। तीनों में बड़ी चीज़ के सामने एक रोज़ की चीज़ रखी जाती है, और रोज़ की चीज़ जीत जाती है।
Practice MCQs with answers (25)
- A दो पंक्तियाँ, और हर पंक्ति दो टुकड़ों में
- B दो पंक्तियाँ, और हर पंक्ति तीन टुकड़ों में
- C चार पंक्तियाँ, और हर पंक्ति दो टुकड़ों में
- D चार पंक्तियाँ, और हर पंक्ति चार टुकड़ों में
Show answer
Why:
दो पंक्तियाँ होती हैं, और बीच का विराम हर पंक्ति को दो टुकड़ों में बाँट देता है।
- A बड़े दान के
- B कठिन साधना के
- C लंबी यात्रा के
- D ऊँचे पद के
Show answer
Why:
साँच को तप के बराबर कहा गया है, यानी उतनी ही कठिन साधना के बराबर।
- A सच बोलने की बात दोहे में कहीं नहीं आती है
- B सच बोलना यहाँ सचमुच सबसे सरल काम ही बताया गया है
- C सच पर टिके रहना तप के बराबर कठिन माना गया है
- D सच बोलना केवल बड़े लोगों के लिए कहा गया है
Show answer
Why:
दोहा सच को तप के बराबर रखता है, और तप कठिन अभ्यास होता है।
- A गुरु से मिलने वाला कोई वरदान
- B मंदिर में चढ़ाया जाने वाला भोग
- C किसी तीर्थ तक की लंबी यात्रा
- D मन को साधने वाला कठिन अभ्यास
Show answer
Why:
तप वह कठिन अभ्यास है जो मन को साधने के लिए किया जाता है।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
दोनों सही हैं, और कारण सचमुच अभिकथन को समझा देता है।
- A हिरण
- B हृदय
- C हिस्सा
- D हिम्मत
Show answer
Why:
हिरदे कबीर की भाषा का रूप है, जिसका अर्थ हृदय है।
- A जिस मंदिर में अधिक भीड़ हो, वहाँ
- B जिस घर में दीपक जले, उसमें
- C जिसके हृदय में सच हो, उसके भीतर
- D जिस पाठ में दोहे हों, उसमें
Show answer
Why:
जिसके भीतर सच बसा हो, उसके भीतर गुरु स्वयं बसे हैं।
- A मार्गदर्शन की बात इस दोहे में कहीं नहीं आती है
- B मार्गदर्शन केवल किसी दूर के स्थान पर ही मिलता है
- C मार्गदर्शन पाने के लिए कठिन उपवास करना पड़ता है
- D सच भीतर रख लेने पर दिशा भीतर से मिलने लगती है
Show answer
Why:
दोहा गुरु को भीतर बताता है, और उसकी शर्त सच है।
- A बराबर
- B हिरदे
- C साँच
- D आप
Show answer
Why:
बराबर शब्द ही दोनों तुलनाएँ खड़ी कर देता है।
- A एक बात को कई बार दोहराकर याद करा देते हैं
- B एक चीज़ को दूसरी के बराबर रखकर छोड़ देते हैं
- C एक लंबी कहानी सुनाकर उसका अर्थ बता देते हैं
- D एक कठिन शब्द देकर उसका अर्थ समझा देते हैं
Show answer
Why:
तुलना पाठक के मन में अपने आप बन जाती है, और टिकी रहती है।
- A एक कहानी से
- B एक आदेश से
- C एक सवाल से
- D एक सूची से
Show answer
Why:
वह सीधे पूछता है कि गुरु और ईश्वर में पहले किसे प्रणाम किया जाए।
- A दूसरा और पाँव का जूता
- B दूर और पास
- C दोनों और हाथ
- D दोनों और चरण
Show answer
Why:
दोऊ यानी दोनों, और पाँय लागना यानी चरण छूना।
- A गुरु को, क्योंकि ईश्वर का पता उन्होंने ही बताया
- B ईश्वर को, क्योंकि वे गुरु से भी बड़े माने जाते हैं
- C गुरु को, क्योंकि वे उस समय अधिक पास खड़े थे
- D ईश्वर को, क्योंकि गुरु ने ऐसा ही कहा हुआ था
Show answer
Why:
कबीर गुरु को चुनते हैं और कारण भी साथ ही दे देते हैं।
- A प्रणाम करना
- B न्योछावर होना
- C विदा लेना
- D वरदान देना
Show answer
Why:
बलिहारी का अर्थ न्योछावर होना या सब कुछ अर्पित कर देना है।
- A दोहा यहाँ ईश्वर और गुरु, दोनों को ही छोटा बता देता है
- B दोहा सचमुच ईश्वर को गुरु से छोटा बता देता है
- C दोहा ईश्वर को छोटा नहीं कहता, केवल क्रम बताता है
- D दोहा इस विषय पर कोई बात ही नहीं करता है
Show answer
Why:
चुनाव क्रम का है — जिसने रास्ता दिखाया, उसका नंबर पहले आता है।
- A सवाल, फिर कारण, फिर कोई उत्तर नहीं
- B कारण, फिर सवाल, फिर उसका उत्तर
- C उत्तर, फिर उसका कारण, फिर सवाल
- D सवाल, फिर उत्तर, फिर उत्तर का कारण
Show answer
Why:
पहले सवाल रखा जाता है, फिर उत्तर, और उत्तर के पीछे कारण।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C केवल I और III
- D I, II और III
Show answer
Why:
I और II सही हैं। III ग़लत है — दोहा खजूर की निंदा नहीं करता।
- A केवल पेड़ की ऊँचाई के अर्थ में
- B आकार, पद और धन — तीनों अर्थों में
- C केवल आयु में बड़े होने के अर्थ में
- D केवल किसी पद में ही बड़े होने के अर्थ में
Show answer
Why:
दोहा किसी का नाम नहीं लेता, इसलिए वह हर तरह के बड़प्पन पर लागू हो जाता है।
- A फल बेचने वाले के
- B पेड़ लगाने वाले के
- C रास्ता चलने वाले के
- D पाठ पढ़ाने वाले के
Show answer
Why:
पंथी वह है जो रास्ता चल रहा है और थका हुआ है।
- A उसके पत्ते गरमी में झड़ जाते हैं
- B उसके पत्ते बहुत पतले और छोटे हैं
- C उसकी शाखाएँ ज़मीन की ओर झुकी हैं
- D उसके पत्ते बहुत ऊपर ही रहते हैं
Show answer
Why:
पत्ते ऊपर ही रहते हैं, इसलिए नीचे छाया नहीं बनती।
- A घना पेड़, क्योंकि उससे यात्री का काम बन गया
- B खजूर, क्योंकि वह दोनों में अधिक ऊँचा निकला
- C दोनों बराबर, क्योंकि दोनों ही पेड़ कहलाते हैं
- D कोई नहीं, क्योंकि दोहा पेड़ों की बात नहीं करता
Show answer
Why:
कसौटी ऊँचाई नहीं है — कसौटी यह है कि किसी का काम बना या नहीं।
- A बड़े होने से बड़ी कोई बात ही नहीं होती है
- B बड़े होने के साथ किसी के काम आना भी चाहिए
- C ऊँचे पेड़ कभी किसी के काम नहीं आ पाते हैं
- D छोटे पेड़ ही सचमुच बड़े माने जाने चाहिए
Show answer
Why:
अकेली ऊँचाई काफ़ी नहीं; साथ में उदारता और पहुँच भी चाहिए।
- A हर दोहा किसी गुरु के नाम से ही आरंभ होता है
- B हर दोहा किसी एक पेड़ का उदाहरण यहाँ ज़रूर ही देता है
- C हर दोहा बड़ी चीज़ के सामने रोज़ की चीज़ रख देता है
- D हर दोहा अंत में एक सवाल छोड़कर रुक जाता है
Show answer
Why:
तप के सामने सच, ईश्वर के सामने गुरु, ऊँचाई के सामने छाया।
- A मैथिली
- B अवधी
- C ब्रजभाषा
- D सधुक्कड़ी
Show answer
Why:
घूम-घूमकर बोलने के कारण उनकी भाषा में कई इलाक़ों के शब्द मिल गए।
- A साँच और झूठ की बराबरी बताने वाला दोहा
- B गुरु और गोविंद के क्रम वाला दोहा
- C खजूर और पंथी की छाया वाला दोहा
- D इनमें से कोई भी दोहा यहाँ लागू ही नहीं होता
Show answer
Why:
यह पहले दोहे की सीधी परीक्षा है — सच पर टिके रहना तप के बराबर है।
Important short questions (7)
दोहे में दो पंक्तियाँ होती हैं। हर पंक्ति बीच में एक जगह रुकती है। इस तरह पढ़ते समय चार टुकड़े सुनाई देते हैं। जगह छोटी है, इसलिए एक भी शब्द बेकार नहीं रखा जा सकता।
पहली तुलना सच और तप के बीच है — सच पर टिके रहना कठिन साधना के बराबर माना गया है। दूसरी तुलना झूठ और पाप के बीच है। दोनों तुलनाएँ एक ही पंक्ति में आमने-सामने रख दी गई हैं।
क्योंकि दोहे की शर्त सच है। जिसके भीतर सच बसा हो, उसे दिशा भीतर से मिलने लगती है। इस तरह सच केवल एक अच्छी आदत नहीं रह जाता, वह मार्ग दिखाने वाली चीज़ बन जाता है।
सवाल यह है कि गुरु और ईश्वर, दोनों सामने खड़े हों तो पहले किसके चरण छुए जाएँ। उत्तर में कबीर गुरु को चुनते हैं, और कारण यह देते हैं कि ईश्वर का पता गुरु ने ही बताया था।
क्योंकि वह चुनाव केवल क्रम का है, मूल्य का नहीं। कबीर यह नहीं कहते कि ईश्वर कम हैं; वे यह कहते हैं कि जिसने रास्ता दिखाया, उसका नंबर पहले आता है।
क्योंकि खजूर बहुत ऊँचा पेड़ है, और इस तरह ऊँचाई पर ही सवाल उठ जाता है। उसके पत्ते ऊपर रहते हैं, इसलिए नीचे छाया नहीं बनती, और फल इतनी ऊँचाई पर लगते हैं कि हाथ नहीं पहुँचता।
हर दोहा किसी बड़ी मानी जाने वाली चीज़ के सामने एक रोज़ की चीज़ रख देता है — तप के सामने सच, ईश्वर के सामने गुरु, ऊँचाई के सामने छाया। और हर बार रोज़ की चीज़ जीत जाती है।
Long answer questions (3)
तप वह कठिन अभ्यास है जो कोई अपने मन को साधने के लिए करता है — उपवास, मौन, या एक जगह बैठकर ध्यान। लोग उसे बहुत बड़ी बात मानते हैं। कबीर रोज़ के जीवन की एक चीज़ उठाकर उसी पलड़े में रख देते हैं। वे कहते हैं कि सच पर टिके रहना उससे कम नहीं है। यह बात सुनने में आसान लगती है, पर जाँच कठिन है। उदाहरण के लिए, किसी खेल में अपनी ही टीम ने नियम तोड़ा हो और उसे मानना पड़े। या परीक्षा में किसी ग़लत उत्तर पर भूल से अंक मिल जाएँ। ऐसे क्षणों में सच एक अभ्यास बन जाता है। उसी पंक्ति में झूठ को पाप के बराबर कहकर वे दूसरा पलड़ा भी भर देते हैं।
कबीर तीन क़दम रखते हैं, और वे भी केवल दो पंक्तियों में। पहला क़दम सवाल है — गुरु और ईश्वर, दोनों सामने खड़े हों तो पहले किसके चरण छुए जाएँ। यह सवाल कठिन है, क्योंकि दोनों में से किसी को छोटा नहीं कहा जा सकता। दूसरा क़दम उत्तर है — कबीर गुरु को चुन लेते हैं और उनके लिए बलिहारी जैसा भारी शब्द लगाते हैं। तीसरा क़दम कारण है — ईश्वर का पता गुरु ने ही बताया था। इस क्रम से उत्तर का वज़न बहुत बढ़ जाता है। अगर कबीर केवल इतना कहते कि गुरु बड़े हैं, तो वह एक राय रह जाती और पाठक मान भी सकता था, न भी मानता। कारण जुड़ जाने पर वह राय एक तर्क बन जाती है, जिसे परखा जा सकता है। यही ढंग उत्तर लिखते समय भी काम आता है — अपनी बात कहिए, और उसके साथ एक वाक्य में कारण दीजिए।
तीसरे दोहे की कसौटी यह है कि बड़े होने का मूल्य इससे तय होता है कि उससे किसी का काम बनता है या नहीं। खजूर ऊँचा है, पर उसके पत्ते ऊपर रहते हैं और फल हाथ से बहुत दूर लगते हैं। इसलिए थका हुआ राहगीर उसके नीचे रुककर भी कुछ नहीं पाता। पहला उदाहरण कक्षा के मॉनीटर का चुनाव है। सबसे ऊँचे अंक लाने वाला किसी को समझाने में समय न दे, और दूसरा अंक में पीछे होकर भी सबकी मदद करे, तो इस कसौटी पर दूसरा आगे निकलेगा। दूसरा उदाहरण घर के बड़े सदस्य का है। बड़ा होने का अर्थ केवल उम्र नहीं है। अर्थ यह है कि छोटे उसके पास अपनी कठिनाई लेकर जा सकें।
Flashcards (17)
Play this topic
- दूसरे दोहे के तीन क़दम क्रम में लगाइए
- शब्द और अर्थ
- सही या भ्रम
- किस दोहे की बात
- झटपट उत्तर
अति और वाणी
चौथा दोहा चार उदाहरणों से मात्रा की कसौटी देता है — न अधिक बोलना, न अधिक चुप रहना, न अधिक वर्षा, न अधिक धूप। पाँचवाँ दोहा ढंग की कसौटी देता है, और बताता है कि अहं हटाकर कही गई बात सुनने वाले को भी शांति देती है और बोलने वाले को भी।
What you will be able to do
- अति, बानी, आपा, औरन और सीतल शब्दों का अर्थ लिख सकूँगा।
- चौथे दोहे के चार उदाहरण गिनाकर उनका साझा संकेत बता सकूँगा।
- आदत वाले और मौसम वाले उदाहरणों का अंतर समझा सकूँगा।
- पाँचवें दोहे की शर्त और उसका दोहरा लाभ अपने शब्दों में लिख सकूँगा।
- दोनों दोहों की कसौटी अपनी बोली और इंटरनेट की आदत पर लगा सकूँगा।
Key points
चौथे दोहे के चारों टुकड़े एक ही शब्द से शुरू होते हैं, और इससे बात भूली नहीं जाती।
अति का अर्थ है हद से आगे; दोहा चीज़ को नहीं, उसकी मात्रा को दोष देता है।
चार उदाहरणों में दो आदत से जुड़े हैं और दो मौसम से, जिन पर किसी का वश नहीं।
बहुत बोलने से बात का वज़न घटता है और ज़रूरी बात ढेर में दब जाती है।
बहुत चुप रहने से ज़रूरी बात समय पर बाहर नहीं आती और भ्रम बढ़ता है।
चारों उदाहरण एक ही दिशा में इशारा करते हैं, और वह दिशा संतुलन है।
पाँचवाँ दोहा शर्त रखता है कि बोली अहं को एक ओर रखकर निकले।
मीठी बोली सुनने वाले को शांति देती है, और वही शांति लौटकर आती है।
चौथा दोहा बताता है कितना बोलें, और पाँचवाँ बताता है कैसे बोलें।
Full explanation
चौथा दोहा — चार बार एक ही शब्द
चौथा दोहा कहता है — अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप। फिर उसी ढंग से आगे बढ़ता है — अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप। ध्यान दीजिए, दोहे के चारों टुकड़े एक ही शब्द से शुरू होते हैं — अति। यह संयोग नहीं है। एक ही शब्द चार बार आने से एक ठोक-सी बन जाती है, जैसे कोई बात चार बार गिनाकर कही जा रही हो। पढ़ने वाला उसे भूल नहीं पाता।
अति का अर्थ
अति का अर्थ है हद से आगे, आवश्यकता से अधिक। ध्यान देने की बात यह है कि दोहा किसी चीज़ को बुरा नहीं कह रहा। बोलना बुरा नहीं है, चुप रहना बुरा नहीं है, वर्षा बुरी नहीं है और धूप भी बुरी नहीं है। जो बुरा बताया जा रहा है, वह मात्रा है। चारों जगह दोष चीज़ में नहीं, उसकी हद में है। यही इस दोहे की सबसे बारीक बात है।
दो आदतें और दो मौसम
चारों उदाहरणों को ध्यान से देखिए। पहले दो — बोलना और चुप रहना — मनुष्य की आदत से जुड़े हैं। पिछले दो — वर्षा और धूप — मौसम से जुड़े हैं, जिन पर किसी का वश नहीं। कबीर दोनों तरह की चीज़ें एक साथ रख देते हैं, और इससे उनकी बात बड़ी हो जाती है। वे यह नहीं कह रहे कि अपनी आदत सुधार लो; वे कह रहे हैं कि यह नियम प्रकृति पर भी वैसे ही लागू है।
बहुत बोलने से क्या होता है
जो बहुत बोलता है, उसकी बात का वज़न घट जाता है। सुनने वाला थकने लगता है और धीरे-धीरे ध्यान हटा लेता है। ऐसे व्यक्ति की ज़रूरी बात भी उसी ढेर में दब जाती है, क्योंकि सुनने वाले को पता ही नहीं चलता कि कौन-सी बात काम की थी। बहुत बोलने का नुक़सान दूसरों को नहीं, बोलने वाले को ही होता है।
बहुत चुप रहने से क्या होता है
दूसरी ओर जो बहुत चुप रहता है, उसकी ज़रूरी बात समय पर बाहर नहीं आती। किसी को यह पता नहीं चलता कि उसे क्या कठिनाई है या वह किस बात से सहमत नहीं है। इससे भ्रम बढ़ता है और कई बार दूसरे लोग अपने मन से कोई अर्थ निकाल लेते हैं। कक्षा में भी यही होता है — जो प्रश्न नहीं पूछता, उसकी शंका बनी रह जाती है।
वर्षा और धूप की हद
अब मौसम वाले दो उदाहरण देखिए। वर्षा फ़सल के लिए आवश्यक है, पर आवश्यकता से अधिक हो जाए तो खेत डूब जाते हैं और फ़सल बैठ जाती है। धूप भी आवश्यक है, पर हद से आगे बढ़ जाए तो ज़मीन सूख जाती है और पानी घटने लगता है। दोनों ही स्थितियों में नुक़सान उसी चीज़ से होता है जो कम मात्रा में वरदान थी।
चारों पर एक ही कसौटी
इन चारों उदाहरणों से एक ही कसौटी निकलती है, और वह है संतुलन। न अधिक, न बिलकुल कम। कबीर इस शब्द को कहीं लिखते नहीं, फिर भी वह दोहे से अपने आप निकल आता है — क्योंकि चार उदाहरण एक ही दिशा में इशारा कर रहे हैं। यह कहने का बहुत चतुर ढंग है: निष्कर्ष पढ़ने वाले को निकालने दिया जाता है।
पाँचवाँ दोहा — कैसी बोली
पाँचवाँ दोहा कहता है — ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। बानी यानी बोली या वाणी, और आपा यानी अपना अहं। कबीर एक शर्त रख रहे हैं: बोली ऐसी हो जो अहं को एक ओर रखकर निकले। इसका अर्थ यह नहीं है कि अपनी बात छोड़ दी जाए। अर्थ यह है कि बात कहते समय अपने बड़े होने का भाव बीच में न आए, क्योंकि वही भाव शब्दों को कड़वा कर देता है।
दूसरी पंक्ति — दो तरफ़ का लाभ
दूसरी पंक्ति कहती है — औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय। औरन यानी दूसरे लोग, सीतल यानी ठंडा या शांत, और आपहुँ यानी स्वयं भी। यानी मीठी बोली सुनने वाले को शांति देती है, और वही शांति बोलने वाले के पास लौट आती है। यह दोहे का सबसे सुंदर मोड़ है, क्योंकि लाभ एक तरफ़ा नहीं रखा गया।
शीतलता वाला चित्र
कबीर ने शांति के लिए ठंडक का चित्र चुना है, और यह चुनाव सोचा हुआ है। क्रोध को लोग गरमी से जोड़ते हैं — आँखें लाल होना, चेहरा तपना। उसके ठीक उलट ठंडक रखकर कबीर बात को शरीर के अनुभव से जोड़ देते हैं। ऐसी तुलना याद रखने में आसान होती है, क्योंकि उसे समझने के लिए किसी व्याख्या की ज़रूरत नहीं पड़ती।
दोनों दोहे मिलकर क्या कहते हैं
चौथा दोहा मात्रा की बात करता है — कितना बोला जाए। पाँचवाँ दोहा ढंग की बात करता है — कैसे बोला जाए। दोनों मिलकर वाणी की पूरी शिक्षा बन जाते हैं। केवल कम बोलना काफ़ी नहीं, क्योंकि थोड़े शब्द भी कड़वे हो सकते हैं। और केवल मीठा बोलना काफ़ी नहीं, क्योंकि मीठी बात भी हद से अधिक हो जाए तो बोझ बन जाती है।
एक कठिन सवाल
यहाँ एक सवाल उठता है, और पुस्तक भी वही पूछती है: क्या कभी कड़वा बोलना आवश्यक हो सकता है? ध्यान से देखिए तो कबीर कड़वे बोलने से मना नहीं करते; वे अहं के साथ बोलने से मना करते हैं। किसी को ख़तरे से रोकने के लिए कही गई तेज़ बात में अहं नहीं होता, चिंता होती है। इसलिए दोहा ऐसी बात के विरुद्ध नहीं जाता।
इंटरनेट पर अति
पुस्तक इसी दोहे को आज की एक आदत से जोड़ती है। इंटरनेट पर अपनी बातें और सूचनाएँ बिना सोचे साझा करना बहुत बोलने जैसा ही है। उसमें दो ख़तरे हैं — पहला, अपनी निजी बातें अनजान लोगों तक पहुँच जाती हैं; दूसरा, काम की बात ढेर में दब जाती है। चौथा दोहा पाँच सौ साल पहले इसी हद की बात कर रहा था।
शब्द जो आज नहीं बोले जाते
इन दो दोहों में कई शब्द आज की हिंदी में नहीं मिलते — बानी, आपा, औरन, सीतल, आपहुँ। इनमें से कुछ पहचाने जा सकते हैं, क्योंकि आज के शब्द उनसे मिलते-जुलते हैं: बानी से वाणी, सीतल से शीतल, औरन से और लोग। पढ़ते समय इस मेल को देख लेना अच्छी आदत है, क्योंकि इससे पुराने पाठ अपने आप खुलने लगते हैं।
Concepts and terms
हद से आगे, आवश्यकता से अधिक। चौथे दोहे में यह शब्द चार बार आता है, और हर बार दोष चीज़ में नहीं उसकी मात्रा में बताया जाता है।
न अधिक और न बिलकुल कम होने की स्थिति। दोहे में यह शब्द कहीं लिखा नहीं है, फिर भी चारों उदाहरण उसी दिशा में इशारा करते हैं।
बोली या वाणी। पाँचवाँ दोहा इसी पर शर्त रखता है, और आज की हिंदी का वाणी शब्द इसी पुराने रूप से मिलता है।
अपना अहं या बड़े होने का भाव। दोहा यह नहीं कहता कि अपनी बात छोड़ दो; वह कहता है कि बात कहते समय यह भाव बीच में न आए।
ठंडा या शांत। कबीर शांति के लिए ठंडक का चित्र चुनते हैं, क्योंकि क्रोध को लोग गरमी से जोड़कर देखते हैं।
सावधान
भ्रम और सच
मिलाकर देखो
Scenario:
एक विद्यार्थी के पास नया फ़ोन आया है। वह दिन भर अपनी हर गतिविधि साझा करता रहता है — कहाँ गया, कितने बजे लौटा, किस कक्षा में कौन अनुपस्थित था। उसके समूह में रोज़ पंद्रह-बीस संदेश उसी के होते हैं। कुछ दिन बाद उसे एक अनजान संदेश आता है जिसमें उसके घर का रास्ता और उसका रोज़ का समय लिखा हुआ है। उसी सप्ताह उसने परीक्षा के विषय में एक ज़रूरी सूचना भी उसी समूह में भेजी थी, पर उसे किसी ने नहीं पढ़ा। पूछने पर एक साथी कहता है कि उसके संदेश अब कोई खोलकर नहीं देखता।
Analysis:
ध्यान दीजिए कि इस प्रसंग में दोनों परिणाम अलग तरह के हैं। पहला निजता का नुक़सान है, जो दोहे में सीधे नहीं आता। दूसरा ठीक वही है जो दोहा बताता है। एक पुराना दोहा किसी नई आदत पर पूरी तरह नहीं, आंशिक रूप से लागू होता है — और इसे पहचान लेना ही ठीक पढ़ना है।
Activity:
अपने एक सप्ताह की ऐसी पाँच बातें लिखिए जो आप साझा करना चाहेंगे, और हर एक के आगे लिखिए कि वह किसके काम आएगी।
करके देखो
Title:
एक ही बात, दो स्वर
Safety:
किसी सामग्री की आवश्यकता नहीं है; केवल लिखना है।
What You Notice:
शिकायत दोनों बार वही रहती है, पर उत्तर अलग मिलता है। इसी से पता चलता है कि दोहे की शर्त बात पर नहीं, स्वर पर है।
Did you know
किसी बात को ज़ोर देने के लिए एक ही शब्द से कई टुकड़े शुरू करना एक पहचाना हुआ शिल्प है। हिंदी में इसे अनुप्रास कहा जाता है।
खेती में वर्षा की मात्रा नापी जाती है, और उसे मिलीमीटर में गिना जाता है। एक ही फ़सल के लिए कम वर्षा और अधिक वर्षा, दोनों हानिकारक मानी जाती हैं।
Memory tricks
चार अति याद रखने का सूत्र — बो–चु–ब–धू — बोलना, चुप, बरसना, धूप। पहले दो हमारी आदत के, पिछले दो मौसम के। चारों पर एक ही कसौटी लगती है, और वह है संतुलन।
Practice MCQs with answers (25)
- A भला
- B अति
- C चूप
- D धूप
Show answer
Why:
चारों टुकड़े एक ही शब्द से शुरू होते हैं, और इससे एक ठोक बन जाती है।
- A आवश्यकता से अधिक
- B आवश्यकता से कुछ कम
- C ठीक उतना ही, जितना चाहिए
- D जिसकी आवश्यकता ही न हो
Show answer
Why:
अति का अर्थ है हद से आगे या आवश्यकता से अधिक।
- A वर्षा और धूप, दोनों मौसमों को बुरा बताता है
- B बोलने और चुप रहने, दोनों आदतों को बुरा बताता है
- C किसी को नहीं, वह इनकी मात्रा को बुरा बताता है
- D चारों को ही एक जैसा बुरा बता देता है
Show answer
Why:
दोष चीज़ में नहीं, उसकी हद में बताया गया है।
- A बहुत चुप रहना और बहुत धूप होना
- B बहुत वर्षा होना और बहुत धूप होना
- C बहुत बोलना और बहुत वर्षा होना
- D बहुत बोलना और बहुत चुप रहना
Show answer
Why:
पहले दो आदत से जुड़े हैं और पिछले दो मौसम से।
- A बात केवल अपनी आदत सुधारने तक रह जाती है
- B नियम प्रकृति पर भी लागू दिखने लगता है
- C दोहे की लय पहले से कमज़ोर पड़ जाती है
- D उदाहरण आपस में उलझकर अर्थ बिगाड़ देते हैं
Show answer
Why:
वे यह नहीं कहते कि केवल आदत सुधारो; नियम मौसम पर भी वैसे ही लागू है।
- A उसकी ज़रूरी बात भी उसी ढेर में दब जाएगी
- B उसकी हर बात सबको पहले से अधिक याद रहेगी
- C उसकी बात का वज़न पहले से बढ़ता चला जाएगा
- D उस पर इस दोहे की कोई बात लागू नहीं होगी
Show answer
Why:
बहुत बोलने से बात का वज़न घटता है और सुनने वाला ध्यान हटा लेता है।
- A उसकी शंका शिक्षक को अपने आप पता चल जाएगी
- B उसकी शंका समय के साथ अपने आप मिट जाएगी
- C उसकी शंका बनी रह जाएगी और भ्रम बढ़ता जाएगा
- D उस पर इस दोहे की कोई बात लागू नहीं होगी
Show answer
Why:
बहुत चुप रहने पर ज़रूरी बात समय पर बाहर नहीं आती।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
दोनों सही हैं, और कारण सचमुच अभिकथन को समझा देता है।
- A उदारता
- B परिश्रम
- C विनय
- D संतुलन
Show answer
Why:
न अधिक, न बिलकुल कम — यही चारों उदाहरणों की दिशा है।
- A दोहे के अंत में वह शब्द संकेत से रख दिया गया है
- B चारों उदाहरण एक ही दिशा में इशारा कर रहे हैं
- C वह शब्द उस समय की भाषा में प्रचलित ही नहीं था
- D पाठ के नीचे दी गई टिप्पणी में वह लिखा हुआ है
Show answer
Why:
निष्कर्ष पढ़ने वाले को निकालने दिया जाता है, और यही कहने का चतुर ढंग है।
- A आदत और अहं
- B बोली और आदत
- C बोली और अहं
- D बोली और अपनापन
Show answer
Why:
बानी यानी बोली या वाणी, और आपा यानी अपना अहं।
- A वह अपनी बात छोड़कर निकले
- B वह सदा बहुत धीमी आवाज़ में निकले
- C वह केवल बड़े लोगों के सामने निकले
- D वह अहं को एक ओर रखकर निकले
Show answer
Why:
शर्त अहं की है, अपनी बात छोड़ने की नहीं।
- A केवल उस व्यक्ति को, जो उसे सुनता है
- B सुनने वाले को, और बोलने वाले को भी
- C केवल उस व्यक्ति को, जो उसे बोलता है
- D किसी को नहीं, वह केवल एक आदत है
Show answer
Why:
सुनने वाले को शांति मिलती है, और वही शांति बोलने वाले के पास लौट आती है।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C केवल I और III
- D I, II और III
Show answer
Why:
I और II सही हैं। III ग़लत है — लाभ बोलने वाले को भी बताया गया है।
- A क्योंकि ठंडक वाला शब्द दोहे में छोटा पड़ता था
- B क्योंकि उस समय गरमी का मौसम चल रहा था
- C क्योंकि क्रोध को लोग गरमी से जोड़कर देखते हैं
- D क्योंकि शांति का कोई दूसरा शब्द ही नहीं था
Show answer
Why:
उलटा चित्र रखकर बात शरीर के अनुभव से जुड़ जाती है और याद रह जाती है।
- A दोनों ही केवल कैसे बोलें, यह बताते हैं
- B चौथा कैसे बोलें, पाँचवाँ कितना बोलें
- C दोनों ही केवल कितना बोलें, यह बताते हैं
- D चौथा कितना बोलें, पाँचवाँ कैसे बोलें
Show answer
Why:
एक मात्रा की बात करता है और दूसरा ढंग की; दोनों मिलकर पूरी शिक्षा बनते हैं।
- A कम बोलने की बात इन दोनों दोहों में कहीं नहीं आती
- B थोड़े शब्द भी कड़वे हो सकते हैं, इसलिए ढंग भी चाहिए
- C कम बोलना सचमुच पूरी शिक्षा मान लिया जा सकता है
- D कम बोलना केवल वर्षा और धूप पर लागू होता है
Show answer
Why:
चौथा दोहा मात्रा सँभालता है और पाँचवाँ ढंग; एक के बिना दूसरा अधूरा है।
- A नहीं, क्योंकि उस आवाज़ में अहं नहीं, चिंता थी
- B हाँ, क्योंकि दोहा तेज़ आवाज़ से सीधे मना करता है
- C हाँ, क्योंकि दोहा केवल मीठी बोली की अनुमति देता है
- D नहीं, क्योंकि दोहा केवल कक्षा के भीतर लागू होता है
Show answer
Why:
कबीर कड़वे बोलने से नहीं, अहं के साथ बोलने से मना करते हैं।
- A इंटरनेट का प्रयोग पूरी तरह छोड़ देने से
- B किसी वेबसाइट को बार-बार खोलते रहने से
- C बिना सोचे सूचनाएँ साझा करते चले जाने से
- D इंटरनेट पर केवल पढ़ाई करते रहने से
Show answer
Why:
बिना सोचे साझा करना बहुत बोलने जैसा ही है।
- A काम की बात दब जाना, और बिल बढ़ जाना
- B इंटरनेट धीमा हो जाना, और बिल बढ़ जाना
- C निजी बातें फैल जाना, और इंटरनेट धीमा होना
- D निजी बातें फैल जाना, और काम की बात दब जाना
Show answer
Why:
पहला ख़तरा निजता का है और दूसरा ठीक वही है जो बहुत बोलने में होता है।
- A वाणी, सरल, और लोग
- B वाणी, शीतल, और लोग
- C वाणी, शीतल, अपने लोग
- D बात, शीतल, और लोग
Show answer
Why:
पुराने और नए रूप का मेल देख लेने से पुराने पाठ अपने आप खुलने लगते हैं।
- A एक ठोक, जिससे बात भूली नहीं जाती
- B एक दोहराव, जिससे दोहा लंबा हो जाता है
- C एक कठिनाई, जिससे अर्थ समझना मुश्किल होता है
- D एक भूल, जिसे कवि सुधार नहीं पाए
Show answer
Why:
जैसे कोई बात चार बार गिनाकर कही जा रही हो।
- A कड़वी बात कहने पर कोई परिणाम नहीं होता है
- B कही गई बात केवल सुनने वाले तक ही रह जाती है
- C कही गई बात बोलने वाले के पास भी लौटकर आती है
- D झगड़े में बोली की कोई भूमिका नहीं होती है
Show answer
Why:
दोहे का मोड़ यही है — ठंडक हो या जलन, वह लौटकर आती है।
- A एक लंबी कहानी सुनाकर, अंत में अर्थ देकर
- B पहले निष्कर्ष लिखकर, फिर उदाहरण देकर
- C कोई उदाहरण न देकर, सीधा आदेश देकर
- D उदाहरण रखकर, निष्कर्ष पाठक पर छोड़कर
Show answer
Why:
चार उदाहरण एक दिशा में इशारा करते हैं, और शब्द पाठक के मन में बनता है।
- A ऊँचाई
- B माप
- C भक्ति
- D परिश्रम
Show answer
Why:
एक दोहा कितना बोलें का माप देता है और दूसरा कैसे बोलें का।
Important short questions (7)
क्योंकि इससे एक ठोक बन जाती है, जैसे कोई बात चार बार गिनाकर कही जा रही हो। एक शब्द बार-बार सुनाई देने से पढ़ने वाला उसे भूल नहीं पाता, और चारों उदाहरण एक ही दिशा में बँध जाते हैं।
यह कि दोष चीज़ में नहीं, उसकी हद में बताया गया है। बोलना, चुप रहना, वर्षा और धूप — इनमें कुछ भी बुरा नहीं कहा गया। बुरी केवल इनकी मात्रा बताई गई है।
इससे कबीर की बात आदत सुधारने की सलाह से आगे बढ़ जाती है। वर्षा और धूप पर किसी का वश नहीं है, फिर भी वही नियम उन पर लागू दिखता है, इसलिए बात एक सामान्य नियम बन जाती है।
बहुत बोलने से बात का वज़न घट जाता है। ज़रूरी बात भी उसी ढेर में दब जाती है। बहुत चुप रहने से ज़रूरी बात समय पर बाहर नहीं आती। किसी को कठिनाई का पता नहीं चलता, और भ्रम बढ़ता जाता है।
शर्त यह है कि बोली अहं को एक ओर रखकर निकले। इसका अर्थ अपनी बात छोड़ देना नहीं है। अर्थ यह है कि बात कहते समय अपने बड़े होने का भाव बीच में न आए। वही भाव शब्दों को कड़वा करता है।
क्योंकि दूसरी पंक्ति दोनों तरफ़ की बात करती है। बोली सुनने वाले को शांति देती है, और वही शांति बोलने वाले के पास लौट आती है। यही दोहे का सबसे सुंदर मोड़ है।
बिना सोचे सूचनाएँ साझा करते चले जाने से, जो बहुत बोलने जैसा ही है। इसमें दो ख़तरे हैं — निजी बातें अनजान लोगों तक पहुँच जाती हैं, और काम की बात ढेर में दब जाती है।
Long answer questions (3)
दोहा चार उदाहरण देता है और चारों में वही बात दोहराता है। पहला उदाहरण बोलना है। बोलना बुरा नहीं है, क्योंकि बोले बिना कोई बात किसी तक पहुँच ही नहीं सकती; बुरा तब होता है जब वह हद पार कर जाए और बात का वज़न घटा दे। दूसरा उदाहरण चुप रहना है। चुप रहना भी बुरा नहीं है, क्योंकि कई बार रुककर सुनना ही ठीक होता है; बुरा तब होता है जब ज़रूरी बात समय पर बाहर न आए और भ्रम बढ़ जाए। तीसरा उदाहरण वर्षा है, जो फ़सल के लिए आवश्यक है, पर अधिक होकर खेत डुबो देती है। चौथा उदाहरण धूप है, जो भी आवश्यक है, पर हद से आगे बढ़कर ज़मीन सुखा देती है। चारों जगह एक ही बात दिखती है — जो कम मात्रा में वरदान थी, वही अधिक होकर नुक़सान बन गई। इसलिए दोहा किसी चीज़ का विरोध नहीं करता।
पहली पंक्ति शर्त रखती है कि बोली अहं को एक ओर रखकर निकले। दूसरी पंक्ति उसका परिणाम बताती है, और वहीं दोहे का मोड़ है। कहा जाता है कि ऐसी बोली सुनने वाले को शांति देती है, और वही शांति बोलने वाले के पास भी लौट आती है। यानी लाभ एक तरफ़ा नहीं है। इसका कारण समझना कठिन नहीं। कड़वी बात कहने के बाद सामने वाला भी वैसा ही उत्तर देता है, और वातावरण बिगड़ जाता है; उस बिगड़े वातावरण में बोलने वाला भी रहता है। उदाहरण के लिए, घर में किसी छोटी बात पर तेज़ स्वर में उत्तर दे दिया जाए तो अगले कई घंटे सबका मन भारी रहता है, और कहने वाले का भी। उसी बात को शांत स्वर में कह दिया जाए तो काम भी हो जाता है।
चौथा दोहा मात्रा की बात करता है और पाँचवाँ ढंग की, और इसी कारण दोनों मिलकर पूरी शिक्षा बनते हैं। पहले दोहे से यह सीख मिलती है कि कितना बोला जाए — न इतना कि बात का वज़न घट जाए, और न इतना कम कि ज़रूरी बात ही रह जाए। दूसरे दोहे से यह सीख मिलती है कि कैसे बोला जाए — अहं को एक ओर रखकर, ऐसी बोली में जो सुनने वाले को शांति दे। अकेली कोई एक सीख काम नहीं करती। केवल कम बोलने से बात नहीं बनती। थोड़े शब्द भी कड़वे हो सकते हैं। केवल मीठा बोलने से भी नहीं बनती। मीठी बात भी हद से अधिक हो जाए तो बोझ लगने लगती है। दोनों को साथ रखकर एक कसौटी बनती है, जो आज की आदतों पर भी लगती है।
Flashcards (17)
Play this topic
- किस तरह का उदाहरण
- शब्द और अर्थ
- सही या भ्रम
- पाँचवें दोहे का क्रम लगाइए
- झटपट उत्तर
निंदक, सूप और संगति
छठा दोहा कमी बताने वाले को पास रखने की उलटी सलाह देता है, सातवाँ सूप की उपमा से विवेक सिखाता है, और आठवाँ मन को पंछी कहकर संगति का हिसाब जोड़ देता है। अंत में कबीर, उनकी भाषा और दोहे से कहावत बनने की बात आती है।
What you will be able to do
- निंदक, नियरे, निर्मल, सुभाय, सार और थोथा शब्दों के अर्थ लिख सकूँगा।
- छठे दोहे की सलाह और उसका कारण अपने शब्दों में समझा सकूँगा।
- सूप की उपमा खोलकर बता सकूँगा कि वह विवेक का प्रतीक कैसे बनता है।
- मन और संगति वाले दोहे की दोनों पंक्तियों का संबंध बता सकूँगा।
- कबीर के जीवन, भाषा और दोहे से कहावत बनने की बात लिख सकूँगा।
Key points
निंदक वह है जो कमी बताता है, और नियरे का अर्थ पास है।
दोहा कहता है कि ऐसे व्यक्ति के लिए आँगन में ही कुटी छवा दीजिए।
निंदक स्वभाव साफ़ कर देता है, और उसके लिए पानी-साबुन नहीं चाहिए।
सूप वह चौड़ी डलिया है जिससे अनाज फटका जाता है और छिलके उड़ जाते हैं।
सार यानी काम की चीज़ रोक ली जाती है और थोथा यानी खोखली चीज़ उड़ा दी जाती है।
सूप विवेक का प्रतीक है, क्योंकि वह फेंकता नहीं बल्कि छानता है।
मन को पंछी कहकर उसका स्वभाव बताया जाता है — वह बँधता नहीं।
दूसरी पंक्ति हिसाब जोड़ देती है — जैसा साथ, वैसा फल।
उसी पंक्ति से कहावत बनी, और कहावत थोड़े शब्दों में गहरा अनुभव बाँध देती है।
Full explanation
छठा दोहा — एक उलटी सलाह
छठा दोहा कहता है — निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। निंदक वह है जो आपकी कमी बताता है, और नियरे का अर्थ है पास। कबीर कह रहे हैं कि ऐसे व्यक्ति को पास रखिए — बल्कि अपने आँगन में ही उसके लिए एक छोटी कुटी छवा दीजिए। यह सलाह पहली बार पढ़ने पर उलटी लगती है, क्योंकि जो हमारी कमी बताए, उससे लोग दूर हटना चाहते हैं। दोहा ठीक उसका उलटा कहता है।
साबुन के बिना सफ़ाई
दूसरी पंक्ति कारण बताती है — बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय। निर्मल का अर्थ है साफ़, और सुभाय का अर्थ है स्वभाव। कबीर कहते हैं कि निंदक आपका स्वभाव साफ़ कर देता है, और उसके लिए उसे पानी-साबुन भी नहीं चाहिए। तुलना बहुत सधी हुई है: कपड़े की सफ़ाई में सामग्री लगती है, स्वभाव की सफ़ाई में केवल कोई बताने वाला चाहिए।
निंदक और आलोचक का अंतर
यहाँ एक बात ध्यान से समझनी है। कबीर हर बुरा बोलने वाले को पास रखने की बात नहीं कर रहे। जो व्यक्ति केवल नीचा दिखाने के लिए कहता है, वह कुछ साफ़ नहीं करता। दोहा उस व्यक्ति की ओर इशारा करता है जो कमी बताता है और इससे सुधरने का अवसर मिलता है। इसलिए पढ़ते समय नीयत देखनी पड़ती है, केवल शब्द नहीं।
सातवाँ दोहा — सूप जैसा स्वभाव
सातवाँ दोहा कहता है — साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सूप वह चौड़ी डलिया है जिससे गाँवों में अनाज फटका जाता है। उसे हिलाने पर भारी दाने भीतर रह जाते हैं और हल्के छिलके हवा में उड़ जाते हैं। कबीर कहते हैं कि अच्छे व्यक्ति का स्वभाव ऐसा ही होना चाहिए। उपमा रोज़ के काम से उठाई गई है, इसलिए समझने में एक पल भी नहीं लगता।
सार और थोथा
दूसरी पंक्ति यह बताती है कि सूप करता क्या है — सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय। सार का अर्थ है काम की चीज़ और थोथा का अर्थ है खोखली चीज़। गहि रहना यानी पकड़ रखना। यानी काम की बात रोक ली जाती है और खोखली बात उड़ा दी जाती है। ध्यान दीजिए, सूप कुछ फेंकता नहीं — वह छानता है, और यही दोनों में अंतर है।
सूप किसका प्रतीक है
पुस्तक पूछती है कि सूप किसका प्रतीक है, और उत्तर है — विवेक का, यानी अच्छे और बुरे की पहचान का। विवेकशील व्यक्ति हर बात को न तो मान लेता है और न सब कुछ ठुकरा देता है; वह छानता है। आज यह बात और काम की हो गई है, क्योंकि इंटरनेट पर हर दिन इतनी जानकारी आती है कि बिना छाने उसे लेना ख़तरनाक होता है।
आठवाँ दोहा — मन एक पंछी
आठवाँ दोहा कहता है — कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय। भावै तहवाँ का अर्थ है जहाँ अच्छा लगे, वहीं। कबीर मन को पंछी कह देते हैं, और इस एक तुलना से मन का पूरा स्वभाव सामने आ जाता है — वह बँधता नहीं, उड़ जाता है, और जिधर उसका मन हो उधर चला जाता है। ध्यान दीजिए कि यहाँ भी कोई रोक नहीं लगाई जा रही; पहले केवल स्वभाव बताया जा रहा है।
संगति और फल
दूसरी पंक्ति परिणाम बताती है — जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय। संगति यानी साथ, वह संग जिसमें कोई रहता है। कबीर कहते हैं कि जैसा साथ होगा, वैसा ही फल मिलेगा। पहली पंक्ति में मन उड़ने के लिए स्वतंत्र था; दूसरी पंक्ति में उसी स्वतंत्रता का हिसाब आ जाता है। जहाँ उड़कर बैठेंगे, उसी का फल भुगतना पड़ेगा।
यह दोहा कहावत कैसे बन गया
इस दोहे की दूसरी पंक्ति इतनी प्रसिद्ध हुई कि वह कहावत की तरह बोली जाने लगी — जैसा संग, वैसा रंग। कहावत ऐसा छोटा वाक्य होता है जिसे लोग अपनी बात को अधिक असरदार बनाने के लिए बीच में रख देते हैं। उसमें जीवन का कोई गहरा अनुभव बहुत थोड़े शब्दों में बँध जाता है। दोहा और कहावत, दोनों में यही गुण है, इसलिए एक का दूसरे में बदल जाना स्वाभाविक था।
तीनों दोहों का साथ
इन तीनों दोहों को साथ रखकर देखिए तो एक क्रम बनता है। छठा दोहा बाहर से आने वाली बात के बारे में है — कमी बताने वाले को पास रखिए। सातवाँ दोहा भीतर की छनाई के बारे में है — जो आया, उसमें से सार रखिए। और आठवाँ दोहा साथ के बारे में है — जिसके संग रहेंगे, वही फल मिलेगा। सुनना, छानना, और संग चुनना — तीन क़दम।
कबीर कौन थे
कबीर पंद्रहवीं शताब्दी के संत कवि माने जाते हैं। उनका जीवन काशी से जुड़ा रहा और वे जुलाहे का काम करते थे, यानी कपड़ा बुनते थे। कहा जाता है कि स्वामी रामानंद उनके गुरु थे, और दूसरे दोहे में गुरु को दिया गया स्थान इसी से जोड़कर देखा जाता है। उनके बारे में प्रचलित बातें कई हैं और सब पर विद्वान एकमत नहीं, इसलिए उन्हें कहा जाता है के साथ कहना ही ठीक है।
बुनकर की भाषा
कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे, फिर भी उनकी भाषा में चित्र भरे हुए हैं — और वे चित्र बाज़ार और घर के हैं। सूप, तराज़ू, कपड़े की सफ़ाई, आँगन की कुटी, खजूर का पेड़। जो व्यक्ति दिन भर करघे पर बैठा हो, उसे यही चीज़ें दिखती हैं। इसी कारण उनके दोहे किसी शास्त्र जैसे नहीं लगते; वे बातचीत जैसे लगते हैं।
दोहे कैसे बचे रहे
कबीर ने अपने दोहे लिखकर नहीं रखे। सुनने वालों ने उन्हें याद रखा, आगे सुनाया, और बहुत बाद में उन्हें संग्रहों में लिखा गया। इस पाठ के दोहे भी एक ऐसे ही संग्रह से लिए गए हैं, जिसका संपादन अयोध्यासिंह उपाध्याय ने किया था। यही कारण है कि एक ही दोहे के शब्द अलग-अलग पुस्तकों में थोड़े बदले हुए मिल जाते हैं।
आठ दोहे, एक पहचान
पूरे पाठ के आठ दोहों को पीछे मुड़कर देखिए। हर दोहा दो पंक्तियों में एक तुलना रखता है और निष्कर्ष पाठक पर छोड़ देता है। कहीं तराज़ू है, कहीं पेड़, कहीं साबुन, कहीं सूप, कहीं पंछी। कबीर कोई उपदेश लंबा नहीं करते — वे एक चित्र सामने रख देते हैं और हट जाते हैं। पाँच सौ साल बाद भी वे चित्र काम कर रहे हैं, और यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है।
Concepts and terms
वह व्यक्ति जो किसी की कमी बताता है। दोहा उसी की बात कर रहा है जिसकी बात से सुधरने का अवसर मिलता है, केवल नीचा दिखाने वाले की नहीं।
अनाज फटकने की चौड़ी डलिया। हिलाने पर भारी दाने भीतर रह जाते हैं और हल्के छिलके उड़ जाते हैं, और यही छनाई सातवें दोहे की उपमा बनती है।
अच्छे और बुरे की पहचान। विवेकशील व्यक्ति हर बात न मान लेता है और न सब ठुकरा देता है; वह सूप की तरह छानता है।
वह साथ या संग जिसमें कोई रहता है। आठवाँ दोहा कहता है कि जैसा साथ होगा वैसा ही फल मिलेगा, इसलिए मन के उड़ने का हिसाब संगति से जुड़ जाता है।
ऐसा छोटा वाक्य जिसमें जीवन का कोई गहरा अनुभव थोड़े शब्दों में बँध जाता है। लोग उसे अपनी बात को असरदार बनाने के लिए बीच में रख देते हैं।
सावधान
भ्रम और सच
मिलाकर देखो
Scenario:
एक विद्यार्थी के समूह में एक संदेश आता है। उसमें लिखा है कि अगले सप्ताह से परीक्षा का तरीक़ा बदल रहा है। नीचे यह भी लिखा है कि इसे तुरंत सबको भेज दिया जाए। किसी ने यह नहीं बताया कि सूचना कहाँ से आई। उसी समूह में एक साथी कहता है कि उसने विद्यालय की सूचना-पट्ट पर ऐसा कुछ नहीं देखा। दूसरा साथी कहता है कि भेज देने में क्या हर्ज है। तीसरा कहता है कि वह घर जाकर अपने बड़े भाई से पूछ लेगा। बीस मिनट में वह संदेश चार और समूहों तक पहुँच जाता है।
Analysis:
ध्यान दीजिए कि दोहा आगे भेजने से मना नहीं करता। वह छानने को कहता है, और छानने के बाद जो सार बचे उसे रोकने को भी नहीं कहता। इसलिए इस प्रसंग का उत्तर संदेश मिटाना नहीं, पहले स्रोत देखना है।
Activity:
पिछले सप्ताह आपके पास आए ऐसे तीन संदेश लिखिए जिनका स्रोत पता नहीं था, और हर एक के आगे लिखिए कि आप उसे कैसे जाँचते।
करके देखो
Title:
कागज़ का सूप
Safety:
अनाज मुँह या नाक के पास न लाइए, और हिलाते समय हाथ धीमा रखिए।
What You Notice:
हल्के कागज़ के टुकड़े पहले हटते हैं और चने भीतर ही रहते हैं। दोहे की उपमा इसी भार के अंतर पर खड़ी है।
Did you know
सूप आज भी गाँवों में काम आता है, और उसे चलाने का ढंग सीखने में समय लगता है। हाथ की हल्की हरकत से ही छिलके अलग हो पाते हैं।
कबीर को मानने वाले आज भी कई जगहों पर मिलते हैं, और उनके पद गाकर सुनाए जाते हैं। इसी कारण एक ही पद के कई सुर मिलते हैं।
Memory tricks
तीन दोहे याद रखने का सूत्र — सु–छा–सं — सुनना, छानना, संग। छठा दोहा सुनने का, सातवाँ छानने का, आठवाँ संग चुनने का। तीन क़दम, और तीनों एक ही क्रम में आते हैं।
Practice MCQs with answers (25)
- A जो आपसे दूर रहता है
- B जो आपकी प्रशंसा करता है
- C जो आपकी कमी बताता है
- D जो आपका काम करता है
Show answer
Why:
निंदक वह है जो कमी बताता है, और उससे सुधरने का अवसर मिलता है।
- A दूर
- B पास
- C नीचे
- D पीछे
Show answer
Why:
नियरे का अर्थ पास है, इसलिए दोहा निंदक को पास रखने की बात कहता है।
- A क्योंकि वह सलाह दूसरी पंक्ति में बदल दी जाती है
- B क्योंकि दोहे में कोई कारण ही नहीं दिया गया है
- C क्योंकि उसमें आँगन और कुटी की बात आ जाती है
- D क्योंकि कमी बताने वाले से लोग दूर हटना चाहते हैं
Show answer
Why:
दोहा ठीक उसका उलटा कहता है जो लोग स्वाभाविक रूप से करते हैं।
- A साफ़ और स्वभाव
- B साफ़ और सुबह
- C सरल और स्वभाव
- D साफ़ और सुझाव
Show answer
Why:
निर्मल यानी साफ़ और सुभाय यानी स्वभाव।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
दोनों सही हैं, और कारण सचमुच अभिकथन को समझा देता है।
- A उसकी हर बात मानकर अपना स्वभाव अभी तुरंत ही बदल लेना चाहिए
- B उसे भी अपने आँगन में ही पास रख लेना चाहिए
- C वह कुछ साफ़ नहीं करता, इसलिए दोहा उसकी बात नहीं कर रहा
- D उसके बारे में दोहे में कोई अंतर नहीं बताया गया
Show answer
Why:
दोहा उस व्यक्ति की ओर इशारा करता है जिसकी बात से सुधरने का अवसर मिलता है।
- A पानी भरने के
- B अनाज फटकने के
- C कपड़ा बुनने के
- D आँगन बुहारने के
Show answer
Why:
सूप वह चौड़ी डलिया है जिससे गाँवों में अनाज फटका जाता है।
- A सारे दाने और छिलके भीतर ही रह जाते हैं
- B भारी दाने उड़ जाते हैं, हल्के छिलके भीतर रहते हैं
- C सारे दाने और छिलके एक साथ ही उड़ जाते हैं
- D भारी दाने भीतर रहते हैं, हल्के छिलके उड़ जाते हैं
Show answer
Why:
यही छनाई सातवें दोहे की पूरी उपमा का आधार है।
- A भारी चीज़ और सुंदर चीज़
- B बड़ी चीज़ और छोटी चीज़
- C काम की चीज़ और खोखली चीज़
- D नई चीज़ और कोई भी पुरानी चीज़
Show answer
Why:
सार रोक लिया जाता है और थोथा उड़ा दिया जाता है।
- A छानने में अधिक समय लगता है, फेंकने में कम
- B छानने में चुनाव होता है, फेंकने में केवल हटाना
- C छानना केवल अनाज के साथ ही किया जा सकता है
- D दोनों में कोई अंतर नहीं है, दोनों एक जैसे हैं
Show answer
Why:
विवेकशील व्यक्ति हर बात न मान लेता है और न सब ठुकरा देता है।
- A उदारता का
- B परिश्रम का
- C भक्ति का
- D विवेक का
Show answer
Why:
विवेक यानी अच्छे और बुरे की पहचान।
- A काम की बात रखकर खोखली बात छोड़ दूँगा
- B हर बात मानकर आगे साझा कर दूँगा
- C हर बात छोड़कर कुछ भी नहीं पढ़ूँगा
- D केवल सबसे लंबी बात को ही अपने पास रख लूँगा
Show answer
Why:
सूप की तरह छानना — न सब मानना, न सब ठुकराना।
- A नदी से
- B पवन से
- C पंछी से
- D दीपक से
Show answer
Why:
एक तुलना से मन का पूरा स्वभाव सामने आ जाता है।
- A जहाँ भीड़ हो, वहीं
- B जहाँ अच्छा लगे, वहीं
- C जहाँ ठंडक हो, वहीं
- D जहाँ कोई न हो, वहीं
Show answer
Why:
मन बँधता नहीं; जिधर उसका मन हो उधर चला जाता है।
- A उस स्वतंत्रता का कारण
- B उस स्वतंत्रता पर रोक
- C उस स्वतंत्रता की प्रशंसा
- D उस स्वतंत्रता का हिसाब
Show answer
Why:
जहाँ उड़कर बैठेंगे, उसी का फल भुगतना पड़ेगा।
- A साथ या संग
- B गीत या लय
- C गिनती या क्रम
- D सीख या उपदेश
Show answer
Why:
संगति वह संग है जिसमें कोई रहता है।
- A निंदक और आँगन वाला दोहा
- B सूप और थोथा वाला दोहा
- C मन और संगति वाला दोहा
- D इनमें से कोई दोहा नहीं
Show answer
Why:
जैसा साथ होगा, वैसा ही फल मिलेगा — यही आठवें दोहे की बात है।
- A जैसी करनी, वैसी भरनी
- B जैसा संग, वैसा रंग
- C जैसा देश, वैसा भेष
- D जैसी नीयत, वैसी बरकत
Show answer
Why:
वह पंक्ति इतनी प्रसिद्ध हुई कि कहावत की तरह बोली जाने लगी।
- A हर कहावत में कोई संख्या अवश्य आती है
- B बहुत लंबे वाक्य में पूरी कहानी आ जाती है
- C हर कहावत किसी एक कवि के नाम से चलती है
- D बहुत थोड़े शब्दों में गहरा अनुभव बँध जाता है
Show answer
Why:
लोग उसे अपनी बात को अधिक असरदार बनाने के लिए बीच में रख देते हैं।
- A सुनना, छानना, और संग चुनना
- B छानना, सुनना, और संग चुनना
- C संग चुनना, सुनना, और छानना
- D सुनना, संग चुनना, और छानना
Show answer
Why:
छठा बाहर से आने वाली बात का, सातवाँ छनाई का, आठवाँ साथ का।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C केवल I और III
- D I, II और III
Show answer
Why:
I और II सही हैं। III ग़लत है — वे कपड़ा बुनने का काम करते थे।
- A क्योंकि उन्हें इन चीज़ों के नाम याद करने थे
- B क्योंकि उस समय इसी विषय पर कविता लिखी जाती थी
- C क्योंकि वे रोज़ इन्हीं चीज़ों के बीच काम करते थे
- D क्योंकि उनके गुरु ने उन्हें यही विषय दिए थे
Show answer
Why:
जो दिन भर करघे पर बैठा हो, उसे यही चीज़ें दिखती हैं।
- A क्योंकि हर पुस्तक अलग भाषा में छपी थी
- B क्योंकि कबीर ने उन्हें लिखकर नहीं रखा था
- C क्योंकि हर संपादक ने उन्हें सुधार दिया था
- D क्योंकि दोहे समय के साथ लंबे होते गए थे
Show answer
Why:
सुनने वालों ने याद रखा, आगे सुनाया, और बहुत बाद में संग्रहों में लिखा गया।
- A श्यामसुंदर दास
- B रामचंद्र शुक्ल
- C महावीर प्रसाद द्विवेदी
- D अयोध्यासिंह उपाध्याय
Show answer
Why:
पाठ के नीचे दी गई टिप्पणी में इसी संग्रह का उल्लेख है।
- A हर दोहा किसी एक पेड़ या पक्षी का नाम अवश्य लेता है
- B हर दोहा अंत में एक स्पष्ट उपदेश लिखकर समझा देता है
- C हर दोहा एक तुलना रखकर निष्कर्ष पाठक पर छोड़ देता है
- D हर दोहा किसी गुरु के नाम से ही आरंभ कर दिया जाता है
Show answer
Why:
कहीं तराज़ू, कहीं पेड़, कहीं साबुन, कहीं सूप, कहीं पंछी।
Important short questions (7)
सलाह यह है कि कमी बताने वाले को पास रखिए, बल्कि आँगन में ही उसके लिए एक कुटी छवा दीजिए। कारण यह है कि वह आपका स्वभाव साफ़ कर देता है, और उसके लिए उसे पानी-साबुन भी नहीं चाहिए।
क्योंकि जो हमारी कमी बताए, उससे लोग स्वाभाविक रूप से दूर हटना चाहते हैं। दोहा ठीक उसका उलटा कहता है, और इसी कारण पहली बार पढ़ने पर वह चौंकाता है।
सूप वह चौड़ी डलिया है जिससे अनाज फटका जाता है। उसे हिलाने पर भारी दाने भीतर रह जाते हैं और हल्के छिलके उड़ जाते हैं। कबीर कहते हैं कि अच्छे व्यक्ति का स्वभाव ऐसा ही छानने वाला होना चाहिए।
छानने में चुनाव होता है और फेंकने में केवल हटाना। इसी से विवेक का अर्थ खुलता है — विवेकशील व्यक्ति हर बात न मान लेता है और न सब ठुकरा देता है।
पहली पंक्ति मन का स्वभाव बताती है — वह पंछी की तरह बँधता नहीं और जिधर उसका मन हो उधर चला जाता है। दूसरी पंक्ति उस स्वतंत्रता का हिसाब जोड़ देती है, क्योंकि जहाँ उड़कर बैठेंगे, उसी का फल मिलेगा।
क्योंकि दोहा और कहावत, दोनों में एक ही गुण है — बहुत थोड़े शब्दों में जीवन का कोई गहरा अनुभव बाँध देना। जो पंक्ति लोगों को याद रह गई, वह बातचीत में अपने आप उतर आई।
क्योंकि वे कपड़ा बुनने का काम करते थे और दिन भर इन्हीं चीज़ों के बीच रहते थे — सूप, तराज़ू, करघा, आँगन। इसी कारण उनके दोहे शास्त्र जैसे नहीं, बातचीत जैसे लगते हैं।
Long answer questions (3)
दोहा कहता है कि कमी बताने वाले को पास रखिए, और पहली बार पढ़ने पर यह बात हर बुरा बोलने वाले पर लागू दिख सकती है। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि ऐसा नहीं है। दोहे का कारण यह है कि निंदक स्वभाव साफ़ कर देता है, यानी उसकी बात से सुधरने का अवसर मिलता है। अब सोचिए, जो व्यक्ति केवल नीचा दिखाने के लिए कुछ कहता है, उसकी बात से क्या साफ़ होता है? कुछ नहीं। इसलिए वह दोहे के दायरे में ही नहीं आता। यह अंतर पहचानना आज अधिक ज़रूरी हो गया है, क्योंकि इंटरनेट पर कही गई कड़वी बातों में दोनों तरह की बातें मिली रहती हैं। एक जाँच काम आ सकती है — सुनने के बाद यह देखिए कि क्या उसमें कोई ऐसी बात है जिसे आप सुधार सकते हैं। यदि है, तो वह निंदक है; यदि नहीं, तो वह केवल शोर है।
सातवाँ दोहा सूप की उपमा से यह कहता है कि काम की बात रोक लीजिए और खोखली बात उड़ा दीजिए। यह बात आज अधिक काम की हो गई है, क्योंकि हर दिन सामने आने वाली जानकारी की मात्रा बहुत बढ़ गई है। पहला उदाहरण किसी विषय को पढ़ने का है। इंटरनेट पर एक ही प्रश्न के बीस उत्तर मिल जाते हैं, जिनमें कुछ किसी जानकार के लिखे होते हैं और कुछ केवल दोहराए हुए। इन्हें छानना पड़ता है — यह देखना पड़ता है कि बात कहाँ से आई और उसके साथ कोई प्रमाण है या नहीं। दूसरा उदाहरण किसी संदेश के आगे भेजने का है। कई संदेश डरा देने वाले होते हैं और कहते हैं कि इसे तुरंत आगे भेजिए। सूप की कसौटी यहाँ सीधी लगती है — पहले छानिए, फिर भेजिए। दोनों उदाहरणों में ध्यान देने की बात यही है कि छानने का अर्थ सब ठुकरा देना नहीं है।
आठों दोहों को पीछे मुड़कर देखें तो एक ढंग साफ़ दिखता है। हर दोहा दो पंक्तियों में एक तुलना या एक चित्र रखता है, और निष्कर्ष पढ़ने वाले पर छोड़ देता है। पहले दोहे में तराज़ू है — एक पलड़े में सच और तप, दूसरे में झूठ और पाप। तीसरे दोहे में एक ऊँचा पेड़ है, जिसके नीचे छाया नहीं बनती। छठे दोहे में कपड़े की सफ़ाई है, पर पानी और साबुन के बिना। सातवें में सूप है, जो सार रोक लेता है और थोथा उड़ा देता है। आठवें में एक पंछी है, जो जहाँ चाहे उड़ जाता है। इनमें कहीं भी यह नहीं लिखा जाता कि अब तुम्हें क्या करना चाहिए। चित्र सामने रखकर कबीर हट जाते हैं, और पढ़ने वाला अपने आप निष्कर्ष तक पहुँचता है।
Flashcards (17)
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- तीन दोहों का क्रम लगाइए
- शब्द और अर्थ
- सार या थोथा
- सही या भ्रम
- झटपट उत्तर
Class 8 Hindi Chapter 5 — frequently asked questions
दोहे में दो पंक्तियाँ होती हैं। हर पंक्ति बीच में एक जगह रुकती है। इस तरह पढ़ते समय चार टुकड़े सुनाई देते हैं। जगह छोटी है, इसलिए एक भी शब्द बेकार नहीं रखा जा सकता।
पहली तुलना सच और तप के बीच है — सच पर टिके रहना कठिन साधना के बराबर माना गया है। दूसरी तुलना झूठ और पाप के बीच है। दोनों तुलनाएँ एक ही पंक्ति में आमने-सामने रख दी गई हैं।
क्योंकि दोहे की शर्त सच है। जिसके भीतर सच बसा हो, उसे दिशा भीतर से मिलने लगती है। इस तरह सच केवल एक अच्छी आदत नहीं रह जाता, वह मार्ग दिखाने वाली चीज़ बन जाता है।
क्योंकि इससे एक ठोक बन जाती है, जैसे कोई बात चार बार गिनाकर कही जा रही हो। एक शब्द बार-बार सुनाई देने से पढ़ने वाला उसे भूल नहीं पाता, और चारों उदाहरण एक ही दिशा में बँध जाते हैं।
यह कि दोष चीज़ में नहीं, उसकी हद में बताया गया है। बोलना, चुप रहना, वर्षा और धूप — इनमें कुछ भी बुरा नहीं कहा गया। बुरी केवल इनकी मात्रा बताई गई है।
इससे कबीर की बात आदत सुधारने की सलाह से आगे बढ़ जाती है। वर्षा और धूप पर किसी का वश नहीं है, फिर भी वही नियम उन पर लागू दिखता है, इसलिए बात एक सामान्य नियम बन जाती है।
सलाह यह है कि कमी बताने वाले को पास रखिए, बल्कि आँगन में ही उसके लिए एक कुटी छवा दीजिए। कारण यह है कि वह आपका स्वभाव साफ़ कर देता है, और उसके लिए उसे पानी-साबुन भी नहीं चाहिए।
क्योंकि जो हमारी कमी बताए, उससे लोग स्वाभाविक रूप से दूर हटना चाहते हैं। दोहा ठीक उसका उलटा कहता है, और इसी कारण पहली बार पढ़ने पर वह चौंकाता है।
सूप वह चौड़ी डलिया है जिससे अनाज फटका जाता है। उसे हिलाने पर भारी दाने भीतर रह जाते हैं और हल्के छिलके उड़ जाते हैं। कबीर कहते हैं कि अच्छे व्यक्ति का स्वभाव ऐसा ही छानने वाला होना चाहिए।
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